Wednesday, December 24, 2008

नए वर्ष पर प्यार सहित, ये मेरे गीत तुम्हे अर्पण हैं !

बरसों पूर्व लिखा यह गीत बिना किसी बदलाव के प्रस्तुत कर रहा हूँ !


मन के सोये तार जगाती
याद तुम्हारी ऐसे आयी ,
ऐसी लगन लगी है मन में
गीत झरें बरसातों जैसे !
पहले भी थे गीत यही पर
गाने वाला मिला ना कोई
जबसे तुमने हाथ संभाला
इन गीतों की हुई सगाई
जीवन भर की सकल कमाई,
इन कागज़ के टुकडों में है
नए वर्ष पर प्यार सहित , ये मेरे गीत तुम्हें अर्पण है !

प्रश्न तुम्हारा याद मुझे है ,
क्या मैं दे सकता हूँ तुमको
मेरे पास बचा ही क्या है ?
जो दे मैं उऋण हो जाऊं
रहा अकेला जीवन भर मैं,
इस जग की सुनसान डगर पर
अगर सहारा तुम ना देते ,
बह जाता अथाह सागर में
बुरे दिनों की साथी,तुमको
और भेंट मैं क्या दे सकता !
मेरे आंसू से संचित , ये मेरे गीत  तुम्हे अर्पण हैं !

ऐसा कोई मिला ना जग में
जिसको मन का दर्द सुनाऊं
जग भर की वेदना लिए मैं
किसको गहरी टीस दिखाऊँ
जिसको समझा दोस्त वही
तिल तिल कर देता ज़हर मुझे
ऐसी चोट लगी है दिल पर
सारा जग बंजर लगता है !
और मानिनी क्या दे सकता,
तुमको इस बिखरे मन से मैं
विगत वर्ष की अन्तिम संध्या पर , ये गीत तुम्हे अर्पण है !

Tuesday, December 9, 2008

भारतीय संस्कार - सतीश सक्सेना

"भाषा और शब्‍दावली किसी व्‍यक्ति की संस्‍कारशीलता की परिचायक होती है । जोर से और फूहड भाषा में कही बात सच हो, यह कतई जरूरी नहीं ।आप अशिष्‍ट शब्‍दावली और भाषा वाली टिप्‍पणियां मत हटाइए । लोगों को मालूम हो जाने दीजिए कि कौन अपने दामाद को 'मेरी लडकी का घरवाला' और कौन 'हमारे जामाता' कह रहा है ।
जिन्‍हें भाषा के संस्‍कार नहीं मिले उनसे शालीनता, शिष्‍टता, सभ्‍यता की अपेक्षा कर आप उन पर अत्‍याचार कर रहे हैं ।वे आक्रोश के नहीं, दया के पात्र हैं । बीमार पर गुस्‍सा मत कीजिए ।"

श्री विष्णु वैरागी जी ने यह बेहतरीन प्रतिक्रिया दी है, रोशन के ब्लाग दिल एक पुराना सा म्यूज़ियम है पर लिखे एक लेख "टिप्पणियों में संयत भाषा का प्रयोग करें" पर !

मुझे याद आया कि हम अपने संस्कार किस कदर भूल गए हैं, मगर हिंदू धर्म की मूलभूत शिक्षाएं भूल कर भी, हम धर्मरक्षा की बातें खूब करते हैं, कौन है दोषी इस बीमारी का ? कौन है जिम्मेदार है हमारे बच्चों के मध्य परस्पर प्यार और बड़ों के प्रति सम्मान की भावना समाप्त करने का ?

उन लोगों को दोष मुक्त किया जा सकता है, जिनको किसी ने कभी प्यार ही नही किया, मगर उनके लिए क्या कहें जिनके माता,पिता,भाई,बहिन और बड़े वुजुर्ग सबके होते हुए भी , उनकी भावनाओं से, प्यार और ममता को , यही पाश्चात्य सभ्यता, जिसमे वे पढ़े और बड़े हुए , निगल गयी !

इसी सभ्यता का अनुकरण करते हुए नयी पीढी शायद कभी पछतावा भी न करे क्योंकि उन्होंने इस प्यार की गरमी और अपनत्व को कभी महसूस ही नही किया ! उनके लिए प्यार और स्नेह, केवल हाय, हेल्लो और थैंक्स तक ही सीमित है, फिर दोषी केवल वे परिवार हैं, जिनमें यह संस्कार कभी दिए ही नही गए और इन परिवारों में आपस में स्नेह का वह मज़बूत बंधन कहीं दीखता ही नही !आज के आधुनिक समय में, ऐसे लोगों से शिष्टता और शालीनता की अपेक्षा करने वाले को ही मूर्ख कहना उचित होगा !

Tuesday, December 2, 2008

नफरत या प्यार ?

मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे ! लेख के जवाब में प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं , उनमें से नफरत भरी कुछ प्रतिक्रियाओं ने जो मैंने प्रकाशित नही की, मुझे मजबूर किया यह जवाब देने को ! उक्त प्रतिक्रियाओं में से एक प्रतिक्रिया मेरे पुत्र की उम्र के एक नवजवान की है जिनकी लेखन शैली मुझे बहुत पसंद है ! सशक्त लेखनी का धनी, इस भारत पुत्र के प्रति मेरा यह कर्तव्य है कि मैं स्पष्टीकरण दूँ !
कृपया विश्वास करें कि लेखन के प्रति, मेरा किसी वर्ग विशेष के प्रति मोह या उसमें लोकप्रियता अर्जित करना बिल्कुल नही है ! आप प्रतिक्रियाएं अगर ध्यान से देखें तो इस देश के अल्पसंख्यक  बच्चों ने मेरी कभी तारीफ़ नहीं की जिससे मैं उत्साहित होकर यह लेख लिख रहा हूँ ! मगर यह लेख इस समय की पुकार हैं, और जो मैं समाज को समझाना (सर्व धर्म सद्भाव ) चाहता हूँ, उसी की सफलता में देश की नयी पीढी और आपकी अगली पीढी का स्वर्णिम भविष्य सुनिश्चित होगा !
  • उग्रवादियों के बारे में मेरी कोई सहानुभूति नही है, यह एक देश के प्रति, नफरत में अंधे पथभ्रष्ट नवयुवक हैं, जिन्होंने कुछ अच्छे वक्ता एवं तथाकथित धर्मगुरुओं का अँधा आदेश मानते हुए निर्दोष बच्चों, स्त्रियों वृद्धों के खिलाफ महज इसलिए हथियार उठा लिए क्योंकि उनके दिलोदिमाग में नफरत और सिर्फ़ नफरत भरी गयी है, और इन लड़कों की नासमझी यह कि इन्होने इसके पीछे छिपे वास्तविक उद्देश्य को जानने का प्रयत्न ही नही किया ! इनके तथाकथित आकाओं का प्रभामंडल व व्यक्तित्व इतना शक्तिशाली था कि इन युवकों में अपना स्वर्णिम भविष्य तथा अच्छा सोचने समझने की शक्ति आदि सब नष्ट हो गयी !
  • इन बहके हुए मार्गदर्शकों ने उनकी मौत हो जाने की दशा में उनके परिवार की सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए इन पढ़े लिखे मगर अपरिपक्व बुद्धि वाले नवजवानों को, नफरत की आग में जलने के लिए प्रोत्साहित किया और उनकी शिक्षा और बुधिमत्ता का उपयोग, अपने अनुयाइयों में अपना नाम कमाने में किया !
  • अमेरिका और भारत जैसे उदार देशों पर हमला करते समय यह मुखिया ख़ुद आगे नही आए बल्कि आप जैसे नवजवानों को इस नफरत की आग में झोंक दिया !
  • चूंकि आप जैसे नवजवान ईमानदार और वचनवद्ध होते हैं , उनका उपयोग विध्वंसक होगा ही , यह पुरानी घटिया मानसिकता वाले , एवं इन नवजवानों के लिए श्रद्धेय लोग , यह बात भली भांति जानते हैं ! एक वर्ग विशेष के प्रति नफरत में जलते हुए , इन काइयां , धूर्त और चालक धर्मगुरुओं ने श्रद्धा का दुरूपयोग करते हुए इन जवान लड़कों को निर्मम हत्यारा बना दिया !
  • आपकी उम्र के लोगों से अपनी इच्छा पूर्ति करवा पाना बहुत मुश्किल कार्य नही होता है , सवाल सिर्फ़ एक बार सामने वाले के प्रभाव में आने का है ! कृपया सोचें कि आपकी पीठ पर किसी और का नाम तो नही लिखा है ?
  • अल्पसंख्यक  बच्चे इसी देश के नागरिक हैं , बहुमत होने के कारण हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन पर शक न करें और दूसरों के बहकावे में आकर आपस में न लड़ें !
  • नफरत का जहर हमें गुस्से के कारण चैन से जीने नही देगा और वही नफरत एक दिन हमारे घर में भी जरूर घर कर जायेगी ! आप किसी नफरत करने वाले व्यक्ति का चेहरा और एक निश्छल व्यक्ति का सौम्य चेहरा ध्यान से देखें और जरा सोचें क्या फर्क है !
  • क्या कोई कौम दूसरी कौम को ख़त्म कर पाई है अगर नही तो फिर आप लोग इस नफरत को फैला कर सिर्फ़ अपनी आदतें और भविष्य ख़राब कर रहे हो जिसका असर आपकी संतानों पर अवश्य पड़ेगा !अंत में मेरा अनुरोध है कि प्यार बाँटने का प्रयत्न करें, नफरत से सिर्फ़ तिरस्कार और बर्बादी बांटी जा सकती है और बदले में यही मिलेगी भी ! हो सके तो जो आपको उकसा कर, आपसे मदद ले रहा है उस चेहरे को पहचानने का प्रयत्न करें तो आप पायेंगे कि ऐसे चेहरे में ममता और प्यार का नामोनिशान नहीं मिलेगा !
  • मैं हमेशा इन अल्पसंख्यक  बच्चों के लिए लेख क्यों लिखता हूँ ?-मुसलमान - हिन्दुस्तान का दूसरा बेटा ! अवश्य पढ़ें ! क्योंकि मैं बहुमत से सम्बंधित हूँ और अल्पमत के लिए आवाज़ उठाना और उनको अपने समाज के दिल में जगह दिलाने का प्रयत्न करना ही मैं भारत माँ की सबसे बड़ी इच्छा मानता हूँ सो नफरत फैलाने वाले अपनी दूकान चलायें मैं प्यार बांटूंगा देखता हूँ कौन शक्तिशाली है ? नफरत या प्यार ?



