Monday, June 14, 2010

क्या इस टिप्पणी को हम कुछ समय याद रख पायेंगे ?? - सतीश सक्सेना

गिरिजेश राव का  यह कमेंट्स अपने आप में पूरी पोस्ट है जो उन्होंने श्रीमती डॉ अजीत गुप्ता की एक पोस्ट   बताओ भारतीयों तुम्हारे पास क्या है ?  पर किया है, जिसमें वे देशवासियों से दुखित मन से एक सवाल करते   हैं  !  
"हमारे पास है:
मानव मल से गंधाते सड़क , गलियाँ
धूल धक्कड़ कूड़ा
बजबजाती नालियां
उफनते सीवर
सीवर बगल में बीच सड़क मंदिर मस्जिद
सीवर के ढक्कन पर छनती पकौड़ी
जितने साफ घर उतना ही गन्दा बाहर
सारा देश सड़क किनारे
अनुशासन लापता
किसी की इज्ज़त नहीं
भ्रष्टाचार :
चपरासी से मंत्री तक
ठेकेदार से मज़दूर तक
मास्टर से दरोगा तक
शिष्य से शिक्षक तक
सबकी रगों में खून बन दौड़ता
किस भारत की बात ?
हम सनातन कीड़े हैं
नाली के .
बायो डायवर्सिटी हमीं से बची है.
संवेदना ? कौन परवाह करता है ?
नीम ?
घर के आगे लगाओ तो कमीने
पूरा पौधा ही तोड़ ले जाते हैं
(दातुन से दांत साफ़ रहते हैं)
ज़रा सी तमीज बची है क्या?
यह देश सौ वर्षों में होगा
फिर टुकड़े टुकड़े.
क्षमा कीजिएगा अगर कटु लगूँ
लेकिन हम लोग आत्ममुग्ध
- पशु से भी गए बीते हैं -"   
गिरिजेश राव का जवाब हमारे यहाँ गली गली में बिखरी वास्तविकता है ,जिसमें हमने अपने आपको आत्मसात कर लिया है, फिर भी हम रोज अपनी संस्कृति की तारीफ में कसीदे पढ़ते नज़र आते हैं ! अभी हाल में आदतवश,  विएंना में चिक्लेट्स को थूकते हुए, मुझे घूरते २-३ लोग निकले तो शायद पहली बार शर्मिन्दगी  का अनुभव हुआ कि मैंने यह क्या किया ? मुझे याद है दुकान से निकलते हुए बिल को तुरंत फाड़ कर फेकने की आदत वाला मैं, वहाँ बिल और कागज के टुकड़ों को जेब में रखकर, डस्टबिन ढूँढता था  ! धूल का पूरे शहर में नामों निशान ही नहीं था !
क्या हम आज इस कमेन्ट पर सोचने की जहमत उठाएंगे  ?? या  हमेशा की तरह, मेरी दोस्ती के कारण ,यहाँ एक टिप्पणी देकर  आगे बढ़ जायेंगे  ??    

36 comments:

  1. यह गिरजेशराव का महत्वपूर्ण वक्तव्य है, जो यह बताता है कि आजादी के बाद जो टेड़ा-मेड़ा विकासपथ हमने अपनाया यह उसी का प्रतिफल है।

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  2. टिप्पणी तो याद है ही ...और ऐसा ही सोचते रहे हैं ...
    मगर आदत रही है हर नेगेटिव में कुछ पोजिटिव खोज पाने की ...

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  3. गिरिजेश राव जी द्वारा लिखी गई एक एक बात सच है। लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है ।
    यह भी सच है कि हमारे यहाँ अभी भी मात पिता बच्चों को मरते दम तक सपोर्ट करते हैं ।
    परिवार नाम की इकाई बस यहीं मिलती है ।
    यहाँ अभी भी दया धर्म का मूल है ।
    हम जिन्दा जीव जंतु नहीं खाते --डेलिकेसी कह कर ।
    इतना बुरा भी नहीं है अपना देश ।

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  4. सतीश जी हमें सोचने चाहिए की हम कहाँ जा रहे है ..विदेशी संस्कृति की ढोल पीट कर हम अपने को बहुत बड़ा समझते है पर और कुछ विदेशियों से सीखे यह हमारे बस की नही बहुत सी ऐसी बातें हैं जिसमें सदियों से सुधार नही हुआ हम १०० साल पहले जहाँ थे वहीं आज भी है और बस भारतीय परंपरा की दुहाई देते रहते है और उसके नाम पर अनेक कुरीतियाँ और अंधविश्वास में जकड़े खुद का ही नुकसान करते है फिर भी आँखे नही खुलती निश्चित रूप से यह एक झकझोर देने वाली सच्चाई है और सबसे बड़ी बात भारत के हर एक व्यक्ति को यह मालूम भी है फिर भी पता नही क्यों अमल शायद बस थोड़े लोग ही करते है....

