Thursday, December 13, 2012

विदाई गुडिया की ... सतीश सक्सेना

२४ अगस्त ८५ को जन्मी गुडिया ने, २४ नवम्बर १२ को, अपने जीवन साथी के साथ, नया घर बसाने , अपना घर छोड़ कर, विदाई ली !
इन आंसुओं को क्या कहें, ख़ुशी के या अपनी लाडली के जाने के गम के !!!!

गुडिया की विदाई पर,हमारे अमेरिकन मेहमान  विश्वयात्री एडम  ने, हमारे छलके आंसुओं से आहत होकर कहा था ....

"why sad ending of a such beautiful function ? "

मैं इस प्रश्न का जवाब उसे अभी तक नहीं दे पाया हूँ ......
आज  गिरिजा कुलश्रेष्ठ का कमेंट्स, फिर आंसू छलका गया ...

बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ 
आराम की ठंडी छांवो में 
काँटा भी न चुभने पाए तेरे
मेरी लाडली तेरे पांओं  में ...
  
जाओ बेटा , मुझे यकीन है कि तुम्हारा नया घोंसला, तुम्हे तुम्हारे पिता और भाई की याद नहीं आने देगा ....
और हम यही चाहते हैं !!!

Saturday, November 17, 2012

गुडिया की रंगोली -सतीश सक्सेना


यह खूबसूरत रंगोली मेरी बेटी हर वर्ष अपने घर के आंगन में बनाती रही है ! इस वर्ष से उसका अपना घर , मायके में बदल जाएगा अतः उसकी यह अंतिम रंगोली है जिसे उसने अपनी भाभी विधि के साथ बनाया है ! संयोग से विधि की, अपने घर में, यह पहली रंगोली है !

मेरी गुडिया ने, विवाह से पूर्व, इस घर के प्रति अपनी  जिम्मेवारियां, विधि को सौंपने की शुरुआत, इस रंगोली से कर दी, और विधि ने अपने घर में पहली रंगोली बनायी !
                                            चार्ज देने और लेने की परम्परा,  सुख से अधिक दुखदायी है ...मोह छोड़ा नही जाता , बेटी से बिछड़ना, बेहद कष्ट कारक है , मगर हकीकत स्वीकारनी होगी !

इस मौके पर, विश्वयात्री एडम परवेज़  ने भी जमकर, इन दोनों की मदद की ! एडम बेटी के विवाह में शामिल होने के लिए, आजकल हमारे मेहमान है ! विश्व भ्रमण पर निकला यह अमेरिकन ४६५ दिन से, अपने घर से बाहर है और हमारा देश, इस यात्रा में उसका ६५ वां देश है ! दिवाली के दिन इस रंगोली पर एडम ने लगभग ४ घंटे काम किया ! हिन्दुस्तानी कल्चर में यह विदेशी योगदान भुलाया नहीं जाएगा !

Friday, November 2, 2012

मौसम, बधाइयों और दिखावे का -सतीश सक्सेना

दिवाली, जन्मदिन और वर्षगांठों पर तोहफों की सौगात, अधिकतर लोगों के चेहरों पर, रौनक लाने में कामयाब रहती है ! मगर इन चमकीले बंद डिब्बों में मुझे, स्नेह और प्यार की जगह सिर्फ मजबूरी में खर्च किये गए श्रम और पैसे , की कडवाहट नज़र आती है ! पूरे वर्ष आपस में स्नेह और प्यार से न मिल पाने की कमी, त्योहारों पर बेमन खर्च किये गए, इन डिब्बों से, पूरी करने की कोशिश की जाती है !

भारतीय समाज की यह घटिया, मगर ताकतवर रस्में, हमारे समाज के चेहरे  पर एक कोढ़ हैं जो बाहर से नज़र नहीं आता मगर अन्दर ही अन्दर प्यार और स्नेह को खा जाता है !

