Thursday, August 12, 2010

हमारी ईमानदारी - सतीश सक्सेना

                             मेरे एक लेख "  कुछ घर में नफरत फैलाने के खिलाफ भी लिखें  "  में अंतर सोहिल के दिए कमेंट्स ने यह लेख लिखने को मजबूर कर दिया !

"....बल्कि किसी को बुराई ही लिखनी है तो सबसे पहले अपने कुयें की लिखनी चाहिये। जिसका पानी वो जन्म से पीता आया है, जिसमें रहता आया है, जिसमें डुबकी लगाता आया है। दूसरे के कुयें से ज्यादा हमें अपने कुयें के पानी की मिठास का पता होता है।  "

                            अंतर सोहिल के कमेंट्स बहुत कम नज़र आते हैं , मगर जब भी उनका कमेंट्स आता है , उनके व्यक्तित्व के बारे में बताने को काफी होता है !


                         अफ़सोस है कि  हम लोग अपनी तरफ देखते ही नहीं कि हम कितने घटिया हैं , ईश्वर ने आँखें भी ऐसी जगह  बनायी हैं कि न अपना चेहरा नज़र आता है न उस समय  अपनी आँखों में छिपे धूर्तता के भाव जब हम किसी को बेवकूफ  बनाते हैं ! मैं खुद अपने आपकी गलतियाँ  समझने में चूकता रहा हूँ ! अगर अपने "ईमानदार "जीवन की कमियों पर द्रष्टि डालता हूँ , तब कुछ भूलों पर अपने आप पर शर्म आती है कि यह मैंने क्यों कर किया होगा !मगर यह मैं खुद था जब मैंने अच्छे और यकीनन अपने से अच्छे लोगों को बेईज्ज़त किया और उस समय मेरे चहरे पर शिकन तक नहीं आई ! उसके बाद भी अक्सर मैं अपने आपको एक अच्छा आदमी समझने का दम भरता हूँ ! क्या प्रायश्चित्त करुँ इन बेवकूफियों का  ??


हम कितने अच्छे काम कर रहे हैं ? यह न देख कर हमारी कमियाँ क्या रहीं ? अगर यह देखने लगें तो  हम बहुतो को हंसाने में कामयाब रहेंगे ! 

31 comments:

  1. क्या वाक़ई ऐसा किया आप ने?

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  2. मेरे विचार से ईमानदारी दुधारी तलवार है, आमतौर
    पर धन के सम्बन्ध में ही इसे समझ लिया जाता है,या बुद्धिजीवीयों के जमावड़े में वैचारिक ईमानदारी भर!...जबकि इसका मतलब जीवन के सभी आयामों में है. ज्यों ज्यों सम्वेदनायें सूक्ष्म से प्रभावित होने लगती हैं, पर्त दर पर्त हमें अपनी पाशविक प्रव्रत्तियों का पता चलना शुरु होने लगता है..भीतर की अशांति बड़ती जाती है...अध्यात्मिक अर्थों में कहते हैं, कि क्षुद्र जब तक विराट में न मिल जायें वो असीम उतर ही नहीं सकता.

    ईमानदारी कि ऐसी पड़ताल बहुत शुभ है.
    क्या पता इस सावन में अस्तित्व आप पर बरसें

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  3. सतीश भाई, हमारे यहाँ एक दिन क्षमा मांगने का होता है लेकिन मैं देखती हूँ कि लोग अपने मित्रों से ही क्षमा मांगते हैं, जिनसे उन्‍होंने बदसलूकी की है उनके पास नहीं जाते। यदि वास्‍तव में ही क्षमा मांगनी है तो जिसके प्रति अपराध किया है उससे उसे गलती का जिक्र करते हुए क्षमा मांगनी चाहिए। तभी मन का मैल धुलता है और तभी प्रायश्चित हो पाता है।

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  4. @ इस्मत जैदी !
    मुझे अपने जीवन में एक घटना याद आ गयी जब मैंने एक व्यक्तित्व की अवमानना की थी जो मेरा बहुत बड़ा प्रसंशक व मददगार रहा था और है ! उनकी गलती यह थी की उन्होंने किसी की मदद करने का सुझाव दिया था जिसे मैं खराब मूड के कारण नहीं करना चाहता था !