Monday, December 1, 2008

मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे !

"इस्लाम को बदनाम करने वाले इन आतंकवादियों को भारत की सरजमीं पर नही दफनाया जाएगा !"

अखबारों में छपी ख़बर के अनुसार ,यह फ़ैसला है मुंबई की मुस्लिम संस्थाओं का, कि इन ९ हत्यारों की लाशों को, मैरिन लाइन बड़ा कब्रिस्तान में कोई जगह और इज्ज़त नहीं बख्शी जायेगी ! मुस्लिम काउन्सिल देश के बाकी संस्थाओं को भी यह मैसेज भेजने का प्रयत्न कर रही है!

इन उग्रवादियों ने सोचा होगा कि इस महान संगठित देश पर हमला करके वह हिन्दू मुस्लिम एकता में दरार डाल पाएंगे जिससे उन्हें शहीद का दर्जा मिलेगा ! शायद यह उन्होंने सपने में भी न सोचा होगा कि उनकी ऐसी दुर्दशा भी हो सकती है !

१५ अगस्त को प्रकाशित मेरे एक गीत ये समझ नहीं आता इनको में उन्हें कहा गया था .....

तुम मासूमों का खून बहा
ख़ुद को शहीद कहलाते हो
औ मार नमाजी को बम से
इस को जिहाद बतलाते हो
जब मौत तुम्हारी आएगी, तब बात शहादत की छोडो
मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे
!


मुझे खुशी है कि इन मानवता के दुश्मनों का साथ देने कोई पास नही आया ! इस देश के बच्चों को आपस में लड़ाने की साजिश नाकाम हुई ! कुछ नासमझों की मानसिकता के बाद भी बहुमत हमारी एकता बनाये रखने में कामयाब होगा, ऐसा मेरा विश्वास है !


Thursday, November 20, 2008

स्वप्न में आयीं वामा सी, स्नेहमयी तुम कौन हो ? - सतीश सक्सेना

स्वप्न में आयीं वामा सी, 
स्नेहमयी तुम कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया, 
करुणमयी तुम कौन हो ?
बाल बिखेरे प्रेयसि जैसे, 
आँख में ममता माता जैसी
नेह भरा स्पर्श लिए तुम ,  
प्रकृति सुंदरी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

तपती धरती पर सावन की
बूँद गिरी हरियाली आयी
जैसे पतझड़ के मौसम में
अमराई भर आई हो !
ऐसे आईं तुम जीवन में
महक उठी दुनिया सारी
मैं निर्धन पहचान न पाऊँ ,
राजलक्ष्मी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

कितना समझाता हूँ मन को
पर असफल ही रहता हूँ
कैसा प्यार चाहता तुमसे
यह मुझको मालूम नहीं
कजरारी आँखों की भाषा
चातक के दिल की परिभाषा
निश्छल मन मैं जान न पाऊँ ,
राजनंदिनी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

दो गुलाब की पंखुड़ियों से 
प्यासे होठो को छू जाना 
तपते चेहरे को आंचल
से ढांक मधुरिमा पंहुचाना 
ऐसा प्यार तुम्हारा पाकर, 
इतना क़र्ज़ तुम्हारा लेकर 
मैं याचक पहचान न पाऊँ , 
प्रणय सुंदरी  कौन  हो   ??
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?   

Tuesday, November 11, 2008

प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ? -सतीश सक्सेना

शीतल मनभावन पवन बहे
बादल चहुँ ओर उमड़ते हैं !
जिस ओर उठाऊँ दृष्टि वहीं
हरियाली चादर फैली है !
मन में उठता है प्रश्न, 
पवन लहराने वाला कौन ?
बादलों के सीने को चीर बूँद बरसाने वाला कौन?

कलकल छलछल जलधार
बहे,ऊँचे शैलों की चोटी से 
आकाश चूमते  वृक्ष लदे   
स्वादिष्ट फलों औ फूलों से
हर बार, रंगों की चादर से , 
ढक जाने वाला कौन ?
धरा को बार बार रंगीन बना कर जाने वाला कौन ?

चिडियों का यह कलरव वृन्दन !
कोयल की मीठी , कुहू कुहू !
बादल का यह गंभीर गर्जन ,
वर्षा की ये रिमझिम रिमझिम !
हर मौसम की रागिनी अलग,
सृजनाने वाला कौन ?
मेघ को देख घने वन में मयूर नचवाने वाला कौन ?

अमावस की काली रातें 
ह्रदय में भय उपजाती हैं !
चांदनी की शीतल रातें, 
प्रेमियों को क्यों भाती हैं !
देख कर उगता पूरा चाँद , 
कल्पना शक्ति बढाता कौन ?
चाँद को देख ह्रदय में कवि के,मीठे भाव जगाता कौन ?

कामिनी की मनहर मुस्कान
झुकी नज़रों के तिरछे वार !
बिखेरे नाज़ुक कटि पर केश
प्रेम अनुभूति , जगाये वेश  !
लक्ष्य पर पड़ती मीठी मार , 
रूप आसक्ति बढाता कौन ?
देखि रूपसि का योवन भार,प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ?

Thursday, November 6, 2008

अपनी माँ को धुँधली यादों में ढूँढता बच्चा !

आदरणीय जे सी फिलिप शास्त्री का अनुरोध माँ पर लिखने का पाकर, बहुत देर तक सोचता रह गया !
क्या लिखूं मैं, माँ के बारे में ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता !

अपने बचपन की यादों में, उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता रहा हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा !

मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....जो कभी नही लिखना चाहता था !
-लोहे की करछुली (कड़छी) पर छोटी सी एक रोटी, केवल अपने इकलौते बेटे के लिए, आग पर सेकती माँ....
-बुखार में , अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ ....
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँको मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे ले गए मेरी माँ को ....

बस यही यादें हैं माँ की ......

Monday, November 3, 2008

सूनी दीवाली -सतीश सक्सेना

"लंदन में मेरी दुर्घटनाग्रस्त बेटी को जीवन में पहली बार यह त्यौहार अकेले मनाना पड़ा। ऊपर से इस बार यकायक लंदन में दीपावली की रात २-२ फीट हिमपात हो गया। ऐसे में उसे याद आई तो केवल माँ और अपनी उस दिन की वे स्मृतियाँ जब उसने मुझे सुनाईं तो सिवाय फफक फफक कर रोने के कोई शब्द मेरे पास नहीं था।"

उपरोक्त शब्द डॉ कविता वाचक्नवी के हैं, जिनके जरिये उन्होंने बिना प्रमुखता, दिए अपने मन की वेदना दीपावली के बारे में बताते हुए प्रकट की थी ! और यह वेदना उस दिन की चर्चा में बहुत कम लोगों ने नोट की थी ! मुझे अहसास हुआ जब फुरसतिया ने इस पर ध्यान न जाने की क्षमायाचना करते हुए कमेंट्स में प्रमुखता दी ! एक माँ से हजारों मील दूर लन्दन में इलाज़ करा रही इस बच्ची के लिए मेरी शुभकामनायें !

आज के इस व्यस्त माहौल में हम लोगों में संवेदना का महत्व कम होता जा रहा है, बल्कि अगर यह कहा जाए कि खत्म हो गया है तो भी शायद अतिशयोक्ति नही होगी !


मुझे याद है नवम्बर २००५ की दीपावली जब मेरा बेटा पहली वार अपने घर से हजारों मील दूर कैलिफोर्निया में पार्टी फंक्शन्स में ना जाकर अकेले कमरे में बैठ कर दीवाली पूजा कर रहा था ! वह चित्र देख कर दीवाली का सारा आनंद एक उदास रात में बदल गया था जो आज तक भुलाये नही भूलता है !

इस निर्दयी विश्व में अपनों के प्रति यह संवेदना और प्यार की अनुभूति ही जीवन का आधार है

Saturday, October 18, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली (पांचवां भाग) - सतीश सक्सेना

लेकर निर्बल की हाय पुत्र !
होगा जग में उद्धार नहीं,
अपने दिल पर रख हाथ देख
आत्मा को लज्जित पाओगे
लज्जित मन से क्यों काम करो 
गंगा सा निर्मल मन लेकर,
निर्बल का ऋण लेकर मन पर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वैष्णव जन कहलाये वह ही
जो कष्ट दूसरों का समझे,
पीड़ा औरों की निज मन में
महसूस करे, आगे आकर ,
सारे तीर्थों का सुख मिलता, 
सेवा निर्बल की करने में ,
अपने सुख की कामना लिए, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अन्याय सहन करने वाला
अन्यायी से भी पापी है,
न्यायार्थ दंड भाई को दो
यह कर्म ज्ञान है गीता का
अन्यायी बनकर जीने से, 
कुल कीर्ति नष्ट हो जाती है
केशव की बातें बिसरा कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वह दिन दिखलाओ महाशक्ति
जिसमें कोई न, प्रपंच रहे !
धार्मिक पाखण्ड समाप्त करो
वास्तविक साधू सन्यासी हों
जाती बंधन को काट मूल से, 
मुक्ति दिलाओ नरकों से
अपराध बोध लेकर मन में क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो जो
नष्ट , वर्ण-संकट कर दे !
अपने अपने कर्मानुसार,
मानव समाज का काम करे
खेलें रंग और गुलाल सभी, 
हर कौम गले मिलकर होली
औरों के लिए घृणा लेकर ! क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Wednesday, October 15, 2008

मुसलमान - हिन्दुस्तान का दूसरा बेटा !


"विनम्र  निवेदन हैं की हिन्दी ब्लोगिंग को साफ़ रखे । बहुत मेहनत की है बहुत से लोगो ने और आप के ये सब आलेख उन सब की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं । आप अल्पसंख्यक लोगों  के भक्त हैं सही हैं पर दुश चरित्र भक्त ना बने बस इश्वर से इतनी ही कामना हैं"

मुझे एक अनाम ने उपरोक्त सुझाव दिए गए हैं, इस प्रतिक्रिया में मुझे अल्पसंख्यक का  भक्त बताने के साथ साथ मेरे लेखों से दुखी होते हुए यह भी कहा कि मेरे लेख बहुतों की सालों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं !......यह विनती ऐसी थी कि मैं २-३ दिन तक सोचता रह गया कि लोगों ने किस कदर इस दुर्भावना को आपने दिल से लगा रखा है यहाँ तक कि व्यक्तिगत बना रखी है देश की यह ज्वलंत समस्या !

क्या इलाज़ है इसका :

-क्या कोई देशवासी आज फिर विभाजन की सोचने को भी तैयार है सिवाय हमारे दुश्मनों के ? क्या यह सम्भव है कि हम अपने इन छोटे भाइयों (या आप पड़ोसी कह लें), जो इसी देश की संतान हैं , को विवश कर पायें कि जो हम कहें वे वही मान लें !

