जितना प्यार दे रहीं मुझको
कैसे खुशियाँ सह पाऊँगा !
अब तो जैसे वर्षों से ना , युग युग से नाता पीड़ा का !
गहरा रिश्ता है अब दुःख से, इसके बिन अब जीना क्या ?
अटूट रिश्ता है चोटों से ,
जख्मों को सहलाना क्या
गहरे घाव ह्रदय में लेकर ,
खिलखिल कर हँस पाना क्या
मैं क्या जानू, जख्मीं होकर, घाव भरे भी जाते हैं !
छेड़छाड़ मीठी झिड़की,आलिंगन का सुख होता क्या ?
कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा
टूटा मन शीशे जैसा !
हर मीठी नज़रों के पीछे
प्यार छिपा ! शंकित मन है !
खंड - खंड विश्वास हुआ है, मोहपाश मैं बंधना क्या !
मेरे एकाकी जीवन को , मधुर हास से लेना क्या !
बहुत मनाऊँ अपने मन को
पर विश्वास कहाँ से लाऊं !
तेरी बाँहों का सम्मोहन
क्यों बेमानी ,लगता है !
लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !










