Saturday, April 23, 2011

आओ, कुछ हम भी रंग बदलें - सतीश सक्सेना

                   अक्सर समाज में हम लोग दुहरे चेहरे के साथ जीते हैं ! पूरे जीवन, अपनी झूठी शानोशौकत से लदेफदे हम लोग , हर समय अपना काम येन केन प्रकारेण, निकालने में व्यस्त रहते हैं ! अपना काम निकालने के लिए , बेईमान जीवन के इन विभिन्न स्वरूपों को इस हलकी फुलकी  हास्य रचना के माध्यम से ढालने का प्रयत्न है, अगर इसे पढ़कर आप मुस्करा दिए तो इसका लिखना सार्थक हो जाएगा ! 


आओ हम भी कुछ नाम करें 
कुछ छपने लायक काम करें 
इक जैकपॉट लग जाये और 
बस जीवन भर आराम करें  
दुनिया न्योछावर हो हम पर, 
मोहक स्वरुप  के क्या कहने 
बगुला करले ख़ुदकुशी देख, जब जब हम अपना रंग बदलें 

हम चोरों और उचक्कों को 
उस्तादी के गुण सिखलाएं 
खुद परमब्रह्म भी  घबराएं 
जब हम  पूजा करने बैठें  ! 
भरपेट,आमरण अनशन कर, 
जब गाँधीवादी   बन  जाएँ !
सारा समाज भौचक्का हो,जब जब हम अपना रंग बदलें !

दयनीय भाव के साथ साथ 
हम हाथ जोड़, बेटी व्याहें
भरपूर गर्व के साथ साथ
हम पुत्र वधू  लेने  जाएँ  !
मंडप में क्रोधित रूप लिए , 
हम लगते विश्वविजेता से,
समधी बेचारे गश खाएं,जब जब हम अपना रंग बदलें !

माथे पर चन्दन तिलक लगा,
जब पीत वस्त्र धारण करते  !
शुक्राचार्यों की समझ  लिए ,
गुरु वशिष्ठ  जैसा  रूप  रखें !  
सन्यासी करते  त्राहि त्राहि, 
जब हम संतों  सा  वेश रखें  ! 
गिरगिट शर्मिंदा हो भागे ,जब जब हम अपना रंग बदलें  !

Friday, April 22, 2011

मानवता के लिए बलिदान दिवस -सतीश सक्सेना

गुड फ्राई डे, त्याग और वलिदान का दिन है ! आज के दिन विश्व, ईसु मसीह के कष्टों को याद करता है , मानव जाति के कल्याण के लिए, अपने हाथों पैरों में कील ठुकवाते, ये महात्मा, इस दुनिया को छोड़ गए थे ,इस आशा में कि शायद मानव जाति कभी सबक लेगी !

शायद अभी कुछ और समय लगेगा जब हम , अपने मत को न मानने वालों  से नफरत करना बंद कर पायेंगे ! 

शायद अभी और वक्त लगेगा जब हम दूसरों की श्रद्धा का उपहास बनाना  बंद कर पाने में समर्थ होंगे ! 

मैं अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ उनको नमन करता हूँ !

Tuesday, April 19, 2011

मेरे गीत कौन गायेगा - सतीश सक्सेना

इस चमक दमक की दुनियां में
रंगों की महफ़िल ,सजी हुई  !
मोहक  प्रतिमाएं  थिरक रहीं 
दामिनि जैसा  श्रृंगार  किये  !
इस समाज में इस महफ़िल में,कौन भला मातम गायेगा ?  
मेहँदी रचित हाथ  लेकर , अब  मेरे गीत  कौन गायेगा   ?

सूरज की पहली किरन साथ
फागुन के रंग बरसते  हैं  !
संध्या होने से पहले   ही ,
स्वागत होता दीवाली का  !
नव मस्ती के  इस योवन में , रोदन क्यों कोई गायेगा   ?
हाला, मधुबाला साथ  लिए, अब मेरे गीत कौन गायेगा ? 

हर मन में चाहत , रंगों की ,  
महसूस व्यथा को कौन करे ?
गर्वित हों  अपने योवन से
अहसास  पराया कौन करे ?  
रणभेरी बजते अवसर पर , वेदना कौन अब  गायेगा  ?
उन्माद भरे इस मौसम में, अब मेरे गीत कौन गायेगा ?

कोई गोता खाए, बालों में  
कोई डूबा गहरे प्यालों में 
कोई मयखाने में जा बैठा 
कोई सोता गहरे ख्वाबों में
जलते घर माँ को छोड़ चले, बापस क्यों  कोई आएगा ?
निष्ठुर लोगों  की नगरी में , अब मेरे गीत कौन गायेगा ?  
  

Tuesday, April 12, 2011

तुम पथ भटक यहाँ क्यों आयीं ? -सतीश सक्सेना

अक्षत पुष्प,दीप,फल लेकर
तुम पथ भटक,यहाँ क्यों आयीं ?
लगता है , मंदिर के भ्रम में , 
रास्ता भूल, चली आई हो,
दिखने में तो ताजमहल से 
कितने  ही, मंदिर बनवाये !
लेकिन बरसों से उजड़े इस परिसर में वरदान नहीं है !