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  5. आत्मान्वेषण के लिहाज से गिरिजेश जी की बात महत्वपूर्ण है !

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  6. जब तक हम सब अपने अन्दर इतनी शक्ति नहीं पैदा कर लेते की हमारे पास जो कुछ हो रहा हैं अगर गलत हैं तो उसके खिलाफ आवाज उठाये तब तक कुछ नहीं होगा । हां सतीश ध्यान देने वाली बात ये जरुर हैं कि जो आवाज उठाते हैं वही हमारे यहाँ गलियाँ खाते हैं । विषय से हट रही हूँ लोग कहेगे लेकिन नारी पुरुष असमानता और वो भी ब्लॉग पर , इसको सही करने के लिये जिस महिला ने भी आवाज दी हैं उसको यहाँ नकारा ही गया हैं । पर किसी के नकारने से लड़ना बंद नहीं करना चाहिये । कोम्फोर्ट ज़ोन से बाहर आकर कुछ करे सब तो ही कुछ होना संभव हैं । लोग बहुत जल्दी {गिव उप } कर देते हैं ।
    मेरे देश और मेरी संस्कृति मे कोई बुराई नहीं और जो हैं मै उसको बदल ने कि चेष्टा करुगी । मै जैसे रहना चाहती हूँ रह सकूँ अपने देश / संस्कृति मे वो सुधार लाना मेरा कर्तव्य और धर्मं हैं । अपने आस पास जो गलत हैं चाहे सदियों पुराना क्यूँ ना हो उसको बदलना जरुरी हैं ।


    ना पसंद का चटका लगाया हैं क्युकी प्रॉब्लम के साथ सोलूशन कि बात भी जरुरी हैं ।

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  7. गिरिजेश सही कह रहे हैं। किन्तु हम निर्लज्ज हैं।
    घुघूती बासूती

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  8. सतीश जी ,नमस्कार ,
    ये सही है कि हमें हर वो चीज़ अपना लेनी चाहिये जो हमें तरक़्क़ी की और अच्छाई की तरफ़ ले जाए ,ये सोचे बिना कि ये गुण किस देश या किस व्यक्ति से संबंध रखता है लेकिन अपने देश की अच्छाइयां
    हमारी नज़रों से ओझल क्यों हो जाती हैं ?सड़क पर कचरा फैलाना बहुत ग़लत है लेकिन क्या विचारों की शुद्धता ,संबंधों की प्रगाढ़ता ,मित्रता के सच्चे अर्थों का निर्वहन ,पति पत्नी का अटूट रिशता अधिक महत्वपूर्ण नहीं ?
    हमारी भावनाएं सच्ची हैं ,विचार परिष्कृत हैं बस थोड़े civic sense की ज़रूरत है जिसके लिये नई पीढ़ी जागृत हो रही है .

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  9. अब जब आप निगेटिव सोचने पर ही आमादा हैं तो कोई क्या करेगा..... ? इंसान को निगेटिव में भी पोजिटिव ही देखना चाहिए... गिरिजेश जी ने सच्चाई तो लिखी है.... जिसको नकारा नहीं जा सकता.....लेकिन आज भी कहीं तो कुछ अच्छा है.... जो भारत को ठीक -ठाक चला रही है.....देखिये...चेंज हमेशा धीरे धीरे होता है.... ग्रैजुयली.... और ज़रा पिछले सालों की ओर देखिये ..... तो हमेशा से अच्छा ही हुआ है.... बात सिर्फ डिसिप्लीन की है.... हमें पहले खुद को डिसिप्लीन करना होगा.... उसके बाद ही व्यवस्थाओं पर चोट करनी होगी..... बात यह भी है की हम लोग यहाँ ब्लॉग पर लम्बी-चौड़ी आदर्शों की फेंकते रहते हैं.... जबकि हम खुद ही सही नहीं हैं.... यहाँ ब्लॉग पर तो लोग ऐसी ऐसी बातें करते हैं.... की ....भगवान् राम भी उनके आदर्श सुनकर .... उन्हें ही भगवान् मान बैठें.... जबकि प्रैक्टिकल कुछ और है......इमप्रैक्टिकल राव साहब ने लिखा है..... पर जिसे प्रैक्टिकल हम लोगों (समाज) ने किया है..... राव साहब ने जो भी लिखा है.... सही लिखा है.... गोमतीनगर जैसी पॉश कालोनी में रहकर इतने अच्छे से ओब्ज़र्व करना सिस्टम को ..... अपने आप में कमेंडीयेबल है.....