एक समय था जब त्योहारों पर, अपने प्यारों के घर, हाथ के बने पकवान भिजवाए जाते थे उनमें प्यार की सुगंध बसी थी ! आज उन्हीं भेंटों को लेने के लिए बाज़ार जाने पर 500 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के उपहार सजे रखे होते हैं और वे डिब्बे पूंछते हैं कि  बताइये कितने पैसे का प्यार चाहिए ?? जैसे सम्बन्ध वैसी गिफ्ट हाज़िर है ! बिस्कुट के डिब्बे से लेकर, पिस्ते की लौंज अथवा 600 रुपये (हूबहू बनारसी साडी)  से लेकर  लगभग 50000/= ( असली बनारसी ) हर रिश्ते के लिए  !
प्यार भेजने में आपकी मदद करने के लिए, प्यार के व्यापारी  हर समय तैयार हैं, आपकी मदद करने को !इन डिब्बों में अक्सर सब कुछ होता है , केवल नेह नहीं होता ! काश भेंट में भेजे गए, इन डिब्बों की जगह हाथ के बनाए गए ठन्डे परांठे होते तो कितना आनंद आता ... :)

इस वर्ष बेटे और बेटी के रिश्तों के ज़रिये, दो परिवार मिले हैं, मेरा प्रयास रहेगा कि इन दोनों घरों में दिखावे की भेंटे न भेजी जाएँ, न स्वीकार की जाए ! मेरा मानना है कि भेंट देने, लेने से, प्यार में कमी आती है , शिकवे शिकायते बढती हैं ! जीवन भर के यह रिश्ते अनमोल हैं, जब तक मन में प्यार की ललक न हो, पैसे खर्च कर इनका अपमान नहीं करना चाहिए !

इस पोस्ट का उद्देश्य उपहारों का विरोध  नहीं हैं , उपहार प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं, जिनके ज़रिये, हम स्नेह और लगाव प्रदर्शित करते हैं , बशर्ते कि इन डिब्बों में विवशता और दिखावे की दुर्गन्ध न आये  !

आज सुदामा के चावल याद आ रहे हैं जिनके बदले में द्वारकाधीश ने, सर्वस्व देने का मन बना लिया था !वह प्यार अब क्यों नहीं दिखता  ?? 

Saturday, October 6, 2012

माँ, तुम्हे अपना भी तो कुछ, ख़याल रखना चाहिए - सतीश सक्सेना

नीचे लिखा पत्र ,डॉ गीता कदायप्रथ ( कैंसर कंसल्टेंट ) का है, जिसमें उन्होंने ब्रेस्ट कैंसर के खतरे के लिए , महिलाओं को जागरूक करने हेतु , एक रचना का अनुरोध किया है  ! डॉ गीता, मैक्स हॉस्पिटल, साकेत , दिल्ली में, कैंसर सर्जन के रूप में कार्यरत हैं !   

Dear Mr Saxena,
It was really good talking to you and am glad you are also enthusiastic about writing a few lines for creating breast cancer awareness.
Dr Geeta Kadayaprath 9810169286

1. Breast cancer is on the rise, and actually can be defeated just by early detection / screening.2. Health consciousness in terms of lifestyle: tobacco, food, exercise.3. pink and breast cancer should remain the main theme, touching indirectly on lifestyle and screening. 
The central idea is to make women realise they are all important to their families and the society at large.They need to take care of themselves and put their health as a priority.We all need her, as a mother,a sister, a daughter, a wife etc.For her to be able to do justice to all these roles, she has to look after herself.She has to listen to her body, she has to be familiar with her body, because she knows her body best. She has to come forth herself if she finds a problem and not postpone it for another day.The urgency to ensure her fitness should not diminish ever.This mindset that no disease can touch her has to go and her vulnerability should make her more aware and forthcoming in reporting a problem at the earliest

She lights up everyone's lives. She is an enigma,a pillar of strength- she is the sunshine, the rainbow, the gentle breeze,the earth, all enduring, selfless and patient.She gives endlessly.Let us care for her, nurture her and keep her healthy because our existence is inextricably linked to her.She means the world to us, so let us paint her canvas in pink and ensure she is aware of her own self and submits herself to a check even if she is ostensibly well.'
Sent from BlackBerry® on Airtel

Dr Geeta kadayaprath
MS, FRCS Senior Consultant (Breast Surgeon)

यदि तुम्ही अस्वस्थ हो
कैसे उठें,किलकारियां
अगर तुम ,भूखी रहीं ,
कैसे जमेंगी , बाजियां ,
अगर तुम चाहो कि हम भी, छू सकें वह आसमां !