    मेरे द्वारा कटु शब्द बोले जाने पर उनकी आँखों में आये आंसू आज भी याद हैं मुझे ! आज भी उस घटना के लिए मैं अपने आपको माफ़ नहीं कर पाता !

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  5. सभी अपनी अपनी कमियों को देखें .. और उसमें सुधार लाएं .. तो धरती स्‍वर्ग न बन जाए ??

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  6. आपने इस पर सोचा .....आज के दौर में यही बहुत बड़ी बात है !

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  7. गुरुदेव… भगवान ने बहुत सोच समझ कर आँख चेहरा पर बनाया है... आदमी एतना मक्कार जानवर है कि अगर उसको अपना आँख से अपना चेहरा नजर आने लगेगा त ऊ मक्कारी करते समय चेहरा पर मुस्कुराहट का नक़ाब लगा लेगा... आँख दरसल इसलिए चेहरा पर दिया गया है कि लोग दूसरे के आँख में अपने किए का प्रतिबिम्ब देख सके... काहे कि आप ऊ हैं जो दोसरा लोग समझता है, ऊ नहीं जो आप अपना बारे में समझते हैं कि आप हैं...किसी को क़त्ल करने जाइए तलवार उठाकर तो उसके चेहरे पर दया का भीख मांगने का भाव देखाई देगा..जेतना गहरा भाव होगा ओतने आपको अपना क्रूरता का एहसास होगा...अऊर कोनो जरूरत मंद का मदद करने पर उसका आँख में कृतज्ञता देखकर आपको दुनिया का सबसे बड़ा आनंद मिलेगा...
    दुनिया का बड़ा से बड़ा ऐक्टर कोनो न कोनो टाइम पर आईना के सामने ऐक्टिंग करता रहा है..इसलिए कि अपने आप को खुद से अलग करके देख सके..

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  8. अक्सर मैंने इस बात पर सोचा है कि जब हम एक उंगली किसी अन्य पर उठाते हैं तो तीन उंगलियां स्वयं पर उठती हैं .....

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  9. सतीश जी ,
    अगर आप से कभी ऐसा हुआ भी होगा तो आप की ये पश्चाताप की भावना उसे धो चुकी है
    और अब उन की आंखों में आए आंसू आप को ग़लती दोहराने भी नहीं देंगे ,
    आप सिर्फ़ एक बात के लिए इतने दुखी हैं यही बहुत बड़ी बात है

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  10. न लेना नाम ए क़ासिद फ़क़त इतना ही कह देना
    जिन्हें तुम भूल बैठे हो उन्हें हम याद करते हैं !

    संवेदना के स्वर !!
    सहमत !!!

    समय हो तो अवश्य पढ़ें

    शमा-ए-हरम हो या दिया सोमनाथ का http://saajha-sarokaar.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

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  11. सतीश भाई इसीलिए कबीर कह गए हैं
    बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय
    जो मन झांका अपना मुझ सा बुरा न कोय

    अपनी आलोचना का भाव ही ईमानदारी है।

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  12. मेरे आदरणीय सतीश सक्सेना जी, नमस्कार

    आपने ऐसा किया होगा, यकीन नही आता। हो सकता है हो गया हो। हर कोई केवल अच्छा या केवल बुरा नहीं हो सकता है। समय, स्थिति और सिचुएशन के अनुरूप कभी कम अच्छा, कभी ज्यादा अच्छा होता रहता है।
    लेकिन जब किसी को अपनी भूलों का अहसास होने लगे और अपनी कमियां खुद दिखाई देने लगें तो उससे अच्छा मैं किसी को नहीं मानता हूँ।

    प्रणाम स्वीकार करें

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  13. आपने मेरी टिप्पणी को इतनी संवेदनशीलता और गंभीरता से लिया। आपका हार्दिक आभार

    प्रणाम स्वीकार करें

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  14. मेरे द्वारा टिप्पणी बहुत ही कम किये जाने के कुछ कारण यहां लिखे हैं जी
    जब किसी को टारगेट बनाकर लिखा जाता है

    प्रणाम

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  15. एक दोहा याद आ रहा है ..
    बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिल्यो कोई,
    जो दिल खोजो आपनो ,मुझसा बुरा न होई.