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  10. जहां पांव में पायल,
    हाथ में कंगन,
    और माथे पर बिंदिया,
    इट्स हैप्पन ओनली इन इंडिया...

    पश्चिमी देशों में लिटरेसी रेट क्या है...और अपने भारत में...

    पहले भारत के एजुकेशन सिस्टम को ठीक कर लीजिए...सिविल सेंस लोगों में अपने आप आ जाएगा...उसके लिए अभी शुरुआत करेंगे तो असर दस-बीस साल बाद नज़र आएगा...

    जय हिंद...

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  11. हर पर्व त्‍यौहार पर घर आंगन , गलियों को साफ सुथरा करने और स्‍नान दान की परंपरा थी यहां .. हमारी संस्‍कृति याद रखने योग्‍य तो है ही .. विदेशी शासन काल में पराधीन बने रहने की जो घुटृटी पिला दी गयी है .. उसका असर स्‍वतंत्र होने के बाद भी नहीं समाप्‍त हो रहा है !!

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  12. प्रासंगिक पोस्ट है...

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  13. गिरिजेश जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचारमग्न होने के लिए विविश कर दिया है. उन्हें साधुवाद.

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  14. इतनी भी क्या बेबसी...अपना अपना कर्म इमानदारी से करना ज़रूरी है बस..फल की चिंता के बिना..

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  15. "कर वमन गरल जीवन भर का"
    गिरिजेश जी ने चरित्रार्थ कर दिया । वाह ।

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  16. विचारणीय बात है , जिस नजर से दुनिया को देखते हैं दुनिया वैसी ही नजर आती है , यही तो संवेदना है और यही वेदना भी है , हमें अपने अपने तरीके से अपने दायरे में जो कुछ भी संभव हो , करते चलना चाहिए । मैं ये नहीं कह रही कि ऐसा नहीं है , ऐसा ही है पर इसके पीछे के कारण भी देख पायें फिर उपाय सोचें । कविता ने बरबस ध्यान अपनी तरफ खींचा ।

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  17. आप बेवजह परेशान सी क्यों हैं मादाम!
    लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे
    मेरे अहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
    मैं जहां हूं वहां इन्सान न रहते होंगे
    ……………………………………………………………
    ………………………………………………………………
    साहिर

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  18. हमें ये सोचने की ज़रूरत है की गंधाती सड़क गलियों और नालियों को किस तरह से साफ़ रखा जाए, सीवर के ढक्कन पर बनी पकोड़ियाँ खाने वाले कौन लोग हैं, अनुशाशन किस तरह कायम हो, भ्रस्टाचार किस तरह ख़त्म किया जाए, और हां संवेदना तो अभी तक हमारे यहाँ जिन्दा है!

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  19. बुरा न माने पिछले साठ सालों में अधिकतर कांग्रेस का शासन रहा है....
    क्या मिला है हमें इस शासन से
    लगभग यही सब. नहीं.

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  20. अनुशासन देश को महान बनाता है... अगर ये सूत्र है तो हमने अपने देश को स्वानुशासन के अभाव में नरक ही बनाया है.

    जिस तरह स्कूल में कड़े नियम क़ानून का अनुसरण करते हैं वैसे ही भाव आम सार्वजनिक जीवन में लाने के लिए कठोर नियम तो होने ही चाहिए.

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  21. ashiksha.......
    agyanta.......
    .arajakata...
    aacharan.....
    atyachar.....
    ahankar...... sabhee par kaboo pana hoga......
    Nakaratmak ravaiya kisee nishkarsh par nahee pahuchaega...............
    Aisa mera sochana hai...........

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  22. Aabadee........sabse aham choot gaya tha ......ye sare A control me rahana aavshyk hai.....

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  23. गिरिजेश जी तो हमेशा से ही देश, समाज की स्थिति से संबंधित प्रश्न उठाते रहे हैं। उनके जैसी दस प्रतिशत सोच भी अगर हम लोगों के पास हो जाये तो यहां का नक्शा ही बदल जाये।

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  24. इस का एक कारण ज़िम्मेदारी से बचना भी है. अपने दुखो के लिए हमेशा सरकार को दोष देते रहना, और हर बात के लिए सरकार का मुँह ताकना,
    कभी हम भी तो खुद कुछ करके दिखाए, सड़को और पब्लिक प्लेस पर गंदगी ना हो या कम से कम मुझ से तो ना हो...
    इतना तो कर ही सकते हैं.

