Thursday, August 19, 2010

बड़ी भयानक शक्ल छिपाए,रचते ढोंग फकीरी का -सतीश सक्सेना

पहन फकीरों जैसे कपडे
परम ज्ञान की बात करें
वेद क़ुरान,उपनिषद ऊपर 
रोज नए व्याख्यान करें,
गिरगिट को शर्मिंदा करते, 
हुनर मिला चतुराई का !
बड़ी भयानक शक्ल छिपाए , रचते ढोंग फकीरी का !

धन अर्जन को कैसे सुन्दर  
प्रभु सेवक का रूप रखें  ,
मीठी मीठी बातें कहकर
आवाहन ! शैतान करें !
दिन में घरघर ज्ञान बाँटते,
रात को मज़ा खुमारी का !
मीठी भाषा के बल अक्सर ,  मज़ा है लुच्चेदारी का !    

रंजिश पाले शिक्षा देते 
नयी नयी बातें बतलाते
अपना धर्म भूल कर भैया
औरों को शीशा दिखलाते 
दारू पीने वाले  अक्सर, 
चखते मज़ा पंजीरी का !
जो मनमोहक सा दीखे है,जाल इसी व्यापारी का !


नींद से जागो सोने वालो  
लगती सेंध, मकानों को 
जिस घर ऐसे सांप रेंगते, 
खतरा है , संतानों को ! 
रात में साकी और सुराही,
दिन में वेश फकीरी का !
वक्त पड़े पर बाप बना लें, वरना छुरा कसाई का !

एक ,दूसरे को ललचाते
स्वच्छ धर्म व्यापार बनाते !
आस्था तोड़ रहे औरों की 
अपने को अच्छा बतलाते !
खीर, मलाई और सिवैयां , 
मुफ्त काफिरों को बाँटें !
जहर मिले मटकों पर लेवल लगा है खीर मलाई का !


यही गीत अर्चना चाओजी को आवाज में सुनिए !



40 comments:

  1. aaj ke dogiyo per ekdam sahi aur sarthak kavita

    ReplyDelete
  2. रात में साकी और सुराही,दिन में वेश फकीरी का !
    वक्त पड़े पर बाप बना लें, वरना छुरा कसाई का !

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्तिपूर्ण पूर्ण रचना ... सतीश जी

    ReplyDelete
  3. आज के युग में साधुओं के वेश में घूमते शैतानों पर इस बेहतरीन रचना को हमें पढवाने के लिये आभार
    क्या इसे मैं अपने पास कॉपी करके रख सकता हूं जी?
    बहुत ज्यादा पसन्द आयी है यह कविता

    प्रणाम स्वीकार करें

    ReplyDelete
  4. खासा अच्छा हुआ करता था धरम भी एक ज़माने में,
    भला हुआ किसका 'मजाल' पाकर संगत हरजाई का!

    ReplyDelete
  5. @ अंतर सोहिल,
    बड़ी ख़ुशी के साथ ले जाइए ! यह आपके ही लिए है, शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  6. वास्तविकता बखानती पंक्तियाँ। कड़वा सत्य सबको स्वीकार्य हो।

    ReplyDelete
  7. इस तरह के फकीर हर रूप में मिल जाते हैं ।
    इसलिए सावधान रहने की ज़रुरत है ।
    अच्छा सचेत किया है ।

    ReplyDelete
  8. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति....

    ReplyDelete
  9. सही बात तो यही है लेकिन जो आपने व्याख्यायित कर दी है

    ReplyDelete
  10. बहुत खूब क्या कहने ......... बेहद उम्दा रचना !

    ReplyDelete
  11. वाली है, मवाली है
    हमको तो लगती कव्‍वाली है
    इसे और बढ़ाते जाओ सतीश भाई
    इसको पढ़ते हुए बजाना सब ताली है
    ताली चाबी नहीं है
    तालियां हैं जो एक लय में बजाई जाती हैं।

    ReplyDelete
  12. वाह सतीश भाई आज तो सारी कसर पूरी कर दी।

    ReplyDelete
  13. बहुत शानदार अभिव्यक्ति.

    रामराम.

    ReplyDelete
  14. न मालूम अभी इन लोगों के ओर कितने रंग देखने बाकी है.....बहरहाल इन विकृ्त मानसिकता के लोगों के पाखंड को उजागर करती आपकी ये रचना बहुत ही बेहतरीन लगी...

