Thursday, October 28, 2010

घर में जहरीले वृक्ष लिए क्यों लोग मानते दीवाली ? -सतीश सक्सेना

समाज में सड़ी गली मान्यताओं के कारण हम कई बार अपने को शर्मिंदा महसूस करते हैं ! ऐसी कुरीतियों को दूर करने के लिए, हमें तुरंत कदम उठाना होगा अन्यथा अपने ही परिवार में असंतोष और नफ़रत का वातावरण होगा और हमारे हमारी भूल के कारण, अगली पीढ़ी देरसबेर अपने आपको शर्मिंदा पाएगी  !    


घर के आँगन में लगे हुए
कुछ वृक्ष बबूल देखते हो
हाथो उपजाए पूर्वजों ने ,
इनमे फलफूल का नाम नहीं
काटो बिन मायामोह लिए, इन काँटों से दुःख पाओगे
घर में जहरीले वृक्ष लिए क्यों लोग मानते दीवाली  ? 

38 comments:

  1. सतीश जी, घर में तो कोई बबूल नहीं बोता। आपकी कविता का भावार्थ कुछ समझ नहीं आया।

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  2. हाथो उपजाए पूर्वजों ने ,
    इनमे फलफूल का नाम नहीं

    कुछ मान्यताएं तो अवश्य बदलनी चाहियें ....

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  3. सादर अनुरोध यह है कि पूरी कविता एक बार ही पोस्ट कर दिया जाय -जितना आनंद उठाना होगा या फिर झेलना होगा एक बार ही हो जाएगा -ये टुकड़ों टुकड़ों का खेल तो नहीं रहेगा :-)
    या फिर मैं ही बार बार की इन चार लाईनों का तात्पर्य ठीक से नहीं समझ पा रहा ..इसलिए ही पढ़ कर कोई कमेन्ट नहीं कर रहा था -लगता है आप एक रण नीति के तहत इसे दीवाली तक ले जाना चाहते हैं :)
    आप छोडिये कोई नहीं मानेगा सब दीवाली मनायेगें ,कवि के कहने से लोग रुकते तो दिवाली कब की बंद हो गयी होती ...

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  4. @ अरविन्द मिश्र ,
    नहीं डॉ साहब कोई रणनीति नहीं है , हमारे समाज की कुप्रथाओं और उसमें फैले भेदभाव के विरोध में लिखी यह लम्बी कविता, को टुकड़ों में लिखने का तात्पर्य ध्यान आकर्षण भर है ! हाँ लोगों को इनमें रस नहीं मिलेगा ! मगर आप को मैं आम पाठक से अलग गिनता हूँ !
    सादर

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  5. @ अजित गुप्ता जी ,
    हमारे समाज की कुप्रथाओं और उसमें फैले भेदभाव के विरोध में लिखी इस कविता द्वारा कम से कम अपने परिवार में सही सीख देना है !बबूल के बृक्ष का अर्थ कुल, बिरादरी और प्रथाओं से कुप्रथा और आडम्बर को जड़ से उखाड़ना भर है ! !
    सादर

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  6. सुन्‍दर लेखन ।

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  7. बोया पेड़ बबूल का
    तो आम कहाँ से होए!

    आपके अंतर्मन की असहनीय पीड़ा को ही दर्शाती है भावुक कविता!

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  8. सादर अनुरोध यह है कि पूरी कविता एक बार ही पोस्ट कर दिया जाय -जितना आनंद उठाना होगा या फिर झेलना होगा एक बार ही हो जाएगा
    हम तैयार है :)

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  9. गुरुदेव! आज जब राष्ट्र पुनः छुआछूत, राष्ट्रद्रोह, धर्मांधता, असहिष्णुता, घृणा, विषवमन, देश की सम्पदा के प्रथम अधिकारी के प्रति विद्वेष, रक्त पिपासा, अश्लीलता, जातीयता, दयाहीनता, सम्वेदनहीनता, सरोकारहीनता, कर्तव्यविमुखता, गौरव से च्यूत होकर अंधकार की एक अनंत कंदरा में निर्जन यात्रा पर अग्रेशित है, तो ऐसे में दीवाली के दियों का आलोक क्या सचमुच उनके हृदय के कलुष को समाप्त कर पाएगा! एक उचित एवम सामयिक प्रश्न ऋंखला के लिए मेरा आभार!

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  10. गुरुदेव! आज जब राष्ट्र पुनः छुआछूत, राष्ट्रद्रोह, धर्मांधता, असहिष्णुता, घृणा, विषवमन, देश की सम्पदा के प्रथम अधिकारी के प्रति विद्वेष, रक्त पिपासा, अश्लीलता, जातीयता, दयाहीनता, सम्वेदनहीनता, सरोकारहीनता, कर्तव्यविमुखता, गौरव से च्यूत होकर अंधकार की एक अनंत कंदरा में निर्जन यात्रा पर अग्रेशित है, तो ऐसे में दीवाली के दियों का आलोक क्या सचमुच उनके हृदय के कलुष को समाप्त कर पाएगा! एक उचित एवम सामयिक प्रश्न ऋंखला के लिए मेरा आभार!