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  25. सर जी!
    देश में भयावह असमानतायें हैं, अपने अपने इंडिया से किसी भी दिशा में कुछ कोस दूर चलें जायें और हमको भारत मिल जायेगा...ये सफाई, कचरा, भ्रश्टाचार..आदि इंडिया की समस्यायें हैं... भारत तो चकाचौधं से भरी इंडिया की आर्थिक प्रगति को तक भर रहा है!
    राष्ट एक बड़े परिवार का नाम है और परिवार में हर सदस्य का मान होता है हिस्सा होता है...देश का एक बड़ा हिस्सा जब बीस रुपये रोज़ पर ज़िन्दा हो (अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी रिपोर्ट) तो यह सब बातें मूल्य नहीं रखतीं. सारी व्यव्स्था शोषण पर आधारित है.......हुक्मरान, अपने राजे महाराजे वाले के खोल से बाहर नहीं आ पा रहे हैं....प्रतिभा को हम सम्मान नहीं देते और जात-पात, धर्म और क्षेत्रों में बांटकर अपना ही सत्यनाश कर रहें हैं हम.

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  26. विचारणीय टिप्पणी पर सार्थक लेख

    मेरा व्यक्तिगत मत रहा है कि प्रत्येक क्षेत्र में कानून का पालन सुनिश्चित हो जाए तो बहुतेरी समस्याओं से निज़ात मिले

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  27. इस का एक कारण ज़िम्मेदारी से बचना भी है. अपने दुखो के लिए हमेशा सरकार को दोष देते रहना, और हर बात के लिए सरकार का मुँह ताकना,
    कभी हम भी तो खुद कुछ करके दिखाए,

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  28. इतनी बहस हो गई और हमें पता ही नहीं :)अच्छी चर्चा हुई।
    सतीश जी , आभार स्वीकारें।
    इसलिए कि आक्रोश को कुछ और तंतुओं पर आघात करने के लिए फैला दिए
    और इसलिए भी कि एक साथी ब्लॉगर की टिप्पणी को इतना मान दिए। अभिभूत हूँ।
    गहन निराशा के क्षणों में विवेकानन्द वाणी मुझे सुकून देती है:
    "सेतुबन्ध की गिलहरी बनो।"
    लेकिन जब मैं चीन, कोरिया वगैरह से भारत की तुलना करता हूँ तो पाता हूँ कि वे मैराथन दौड़ में जुटे हैं और हम मार्निंग वाक में। मन कसैला हो जाता है।

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  29. विचारणीय पोस्ट एक दूसरे को कुछ कहने और देश को गरियाने से बेहतर तो शायद ये होगा की हम अभी से प्राण करें की कम से कम हम ब्लोगर अपने स्तर पर अपने आस पास स्वच्छता और सफाई का ध्यान रखें और इमानदारी बरतें

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  30. मेरी पोस्‍ट की टिप्‍पणी पर आयी इस पोस्‍ट के बारे में मैं यह कहना चाहूंगी कि मैंने अपनी पोस्‍ट में यही लिखा था कि अमेरिका में रह रहे भारतीय इण्डिया को नरक मानते हैं। लेकिन फिर भी हमारे पास ऐसा कुछ है जिस कारण हम इस नरक को स्‍वर्ग में बदल सकते हैं। यदि दीवार के डायलाग में मेरे पास माँ है कि भी व्‍याख्‍या करने लगें तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। मेरी पोस्‍ट की सभी टिप्‍पणियों को देखेंगे तो वहाँ बसे सभी ब्‍लागर मित्रों ने ही भारत की आलोचना की है और शायद उनके मन में कहीं न कहीं यह भाव हो कि हम भारत की उन्‍नति में सहायक नहीं है इसलिए उन्‍हें भारत नरक ही लगता है। जिससे उनका पक्ष सबल होता है कि हम नरक में क्‍यों रहें? भारत में भी जो केवल आलोचना करना जानते हैं वे एक ही पक्ष को देखकर आलोचना करते हैं लेकिन उन्‍हें यह पता नहीं कि हम हमारी युवा पीढी के मन में कितना विष घोल रहे हैं भारत के प्रति। यही कारण है कि हमने भारत को केवल कुछ दिनों का ठिकाना मान लिया है और यह कहते फिरते हैं कि वहाँ गन्‍दगी है्, भ्रष्‍टाचार है इसलिए हम चले आए। आलोचना करने वालों को शायद बदलता भारत दिखायी नहीं देता? लेकिन फिर भी विचारों की स्‍वतंत्रता है तो सभी तरह के विचार आने भी चाहिए तभी तो हम विकास की ओर बढेंगे।

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  31. आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  32. आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  33. अभी पूरी तरह से निराश नहीं होना चाहिए। 1000 साल की गुलामी से आजाद हुआ है देश। उसे कुछ समय तो दीजिए। हर युवा तैयार है।

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  34. @ गिरिजेश राव ,
    आपको पढना एक सुकून देता है ...काश कुछ गिरिजेश राव ओर मिल जाएँ ! हार्दिक शुभकामनायें !

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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