पिछली पोस्ट में प्रवीण पाण्डेय की टिप्पणी पढ़कर देखता ही रह गया ...
"मैंने तो मन की लिख डाली,
अब शब्दों की जिम्मेदारी ! "
और उनको एक पत्र लिखा वह आपकी नज़र है ...
प्रवीण भाई,
सतीश सक्सेना
रचनाकारों की नगरी में मैंने कुछ रंग सजाये हैं
आते जाते ही नज़र पड़े
ऐसे अरमान जगाये हैं ,
यदि मन के भाव समझ पाओ,तो झूम उठे,दुनिया सारी !
मैंने तो मन की लिख डाली, अब शब्दों की जिम्मेदारी !
जो शब्द ह्रदय से निकले हैं
उन पर न कोई संशय आये
वाक्यों के अर्थ बहुत से हैं ,
मन के भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की, हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी
क्या जाने अर्थ निकालेगी, इन छंदों का, दुनिया सारी !
असहाय,गरीबों, मूकों की
आवाज़ उठाना लाजिम है !
मानव की कुछ करतूतों से
आवरण उठाना वाजिब है !
पाशविक प्रवृत्ति का नाश करे,मानवता हो मंगल कारी
इच्छा है, अपनी भूलों को, स्वीकार करे दुनिया सारी !
जिस तरह प्रकृति का नाश ,
करें खुद ही मानव की संताने
फल,फूल,नदी,कल कल झरने
यादें लगती, बीते कल की !
गहरा प्रभाव छोड़े अपना, कुछ ऐसी करें कलमकारी !
ईश्वर की सुंदर रचना का, सम्मान करे दुनिया सारी !
मृदु भावों का अहसास रहे ,
बचपन से, मांगे मुक्त हंसी
स्वागत सबका सम्मान रहे !
दुश्मनी रंजिशें भूल अगर,झूमेगी जब महफ़िल सारी !
तब गैरों की भी पीड़ा का, अहसास करे दुनिया भारी !
बच्चों को , रोकें, हंसने से !
शिशुओं को माँ के आंचल से
अपनों के प्रति,शंकित होकर
जीवन पर प्रश्न उठाने से !
क्रोधितमन,कुंठाएं पालें,ये बुद्धि गयी कैसे मारी
गुरुकुल की शिक्षाएं भूले, यह कैसी है पहरेदारी !
कुछ ऐसा राग रचो मिलकर
सुनकर मृदुहँसी उठे मन से
कुछ ऐसी लय संगीत बजे
सब बाहर आयें ,घरोंदों से !
गीतों में यदि झंकार न हो, तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी !
रचना के मूल्यांकन में है , इन शब्दों की जिम्मेदारी !