माँ  तुम्हें भी स्वयं का कुछ  ध्यान रखना चाहिए !

याद रख , तेरी हँसी ,
जीवंत रखती है,हमें !
तेरी सेहत में कमी ,
बेचैन करती है,हमें !
जाना तो इक दिन सभी को, मगर अपनों के लिए
माँ, तुम्हे अपने बदन का , ध्यान रखना चाहिए !

कुछ बुरी बीमारियां 
खतरा है नारी के लिए
कैंसर सीने में जकड़े
उम्र , सारी के लिए
वक्त रहते जांच करवा कर, जियें, सब के लिए !

कुछ तो माँ अपने लिए ,अरमान रखना चाहिए !

तुमसे ही सुंदर लगे
संसार जीने के लिए
तुम नहीं,तो कौन है ?
हँसने,हंसाने के लिए
सिर्फ नारी  जगत में , जीती है गैरों के लिए !

माँ, हमें अपने लिए ,इक शक्तिरूपा चाहिए !

मायके में, आंख भर
आयी,तुझे ही यादकर
और मुंह में कौर न जा
पाए तुमको याद कर !
अगर मन में प्यार है ,परिवार  अपने के लिए !
माँ,शारीरिक व्याधियों की,जांच होनी चाहिए !

नारी आँचल में पले हैं ,
गाँठ  घातक रोग के !
धीरे धीरे कसते जाते
रेशे , दारुण रोग के !
इनके संकेतों की हमको , परख होनी चाहिए !
माँ , बड़ों की बात हमको याद रखना चाहिए !

Sunday, September 9, 2012

आह ...-सतीश सक्सेना


बड़ों के  कंधे पर अर्थी, उठायी जाए बच्चों की !
तो बूढी जिंदगी में, और जीना  बोझ लगता है !
अगर बेटे को लथपथ,खून से, कोई पिता देखे  !
तो ईश्वर नाम पर,विश्वास करना,बोझ लगता है !

Saturday, September 1, 2012

कसम हमें इन प्यारों की - सतीश सक्सेना

जब तक यादें रहतीं दिल में , श्र्द्धा और सबूरी की ! 
तब तक दिल में,बसी रहेगी,गंध उसी कस्तूरी  की !

जब तक, मेरे इंतज़ार में, नज़र  लगीं,  दरवाजे  पर !
तब तक वे, न जाने देंगीं, दिल से धमक जवानी की !

जब तक कोई कान लगाये,आहट सुनता क़दमों  की !
दिल ये,सदा जवान रहेगा, कसम है पद्मभवानी  की !

भरी जवानी में , ये  बाते, किस गुस्ताख ने छेड़ी हैं !
हाथ मिलाएं, हमसे आकर, हो पहचान गुमानी की !

जब तक ह्रदय मचलता अपना,चूड़ी,कंगन,गजरे पर

जोश जवानों का शर्मिंदा , ताकत है सुलतानी की !

Wednesday, August 29, 2012

कभी तकलीफ इतनी हो कि जीना बोझ लगता है -सतीश सक्सेना


किसी दोस्त की सहानुभूति ने फिर अनु की याद दिलवा  दी ......
कुछ कष्ट ऐसे हैं कि भुलाए नहीं जाते ...


हमेशा के लिए, घर से गयी, दुःस्वप्न  लगता है !
हमें उस रात से शिव पर,भरोसा बोझ लगता है !

बड़ों के  कंधे पर अर्थी, उठायी जाए बच्चों की !
पिता की जिंदगी में , और जीना  बोझ लगता है !