खड़ी , भव्य दीवारें मेरी 
कलश कंगूरे ध्वज और तोरण
घंट ध्वनि, मंत्रोच्चारण से 
लगता घर, मेरा मंदिर सा 
यह सब सच है मगर कामिनी,
पूजा यहाँ न अर्पण करना !
तुमको दुःख होगा कि यहाँ पर,मंदिर है पर मूर्ति नहीं है  !

बाहर से देवता सरीखा 
सौम्य लगूं आराध्य सरीखा 
तुम मुझसे वर लेने आयीं 
मैंने मांग लिया तुमको ही
अब भी जागो स्वप्न सुंदरी,
गीत यहाँ न समर्पित करना
इस सूने मंदिर में देवी  ! कविता है ,सौंदर्य   नहीं   है   !

मीरा जैसा प्यार लुटाती ,
घर बाहर की लाज छोड़कर
मधुर गीत आँचल में भरकर  
किस मोहन ,को ढूंढ रही हो 
पूजन लगन देखि मनमोहनि, 
मैं भी हूँ नत मस्तक तेरा , 
तेरी पूजा ग्रहण योग्य मंदिर तो है  ! आराध्य नहीं है  ! 

Friday, April 8, 2011

आ बता दें कि तुझे कैसे जिया जाता है .... -सतीश सक्सेना

डॉ अमर कुमार का कहना है कि ...
"अब लीजिये, शरदपवार भये अमर कुमार : यहाँ कुछ यही बानगी है, आज मैंने स्वयं से अनुमति लेकर, अपने वेवकैम से अपना ही फोटो अपने हाथों खींचा है । जिसमें कुछ कलाकारी करने का असफल प्रयास भी शामिल है । अस्थायी रूप से मेरा थोबड़ा बिगड़ गया तो क्या, मैं गर्व से यह तो पूछ ही सकता हूं । सर जी, फोटो ठीक आयी है ?"

           अगर ब्लोगिंग में बहादुरी की मिसाल देखनी है , तो राय बरेली चलें डॉ अमर कुमार से मिलने  !  कानपूर मेडिकल कॉलेज से  एम् बी बी एस  डॉ अमर कुमार , देश में हिंदी विकास के लिए ,समर्पित गिने चुने योद्धाओं में से  एक हैं ! और ब्लोगिंग में अपनी बेवाक भाषा के लिए मशहूर हैं !  
                  अगर अचानक किसी मस्तमौला और हँसते हुए सर्वसम्पन्न इंसान को यह कहा जाए कि उसे कैंसर है तो शायद अच्छे भले पहलवानों  को पसीने छूट जायेंगे ! ऐश्वर्यशाली  जिन्दगी के एक खराब मोड़ पर, खुद  डॉ अमर कुमार को यह पता नहीं चला कि लोगों का इलाज़ करते करते  वे खुद कैंसर वार्ड में दाखिल हो चुके हैं !

              शानदार सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक अमर कुमार, कैंसर ओपरेशन के बाद का, अपने  बदले  चेहरे  का फोटो , अपने  नए लेख के साथ प्रदर्शित करते हुए लिखते हैं ,कि अमर कुमार भी, अब शरद पवार जैसे लग रहे हैं ! :-(

           कम से कम मेरे लिए यह पढना बेहद दर्दनाक  रहा ! शायद मैं,  हँसते हुए कह रहे, डॉ अमर कुमार की वेदना को महसूस कर पाया था ! इन शब्दों को पढ़ते हुए मेरा मस्तक इस कर्मयोगी के आगे अनायास ही झुक गया ! वन्दनीय है यह बहादुरी ! जीवन में दर्दनाक क्षणों को , हँसते हुए क्षणों की तरह ही जीना है ! यह समय भी कट जाएगा ! कल का किसी को कुछ नहीं पता ...... 

           यह पोस्ट लिख दी ताकि मेरे बच्चों को एक शिक्षा मिल सके कि बहादुरी के साथ शानदार जीवन कैसे जिया जाता है ! 
आ बता दें कि तुझे कैसे जिया जाता है .....
(यू ट्यूब  से साभार ) 


डॉ अमर कुमार का इस पोस्ट पर दिया गया कमेन्ट , मैं पोस्ट का हिस्सा बनाना चाहता हूँ , शायद यह प्रेरणास्पद शब्द ,हम सबको कुछ समझा सकें ..