- अगर हम बड़े भाई का फ़र्ज़ अदा करने का सोचें तो सबसे पहले अपने छोटे भाइयों के सर से, हर समय शक में जीने का भय उतारना पड़ेगा ! हमें उनकी परेशानियाँ , रिश्ते नाते, ध्यान में रखते हुए फैसले लेने होंगे ! दुनिया में कोई भी तीसमार खां कौम पैदा नही हो पाई जो किसी दूसरे समुदाय को ख़त्म कर दे ! ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं ! हाँ नफरत पाल कर रहते चले आए पड़ोसी समुदायों के बच्चे तक शैशव अवस्था से ही मरने मारने की बातें जरूर करने लगे ! और यह सब उन्ही के बुजुर्गों ने दिया !

-चंद उग्रवादियों और दहशतपसंदों की हरकतों का इल्जाम पूरी कौम के सर पर न डालने का फ़ैसला करना होगा ! और यह फ़ैसला करना होगा जनमानस को, इस सोच के साथ कि वे इस तरह का दूषित जहर फैला कर देश का सबसे बड़ा नुक्सान करने जा रहे हैं !

इतिहास गवाह है कि अधिकतर देशों का नुकसान दुश्मन के फौजों ने नही किया मगर आंतरिक फूट और ग्रहयुद्ध ने किया ! और सबसे अधिक मौतें बच्चों और कमजोरों की हूई ! ऐसे देशों की न केवल नस्लें तबाह हो गयीं बल्कि ३०-४० वर्षों के बाद भी वे अच्छे नेतृत्व तक के लिए मुहताज हो गए !

इस दुर्दशा को पहुंचाने वाले यही कमअक्ल लोग थे .....जो अपने आपको देशभक्त कहते हुए मुंह बजाते घूम रहे हैं, और जब इनकी बकवास सिरे चढ़ जायेगी, उस वक्त यह चूहे सबसे पहले अपने बिलों में घुस जायेंगे ! उस समय कमज़ोर पड़ते देश से इन्हे न अपना प्यार नज़र आएगा न धर्म !

आज आवश्यकता है कि हम इन नफरत फैलाते हुए, देश के दुश्मनों की पहचान करलें , ऐसे लोगों की किसी भी प्रकार की, तारीफ़ करना भी मेरी नज़र में सिर्फ़ अपराध है ! एक मूर्ख मगर घातक विचारधारा को किसी भी हालत में फैलने से रोकने के लिए, प्रयत्न करने से बड़ा पुण्य कार्य, मैं और नही मानता !

मगर दुःख है कि हमारे कुछ साथी अनजाने में ऐसे लोगों की पीठ थपथपाने में कोई कसर नही छोड़ते !
मैं अपने अल्पसंख्यक भाइयों से भी अपील करता हूँ, कि वे ग़लत बातों के खिलाफ खुलकर सामने आयें, 
उग्रवादियों और उनके मंसूबों का विरोध करें ! अन्य मजहब के खिलाफ लिखने या मज़ाक बनाने वालों का खुल कर विरोध करें ऐसा करके निस्संदेह अधिकतर लोगों का गुस्सा शांत होगा !

किसी भी धर्म की बखिया उधेड़ने का अधिकार किसी को नही है ! हजारों साल पहले अस्तित्व में आए धर्मों की व्याख्या आधुनिकता के नाम पर करने की इजाज़त किसी को नही होनी चाहिए ! मज़हब हमारी आस्था और श्रद्धा है, जो हमारे बुजुर्गों ने निर्देशित किया है, उस पर किसी और की व्याख्या, सिर्फ़ उसकी कमअक्ली है और कुछ नहीं !

क्या आपके पाठक कम हैं ? एक चेक लिस्ट -सतीश सक्सेना

                                 अपने ब्लाग पर आपका परिचय क्या संदेश दे रहा है ? कहीं ऐसा तो नही कि आप के परिचय से यह झलकता हो कि आप इस देश के सबसे बड़े विद्वान् हैं तो आप यह जान लें कि ब्लाग जगत पर लिखने वाले लोग एक से एक शानदारव्यक्तित्व वाले लोग हैं जो आपके ब्लाग को देख कर ही समझ जायेंगे कि वे एक  नासमझ , जो अपने आपको विद्वान् मानता है, को पढ़ रहे हैं ! यकीन मानिए दोबारा पढने के लिए वे आपके ब्लाग पर फिर कभी नहीं आयेंगे !

                              कहीं आप अपने लेखों में , जिसमें  क्लिष्ट शब्दों का उपयोग अधिक हुआ हो, का प्रयोग अधिक तो नही करते  ?

                              क्या आपके ऐसे मित्र हैं जिनसे अपने ब्लाग के बारे में बेवाक कमेंट्स ले सकें , कि आपके ब्लाग पर कमेंट्स कम क्यों आते हैं  ?

                              क्या आपके पास ईमानदार मित्र हैं जो आपकी आपके मुंह पर आलोचना कर सकें , या आपने सिर्फ़ तारीफ करने वाले मित्रों को ही अपना शुभचिंतक बनाया है , अगर ऐसा है तो आप विद्वान् होने के बावजूद बहुत शीघ्र अपने आपको अवसाद में पाएंगे !
                            आपके ब्लाग का रंग संयोजन आंखों को चुभता तो नही है ?

                            क्या आप मन में किसी विचारधारा ( पार्टी, जाति , नारी, पुरूष, इत्यादि ) के प्रति नफरत तो नही फैला रहे हैं ? अगर ऐसा है तो याद रखें गुस्सा और नफरत की ये चिंगारियां अगर आप बिखेर रहे हैं तो यह आपके परिवार को अवश्य प्रभावित करेंगी ! कृपया इतिहास का एक उदाहरण सोच कर देखे कि नफरत से क्या हासिल हुआ ! जो नकारात्मक सोंच आप उत्सर्जित कर रहे हैं उसका असर आपके परिवार पर क्या पड़ेगा ?  अधिकतर  यह नफरत भरे लेख ,व्यक्तिगत मामलों में, अपने अनुभव के कारण लिखे जाते हैं या विषद विषय पर अनुभवहीनता के कारण , कि आप उस विषय को अधिक जानते ही नहीं !

Tuesday, October 14, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम !(अंतिम भाग ) - सतीश सक्सेना

परनिंदा और कटु शब्दों का
बेटी त्याग हमेशा करना !
संयम रख अपनी वाणी पर  
घर में कभी अनर्थ न करना
अगर क्रोध में सौम्य रहीं तो,
बेटी साध्वी बनी रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

ऐसा कोई शब्द ना बोलो
दूजा मन आहत हो जाए
तेरी जिह्वा की लपटों से
अन्य ह्रदय घायल हो जाए
चारों धामों पर जाकर भी,
मन में शान्ति नही पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

कभी न भूलो बेटी ! तुमने ,
जन्म लिया है मानव कुल में
कुछ विशेष वरदान हमारे ,
कुल को दिए विधाता ने ,
ज्ञान असीमित लेकर बेटी, 
तुम भविष्य निर्माण करोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

ज्ञान तुम्हारा सार्थक होगा
घर बाहर दोनों जगहों में
आशीषों के ढेर लगेंगे ,
जब परिवार तुम्हारे में !
परहित साधक बनो लाडली,
पूरी तभी साधना होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

वाद विवाद जन्म देता है ,
पति पत्नी के मध्य कलह को
गृह विनाश का बीज उखाडे
नही उखड़ता है, जमने पर !
ऋषि मुनियों के दिए मौन से
क्रोधित मन काबू पाओगी ! 
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

मौन अस्त्र से गौतम जीते
अंगुलिमाल झुक गया आगे
मितभाषी गांधी के आगे ,
झुका महा साम्राज्यवाद भी
हर विरोध शर्मिंदा होगा,
अगर मौन को तुम परखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

याद रहे द्रोपदी सरीखी !
वाचालता कभी न आए
उतना बोलो , जितना
आवश्यक मंतव्य बताने को
तेज बोलने वाली नारी ,
आदर कभी नही पायेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

इतना प्यारा जीवन साथी 
पुत्री धन्य हुईं तुम पाकर 
शायद तेरे निर्मल मन ने 
जीता ह्रदय विधाता का ,
निश्छल मन और गहन समर्पण,
बेटी जीत तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी , राज कुमारी तुम्ही  लगोगी  !

Saturday, October 11, 2008

लड़कियों की तकलीफ कौन समझना चाहता है ?

                     एक बेहद कड़वा सच जिसे कोई मानना नही चाहता ! शायद हमें अपनी निगाह में ख़ुद गिर जाने का डर, इसे याद न रखने को विवश करता है !

                      २३ -२४ साल की होते होते, माँ बाप सोचने लगते हैं कि १-२ साल में गुडिया के विवाह के बाद यह खर्चा तो कम हो ही जाएगा ! उस गुडिया के कमरे पर, कब्ज़ा करने की कईयों की इच्छा, ख़ुद माँ का यह कहना कि गुडिया के शादी के बाद, यह कमरा खाली हो जाएगा, इसमे बेटा रह लेगा, किताबों को बाँध के टांड पर रख दो और स्टडी टेबल अपने भाई के बेटे को देने पर, इस कमरे में जगह काफी निकल आयेगी !

                       यह वही बेटी थी, जो पापा की हर परेशानी की चिंता रखती और हर चीज समय से याद दिलाती थी, उसके पापा को कलर मैचिंग का कभी ध्यान नही रहता, इस पर हमेशा परेशान रहने वाली लडकी, सिर्फ़ २५ साल की कच्ची उम्र में, सबको इन परेशानियों से मुक्त कर गयी !

                        यह वही बहिन थी जो पूरे हक़ और प्यार के साथ, खिलखिला खिलखिला कर, अपने भाई के जन्मदिन की तैयारी पापा, माँ से लड़ लड़ कर, महीनों पहले से करती थी ! रात को ठीक १२ बजे पूरे घर की लाइटें जला कर हैप्पी बर्थडे की धुन बजाने वाली लडकी, एक दिन यह सारी उछल कूद छोड़कर, गंभीरता का दुपट्टा ओढाकर विदा कर दी गयी .....और साथ में एक शिक्षा भी कि अब बचपना नहीं, हर काम ढंग से करना ऐसा कुछ न करना जिसमे तुम्हारे घर बदनामी हो !

