Saturday, May 24, 2008

स्वाभिमान - सतीश सक्सेना

समझ प्यार की नही जिन्हें है 
समझ नही मानवता की
जिनकी अपनी ही इच्छाएँ
तृप्त नही हो पाती हैं ,
दुनिया चाहे कुछ भी सोचे 
 कभी न हाथ पसारूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !


चिडियों का भी छोटा मन है
फिर भी वह कुछ देती हैं
चीं चीं करती दाना चुंगती
मन को हर्षित करती हैं !
राजहंस का जीवन पाकर 
 क्या भिक्षुक से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !


विस्तृत ह्रदय मिला इश्वर से
सारी दुनिया ही घर लगती
प्यार नेह करुणा और ममता
मुझको दिए , विधाता ने !
यह विशाल धनराशि प्राण, 
अब क्या मैं तुमसे मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको ,   दवा न तुमसे मांगूंगा !


जिसको कहीं न आश्रय मिलता
मेरे दिल में रहने आये
हर निर्बल की रक्षा करने
का वर मिला विधाता से
दुनिया भर में प्यार लुटाऊं 
 क्या निर्धन से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !


प्रिये दान से बढ कर कोई
धर्म नही है, दुनिया में  !
खोल ह्रदय कर प्राण निछावर
बड़ा प्यार है , दुनिया में  !
मेरा जीवन बना दान को 
 क्या याचक से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

समता सदा बराबर वाले  
की ही करना , ठीक रहे !
दीपशिखा की लौ , होकर 
तुम करतीं तुलना सूरज से
करूं प्रकाशित सारा जग, 
मैं क्या दीपक से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको ,   दवा न तुमसे मांगूंगा !


मेरी पूरी हुई साधना !
पद्मासन तुम सीख न पायीं
मैंने दर्शन किए प्रभू के
आराधना तुम्हे ना आई
परमहंस का ज्ञान मिला है 
 क्या साधू से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !


माँ सरस्वती से पाया वरदान
ह्रदय, कविता लिखने का
राग, द्वेष और ईर्ष्या में
तुम खो बैठी हो ह्रदय कवि का
कवि का ह्रदय लेखनी पाकर क्या मैं तुमसे मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !


गर्व सदा ही खंडित करता
रहा कल्पनाशक्ति कवि की
जंजीरों से ह्रदय और मन
बंधा रहे , गर्वीलों का !
मैं हूँ फक्कड़ मस्त कवि, 
 क्या गर्वीलों से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

1 comment:

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- सतीश सक्सेना

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