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  16. अध्यात्म की तरफ बढ़ते कदम...जब इन्सान स्व-आंकलन करने लगे.

    जरुरी है यह विश्लेषण...मगर जब इन्सान यह करना शुरु करता है तब तक कितनी ही देर हो चुकी होती है ...फिर भी जब जागे तब सबेरा.!!

    अच्छा रहा पढ़ना.

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  17. अपनी भूल कोई महामान्व ही स्वीकार सकता है वर्ना तो हम सही जग झूंठा का सिद्धांत ही काम करता है. शुभकामनाएं.

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  18. saarthak likha hai aapne... aatm manthan se badi koi baat nahi

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  19. हम कितने अच्छे काम कर रहे हैं ? यह न देख कर हमारी कमियाँ क्या रहीं ?
    शायद अच्छा है कि हम अपनी कमियाँ नहीं देख पाते वर्ना जिन्दा रह पाना ही मुश्किल हो जाता क्योकि कमियाँ सबसे ज्यादा तो खुद में ही है.

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  20. अहंकार इतना हावी रहता है मन पर कि अपने अवगुण कहाँ नज़र आते हैं ।

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  21. बहुत ईमानदारी से लिखी गई पोस्ट..............

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  22. दर्पण का आविष्कार करके भी,मानव ने उस में स्वयं को झांकना नहीं सिखा।
    अहं को थोडी देर के लिये विलग कर जब हम स्वतंत्र खडे होते हैं,तब हो पाता है मनोमंथन।
    परोपकार और परोपदेश बहुत दे चुके,आवश्यकता तो स्वात्म पर उपकार करने की है,और वह उपकार तब होता है जब हम अपनी आत्मा को सुधरने का अवसर देते है,उसे शुद्ध रखने के प्रयत्न करते है।
    आत्ममंथन,स्वालोचना व प्रायश्चित ही वे साधन है।

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  23. अगर हमे अपनी भुल, अपनी कमिया देखनी है तो हर रोज रात को सोने से पहले अपनी चार पाई पर बेठ कर बस यह सोचे कि मने आज दिन भर कितने अच्छे ओर कितने बुरे काम किये, यानि अपनी दिन चर्या के बारे जरुर मनन करे-----ओर अगर किसी के बारे गलत किया तो सोचे अगर वो मेरे साथ करत तो...

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  24. अपनी बुराईयां
    भरी हुई कमियां
    दीख कर भी
    नहीं दिखती हैं
    दिखाता है कोई
    तब भी दुख होता है।

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  25. हम कितने अच्छे काम कर रहे हैं ? यह न देख कर हमारी कमियाँ क्या रहीं ? अगर यह देखने लगें तो हम बहुतो को हंसाने में कामयाब रहेंगे ...
    दूसरों पर हंसने से बेहतर विकल्प है अपनी खामियों और कमजोरियों पर हँसना ...मगर सबके लिए संभव भी नहीं है यह ...!

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  26. आपकी पोस्ट से मुझे कुछ सीखने मिला है
    मैं इसका ध्यान रखूंगा
    आपका शुक्रिया

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  27. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  28. मै स्वयं को ईमानदार सम्झता हूं क्योकि अभी बेईमानी करने का अवसर नही मिला है . जब यह अवसर सामने होगा उस समय आकलन करुंगा कि मै ईमानदार रहा या नही .

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  29. बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलया कोए,
    जो तन देखा आपना, मुझसे बुरा न कोए...

    जय हिंद...

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  30. ...अफ़सोस है कि हम लोग अपनी तरफ देखते ही नहीं कि हम कितने घटिया हैं ...

    ... bahut sundar !!!

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  31. अन्तर सोहिल की टिप्पणियाँ सदैव ही उत्सुकता से पढ़ते हैं हम।

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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