Friday, April 23, 2010

सूना मंदिर - सतीश सक्सेना

बरसों पूर्व लिखा गया एक बहुत पुराना गीत आपको पढवाना चाह रहा हूँ , कृपया ध्यान रखें मेरे गीतों में शायद शिल्प का कोई स्थान नहीं मिलेगा क्योंकि गीत शिल्प का मैं बिलकुल जानकार नहीं हूँ , जो भाव मन में उठे वे ही लिखे गए ! अतः विद्वान् जनों से क्षमा प्रार्थी हूँ  ! आम लोगों को शायद यह गीत पसंद  आएगा !


फूलों भरी अंजली लेकर तुम पथ भटक यहाँ क्यों आई !
लगता है मन्दिर के बदले, रास्ता भूल चली आई हो !

खड़ी , भव्य दीवारें मेरी
कलश कंगूरे ध्वज और तोरण
घंट ध्वनि, मंत्रोच्चारण से
लगता घर मेरा मन्दिर सा
यह सब सच है !मगर कामिनी पूजा यहाँ न अर्पण करना !
तुमको दुख होगा कि यहाँ पर मन्दिर है पर मूर्ति नहीं है !

बाहर से देवता सरीखा,
सौम्य लगूँ आराध्य सरीखा
तुम मुझसे वर लेने आईं,
मैंने मांग लिया तुमको ही
अब भी जागो स्वप्नसुंदरी, गीत यहाँ न समर्पित करना !
इस सूने मन्दिर में देवी  ! कविता है,  सौन्दर्य नहीं है  !

मीरा जैसा प्यार लुटाती,
घर बाहर की लाज छोड़ कर
शुभ्र पुष्प अंजलि में लेकर,
किस मोहन को ढूँढ रही हो
पूजन लगन देख मनमोहिनि, मैं भी हूँ नतमस्तक तेरा !
तेरी पूजा ग्रहण योग्य, मन्दिर तो है , आराध्य नहीं है !

32 comments:

  1. बहुत बढ़िया गीत है सक्सेना साहब ! मगर एक प्राइवेट बात पूछना चाहूंगा ( धीरे से मेरे कान में बताना ) इसे पढने के बाद भाभीजी ने 'किस' किया था ???????? :) गुस्ताखी माफ़ !!

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  2. बहुत ही अच्छा विचार है / अच्छी विवेचना के साथ प्रस्तुती के लिए धन्यवाद / आपको मैं जनता के प्रश्न काल के लिए संसद में दो महीने आरक्षित होना चाहिए इस विषय पर बहुमूल्य विचार रखने के लिए आमंत्रित करता हूँ /आशा है देश हित के इस विषय पर आप अपना विचार जरूर रखेंगे / अपने विचारों को लिखने के लिए निचे लिखे हमारे लिंक पर जाये /उम्दा विचारों को सम्मानित करने की भी व्यवस्था है /
    http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html

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  3. @गोदियाल भाई !
    समझदार लोगों से बड़ा डर लगता है, इस उम्र में भी पिटवा देंगे...जब मिलोगे तो कान में बताऊंगा !

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  4. विचार साफ हैं
    सच्‍चे हैं
    भाव अच्‍छे हैं
    पर ...

    शिल्‍प क्‍या होता है
    हमें भी मालूम नहीं।

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  5. @honesty project democracy,
    राजनीतिक समस्याओं पर मैं विचार शून्य हूँ ! सम्मान के लिए आपका धन्यवाद !

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  6. मीरा जैसा प्यार लुटाती,
    घर बाहर की लाज छोड़ कर
    शुभ्र पुष्प अंजलि में लेकर,
    किस मोहन को ढूँढ रही हो
    " बेहद ही मनभावन और सुन्दर गीत"
    regards

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  7. मीरा जैसा प्यार लुटाती,
    घर बाहर की लाज छोड़ कर
    शुभ्र पुष्प अंजलि में लेकर,
    किस मोहन को ढूँढ रही हो

    इस पर कोई टिप्पणी नहीं । बस बार बार पढ़ने का मन कर रहा है ।

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  8. भावपूर्ण और मनमोहक गीत।

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  9. geet me bhavnaaon kaa prasfutan adbhut hai. aur geyataa bani hui hai,isaliye rachanaa sampreshaneey ban gai hai. rahi shilp ki baat, to mai kah saktaa hu,ki aa jayegaa. pahale bhaav tak to ham pahunchen aap men ''bhaav'' kaa ''a-bhav'' nahee hai, yah badee baat hai. bhavishya me isee tarah kee pyaree-pyaaree rachanaaon ki pratikshaa rahegi.