हमारे  सामने,  दम तोड़  जाते  है, जवां  सपने !
औ हम बस देखते रह जाए,जीना बोझ लगता है !

अभी शादी की,आशीषें भी,उसके काम ना आयीं !  
तो चरणों पर कहीं झुकना,बड़ा ही बोझ लगता है !

अभी मेंहदी भी हाथों से न छूट पायी थी बच्चे की !   
ऐसे , मांगलिक कार्यों का होना ,  बोझ लगता है !

अभी भी, आखिरी पूजा की तैयारी,  नज़र में है ! 
हमें भगवान पर, ऐसा  भरोसा, बोझ लगता है !

अरे ! मासूम सी बच्ची को मारा,जिस तरह तुमने !   
हमें मंदिरों  का , सम्मान करना , बोझ लगता है !

वो नित संध्या समय, दीपक जलाती थी तेरे आगे  !
हमें ज़ालिम को, ईश्वर मानना, अब बोझ लगता है !

अगर पुत्री को, लथपथ खून से,  कोई पिता  देखे  !
तो ईश्वर नाम पर, विश्वास करना,बोझ लगता है !

जब अपनी शक्ति की, असहायता पर दया सी आये 
तो दर्पण सामने, आना भी, अक्सर बोझ लगता है ! 

Sunday, August 19, 2012

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख -सतीश सक्सेना

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख,
जिससे घर का सम्मान बढ़े ,
कुछ कागज काले कर ऐसे,
जिससे आपस में प्यार बढ़े

रहमत चाचा से गले मिलें,
होली और ईद साथ आकर !
तो रक्त पिपासु दरिंदों को,नरसिंह बहुत मिल जायेंगे !


विध्वंसक भीड़ सामने हो ,
कोई साथी नज़र नही आए !

हर तरफ धधकते शोलों में, 
शीतल जल नज़र नहीं आये !
कुछ नयी कहानी ऐसी लिख,
जिससे अंगारे ठन्डे  हों !
मानवता के मतवालों को, हमदर्द बहुत मिल जायेंगे !

कुछ तान नयी छेड़ो ऐसी
झंकार उठे, सारा मंज़र ,
कुछ ऐसी, परम्परा जन्में ,

हंस गले मिलें फेंकें खंज़र,
होली पर, मोहिद रंग खेलें, 

गौरव हों दुखी, मुहर्रम पर !
तब  धर्म युद्ध में कंधे को , सारथी बहुत  मिल जायेंगे !


वह दिन आएगा बहुत जल्द
नफरत के सौदागर ! सुनलें ,
जब माहे मुबारक के मौके,
जगमग होगा बुतखाना भी !

मुस्लिम बच्चे,  प्रसाद लेते , 
मन्दिर में ,  देखे जायेंगे !
और ईद मुबारक के मौके, हमराह बहुत मिल जाएंगे !

ये जहर उगलते लोग हमें 
आपस में, मरवा डालेंगे !
अपने घर की दीवारों में 
रंजिश का बिरवा बोयेंगे  !
चौकस रहना  शैतानों से , 

जो हम लोगों  के बीच रहें  !
तू आँख खोल पहचान इन्हें,जयचंद बहुत मिल जायेंगे !

Thursday, August 16, 2012

परिहास तुम्हारे चेहरे पर -सतीश सक्सेना

नीचता की पराकाष्ठा की बाते हम अक्सर सुनते हैं , मगर जब लोग इस सीमा को भी आसानी से लांघ जाते हैं तब शायद हमको क्रूरता और नीचता की नयी परिभाषाएं पता चल पाती हैं ! इतिहास गवाह है कि अक्सर बेहतरीन लोग, अपनों के द्वारा बड़ी निर्दयता से, बिना उफ़, क़त्ल किये गए ! यह सब आज भी चल रहा है बस समय , स्थान और परिस्थितियां ही बदली हैं ! अपने ही एक अभिन्न मित्र के प्रति नफ़रत, मानव मन की निष्ठुरता और क्रूर स्वभाव  की इस तस्वीर पर गौर फरमाएं 

कब दिन बीता कब रात गयी 
कब बिन बादल बरसात हुई  !  
कब बिना कराहे, दिल  रोया ,    
कब  सोये - सोये , घात  हुई ! 
जब घेर दुश्मनों ने मारा था, 
राज तिलक के  मौके पर  !
अपनी गर्दन कटते, देखा  संतोष , तुम्हारे  चेहरे  पर  !