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  11. गहन अर्थों वाली एक सशक्त कविता।

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  12. कुप्रथाओं के खिलाफ और अप्रासंगिक परम्पराओं के खिलाफ मुहिम जरूरी है

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  13. कुछ मान्यताएं सच में बदलनी चाहिए .

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  14. आपकी नियत पर कोई शक़ नहीं !

    आज की टिप्पणी मिथिलेश और आपके नाम !

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  15. .
    .
    .
    सही है जी,
    आंगन में अगर बबूल लगा है तो काट फेंकना ही एकमात्र समाधान है!


    ...

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  16. दीवाली क्रम बहुत सी कुरीतियों को उजागर कर रहा है, समाज की।

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  17. @ अली सा ,
    धन्यवाद अली साहब ...आप बिचित्र हैं :-)

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  18. मैं भी अरविन्द मिश्र जी के विचार से सहमत हूँ - पूरी कविता मिल जाए तो आनंद आ जाए :)

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  19. सुन्‍दर लेखन ।

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  20. इन कुरीतियों को हमें जड़ से उखाड़ फेकना होगा....यह आह्वान दूर दूर तक पहुँचाया जाए...

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  21. बोया पेड़ बबूल का
    तो आम कहाँ से होए!
    फिर भी दिवाली कांटे बोने का कोई दुस्ख नहीं?
    सतीश जी बेहतरीन कविता

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  22. कांटे दार पेड़ कुछ ज़ियादा हो गए हैं.
    कविता पूरी कर दें.

    मेरे ब्लॉग पर आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा.

    कुँवर कुसुमेश
    blog:kunwarkusumesh.blogspot.com

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  23. सतीश भाई ... सच में कुछ समझ में नहीं आ रहा है।
    आप दिवाली का विरोध करना चाह रहे हैं, या कुप्रथाओं का .. या दोनों का। या दीपावली को ही कुप्रथा मानते हैं।
    चलिए अपना मत तो दे ही दें, कुप्रथाओं से तो हम साल भर लड़्ते रहते हैं, लड़ते रहें, दीपावली साल में एक दिन मनाते हैं, मनाएंगे।
    मुझे देश के इन पारंपरिक त्योहारों में पूरी आस्था है।

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  24. @ मनोज भाई ,
    हर हालत में दीवाली मनाई जाएगी ...हमारे खून में बचपन से रची बसी दीवाली हमसे छुट जाए इसका सवाल ही नहीं पैदा होता !
    यहाँ सिर्फ संकेत है कि हम अपनी कुप्रथाएँ छोड़े बिना खुशियाँ क्यों मनाते हैं ! पहले अपने घर से बुराइयों को नष्ट कर अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य सुनिश्चित करें तब खुशिया ( दीवाली) मनाएं !
    सादर

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  25. इंस्टालमेंट वाली पालिसी पर विचार किया जाय :)

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  26. @ अभिषेक ओझा ,
    मज़ा आया इस मासूमियत पर अब तो कुछ कहना ही पड़ेगा !
    कुछ दिन से लिखने का मन नहीं कर रहा था , अतः पुरानी रचना ( जो मुझे बहुत पसंद है ) को इंस्टालमेंट में आप मित्रों को परोस दी !
    शिकायतें बढ़ रही हैं ...मालूम है पर थोड़े दिन और मदद नहीं कर सकते .... ..

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  27. परिवर्तन आवश्यक है
    सवाल को ही सूत्र पात माना जावे
    ताज़ा पोस्ट विरहणी का प्रेम गीत

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  28. हम शिकायत नहीं करेंगे...बैक जा कर पढ़ भी लिए कविता... :)

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  29. कुप्रथाओं से तो मुक्ति मिलनी ही चाहिए .... सही explanation ...

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  30. घर में जहरीले वृक्ष लिए क्यों लोग मानते दीवाली

    bahut hee gambheer bat kahee hai aapne ..

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  31. बबूल में तो बडे सुंदर हल्दी के रंग के फूल खिलते हैं और बबूल का दातौन भी अच्छा होता है । इसकी लकडी तो कहते हैं देर तक आंच देती है । हां घर में कोई नही लगाता । आप की प्रस्तावना यह कहती है कि पूर्वजों से चली आई कुरीतियों को ढोने में कओ ई अर्थ नही है पर बबूल इतना भी बुरा नही होता कंटीला होता है । हां ।
    दीवाली और बबूल का संबंध समझ में नही आया ।

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  32. @ आशा जोगलेकर जी
    दिवाली का तात्पर्य खुशियों से और बाबुल हमारी कुप्रथाएं है !
    सादर

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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