Thursday, July 8, 2010

शोर प्रदूषण और यूरोप - सतीश सक्सेना

पेरिस से जिनेवा तक का सफ़र हम लोगों ने, विश्व की सबसे तेज रफ़्तार ट्रेन टीजीवी, जिसकी स्पीड ३२० कम प्रति घंटा तक जाती थी, से तय किया था ! इस ट्रेन की यात्रा का हमें बहुत इंतज़ार था ! पेरिस स्टेशन ( पेरिस ल्योन ) पंहुचने पर एक कतार में खड़ीं कई सुपरफास्ट ट्रेन दिखाई दीं ! बीच में एक ऐतिहासिक स्टेशन बेलग्रेड पड़ा जिसकी जीर्ण हालत देख हमें ख़ुशी हुई ! बेलग्रेड हिटलर की एक बदनाम जेल के लिए मशहूर रहा है , जहाँ गेस्टापो का एक महत्वपूर्ण अड्डा था !
ट्रेन में  हम भारतीयों को छोड़, अन्य लोग शांत थे , हम लोगों ने बैठते ही अपना अपना ग्रुप बना लिया और अपनी अपनी कहानियां सुनाने में भूल गए कि यहाँ के लोग तेज आवाज में सुनने के आदी नहीं हैं ! यहाँ तक कि  हाई स्पीड टीजीवी के चलने पर, कुछ भी नहीं महसूस हो रहा था ! पटरियों की धडधड आदि सब गायब , इतनी शांत कि गति भी पता न चले , लगा कि कुछ मज़ा ही नहीं आ रहा  !      
थोड़ी देर में लगभग ७५ वर्षीय एक बुजुर्ग महिला अपनी सीट से उठ कर, मेरे  सामने बैठे, मित्र के पास जाकर बेहद गुस्से में बोली आप इतनी जोर से क्यों चीख रहे हैं !  आपकी तेज आवाज ने मेरे कानों में दर्द कर दिया है ! मेरी तबियत खराब हो रही है ...क्या आपको पब्लिक प्लेस में बोलना नहीं आता है ! 
हमारे भारतीय मित्र , जो एक उच्च अधिकारी रह चुके थे ,अचानक हुए इस हमले को बिलकुल तैयार नहीं थे !  बार बार सॉरी  माँ , कहकर अपनी जान छुटाई ! यह पहला मौका था जब हमारी ख़राब आदत, हमें खुद को महसूस हुई !
दूसरा मौका स्वित्ज़रलैंड में विलार्स नामक बेहद खूबसूरत  जगह  होटल  "ले ब्रिस्टल "  लॉबी का था जहाँ एक काफी बड़ा बोर्ड  लगा हुआ था कि कृपया साइलेंस बनाए रखें !
एक अन्य कोच से  उतरे, एक भारतीय, लॉबी  में  इतनी जोर जोर
बोल रहे थे कि मुझे तक असहनीय हो रहा था  ! इतने में एक होटल अधिकारी ने आकर उन सज्जन को बुला कर यह नोटिस बोर्ड दिखाया उसके बाद ही वे देसी सज्जन खामोश हो पाए !

साधारण शिष्टाचार और अपने देश के सम्मान का ख़याल हमारे जन मानस में , कैसे आएगा ? खास तौर पर तब जबकि शोर को हम प्रदूषण मानते ही नहीं ,उसके खतरों से आगाह होने की चिंता तो तब होगी जब हमें उसके बारे में पता हो !


19 comments:

  1. थोड़ा समय लगता है फिर आदत पड़ जाती है धीरे बोलने की.

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  2. बात त ठीके है, कभी कभी सोर से बहुत परेसानी होने लगता है... केतना लोग बहुत जोर जोर से बतियाता है. हमरो एही आदत है. एक बार हमको कोई टोका कि तुम काहे एतना जोर से बात करते हो. त हम सॉरी बोलने के पहिले दू बात बोले, पहिला कि हमरा बात में कंभिक्सन होता है इसीलिए इमोसन में आवाज तेज हो जाता है.. अऊर दोसरा कारन ई है कि फुसफुसा के त चोर लोग बतियाता है, हम साफ बात बोलते हैं इसलिए जोर से बोलते हैं.लेकिन बाद में हम सॉरी बोले. एगो बहुत पुराना गाना याद आ गया.. ‘सावन का महीना पवन करे सोर’ … युरोप में पवन त होता होग, का जाने सावन होता है कि नहीं... अऊर अगर दुनो होता होगा तब त सोर के लिए पवन में भी साइलेंसर लगाना होता होगा… खैर ई मजाक था.