                         कौन सा घर है मेरा ... ?? नया घर जहाँ हर कोई नया है, जहाँ उसे कोई नही जानता या वह घर, जहाँ जन्म लिया और २५ साल बाद विदा कर दी गयी ! जिस घर से विदाई के बाद, वहां एक कील ठोकने का अधिकार भी उसे अपना नही लगता ! और जिस घर को मेरा घर.. मेरा घर.. कहते जबान नही थकती थी उस घर से अब कोई बुलावा भी नही आता ! क्या मेरी याद किसी को नही आती... ऐसा कैसे हो सकता है ? फिर मेरा कौन है ... उस बेटी के पास रह जाती हैं दर्द भरी यादें ... और अब वही बेटी, अपनी डबडबाई ऑंखें छिपाती हुई, सोचती रहे ...

किस घर को , अपना  समझूं   ?
मां किस दर को मंजिल मानूं ?
बचपन बीता जिस आँगन में 
उस घर को, अब क्या मानूं  ?
बड़े दिनों के बाद आज भैया की याद सताती है  ?
पता नहीं क्यों सावन में पापा की यादें आती है  ?

                       शादी के पहले दूसरे साल तक बेटी के घर त्योहारों पर कुछ भेंट आदि लेकर जाने के बाद, उस बच्ची की ममता और तड़प को भूल कर, अपनी अपनी समस्याओं को सुलझाने में लग जाते हैं ! कोई याद नही रखता अपने घर से विदा की हुई बच्ची को ! धीरे धीरे इसी बेटी को अपने ही घर में, मेहमान का दर्जा देने का प्रयत्न किया जाता है, और ड्राइंग रूम में बिठाकर चाय पेश की जाती है !

तुम  सब ,  भले   भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ ?
तुम सब भूल गए भैय्या !

पर मैं , वे दिन कैसे भूलूँ  ?
मैं इकली और दूर बहुत, उस घर की यादें आती हैं !
पता नहीं क्यों आज मुझे , मां, तेरी यादें आती हैं  !

                     हम अपने देश की संस्कारों की बाते करते नही अघाते हैं पर शायद हम अपने घर के सबसे सुंदर और कमज़ोर धागे को टूटने से बचाने के लिए , उसकी सुरक्षा के लिए कोई उपाय नही करते ! आज आवश्यकता है कि बेटे से पहले बेटी के लिए वह सब दिया जाए जिसकी सबसे बड़ी हकदार बेटी है !

Friday, October 10, 2008

अँधेरी रात का सूरज - राकेश खंडेलवाल

पंकज जी का अनुरोध था कि मैं राकेश जी पर कुछ और लिखूं, हिन्दी की सेवा में लगे हुए एक सम्मानित विद्वान् का अनुरोध पाकर, इस मशहूर गीतकार की रचनाओं पर नज़र डालते हुए, गीतकार की कलम पर विषय अनायास ही मिल गया ! राकेश खंडेलवाल मशहूर हैं, भाषा को झंकार प्रदान करने वाले शब्दों का उपयोग करने के लिए ! उनकी गीतमाला में हर शब्द मोती की तरह पिरोया होता है

मगर आजकल के ये दरबारी कवि अपने आप को चमकाने के लिए क्या नहीं करते ! गंभीर विषयों, पर सभ्य सुसंस्कृत भाषा के धनी, इस कवि की तकलीफ इन शब्दों में देखिये ...

"मान्य महोदय हमें बुलायें सम्मेलन में हम भी कवि हैं
हर महफ़िल में जकर कविता खुले कंठ गाया करते हैं
हमने हर छुटकुला उठा कर अक्सर उसकी टाँगें तोड़ीं
और सभ्य भाषा की जितनी थीं सीमायें, सारी छोड़ी
पहले तो द्विअर्थी शब्दों से हम काम चला लेते थे
बातें साफ़ किन्तु अब कहते , शर्म हया की पूँछ मरोड़ी

हमने सरगम सीखी है वैशाखनन्दनों के गायन से
बड़े गर्व से बात सभी को हम यह बतलाया करते हैं"

ख़ुद की भाषा से चमत्कृत ये आधुनिक कवि, और सामने भीड़ में बैठे अपने गुरु की रचनाओं पर तालियाँ बजाते उनके कुछ सर्वश्रेष्ठ शिष्य, अक्सर कविसम्मेलनों में समां बांधते हर जगह नज़र आ जायेंगे ! अच्छी टी आर पी बढ़ाने के सारे मन्त्र इन्हे पता होते हैं ! राकेश जी आगे कहते हैं ....

"हम दरबारी हैं तिकड़म से सारा काम कराते अपना
मौके पड़ते ही हर इक के आगे शीश झुकाते अपना
कुत्तों से सीखा है हमने पीछे फ़िरना पूँछ हिलाते
और गधे को भी हम अक्सर बाप बना लेते हैं अपना

भाषा की बैसाखी लेकर चलते हैं हम सीना ताने
जिस थाली में खाते हैं हम, छेद उसी में ही करते हैं !
जी हम भी कविता करते हैं"

राकेश जी की उपरोक्त व्यथा पर राजीव रंजन प्रसाद के कमेंट्स थे ....

आदरणीय राकेश जी,आपका ने हास्य लिखने का तो केवल बहाना किया है, इन शब्दों के पीछे की गहरी पीडा समझी जा सकती है। सचमुच तिलमिलाहट होती है कविता और साहित्य का सत्यानाश करने वाले विदूषकों से...

आजकल अधिकतर जगहों पर नगाडे बजाते यह लेखक दिख जाते हैं, घटिया लेखन के यह रचनाकार कोई न कोई मुखौटा ओढ़कर काम करते हैं, कोई अपने ज्ञान का ढिंढोरा पीटता है तो अन्य दूसरों पर सतत आक्रमण कर अपने आपको को विजयी घोषित किए बैठा है !मेरे अपने कुछ मित्र भी इन लोगों में से हैं जिनमे प्रतिभा की कोई कमी नही, मगर उनकी कमियां समझाने की हिम्मत कौन करे ?? और कौन सरे आम अपनी धोती खुलवाने की हिम्मत करे ?? ;-)

और अंत में नवयुग के कवियों को, भाषा और कविताओं की मिट्टी पलीद करते देख, अधिकतर शांत रहने वाले, क्रोधित संवेदनशील राकेश खंडेलवाल......

सड़े हुए अंडे की चाहत
गले टमाटर की अकुलाहट
फ़टे हुए जूते चप्पल की माला के असली अधिकारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

तूने जो लिख दी कविता वह नहीं समझ में बिलकुल आई"
खुद का लिखा खुदा ही समझे" की परंपरा के अनुयायी
तूने पढ़ी हुई हर कविता पर अपना अधिकार जताया
रश्क हुआ गर्दभराजों को, जब तूने आवाज़ उठाई

सूखे तालाबों के मेंढ़क
कीट ग्रसित ओ पीले ढेंढ़स
चला रहा है तू मंचों पर फ़ूहड़ बातों की पिचकारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

पढ़ा सुना हर एक चुटकुला, तेरी ही बन गया बपौती
समझदार श्रोताओं की खातिर तू सबसे बड़ी चुनौती
तू अंगद का पांव, न छोड़े माईक धक्के खा खा कर भी
चार चुटकुलों को गंगा कह, तूने अपनी भरी कथौती

कीचड़ के कुंडों के भैंसे
करूँ तेरी तारीफ़ें कैसे
हर संयोजन के आयोजक पर है तेरी चढ़ी उधारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

क्या शायर, क्या गीतकार, सब तेरे आगे पानी भरते
तू रहता जब सन्मुख, कुछ भी बोल न पाते,वे चुप रहते
हूटप्रूफ़ तू, असर न तुझ पर होता कोई कुछ भी बोले
आलोचक आ तेरे आगे शीश झुकाते डरते डरते

ओ चिरकिन के अमर भतीजे
पहले, दूजे, चौथे, तीजे
तुझको सुनते पीट रही है सर अपना भाषा बेचारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी !
और ऐसे में राकेश खंडेलवाल जैसे रचनाकार का सब्र भी टूट जाता है जब भाषा और संवेदनाओं का मजाक सारे आम उडाया जाए !

डॉ अमर ज्योति के शब्दों में "शब्दों के जादूगर राकेश जी शब्दों को कठपुतलियों की तरह नचा कर जहां एक ओर दैनिक जीवन की विसँगतियों का चित्रण करते हैं वहीं दूसरी ओर जीवन की गहरी दार्शनिक व्याख्या भी करते हैं।"

और अंत में मैं एक शानदार गीतकार, प्रेरणादायी, कविश्रेष्ठ राकेश खंडेलवाल की "अँधेरी रात का सूरज" का स्वागत करता हूँ ! साथ ही पंकज सुबीर का भी धन्यवाद जिनके कारण यह रचना हिन्दी जगत को मिल सकी !

Tuesday, October 7, 2008

शब्द चित्रकार राकेश खंडेलवाल -सतीश सक्सेना



पंकज सुबीर की वेब साईट सुबीर संवाद सेवा को देखते हुए एक उनकी अपील देखी जिसमे पूरे सप्ताह राकेश खंडेलवाल की ही चर्चा करने की इच्छा प्रकट की गयी थी ! साधारणतया ऐसी इच्छा, आज के युग में, जहाँ प्रकाशक- लेखक के मध्य तल्खियत की कहानिया रोज ही सुनी जायें, अचंभित करने वाली ही लगती है ! मुझे इसी वेबसाइट से पता चला कि राकेश खंडेलवाल के गीतों का संकलन (अँधेरी रात का सूरज) प्रकाशित करने की इच्छा ख़ुद पंकज सुबीर की ही है, और यह संकलन ख़ुद पंकज जी ने ही किया है ! पंकज सुबीर ख़ुद कवियों को गीत और ग़ज़लें सिखाने वाली कक्षाओं का संचालन करते हैं और यह, मेरी जानकारी अनुसार देश में इस प्रकार का पहला प्रयोग है ! निस्संदेह पंकज देश में लेखन को बढावा देने हेतु, एक प्रसंशनीय योगदान दे रहें हैं ! इस वेब साईट को पढ़ते पढ़ते यह इच्छा बलवती होती चली गयी कि राकेश खंडेलवाल जैसी सशक्त लेखनी के ऊपर मैं भी, अपने टूटे फूटे शब्दों में कुछ लिखने का प्रयत्न करुँ ! 

अमेरिका में निवास कर रहे राकेश, अपने देश से दूर रह कर अपनी संस्कृति के राजदूत हैं , उनके हर गीत से हमारे देश की विनम्रता, विविधिता और सौम्यता नज़र आती है ! अपने पाठकों से आशीर्वाद लेते राकेश की विनम्र अभिव्यक्ति की एक झलक देखिये ....