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  10. वाह भाई सतीश जी. बहुत सुंदर रचना है.

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  11. सुन्दर शब्द संयोजन से सजी रचना बहुत अच्छी लगी..

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  12. सुन्दर रचना. साधुवाद.

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  13. सतीश भाई,
    आपका तो महकमा ही शिल्प का है और आप शिल्प में ही खुद को अंगूठाछाप बता रहे हैं...

    आज तो ब्लॉगवुड की हालत देखकर ये गीत ज़ेहन में आ रहा है...

    ये कैसा ब्लॉग मंदिर है,
    जिसमें दूसरों के लिए दर्द नहीं...

    अरे सतीश भाई मैं जीते जी अपने शरीर को आपके होम्योपैथी के प्रयोगों के लिए दान देने को तैयार बैठा हूं, और आप है कि अभी तक तवज्जो ही नहीं दे रहे...

    http://deshnama.blogspot.com/2010/04/blog-post_21.html

    जय हिंद...

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  14. धन्यवाद है जी हम शिल्प-विहीनो के लिए इतनी प्रेरणादायी रचना प्रस्तुत करने लिए!

    मै कई बार इस शिल्प और प्रयास के द्वंद्ध में उलझा रहता हूँ!आज विश्वाश और गहरा हुआ प्रयास में!

    कुंवर जी,

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  15. बेहद ही मनभावन और सुन्दर गीत"

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  16. इस कविता में तो पूजित ही नतमस्तक हो गया।

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  17. Ek Saarthak pooja !

    The prayers being answered.

    Ye geet gungunane se jyada...aatmasaat karne ko jee chahta hai.

    Bahut sundar...badhaai.

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  18. bahut sunder bhav aur vyktitv kee spastvadita geet me bhee mukhrit ho rahee hai ............
    ye hee bhav din dugne aur raat chougne hote chale jae isee aasheesh ke sath..........

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  19. @दिनेश राय द्विवेदी ,
    :-) भाई जी..आज कल ऊपर भी मिलावट हो गयी , भगवान् भी भक्तों जैसे हो गए हैं !

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  20. यह सब सच है !मगर कामिनी पूजा यहाँ न अर्पण करना !
    तुमको दुख होगा कि यहाँ पर मन्दिर है पर मूर्ति नहीं है

    मूर्ति कभी पूजा नहीं
    उस की मूरत जैसा
    क्योकि कोई दूजा नहीं

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  21. bahut hi sunder aur madhur geet hai :)

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  22. Maja aa gaya. Sachmuch aap Mahan hai.

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  23. सतीश जी बहुत सुंदर गीत है ,आप गीत कम क्यों लिखते हैं?

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  24. एक बार पहले भी कह चुका हूँ मैं और आज फिर कह रहा हूँ … आपकी रचनाएँ आपका व्यक्तित्व दर्शाती हैं और मुझे हर बार अबू बन आदम की याद दिलाती हैं..

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  25. बहुत सुंदर गीत, धन्यवाद जी. हमे तो आज ही पता चला कि आप तो होम्योपैथिक है जी,
    धन्यवाद

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  26. बहुत ही सुन्दर है भाई ... क्या बात है !!

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  27. बेहद खूबसूरत और उम्दा रचना. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  28. अच्छे भाव की प्रस्तुति सतीश भाई। सुन्दर रचना।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  29. बहुत बढिया सतीश भैया।

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  30. यहाँ मंदिर है पर मूर्ति नहीं - बहुत अच्छा लगा , आदमी के मन मैं आस्था होनी चहिये, पत्थरो में क्या रखा है

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  31. यहाँ मंदिर है पर मूर्ति नहीं - बहुत अच्छा लगा , आदमी के मन मैं आस्था होनी चहिये, पत्थरो में क्या रखा है

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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