Thursday, March 4, 2010

मेरे जीवित रहते हुए भी ......- सतीश सक्सेना

                    क्या आपने कभी यह सोचा है कि हमने अपने जीवन में कहाँ कहाँ गलतियाँ की है, अगर हम ईमानदारी से विगत जीवन का मूल्यांकन करें तो लगता है कि जीवन में कुछ भूलें बेहद बड़ी थीं , जो माफ़ करने लायक नहीं थीं और शायद इस समय भी अपनी आदतों में कोई सुधार नहीं कर पाया हूँ  !  मन  यह मानने को तैयार नहीं होता कि मेरी भयंकर भूलें, मात्र लापरवाही थी या जानबूझकर अपने आपको अन्य कार्यों में व्यस्त रखना ताकि मैं इस समस्या से बचा भी रहूँ एवं अपने आपको भविष्य में दोषी भी न ठहराऊं ! 
मेरी इन भूलों अथवा लापरवाहियों के कारण, वे लोग असमय ही दुनिया से चले गए जिन्होंने मेरे बचपन में , सदा मेरी रक्षा की थी ,.....
मुझे लगता है कि ...
  • मैंने अपने बड़ों की, उनके जीवनकाल में, वह सेवा नहीं की जिसके वे हकदार थे और उनके अवसान के बाद पछतावा किया कि जो सुविधाएँ मैं उन्हें आराम से दे सकता था वह सिर्फ लापरवाही के कारण नहीं दे सका !
  • मैं उनकी घातक बीमारी के समय में, अगर ठीक प्रकार उनके इलाज़ का प्रबंध करता तो वे शायद आज भी जीवित होते, ठीक अगर यही लापरवाही उन्होंने मेरे बचपन में की गयी होती तो शायद मैं आज यह लेख लिखने को जिन्दा न होता !
  • निस्संदेह वे हमसे बहुत अच्छे थे ! 

14 comments:

  1. यशपाल जी की उक्ति याद आती है :
    अवसर के देवता का सिर घने केशों वाला है पर पीछे से वह गंजा है. उसे उसके केशों को पकड़कर ही काबू में किया जा सकता है. वह अगर निकल गया तो आप उसके सिर पर कितना भी हाथ मारेंगे वह काबू में नही आने वाला.

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  2. बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

    आपका लेख अच्छा लगा।



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  3. आपका यह लेख बहुत अच्छा लगा...

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  4. Bahut himmat kee baat hai ise tareeke se apane vyvhaar ka hee vishleshan karana.aapkee 3,4 post
    hee padee hai jitna mai samajh pai hoo sanskar aapke buland hai.yuvaavastha me sabhee ko aajkal apana 100% kaam ko dena hee hota hai . ardhangineehee aise samay sahayak hotee hai aur bado ka v ghar aae atithee ka dhyan ve hee rakhatee hai .Aapke aangan me to Garima ka lalan palan hua hai aapkee Garima aapke jeevan kee garima sabhee ke liye shubhkamnae......
    Vaise aatm chintan bhavishy behtar kar deta hai .

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  5. आप की बात सही है। लेकिन मेरा मानना है कि परिस्थितियाँ निर्णायक होती हैं।

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  6. द्विवेदी जी टिप्पणी मेरी टिप्पणी मानी जाये ।

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  7. मुझे भी लगता है हालात कई बातों का फैसला करते हैं !

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  8. बात तो बहुत गहरी कही है.. कई बार मुझे भी लगता है... कि मैं दिल्ली में अपने घरवालों से दूर हूं... फिर उन्हें मेरे बड़े होने का क्या फायदा मिला...

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  9. सतीश जी , सब कुछ इंसान के हाथ में नहीं होता ।
    लेकिन अंतर्मन में सच्चाई का बोध होना अच्छी बात है।

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  10. पहला बिन्दु तो अहसासता हूँ हमेशा किन्तु द्वितीय का अनुभव नहीं अब तक अहसासने का..

    सुन्दर विचारा है आपने.

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  11. असल में लापरवाही या परिस्थितिवश दोनों या एक एक बिंदुओं से भुक्तभोगी लोग मिलेंगे. शायद आज परिस्थितियां जो कि दूर दूर रोजगार की वजह से ज्यादा जिम्मेदार हैं. ईश्वर कृपा से अपने को दोनों का ही अनुभव नही मिला.

    आपने बहुत अच्छा आत्ममंथन का मौका दिया. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  12. परिस्थितियाँ और समय शायद इंसान के हाथ में नहीं होते...... जो गुजर गया उसमे हम कुछ नहीं कर सकते मगर आगे को शायद सुधार सकते हैं....आपका ये लेख सभी को सोचने को मजबूर करेगा.....
    regards

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  13. अहसास तो सबको होता है

    पर अहसास नहीं कराते हैं

    आपने मान तो लिया है

    लोग मान भी नहीं पाते हैं।

    वैसे ये वो अहसास है जो देर ही होता है सदा।

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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