यहाँ अब तक उपस्थित सभी शुभाकाँक्षियों को मेरा विनम्र अभिवादन !
सँदेश साफ़ है.. जो अपरिहार्य है, उसे हँस कर स्वीकार करिये । बिसूरने से.. रोने चिल्लाने से आपकी सज़ा की मियाद कम न होगी.. उल्टे दर्द और बढ़ ही जायेगा । जब तक जीवित हो, बुरे से अच्छों के पक्ष में लड़ते रहो.. कल कोई तुम्हें याद भले ही न करे... पर तुम उन अच्छाईयों में ज़िन्दा रहोगे ।
गीतकार के शब्दों में... नाम गुम जायेगा... चेहरा यह बदल जायेगा.. मेरी आवाज़ ही पहचान है.. ग़र याद रहे ।

Tuesday, April 5, 2011

आज किसी की रक्षा करने, साईं तुझे मनाने आया -सतीश सक्सेना

                      वर्षों पहले जब इस महानगर में कदम रखा था तो एक सीधे साधे लड़के राकेश से, एक ही कार्यालय में कार्य करने के नाते मित्रता हुई, और उसने रहने के लिए घर की व्यवस्था कराई ! उसके बाद बहुत सी यादें, एक दूसरे की शादी में योगदान...... दुःख के समय में साथ....मुझे याद है राकेश के द्वारा साईं बाबा के मन्दिर में ले जाने की जिद, और मेरा न जाना.....मेरी भयानक बीमारी पर साईं बाबा का प्रसाद लाकर घर में खिलाना और यह विश्वास दिलाना की अब आप ठीक हो जाओगे ! उसकी बहुत जिद और इच्छा थी कि मैं एक दिन उसके साथ शिरडी अवश्य चलूँ, जो मैंने कभी पूरी नही की !
                      और एक दिन वही, बिना मां,बाप, भाई, बहिन वाला राकेश, गंगाराम हॉस्पिटल पर स्ट्रेचर पर, अर्धवेहोशी, आँखों में आंसू भरे मेरी तरफ़ बेबसी में देख रहा था, तब मेरे जैसा नास्तिक, पहली बार साईं दरबार में विनती करने के लिए भागा !वहीं यह विनती लिखी गयी, बावा को मनाने हेतु , पर शायद बहुत देर हो गई थी......... !

ना श्रद्धा थी , ना सम्मोहन
ना अनुयायी किसी धर्म का
कभी न ईश्वर का दर देखा
अपने सिर को नहीं झुकाया
फिर भी मेरे जैसा नास्तिक,
बावा ! तेरे द्वारे आया !
मुझे नहीं मालुम क्यों, कैसे ? आज चढावा देने आया !

पूजा करना मुझे न आए
मुख्य पुजारी मुझे टोकते
कितनी बार लगा है जैसे
जीवन बीता, खाते सोते,
अगर क्षमा अपराधों की हो
तो मैं भी, कुछ लेने आया
आज किसी की रक्षा करने का वर तुमसे लेने आया !

आज कष्ट में भक्त तेरा है
उसके लिए चरणरज लागूं
कष्टों की परवाह नहीं है ,
अपने लिए नहीं कुछ मांगू,
पर बावा उसकी रक्षा कर
जिसने तेरा दर दिखलाया
आज ,किसी की जान बचाने, तेरी ज्योति जलाने आया !

कई बार सपनों में आकर
तुमने मुझको दुलराया है
बार - बार संदेश भेजकर
तुमने मुझको बुलवाया है
बाबा तुझसे कुछ भी पाने
मैं फल फूल कभी न लाया !
आज एक विश्वास बचाने , मैं शरणागत बनके  आया !

कितने कष्ट सहे जीवन में
तुमसे कभी न मिलने आया
कितनी बार जला अग्नि में
फिर भी मस्तक नही झुकाया
पहली बार किसी मंदिर में
मैं भी , श्रद्धा लेकर आया !
आज तेरी सामर्थ्य देखने , तेरे द्वार बिलखने आया !
आज किसी की रक्षा करने साईं तुझे मनाने आया !

Friday, April 1, 2011

वे काटें तो प्यार मुहब्बत हम बोलें तो अत्याचार -सतीश सक्सेना

बहुमुखी  प्रतिभा के धनी अनुराग शर्मा ने आज एक खस्ता शेर लिखा , जो सीधा दिल में, गहराई तक उतरता चला गया  ! हलके फुल्के हास्य व्यंग्य के लिए लिखी इस रचना का एक एक शेर, लगता है जीवन की सच्चाई बयान  कर रहा है !

अक्सर स्वार्थी हम लोग ,जब भी अपनों  का फायदा उठाते हैं तो अपनी योग्यता और अपनी ही पीठ थपथपाते रहते हैं कि हम इस योग्य है कि यह गधा मेरे लिए काम आ रहा है ! यह हमारी ही मुहब्बत है कि वह हमसे प्यार करता है ....

बेहद दर्द के साथ इन प्यारों का साथ छोड़ना ही बेहतर है ... दिल कहता है कि 

इंशा अब इन्हीं अजनबियों में चैन से सारी उम्र कटे
जिनके कारण बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का  

आज के समय में खोया पाने का आकलन करें तो लगता है  जीवन में आनंद ही नहीं है ! क्यों न बुरी संगति,  याद ही न रखें और बेहतर आशाओं के साथ, जीवन के ख़राब पडावों को भूलने की कोशिश करें  ! 


आज यह गाना कई बार सुना ...
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