"एक आशीष जो शारदा ने दिया,
वह भरे जा रहा शब्द से आंजुरि
आपके पांव पर वह चढ़ाता हूँ मैं,
होके करबद्ध करता नमन आपको
आपके शब्द देते रहें प्रेरणा,
कामना पुष्प सी मुस्कुराने लगी !
आपके स्नेह से जो सजी है मेरी,
भेंट करता वही अंजुमन आपको"

आत्ममंथन के कारण,उपजे नैराश्य भाव के साथ साथ ईमानदारी, इस मासूम गीतकार के ईमानदार दिल की एक तस्वीर पेश करता है......

"जीवन के हर समीकरण का कोई सूत्र अधूरा निकला
इसीलिए तो कभी किसी से सामंजस्य नहीं हो पाया"

पहली बार इस महान गीतकार की रचनाएं पढ़कर मेरी पहली प्रतिक्रिया (७ जून ०८ ) इस प्रकार थी ॥"आपकी शैली तथा आपकी ईमानदारी बहुत पसंद आई ! निस्संदेह आप एक शानदार इंसान भी होंगे ! और आपके गीत , वाकई मज़ा आ गया आपके गीतों को पढ़कर ! संकलित करने के योग्य हैं , आशा है आज की बनावटी दुनिया को आप यह निश्छल, सोम्य गीतसृजन लगातार देते रहेंगे !"

इसका जवाब राकेश जी ने इस गीत से दिया ....

"आपकी यों ही शुभकामनायें मिलें लेखनी शब्द तब ही चितेरा करे
मेरी मावस सी एकाकियत में सदा आपका नेह आकर सवेरा करे..."

राकेश खंडेलवाल ने मेरी पोस्ट " अम्मा ! " पर माँ स्तुति में टिप्पणी देकर मेरी उक्त रचना का सौन्दर्य कई गुना बढ़ा दिया !

"कोश के शब्द सारे विफ़ल हो गये, भावनाओं को अभिव्यक्तियां दे सकें
शब्द तुमसे मिले, भावना कंठ सब इक तुम्हारी कॄपा से मिला है हमें
ज़िन्दगी की प्रणेता दिशादायिनी, पूर्ण अस्तित्व का तुम ही आधार हो
इतनी क्षमता महज हमको मिल न सकी, अर्चना जो तुम्हारी सफ़ल कर सकें"

मेरी एक अन्य रचना पर "वे नफरत बांटें इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं "......राकेश जी की गीतमयी प्रतिक्रिया देख मैं भौचक्का रह गया, लगा कि इन खुबसूरत पंक्तियों के बिना वह गीत ही अपूर्ण था जिसे राकेश जी ने आकर पूरा किया ! मेरी प्रतिक्रिया इस तरह थी "॥

अरे वाह, राकेश जी !
मैं बड़ा खुशकिस्मत हूँ कि आप इस गरीबखाने में आए ! सच बताऊँ ! आपके आते ही गीतों के स्वर में झंकार आ जाती हैं ! आपने न केवल इस गीत के मर्म को पढ़ लिया बल्कि सम्पूर्णता भी दी,....."

"जब भी कुछ फ़ूटा अधरों से
तब तब ही उंगली उठी यहाँ
जो भाव शब्द के परे रहे वे
कभी किसी को दिखे कहाँ
यह वाद नहीं प्रतिवाद नहीं
मन की उठती धारायें हैं !
ले जाये नाव दूसरे तट, हम पाल चढ़ाये बैठे हैं !"

राकेश खंडेलवाल जैसा शब्द सामर्थ्य से धनी गीतकार विरले ही जन्मते हैं, अपनी अभिव्यक्तियों को शब्दों के मोतियों से सजाने व श्रृंगार करने की जो विधा राकेश जी के पास है, अन्यंत्र नही दिखाई देती ! और राकेश जी के व्यक्तित्व की सबसे बेहतरीन खासियत है उनका विनम्र स्वभाव, लगता ही नही कि यही व्यक्ति,काव्यपुरुष राकेश खंडेलवाल हैं !हम उम्मीद करते हैं कि राकेश बरसों तक हिन्दी भाषा को सशक्त आधार प्रदान करते रहेंगे !

Monday, October 6, 2008

हिन्दी ब्लाग लेखन इन दिनों -सतीश सक्सेना

              ब्लॉग लेखन शुरू करते समय मन में बड़ा उत्साह था कि मैं यहाँ अच्छे लेखन से जुड़ कर अपने ज्ञान में कुछ योगदान कर पाऊंगा, और उन महा नायकों से रूबरू होने का मौका भी मिलेगा जिनको अखबारों में पढ़ कर धन्य मानता रहा ! मगर मुझे लगता है कि अनपढ़ आदमी के ज्ञान की तरह मेरे ज्ञान की सीमा भी कुएं के मेढक जितनी ही थी ! आज जब इस मैदान ( ब्लागर जगत ) में आया तो लगता है कि मैं लेखकों के मध्य नही, पहलवानों के मध्य कार्य कर रहा हूँ !

             हिन्दी ब्लाग की प्रमुख कमजोरी, उपयुक्त और प्रभावशाली लेखन की कमी के अलावा, ख़राब माहौल है शायद इसी कारण महिला और साहित्यिक लेखन की वेहद कमी है ! यहाँ हर लेखन पर प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं, अच्छे लेखन पर अपरिपक्व कमेंट्स, समाज की कमियों वाले लेखों पर, बुद्धि से लगभग पैदल लोगों के गाली गलौज युक्त कमेंट्स, बेहद एक्टिव महिला ब्लागरों के साथ, व्यक्तिगत तौर पर अश्लील कमेंट्स, किसी भी अच्छे लेखक के मन में वित्रश्ना भरने के लिए काफी हैं !

               अधिकतर लोग अपने नीरस लेखन से दुखी होकर किसी भी चर्चित ब्लाग पर जाकर भद्दी व घटिया टिप्पणी ,यहाँ तक कि गालियाँ भी देते हैं,जिससे उनकी प्रतिक्रिया चर्चा का विषय बन सके और उनको लोग जान जाए,अधिकतर ऐसे लोग महिला और संवेदनशील लेखकों को मानसिक चोट पहुंचाने में सफल भी रहते हैं,और उनका उद्देश्य जाने बिना,लोग प्रतिक्रियाओं के माध्यम से,अनचाहे ही,उन्हें कामयाब हीरो बना देते हैं! ऐसे लोगों के नाम और उनके ब्लाग को एक ब्लैक बोर्ड पर प्रर्दशित कर लोगों को आगाह किया जा सकता है !

               प्रोत्साहन में बड़ी शक्ति होती है,बहुत शक्तिशाली कलम भी शुरू में लड़खडाने लगती है, प्रोत्साहन के कमी और बदकिस्मती से अगर शुरुआत में ही इन्हे कुछ लोग हूट करदें तो बड़े बड़े ईमानदार और शक्तिशाली वैचारिक प्रतिभा के धनी लोग भी चुटकियों में दम तोड़ देंगे,और इस निष्ठुर ब्लॉग जगत में कोई उसकी कब्र पर दो फूल अर्पित करने आयेगा इसमे मुझे संदेह है !

               जहाँ एक तरफ़ अच्छे एवं उचित लेखों के लिए पाठकों की प्रतिक्रियाएं वातावरण में एक सौहार्दपूर्ण मिठास घोलने का कार्य करेंगी ! वहीं नाज़ुक विषयों पर अनजाने तथा बिना सोचे समझे की गयी प्रतिक्रियाएं समाज का सत्यानाश कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं !

               और इसी प्रकार तात्कालिक जोश में,एक सामान्य उत्साही ब्लागर की ग़लत तारीफ मिलने पर,विद्वान मगर पथभ्रष्ट,और अति उत्साहित लेखनी,समाज का वह विनाश करेगी जिसकी कोई कल्पना भी न कर सके! आज आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर,प्रतिक्रिया देते समय,निष्पक्षता व ईमानदारी का ध्यान रखें !

Saturday, October 4, 2008

कंधमाल -सतीश सक्सेना


ग्राहम स्टेंस और दो मासूम बच्चे ...

और अब यह बेचारी नन.....

शर्म से और लिख नही पा रहा ......


Monday, September 29, 2008

लिख सतीश तू बिना सहारे ! गाने वाले मिल जायेंगे -सतीश सक्सेना

रमजान के मुबारक महीने पर, इस देश की एक बच्ची रख्शंदा Pretty woman ने, बेहद दर्द के साथ एक ऐसी पोस्ट, आई है ईद, लेकर उदासियाँ कितनी... लिखी ! जिसने दिल को झकझोर सा दिया ! हमारे विशाल ह्रदय वाले देश में, पूरी कौम को बदनाम करने की कोशिश बुरी तरह नाकामयाब होगी, इसमे हमें बताना होगा कि हम दोनों एक दूसरे धर्मों का तहे दिल से सम्मान करते हैं ! धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करने वालों को एक प्यार का संदेश पढाना होगा !

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख,
जिससे घर का सम्मान बढ़े ,
कुछ कागज काले कर ऐसे,
जिससे आपस में प्यार बढ़े
रहमत चाचा से गले मिलें , 

होली और ईद साथ आकर !
तो रक्त पिपासु दरिंदों को,नरसिंह बहुत मिल जायेंगे !


अनजान शहर सुनसान डगर
कोई साथी नज़र नही आए
पर शक्ति एक दे रही साथ
हो विजय सदा सच्चाई की
कुछ नयी कहानी ऐसी लिख,

जिससे अंगारे ठन्डे हों !
मानवता के मतवाले को, हमदर्द बहुत मिल जायेंगे !

कुछ तान नयी छेड़ो ऐसी
झंकार उठे, सारा मंज़र,
कुछ ऐसी परम्परा जन्में ,
हम ईद मनाएँ खुश होकर
होली पर,मोहिद रंग खेलें,

गौरव हों दुखी,मुहर्रम पर !
इस धर्मयुद्ध में , संग देने , सारथी बहुत मिल जायेंगे !


वह दिन आएगा बहुत जल्द
नफरत के सौदागर ! सुनलें ,
जब माहे मुबारक के मौके,
जगमग होगा बुतखाना भी
मुस्लिम बच्चे , प्रसाद लेते , 

मन्दिर में , देखे जायेंगे !
मंदिर मस्ज़िद में फर्क नहीं,हमराह बहुत मिल जायेंगे !