जब समय लिखे इतिहास कभी 
जब  मुस्काए,  तलवार   कभी, 
जब शक होगा, निज  बाँहों पर ,
जब इंगित करती, आँख  कहीं,    
जब बिना कहे दुनिया जाने,
कृतियाँ, जीवित कैकेयी   की !
हम बिलख बिलख जब रोये थे, परिहास तुम्हारे चेहरे पर !

क्यों जग के सम्मुख हंसी उड़े  
क्यों  बेमन साथी साथ चलें  ?
क्यों साथ उठायें  कसमें हम ?
क्यों  ना पूरे , अरमान  करें   ?
गहरी खाई में गिरते दम  , 
वह  दर्द भरा, क्रन्दन  मेरा  !  
विस्फारित आँखों से देखी, इक जीत तुम्हारे चेहरे पर !

क्यों नाम हमारा   आते  ही  ? 
मुस्कान, कुटिल हो जाती थी 
बच्चों सी निश्छल हंसी देख
मन में, कडवाहट आती थी  ?
अभिमन्यु  जैसा वीर गया,
यह व्यूह सजाया था किसने  ?
इतिहास तड़प उठता, देखे, जब चमक तुम्हारे चेहरे पर  !

जब गिरा जमीं पर थका हुआ 
वह धूल धूसरित,रण योद्धा !
तब  अर्धमूर्छित प्यासे  को,
तुम जहर, पिलाने आये  थे,
धुंधली  आँखों ने देखी थी,
तलवार तुम्हारे हाथों में  !
अंतिम साँसें  लेते  देखी , मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर !

Thursday, August 9, 2012

अनुप्रिया और उसके बच्चे से -सतीश सक्सेना

आज अनुप्रिया और उसके अजन्में बच्चे ध्रुव से   की तेरहवीं है , आज से इस बच्ची को भूलना शुरू करेंगे ....

हम आज से बच्चे तुझे बस दिल में रखेंगे 
तेरी याद कुछ ऐसी हैं , भुलाई नहीं  जाती !

जब भी कहीं जायंगे , तुझे  ले के  जायेंगे  !
वह मृदुल सी मुस्कान, भुलाई नहीं  जाती !

दुनिया नहीं  जाती, किसी के साथ, है पता !
पर याद इस मासूम की,दिल से नहीं जातीं!

वादे तमाम कर चुके कि,  अब न  रोयेंगे !  
पर आँख है , आंसू से जुदा हो नहीं  पाती !

कोशिश करेंगे, अनुप्रिया, अब याद ना आये
छलके हुए आंसू की  नज़र, छुप नहीं पाती ! 

अब लात नहीं मारना, बच्चे उसे कभी ,
तुझको संभालते हुए,वह उठ नहीं पाती !

जैसे भी हो सके , उसे अब खुद सम्हालना !
अम्मा बगैर,  अन्नू  कहीं  जा  नहीं पाती !  

तू क्या खिलायेगा उसे, हमको  नहीं  पता !
तेरी माँ बहुत सीधी है,कभी कह नहीं पाती! 