    ReplyDelete
  15. सहमत है जी आप से

    ReplyDelete
  16. चाचा जी ..दुनिया भरी पड़ी है ऐसे लोगों से बड़े बड़े करिश्माई लोग है इस संसार में जिन्हे देख कर पता नही चलता की वास्तव में ये हैं कौन ऐसे ऐसे बहरुपिये घूम रहे है...बहुत दिनों के बाद एक काव्यात्मक रचना पर बातें बहुत सटीक और .सारगर्भित पोस्ट.....सुंदर रचना के लिए बधाई.......

    ReplyDelete
  17. चाचा जी ..दुनिया भरी पड़ी है ऐसे लोगों से बड़े बड़े करिश्माई लोग है इस संसार में जिन्हे देख कर पता नही चलता की वास्तव में ये हैं कौन ऐसे ऐसे बहरुपिये घूम रहे है...बहुत दिनों के बाद एक काव्यात्मक रचना पर बातें बहुत सटीक और .सारगर्भित पोस्ट.....सुंदर रचना के लिए बधाई.......

    ReplyDelete
  18. आज कल ऐसे ही फकीरों की खूब दुकान चलती है ...

    ReplyDelete
  19. पहन फकीरों जैसे कपडे
    परम ज्ञान की बात करें
    वेद पुराण उपनिषद ऊपर
    रोज नए व्याख्यान करें,
    गिरगिट को शर्मिंदा करते , हुनर मिला चतुराई का !
    बड़ी भयानक शक्ल छिपाए रचते ढोंग फकीरी का !

    पाखंड और आडम्बर को परिभाषित करती सच्ची रचना
    के लिए बधाई स्वीकार करें

    ReplyDelete
  20. सही पोल खोली है सरजी।
    मजा आ गया।

    ReplyDelete
  21. जय हो! क्या ऊंची बात कह दी। एफ़िल टावर से भी ऊंची। इस तरह की झन्नाटेदार कवितायें लिखा करिये। और लिखिये न!

    ReplyDelete
  22. बहुत सुंदर और सारगर्भित रचना !!

    ReplyDelete
  23. wah bhai ji wah....
    mazaa aa gaya........geet pad kar...wah

    ReplyDelete
  24. जबरदस्त रचना -बधायी भी ,शुक्रिया भी !

    ReplyDelete
  25. सुंदर प्रस्तुति!
    राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

    ReplyDelete
  26. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

    ReplyDelete
  27. किस विशेष पंक्ति को कोट किया जाए ...कश्मकश में हूँ ..
    फकीरों के भेष में शैतान ....भेड़ की खल में भेड़िये ...
    शानदार, जानदार कविता ..!

    ReplyDelete
  28. अच्छा काव्य व्यंग्य ! सतीश साहब आपको बहुत अच्छा काम मिला जिसे आप बखूबी कर रहे है । मेरी ओर से आपको बधाई !

    ReplyDelete
  29. @आदरणीय सक्सेना जी
    कॉपी करके रखने की अनुमति देने के लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
    यह रचना मुझे मेरे अन्दर झांकने में मदद कर रही है। मैं भी ऐसे ही कभी ढोंगीं, कभी साधु का चरित्र निभाता हूँ।

    प्रणाम स्वीकार करें

    ReplyDelete
  30. Bahut achhi rachna hai ji....Padhkar bahut mazza aaya.

    ReplyDelete
  31. Bahut Satik baat kahi aapane is sundar abhivyakti ke madhyam se ...Aabhar!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

    ReplyDelete
  32. बहुत बढिया कविता.

    ReplyDelete
  33. आत्मविश्लेण कराने वाला गीत... इसे परोसने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद....
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    ReplyDelete
  34. सावधान !भोली शक्लों से खतरनाक,
    बहुरूपिये हैं !
    जिस घर ऐसे सांप रेंगते ,
    खतरा है , संतानों को !




    मार्मिक कटाक्ष....... अच्छी कविता लिखी और पड़ने को दी.......... आभार.

    ReplyDelete
  35. समाज को गुमराह करनेवाले बगुला-भक्तों का बहुत सही चित्रांकन किया है,सतीश जी .पर हमारे यहाँ सबसे बड़ी समस्या है जन-साधारण कैसे चेते !

    ReplyDelete
  36. इस सुंदर काव्य पर मेरी नज़र आज पड़ी आपकी लोकहितचिंता वास्तव में ही प्रशंसनीय है .

    ReplyDelete
  37. आज अर्चना जी के माध्यम से इस गीत तक पहुंचा... बहुत ही सुन्दर एवं प्रभावी रचना

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,