ये जहर उगलते लोग तुम्हे
आपस में, लड़वा डालेंगे ,
ना हिन्दू हैं,ना मुसलमान
ये मानवता के दुश्मन हैं
चौकस रहना शैतानों से ,

जो हम दोनों के बीच रहें !
तू आँख खोल पहचान इन्हें,जयचंद बहुत दिख जायेंगे !


आतंकवाद के खिलाफ लड़ता हमारा देश, आपस में फूट डालने के प्रयास में लगे कुछ कम अक्ल लोग,और उन्हें हौसला देते उनके मूर्ख अनुयायी, जो अनजाने में जयचंदों के हाथ मजबूत कर रहे हैं ! देश के दुश्मनों द्बारा जगह जगह होते बम विस्फोट ! ऐसे शक और माहौल में ज़रूरत है अपने परिवार के ज़ख्मों पर मलहम लगाने की और उग्रवादियों के हौसले कमज़ोर करने की ! ऐसे में श्रद्धेय राकेश खंडेलवाल ने अपनी कलम से, इस गीत को एक और आशीर्वाद भेजा है !

यों सदा बादलों सा हमने,
अपना मन स्वच्छ रखा साथी 
ले गिरते पंख कबूतर के
दी हमने दीपक को बाती
पर सहनशक्ति को यदि तुमने 
कोई कमजोरी समझा तो
इस अंगनाई के गुलमोहर , अंगारों में ढल जायेंगे !

Saturday, September 20, 2008

वे नफरत बाँटें इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं - सतीश सक्सेना

साजिश है आग लगाने की
कोई रंजिश, हमें लड़ाने की
वह रंज लिए, बैठे दिल में
हम प्यार, बांटने निकले हैं!
चाहें कितना भी रंज रखो 
दिखते भी नहीं संवाद नहीं, 
फिर भी तुमसे आशाएं हैं !
जीवन में बड़ी अपेक्षा से , उम्मीद लगाए बैठे हैं !

वे शंकित, कुंठित मन लेकर,
कुछ पत्थर हम पर फ़ेंक गए
हम समझ नही पाए, हमको
क्यों मारा ? इस बेदर्दी से ,
बेदर्दों को तकलीफ  नहीं, 
केवल कठोर, क्षमताएं हैं !
हम चोटें लेकर भी दिल पर,अरमान लगाये बैठे हैं !

फिर जायेंगे, उनके दर पर,
हम हाथ जोड़ अपनेपन से,
इक बालहृदय को क्यूँ ऐसे  
भेदा अपने , तीखेपन से  !
शब्दों में शक्ति प्रभावी है 
लेकिन कठोर प्रतिभाएं हैं !
हम घायल होकर भी सजनी कुछ आस जगाये बैठे हैं !

हम जी न सकेंगे दुनिया में
माँ जन्में कोख तुम्हारी से
जो कुछ भी ताकत आयी है 
पाये हैं, शक्ति तुम्हारी से !
इस घर में रहने वाले सब, 
गंगा ,गौरी,दुर्गा,लक्ष्मी , 
सब तेरी  ही आभाएँ  हैं ! 
हम अब भी आंसू भरे तुझे, टकटकी लगाए बैठे हैं !

जन्मे दोनों इस घर में हम
और साथ खेल कर बड़े हुए
घर में पहले अधिकार तेरा,
मैं, केवल रक्षक इस घर का
भाई बहनों  का प्यार सदा 
जीवन की  अभिलाषायें हैं !
अब रक्षा बंधन के दिन पर,  घर के दरवाजे बैठे हैं !

क्या शिकवा है क्या हुआ तुम्हे
क्यों आँख पे पट्टी बाँध रखी,
क्यों नफरत लेकर, तुम दिल में
रिश्ते, परिभाषित करती हो,
कहने सुनने से होगा क्या 
मन में पलतीं, आशाएं हैं ! 
हम पुरूष ह्रदय,सम्मान सहित,कुछ याद दिलाने बैठे हैं !

श्री राकेश खंडेलवाल (http://geetkalash.blogspot.com/ मेरे अधूरे गीत को इस प्रकार पूरा किया ...उनका आभारी हूँ कि वे मेरी वेदना को अपने शब्दों में व्यक्त करने में सफल रहे !
जब भी कुछ फ़ूटा अधरों से
तब तब ही उंगली उठी यहाँ
जो भाव शब्द के परे रहे
वे कभी किसी को दिखे कहाँ
यह वाद नहीं प्रतिवाद नहीं
मन की उठती धारायें हैं,
ले जाये नाव दूसरे तट, हम पाल चढ़ाये बैठे हैं !

Thursday, September 18, 2008

हमारे संस्कृति सारथी -राज भाटिया !



राज भाटिया जो प्रचार से दूर, पराये देश में रहते हुए भी भारतीय संस्कृति नन्हे-मुन्हे बच्चों को सिखाने के प्रयत्न में लगे हुए हैं ! नन्हे मुन्नों को अपने पास बैठा कर यह भारतीय कल्चर की कहानिया सुनाते हैं, इनकी इस वेब साईट पर जायेंगे तो किसी भी हिंदू का सर श्रद्धा से झुक जाएगा ! महसूस हो जाएगा की हम एक पावन स्थान पर आ गए हैं और वहाँ दिखाई पड़ेंगे बच्चों से घिरे हुए मधुर आचरण की कहानिया सुनाते राज !
और आश्रम भी ऐसा जहाँ गुरुवर नानक, माँ शारदा, ख़ुद केशव विराजमान हैं, वहां एक योगी राज भाटिया अपनी सुगन्धित धूनी रमाये बैठे नज़र आयेंगे !

ब्लाग जगत पर जिन लोगों को अब तक मैं जान पाया उनमे राज भाई ! विदेश में बसे ऋषि प्रतीत होते हैं, ! भारतीय कल्चर को बढ़ाने का ऐसा प्रयत्न और लगाव अब तक मैं और कहीं नही देख पाया ! अचानक पहली बार कोई व्यक्ति इस ब्लॉग पर आएगा तो लगेगा कि जैसे यह स्थान किसी धार्मिक हिंदू का है, मगर कुछ देर में इस संत के विचार जान कर आप समझ जायेंगे कि यह जगह एक विशाल दिल वाले इंसान की है जो मानवता से प्यार करता है , अपने देश से प्यार करता है अपनी संस्कृति से प्यार करने के साथ साथ, हर मज़हब की भी उतनी ही इज्ज़त करता है जितनी हिंदू धर्म की !

"अनवर भाई अगर गलती से किसी का मन भी दुखा दु तो मुझे सारी रात नीद नही आती, जब तक उस से माफ़ी ना मांग लु,ओर गलत को गलत कहने मे कभी भी परहेज नही किया..."

उपरोक्त शब्द राज ने वेब साईट चाट पर अनवर से कह रहे हैं, जबकि आज फैशन बन चुका है अपने बड़प्पन को सिद्ध करने का, अपने ज्ञान ( ज्ञान भाई माफ़ करें ;-) .. उनसे नही कह रहा ) के प्रचार करने का, कोई मौका हमारे कुछ प्रतिष्ठित ब्लागर हाथ से नही जाने देते ! अपनी विद्वता प्रचार का यह नशा, उनके कुछ स्वयं ज्ञानी चेले चेलियों ने उनकी पीठ थपथपा कर और दुगुना कर दिया ! ऐसे ढोल नगाड़े बजते माहौल में कौन हिम्मत करे प्रश्न करने की ?? हर किसी को अपनी इज्ज़त की चिंता रहती है कि सरे बाज़ार मेरी धोती ना खोल दी जाए ....

मैं कल ब्लॉग जगत में, एक साल पुरानी कुछ पोस्ट पढ़ कर कुछ ब्लाग नायकों को समझने की कोशिश कर रहा था जानकर स्तब्ध रह गया कि किस तरह लोग अपनी धुन में दूसरे पक्ष को समझने का प्रयत्न ही नही करते ! और मजेदार बात यह कि हर पक्ष का ग्रुप उनके पक्षः में दोनों हाथों से तलवारें चला रहा है !
चंद "बेस्ट सैलर" किताबें पढ़ कर, उनके उद्धरण देते विद्वान्, यहाँ ब्लाग जगत में विदुर और केशव को सिखाते देखे जा सकते हैं !
इस माहौल में राज भाई के यह शब्द वन्दनीय हैं !

शहरोज भाई के लिखे "पंडित पुरोहितों के बिना उर्स मुकम्मिल नहीं होता" पर दिए गए उनके कमेंट्स
"कट्टरवाद की बीमारी सबसे खतरनाक बीमारी है, दुसरा आग लगाने ओर भडकाने वालो से भी हमे बचना चाहिये, वेसे जब मेरा दोस्त(पकिस्तान से) इस दुनिया से गया तो मेने उस की रुह को जन्नत मे जगह मिले के लिये नमाज भी अदा की ओर इस से मेरे धर्म को तो कोई हानि नही हुयी, बल्कि मुझे आत्मिक शान्ति मिली.
आप ने बहुत ही सुन्दर लिखा हे काश सारे भारत वाषी आप के ख्याल के हो जाये तो हमारे भारत मे ही नही पुरी दुनिया मे कितनी शान्ति हो।"
धार्मिक जनून के इस माहौल में अगर एक हिंदू, किसी मस्जिद में जाकर मत्था टेकता है, तो हिंदू धर्म की इज्ज़त बढ़ाने में इससे बड़ा योगदान और कुछ नही हो सकता, मेरा यह विश्वास है कि किसी हिंदू को मत्था टेकते देख कर मस्जिद में उपस्थित हर मुस्लिम भाई को एक सुखद आश्चर्य और सुकून की भावना ही नहीं पैदा होगी बल्कि तुंरत उसके दिल में उस व्यक्ति विशेष के प्रति आदर सम्मान देने की भावना भी पैदा होगी !

Monday, September 15, 2008

भारतीय महिला जागरण लेखन और ब्लाग प्रतिक्रियाएं -सतीश सक्सेना


हिन्दी ब्लाग जगत में महिलाओं से जुडी हुई समस्यायें पढ़ते समय हमेशा मैंने एक चुभन सी महसूस की जैसे कुछ छुट गया हो या कि इन लेखों में पुरुषों के प्रति कुछ अधिक कड़वाहट है जो कि सच प्रतीत नहीं होती ! पारिवारिक समस्याओं में, घर टूटने की अवस्थाओं में दोषी जितना पुरूष है, स्त्री का आचरण उससे कम दोषी नही है ! इस आपसी कलह में जहाँ पुरूष, पत्नी के प्रति लापरवाही का दोषी माना जाएगा वहीं स्त्री दोषी है, अपने ही परिवार में, अपेक्षाओं को पूरा न होने के कारण, घुट घुट कर रहने के लिए ! इस विषय पर मेरा विचार है कि कुछ लेखक या लेखिकाएं दुराग्रह से ग्रसित होकर होकर लिखते है ! ऐसे लेख और विचार, समाज के साथ कभी न्याय नहीं कर पाते बल्कि उसको पथभ्रष्ट करने में एक भूमिका ही निभाते हैं ! हमारा भारतीय समाज और संस्कार आज भी विश्व में अमूल्य हैं ! अतिथि देवो भवः एवं हमारी स्नेह भावना आज भी विश्व के सामने बेमिसाल हैं ! प्यार और ममता की यही विशेषता, भारतीय स्त्री को विश्व की अन्य महिलाओं से बहुत आगे ले जाती है !