Monday, July 30, 2012

एक बुरा ख़त बिंदु के लिए - सतीश सक्सेना

बिनी ,   
तुम्हारी भाभी अनुप्रिया नागराजन के बारे में, आज सारे अखबारों में छपीं खबरें, जिनके लिंक दे रहा हूँ, हमारे लिए बहुत मनहूस हैं , मगर पढ़ लो ताकि हमें याद रहे कि भगवान् हमें उतना प्यार नहीं करता जितना हम सोंचते हैं ! 
एक झटके में उसकी क्रूरता ने , हमारे परिवार की  रौनक, हर समय मुस्कराती और भरपूर प्यार करती अनु, को हमसे छीन लिया !
स्ट्रेचर पर खून से लथपथ अनु के चेहरे को, दोनों हाथों में लिए, मैं बार बार रो रो कर, उस मनहूस रात उसे मनाता रहा !
उठ जाओ अनु बच्चा , मैं आ गया मेरा बेटा ...
पर वह रूठ गयी थी ...
हम सब उसे बहुत बहुत प्यार करते थे ...और वह हमें ! 
उसे हमसे छीन लिया गया और तब जब उसके पेट में एक मासूम जान और थी !   
और हम उसे नहीं बचा पाया , न उसे.... न उसके अजन्मे बच्चे को....  
हमें पंहुचने में बहुत देर हो गयी थी ..
उस रात पहली बार मैंने अप्पा जी को फूट फूट कर रोते देखा, लगता है अन्नू उनके दिल में भी, अपनी जगह बना चुकी थी .
और  अम्मा का तो जैसे सब कुछ लुट गया बच्चे ....
अनु उनका  सपना था , जब वह अनु के साथ चलती थी तब चेहरे पर शानदार चमक रहती थी रोज अपनी बहू को बैंक पंहुचाना और लाना नियमित था, लगता था जैसे वे सबसे खुशकिस्मत माँ हैं, अनु के कारण वे बहुत उत्साहित थी लगता था जीवन का एक सहारा मिल गया था  !
अनु को लंच में तीन चार तरह का सामान पैक करना रोज का काम था ...
ये दोनों सास बहू एक दुसरे को अथाह प्यार करने लगीं थी ....
मैं नहीं समझ पाता कि उनके आँसू कैसे पोंछे जाएँ , 
वे अपने आपको बहुत अकेला पाएंगी ...
शायद तुमसे मिलकर वे बहुत रोयेंगी !
आज अनु का अस्थि विसर्जन किया उसकी छोटी छोटी अस्थियाँ बीनते समय सामने पेड़ की डाल पर मुस्कराती अनु बैठी दिखी मुझे....
नवीन अकेला हो गया है उसके सपने शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गए !
यहाँ आते समय एक बात याद रखना कि तुमने वायदा किया था कि विपरीत परिस्थितियों में तुम घबराओगी नहीं 
आज वही दिन है ..
यही जीवन है बेटा , मैं तुम्हे एअरपोर्ट पर मिलूंगा मगर अनु मेरे साथ नहीं होगी ...
रोना मत !
अंकल









Thursday, July 26, 2012

ब्लागर साथियों से हर संभव मदद चाहिए -सतीश सक्सेना

अपील 
मैं दर्द लेके दुखी हूँ, मगर पता है मुझे
मेरा ख़याल, उन्हें भी खुशी नहीं देता !


उपरोक्त शब्द, बेहद संवेदनशील शायर सर्वत जमाल  (09696318229) के हैं , जो कि १४ जुलाई से घर से लापता हैं ! उनकी  पत्नी श्री मती अलका सर्वत  (09889478084)से बात करने पर पता चला है कि वे १४ जुलाई को लखनऊ से बनारस के लिए ट्रेन द्वारा रवाना हुए थे, तबसे उनका मोबाइल स्विच ऑफ़ है ! 
अलका जी ने उनके लापता होने की सूचना पुलिस में दे दी है , मगर अब तक उनका कुछ पता नहीं चल पाया है ! आप सबसे, खास तौर पर लखनऊ एवं वाराणसी स्थिति लेखक ब्लोगर्स समुदाय से, आग्रह व अनुरोध है कि  इस बेहद भले और शानदार गज़लकार  को, तलाश करने में, अपनी शक्ति और व्यक्तिगत प्रभाव का उपयोग देने की कृपा करें ! मुझे विश्वास है कि अगर लखनऊ पुलिस एवं सर्वत जमाल साहब के मित्रों से संपर्क किया जाए तो सफलता मिलने की उम्मीद है  !
उनसे मेरी पहली और आखिरी मुलाक़ात अजय कुमार झा द्वारा बुलाए गए एक ब्लोगर सम्मलेन में, दिल्ली में हुई थी, उसके बाद कभी नहीं मिल पाए ! उनका यह शेर पढते हुए दिल में गलत आशंकाये जन्म ले रही हैं , इस भले इंसान की , इंसानियत  के लिए , अभी बेहद जरूरत है !
रोटी, लिबास और मकानों से कट गए
हम सीधे सादे लोग सयानों से कट गए