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  3. यहाँ तो धीरे बोलेंगे तो लगेगा कि बीमार हो गए हैं... :)
    पर आपने सही दिशा की ओर ध्यान दिलाया...अच्छी पोस्ट

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  4. अपने ही लोगों की इस आदत से तो हम भी परेशान हो जाते हैं ।
    विशेषकर किसी रेस्तरां में बैठे हों और बच्चे शोर मचा रहे हों तो खाने का मज़ा ही किरकरा हो जाता है । वैसे बड़े भी कम नहीं होते ।
    सुन्दर नज़ारे दिख रहे हैं ।

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  5. :) काश ऎसा भारत मै भी हो,

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  6. भारत जैसा भी है बहुत अच्छा है !

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  7. हम लोगो ने अंग्रेज़ो की बुरी बातें तो अपना ली हैं लेकिन अच्छी बातों की तरफ ध्यान नही दिया.इन लोगो की तरक़्क़ी में अनुशासन का बहुत बड़ा रोल है.

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  8. जीवन में उत्सुकता बनाये रखनी चाहिये । मैं तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ उन सहयात्रियों का जिन्होने दो केबिन दूर से भी अपनी कहानियाँ मुझ तक पहुँचायीं । बाहर तो घुटन होने लगेगी । यात्रा में यदि लोग बात न करें तो समय कैसे कटे, उनका और औरों का ।

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  9. sanskruti ka fark dikh jata hai.......
    vaise prant prant me bhee fark hai........
    u p me sadak pr aae din ladaaee jhagde ke nazare nazar aa jate hai kabhee mol bhav karte samay sabjee wale par hee baras padte hai......to kabhee riksha taxi walo se bahas vo bhee zor zor se......Gareeb ko dabane ka accha tareeka hai.......
    lagata hai hum bhartiyo ka rakt kuch jyada hee garm hai......
    jaldee hee khoulne jo lagata hai..........
    Acchee post ke liye aabhar......
    are ha yanha to hospital ko bhee nahee chodate vaha bhee samooh me ikattha hokar shor machana aam baat hai.......

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  10. SHUKRGUZAR HOON.AAPNE DEEN AUR DUNYA KE LIYE TIME NIKALA.
    AAPKE KAHE CHAND ALFAZ HI KAFI HAIN HAMARE LIYE.MAIN BAHUT KAM AUR BLOG PAR JATA HUN KUCH LOG KABHI MAIL KIYE TO GAYA.WAQT KI DUSHVARIYAN HAYAL RAHTI HAIN.
    ALLAH NE CHAHA TO HAMARA PYARA MULK BHI IN FIRANGIYON SE KHOOBSURAT AUR HASEEN HOGA.

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  11. यहां तो ट्रेन के शोर और सवारियों की बातचीत में द्वंद्व (काम्पीटीशन) होता रहता है कि कौन सा तेज है:-)

    धीमे बोलने पर सामने वाला पूछता है -"भाई तबीयत सही नहीं है क्या"

    प्रणाम

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  12. बहुत दिनो के बाद आपके ब्लाग मे आया ...आपके संसमरण लुभावने है. अभी पढ रहा हू.

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  13. शायद जब हमें विदेश जाने से पहले उस देश के शिष्टाचार के बारे में कुछ सीख लेना चाहिए। शोर मचाना और कचरा फैलाना ये हमारे दो भयंकर अवगुण हैं।
    घुघूती बासूती

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  14. अगर तेज बोलने से हमारी पहचान है तो मैं तेज बोलना ही पसन्द करूंगा।
    उन्हे बुरा लगे तो लगे।

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  15. भारत का आम आदमी इतना शोर करता है कि उसे असभ्‍यता की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए। जर्मनी में शोर करना असभ्‍यता कहलाती है।

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  16. जैसे देश वैसा भेष !

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  17. vaah !bin kharche ke ki sair karva di apne maja aa gaya

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  18. बहुत अच्छा लगा देख पढ़ कर ... माशाअल्ला आप तो एकदम फुलटू स्मार्ट दिख रहे हैं(मेरा मतलब हैं भी)... हमने तो खयालों मे हवाई ट्रेन का सफर कर लिया ... फोटू दिखाने का शुक्रिया ,,, गनीमत है उनके यहाँ कपड़ा डोरी पर ही सुखाते हैं और बच्चे भी हमारे जैसे ही खेलते हैं ...
    तेज़ बोलना जरूर कभी कभी बुरा लगता है ... परिस्थति के अनुसार इतना तो बदला जा सकता है ..

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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