शादी व्यवस्था के फेल होने में एक महत्वपूर्ण कारण, अपनी पुत्रियों को प्यार और पारस्परिक समझ की सही शिक्षा न देना ही है ! मैं यहाँ पर बहू और पुत्री में कोई भेद नही कर रहा ये सिर्फ़ नारी के दो रूप हैं! माता पिता या सास ससुर हम लोग हैं ! मेरा यह भी मानना है कि पुत्र (दामाद) और पुत्री (बहू ) दोनों ही एक दूसरे को सम्मान दें ! परन्तु पुत्री उम्र में छोटी होने के कारण, पहले सम्मान देने की जिम्मेदारी उठाये ! तो कोई घर अपूर्ण नही हो सकता है ! समय है पति पत्नी के संबंधों में, तल्खी कम कराने का प्रयत्न करने का,  न कि जिस आग में हम झुलसे हैं उसमें अपनी बेटियों और बेटों को भी झोंकने का प्रयत्न करें ! हमें अनुभव है तो इस अनुभव का लाभ अपनी बच्चियों को दें जिससे वे नए घर में जाकर एक नए जीवन का संचार करें जिससे दोनों घरों के रिश्ते और मज़बूत बन सकें और सुख दुःख में साथ खड़े होकर एक दूसरे को ताकत दें !

विवाह के बाद पुत्री अपने घर से विदाई लेकर जब नए घर जाती है तो शायद ही कोई निकृष्ट परिवार ऐसा होगा जहाँ

उसका खुशियों भरे वातावरण में स्वागत न किया जाए ! उस वक्त पुत्री के इस नए घर में, हर व्यक्ति अपने बेहतरीन
रूप को, उसके सामने प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है और प्यार जैसे न्योछावर किया जाता है ! इस खुशनुमा माहौल में, नववधू के मन में किसी प्रकार की शंका न होकर सिर्फ़ अपने नए घर में रमने की तमन्ना हो तो मेरा यह विश्वास है कि कोई ताकत इस माहौल में कटुता नही घोल सकती ! जरूरत है कि इस समय मेरी बेटी अपनी शंकाएँ हटा कर नए उत्साह से अपना घर बसाना शुरू करे !
आजकल कुछ लेख इस प्रकार लिखे जा रहे हैं जिससे प्रतीत होता है कि पुरूष नारी को निरीह और कमज़ोर मान कर अत्याचार करता है, मैं अपने परिवेश में एक भी ऐसे परिवार को नही जानता जिसमे नारी को परेशान करने की हिम्मत भी पुरूष कर सके, इसका अर्थ यह बिल्कुल नही कि नारियों को सताया नही जाता ! परन्तु इतनी अधिक घटनाएँ घटीं हो कि हम नव वधुओं को डरा ही दें, यह अतिशयोक्ति लगती है ! मेरा यह विचार है कि अगर अत्याचारों और विचारों के शोषण की बात करें तो यह ५० - ५० प्रतिशत है ! चूँकि यह विषय हमारे बच्चों से सम्बंधित है अतः बहुत नाज़ुक है, तीक्ष्ण सोच और पूर्वाग्रह ग्रस्त लेखनी अनर्थ कर सकती है अतः इस प्रकार के लेखों पर कमेंट्स बिना भली भांति विचारे नहीं देने चाहिए , मगर आदरणीय लेखिकाओं के इन लेखों पर, हमारे प्रबुद्ध साथियों ने, खुले दिल से, बिना गौर किए, मुक्तभाव कमेंट्स देने में कोई कोताही नही की ! ऐसे लेख जिसमें महिला को शोषित एवं पुरूष को शोषक घोषित किया जाए, हमारे बच्चों के मन में गहरा नकारात्मक प्रभाव डालेंगे मगर फिर भी हम (ब्लागर ) अभिभूत हैं, और खुले मन से तारीफ़ ........ वाह! वाह! और जोरदार तालियाँ........ ......मुझे भय है कि यह तालियाँ हमारी बच्चियों का अधिक नुक्सान करेंगी अतः तारीफ़, विषय देख कर की जाए तो अच्छा होगा !

मेरे मत से हर पुरूष पर उंगली नही उठाई जा सकती और न हर नारी को दोषी कहा जा सकता है ! "नारी को दासता से मुक्ति" "पुरूष के शोषण के खिलाफ आवाज़" जैसे जुमले केवल राजनीति के मंच की शोभा बढ़ाने के लिए ही उचित हैं, इस प्रकार के नारे, घर व्यवस्था में शायद ही कभी आधार पा पायें ? शायद कुछ दिन के लिए नारी को  तथाकथित  "दासत्व " का अहसास होता हो मगर समय के साथ यही नारी घर में एकक्षत्र साम्राज्य की मालकिन भी बनती है और उसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता ! मैं ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ जहाँ पुरुषों का महत्व है ही नही शायद वे "दासत्व" का जीवन निर्वाह कर रहे हैं और वेहद खुश भी हैं !

लेखन अमर है और कुलेखन आने वाली पीढी को एक नयी राह पर ले जाएगा, और भूतकाल में ऐसा हो चुका है जिसमें अधकचरे लेखकों ने अच्छे भले इतिहास के आधारभूत तथ्यों की मिटटी पलीद कर के रख दी और बाद में इसी लेखन को इतिहास और ऐसे लेखको को महानायक स्वीकार कर लिया गया ! अफ़सोस इस बात का है कि कुछ महिलाएं ख़ुद नही सोच पातीं कि वे क्या कह रहीं हैं, और इससे, समय के साथ, सबसे अधिक नुक्सान उन्ही का होने जा रहा है ! अपने शानदार प्रभामंडल और इन तालियों की गडगडाहट में उन्हें आने वाले समय तथा पीढी का उन्हें शायद ध्यान ही नहीं रहता ! वे शायद भूल जाती हैं कि इस विकृत संरचना की सबसे बड़ी शिकार वे ख़ुद ही होंगी ! और भारतीय पुरूष उस समय भी सर पर हाथ रखकर किंकर्तव्यविमूढ़ होगा या शायद आवेश में नारियों की इस गलती पर, दुखी मन के साथ, तालियाँ ही बजाये !

एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप के समय कोई नही सोचता कि हम दूसरे पक्ष के साथ अन्याय कर रहे हैं और अनजाने में भारतीय समाज की मूलभूत संरचना को बिगाड़ रहे हैं !मैं व्यक्तिगत अनुभव से पूरे संयुक्त परिवार की अच्छाइयों की तरफ़ ध्यान दिलाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ! आज के समय में संयुक्त परिवार घटते जा रहे हैं मगर भाई-बहन-माता और पिता के प्यार की आवश्यकता तो सभी को है! जब कोई पुरूष पर उंगली उठाता है तो मुझे लगता है वह मेरे पिता को इंगित कर रहा है और यही बात स्त्री के विषय में हो तो मुझे मां दिखाई देती है ! क्या इन लेखिकाओं को यह महसूस नहीं होता कि जिनपर वे उंगली उठा रही हैं वे उनकी भावना से जुड़े, उनके खून से जुड़े अपने ही अभिन्न अंग हैं ! और भावना प्रधान वर्चस्व की मालकिन होने के कारण सबसे अधिक कीमत उन्हें ही देनी पड़ेगी, क्योंकि परिवार का अगला पुरूष उनका अपना बेटा होगा जिसको शिक्षा देने कि जिम्मेवारी उनकी अपनी ही है !

अंत में ताऊ रामपुरिया का एक वाक्य जो उनके नवीनतम लेख से उडाया गया है, "आशा है कि कृपया सकारात्मक रुप मे ग्रहण करेंगे !" ;-)  

Saturday, September 6, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम ! (पांचवां भाग)

कर्कश भाषा ह्रदय को चुभने वाली, कई वार बेहद गहरे घाव देने वाली होती है ! और अगर यही तीर जैसे शब्द अगर नारी के मुख से निकलें तो उसके स्वभावगत गुणों, स्नेहशीलता, ममता, कोमलता का स्वाभाविक अपमान होगा ! और यह बात ख़ास तौर पर, भारतीय परिवेश में, घर के बड़ों के सामने चाहे मायका हो.या ससुराल, जरूर याद रखना चाहिए ! अपने से बड़ों को दुःख देकर, सुख की इच्छा करना व्यर्थ और बेमानी है !

नारी की पहचान कराये
भाषा उसके मुखमंडल की
अशुभ सदा ही कहलाई है
सुन्दरता कर्कश नारी की !
ऋषि मुनियों की भाषा लेकर,तपस्विनी सी तुम निखरोगी
पहल करोगी अगर नंदिनी , घर की रानी,  तुम्ही रहोगी !


कटुता , मृदुता नामक बेटी
दो देवी हैं, इस जिव्हा पर !
कटुता जिस जिव्हा पर रहती
घर विनाश की हो तैयारी !
कष्टों को आमंत्रित करती, गृह पिशाचिनी सदा हँसेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

उस घर घोर अमंगल रहता
दुष्ट शक्तियां ! घेरे रहतीं !
जिस घर बोले जायें कटु वचन
कष्ट व्याधियां कम न होतीं !
मधुरभाषिणी बनो लाड़िली,चहुँदिशि विजय तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी , घर की रानी,  तुम्ही रहोगी  !

घर में मंगल गान गूंजता,
यदि जिव्हा पर मृदुता होती
दो मीठे बोलों से बेटी  ,
घर भर में दीवाली होती !

उस घर खुशियाँ रास रचाएं ! कष्ट निवारक तुम्ही लगोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ! घर की रानी तुम्ही रहोगी !

अधिक बोलने वाली नारी
कहीं नही सम्मानित होती
अन्यों को अपमानित करके
वह गर्वीली खुश होती है,
सारी नारी जाति कलंकित, इनकी उपमा नहीं मिलेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ! घर की रानी तुम्ही रहोगी !

next : http://satish-saxena.blogspot.in/2008/10/blog-post_14.html

Tuesday, September 2, 2008

हिन्दी ब्लाग और पुरूष मानसिकता !