जंगल में बस्तियों का सबब हमसे पूछिए
जंगल के पहरेदार मचानों से कट गए
बुजदिल कहूं उन्हें कि शहीदों में जोड़ लूँ
वो आदमी जो ठौर ठिकानों से कट गए 

मैं चिंतित हूँ उनके लिए क्योंकि वे बहुत संवेदनशील व्यक्ति हैं, ऐसे लोग समाज की कठोर चोटें, आसानी से झेल नहीं पाते  ...
आप अगर मर्द हैं तो खुश मत हों 
काम  आती  है,  सिर्फ़ नामर्दी  !

उनके एक एक शेर को अगर विस्तार दिया जाए तो पूरी किताब लिखी जा सकती , उनकी संवेदनशीलता, उनकी रचनाओं में ,हर जगह स्पष्ट झलकती नज़र आती है !
सदियाँ गुज़री लेकिन तुमको दहशत 
में, हर लंगड़ा , तैमूर दिखाई देता है !
धोखा पहले पाप बताया जाता था 
लेकिन अब दस्तूर दिखाई देता है !



वे इंसानियत में, कम होते स्नेह और प्यार पर अक्सर लिखते रहे हैं, जीवन में अगर अपनों पर विश्वास न करें तो कहाँ जाएँ ...इंसान पर उनका अविश्वास देखिये ..
इस तरफ आदमी, उधर कुत्ता ,
बोलिए, किस को सावधान करें!


एक और मिसाल आज के समय का उसूल यही है शायद ...
पास रख्खोगे तो जिल्लत पाओगे 
यार इस ईमान का सौदा करो !  

आशा है आप लोग व्यक्तिगत प्रभाव का उपयोग करते हुए लखनऊ पुलिस पर दवाब बना कर उन्हें तलाश करवाने में अपना सहयोग करेंगे ! इस मामले में ( https://www.facebook.com/alka.s.mishra )  इंदिरा नगर थाने, लखनऊ में  रिपोर्ट दर्ज करवा दी गयी है !
( सर्वत जमाल  के अचानक गायब होने के बारे में खबर है कि वे अपने घर से मनमुटाव के कारण घर से गायब थे , कृपया इस सम्बन्ध में, अब आगे, यहाँ कोई कमेन्ट न करें  )


Saturday, July 7, 2012

तुम्ही सो गयीं, दास्ताँ सुनते सुनते - सतीश सक्सेना

आज रश्मिप्रभा जी की एक रचना पढकर अनायास अभिमन्यु की पीड़ा याद आ गयी ! वैज्ञानिक तथ्य है कि बच्चे गर्भ से ही शिक्षा ग्रहण करने लगते हैं ! महाभारत काल की यह घटना बहुत मार्मिक है , काश उस दिन सुभद्रा को नींद न आयी होती तो शायद कथाक्रम  कुछ और ही लिखा जाता ! 
अभिमन्यु ,माँ  के गर्भ में, पिता को सुनते हुए,चक्रव्यूह भेदना समझ चुके थे  मगर इससे पहले कि अर्जुन पुत्र को बाहर निकलने का रास्ता बताते, माँ सुभद्रा को नींद आ चुकी थी !पिता के अधूरे रहते पाठ के कारण, अभिमन्यु चक्रव्यूह से कभी बाहर न निकल सके ! 
पांडवों को, कृष्णा की वह नींद बहुत भारी  पड़ी थी ! एक पुत्र का व्यथा चित्रण इस रचना द्वारा महसूस करें ! 
एक भयानक पूर्वाभास जैसा रहस्यमय संयोग कि यह कविता  लिखने के बाद, सबसे पहले 8 माह की गर्भवती अनु को उसकी असामयिक मृत्यु से एक सप्ताह पहले सुनाई गयी ... :(
मैंने यह रचना क्यों लिखी मुझे खुद नहीं पता , काश न लिखता !!