यह लेख मेरे और एक महिला हिन्दी ब्लॉगर के मध्य हुए पत्राचार का हिस्सा है जो यहाँ प्रदर्शित करना आवश्यक समझता हूँ चूंकि सुझाव बेहद सटीक हैं अतः यहाँ देना मेरे विचार से उचित है , शायद समाज के कुछ कार्य आए ! सम्मानित महिला ब्लागर ने मेरे लिखे एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग ) पर एक आपत्ति प्रकट करते हुए कहा था, कि हर पिता पुत्री को ही शिक्षा क्यों देता है ?

----- Original Message -----
From: सतीश सक्सेना
To: रचना सिंह
Sent: Tuesday, September 02, 2008 10:32 AM
Subject :हिन्दी ब्लाग और पुरूष मानसिकता !
On 9/1/08, Rachna Singh wrote:

" its high time we educated our man folk satish "

पुरूष मानसिकता के बदलने के सवाल पर आप ठीक हैं रचना जी ! भारतीय समाज के पारंपरिक रूप में पुरूष का अस्तित्व विश्व समाज के समक्ष टिक नही पायेगा ! पुरूष मानसिकता, (जिसमें अहम्, पुरुषत्व,शक्ति तथा कमजोर को सुरक्षा देना जैसे तत्व प्रधान हैं,) से यह हटा पाना कि " यह मेरी है " बेहद मुश्किल कार्य है, शिक्षित और समझदार की मानसिकता बदल सकती है मगर अधिकतर भारतीय परिवार इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षित हैं ही नहीं, न स्कूल से और न सामजिक परिवेश से !

"सतीश बहुत जरुरत है कि केवल बेटी को शालीनता की शिक्षा ना दी जाये"

अगर आप मेरे गीत में लिखी मेरी रचना " एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग ) " के सन्दर्भ में कह रही हैं तो यह कविता एक ऐसे पिता का चिंता वर्णित कर रही है जो पारंपरिक रूप से भारतीय समाज और उसी पुरूष समाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है इसमे अपनी जान से भी प्यारी पुत्री को पारस्परिक समझ और सामंजस्य के बारे में समझाता है, कि बेटी २४-२५ वर्ष की कच्ची उम्र में नए लोगों के साथ रहकर उनका दिल कैसे जीत पायेगी !

"अगर हम सब बेटो को भी वही पाठ पढाये जो बेटी को तो भारतीयता को बदनाम करने बाले लोग लोग धीरे धीरे समझदार होंगे "

आप इस बात का समर्थन करेंगी कि विवाह के समय, वर पक्ष का, नयी वधू के प्रति जितना उत्साह होता है उतना ही वधू पक्ष अपनी पुत्री के प्रति चिंतित होता है ! अगर ऐसे में पुत्री शंकित मन से न जाकर , नए उत्साह से अपने नए परिवार को अंगीकार के, और दोनों घरों से शंका तथा चिंता का माहौल हटा कर नया उत्साह भरे तो काफ़ी कष्ट प्रद मौकों से छुटकारा मिल सकता है ! इस पूरी कविता में पुत्री को उसकी ताक़त का अहसास दिलाते हुए प्यार से अपने बड़ों का दिल जीतने की बात कही गयी है ! हाँ इसमे, एक और सच्चाई, जिसको बहुत कम नारी लेखिकाओं ने लिखा होगा, को भी स्थान दिया गया है, नवविवाहित पति की मनोदशा को समझना परिवार के सबसे बड़े सुख के अवसर पर, पति सबसे अधिक तनाव ग्रस्त रहता है और उसकी इस मनोदशा को नववधू और उसके अपने परिवार के लोग समझना भी नही चाहते ! पुरूष के इस पक्ष को नारी वादी आन्दोलन के प्रणेता बिल्कुल महत्व नही देते जहाँ नारी के कष्टों पर खूब हाय तौबा रहती है वहीं नवविवाहित लड़के के बारे में कोई सोचता तक नहीं !


"आप की कविता पर भी मेने यही कहा था मै पुरूष जाति के ख़िलाफ़ नहीं लिखती
मै लिखती हूँ उस मानसिकता के ख़िलाफ़ जहाँ स्त्री को शालीन रह कर सब गंदगी सहने की शिक्षा दी जाती हैं "

आज के समय में, स्त्री को शक्तिशाली बनने की आवश्यकता, समय की पुकार है ! इसके अभाव में देश तो पिछ्डेगा ही, अगली पीढियां भी कुछ सीख नहीं पाएंगी ! भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति, कमोवेश पिछडी जनजातियों की भांति ही है, जो अपनी स्थिति को नियति मान कर खुश हैं ! स्त्री दशा में सूधार हेतु, बदनामी के भय से , शिक्षा देने बहुत कम महिलायें आगे आ पाती है समाज की गालियाँ, "बहुत तेज" होने, तथा गंदे आरोप जिससे वह समाज में खड़ी भी न हो पाये, थोपना आम बात है ! और यह सब, सबके समक्ष करते हुए लोग गर्वित होते हैं, तथा ब्लॉग जगत के मशहूर लोग या तो भाग खड़े होते है या इस पर मौन व्रत धारण कर मन ही मन प्रायश्चित्त करते है ! यह और कुछ नहीं सिर्फ़ हमारी कायरता है !

आप का कार्य सराहनीय है, इस हिम्मत के लिए मै आपका अभिनन्दन करता हूँ !

Monday, September 1, 2008

रमजान मुबारक !

सब  भाई बहनों को,

इस माहे मुबारक पर,

मुबारकबाद !

Saturday, August 23, 2008

भारत मां के यह मुस्लिम बच्चे ! (दूसरा भाग)

आज नवभारत टाईम्स के पहले पेज पर दो पर्दानशीं हिन्दुस्तानी लड़कियों की गोद में, बाल कृष्ण को, मोर मुकुट, पीले वस्त्र, लंबा तिलक धारण किए, देखा तो बरबस ही भक्त सूरदास के पद याद आ गए !

"अखियाँ हरि दर्शन की प्यासी ।देखो चाहत कमल नयन को, निस दिन रहत उदासी ॥केसर तिलक मोतिन की माला, वृंदावन के वासी ।"
उक्त चित्र इतना सुंदर था कि समझ नही आता कि तारीफ कैसे करूँ, भावः विह्वल एक चित्र कर सकता है ? कल्पना से परे कि बात लगती है ! अपनी इन मुस्लिम बहनों को प्रणाम, साथ ही नवभारत टाईम्स की जागरूकता को भी !
-लोगो से सुना था कि हमारे मुस्लिम दोस्त, बहुत कट्टर होते हैं, अपने धर्म के अलावा औरों को पसंद नही करते हैं ! उनको एक शानदार जवाब इन मुस्लिम लड़कियों ने जन्माष्टमी के त्योहार पर अपने बच्चों को कृष्ण रूप देकर दिया है ! क्या सुनी सुनाई मानसिकता थी मेरी, मैं आज अपनी उस सोच पर सचमुच शर्मिन्दा हूँ !

Saturday, August 16, 2008

ये समझ नहीं आता इनको -सतीश सक्सेना

स्वतंत्रता दिवस पर उग्रवादियों और तथाकथित जेहादियों को एक संदेश ! 

लूटें घर को, मारें मां को
पल पल में, हुंकारे भरते
गर्दन ऊंची, छाती चौडी,
है शर्म नाम की चीज नहीं,
जब बाल पकड़ यमराज इन्हें,

परदेश में लाकर मारेगा !
तब आँख, फटी रह जायेगी , कोई न बचाने  आयेगा  ! 


किसको धमकी तुम देते हो ,
लाखों मरने को हैं तैयार !
बच्चों का रक्त बहाने को
आओ लेकर सब हथियार!

मारो बम कितने मारोगे, 
इक दिन ऐसा भी आयेगा !
जब, मौत तुम्हारी आने पर , आंसू कोई न बहायेगा !

तुम मासूमों का खून बहा,
ख़ुद को इंसान बताते  हो
औ मार नमाजी को बम से
इस को जिहाद बतलाते हो

जब मौत तुम्हारी आयेगी,
तब कोई न फूल चढ़ायेगा !
मय्यत में कंधा देने को , घर से भी न कोई आयेगा !


Monday, August 11, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम ! ( चौथा भाग )


यहाँ एक दुखी पिता अपनी लाडली को विवाह की आवश्यकता बताने, समझाने का प्रयत्न कर रहा है ! भारतीय समाज की सबसे मजबूत गांठ, आज पाश्चात्य सभ्यता समर्थन के कारण खतरे में है ! नारी अपने बिभिन्न रूपों को भूल कर अपने एक ही रूप को याद करने का प्रयत्न कर, तथाकथित जद्दोजहद कर रही है ! एवं आधुनिकीकरण की तरफ़ भागता समाज, हमारी शानदार व्यवस्था भूल कर चमक दमक में खो रहा है ! ऐसे समय में ,यह कविता बहुतों के माथे पर बल डालेगी, मगर यह एक भारतीय पिता की भेंट है अपनी बेटी को !

बचपन यहाँ बिताकर अब तुम
अपने नए निवास चली हो !
आज पिता की गोद छोड़ कर
करने नव निर्माण चली हो !
केशव का उपदेश याद कर, 

कर्म भूमि में तुम उतरोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

इतने दिन तुम रहीं पिता की
गोद , 
मातृ  का मान बढाया,
अब जातीं घर त्याग अकेली
एक नया संसार बसाया ,
जब भी याद पिता की आये ,

अपने पास खड़े पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

कोई नन्हा जीवन तेरा ,
खड़ा हुआ बांहे फैलाए !
इस आशा के साथ,उठाओगी
तुम , अपनी बांह पसारे !
ले नन्हा प्रतिरूप गोद में , 

ममता मयी तुम्ही दीखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही लगोगी !

श्रष्टि नयी की रचना करने,
विधि है, इंतज़ार में तेरे !
सुन्दरता की नन्ही उपमा
खड़ी, तुम्हारी आस निहारे
तृप्ति मिलेगी रचना करके

मां की गरिमा तुम्हे मिलेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

नर नारी के शुभ विवाह पर
गांठ विधाता स्वयं बांधते,
शायद देना श्रेय तुम्ही को
जग के रचनाकार चाहते !
जग की सबसे सुंदर रचना 

की निर्मात्री तुम्ही रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

next - http://satish-saxena.blogspot.in/2008/10/blog-post_14.html
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