पिता ने कहा था !
कि जगती रहें  !
आप भी पुत्र  से ,
बात सुनती रहें !
काश कुछ देर भी  , 
ध्यान देतीं  अगर  !
तब न खोती मुझे नींद में, सुनते सुनते ! 

मैंने उनको बहुत ,
ध्यान देकर सुना !
पर तुम्हे उस समय 
पाया कुछ अनमना  
काश उस दिन पिता 
साथ, जगतीं अगर,
पर तुम्ही सो गयीं,दास्ताँ सुनते सुनते  !

मैं तो मद्धम ध्वनि 
में भी सुनता रहा  !
नींद में डूबते भी 
मैं  चलता  रहा  ! 
काश कुछ दूर तक, 
ऊँगली छुटती नहीं !
माँ  कहाँ खो गयीं ?दास्ताँ सुनते सुनते !

पिता  चाहते थे 
कि  यशवान  हो !
और तुम चाहती थीं 
कि  बलवान  हो !   
काश कुछ देर ऑंखें  
झपकती  नहीं ,
तेरा दीपक बुझा नींद में, सुनते सुनते !

एक दुख तो रहेगा
मुझे   भी  यहाँ  ,
मैं पिता की तरह
लड़ न पाया वहाँ,
उनका सम्मान, उस 
दिन बचा ना सका !
माँ , कहाँ ध्यान था, दास्ताँ सुनते सुनते !

मीठे स्वर बिखराने वाले - सतीश सक्सेना

ठाठ तमाशे के, मेले  में , 
मीठे स्वर बिखराने वाले ,
गीत तुम्ही को ढूंढ रहे हैं 
नेह सुधा बरसाने वाले  !
कौन दिशा में तुम रहते हो,मधुर रागिनी गाने वाले ?
सिर्फ तुम्हारे मीठे स्वर से , गीतों में  झंकार उठेगी !


काश गीत मेरे तुम गाओ  ,   
सूखे  में, वसंत आ जाए ! 
मंद मंद शीतल  झोंकों से ,   
वृक्ष झूम,खुशबू बिखराएँ
कहाँ छिपे हो गाने वाले,रिमझिम धुन बरसाने वाले, 
तेरे अधरों पर आते ही , गीतों में  मुस्कान  उठेगी !  

कहाँ छिपी हो मीठी वाणी 
थोड़े पुष्प ,चढ़ाकर जाओ  
बिखरे फूलों का एक गजरा,
अपने हाथ बना कर जाओ
कहाँ खो गए हो मधुबन में,मधुर गंध बिखराने वाले !  
सिर्फ तुम्हारे छू लेने पर, पतझड़ में भी महक उठेगी !


कहाँ खो गयी वीणावादिन
कैसे ऑंखें ,तुम्हे भुलाएं  !
कब से वीणा करे प्रतीक्षा 
आशा संग छोडती जाए !
कहाँ खो गए इस जंगल में, ह्रत्झंकार जगाने  वाले ! 
जलतरंग ध्वनि के गुंजन से, नवजीवन लहर उठेगी !

Friday, July 6, 2012

ममतामयी इंदु माँ अस्वस्थ है -सतीश सक्सेना


तुम्हारा स्वागत है इंदु माँ  !
इंदु पूरी जैसे ममतामय व्यक्तित्व को यह बीमारी ( ह्रदय रोग के दो आपरेशन ) झेलनी पड़ेगी , यह सोंचना भी मेरे लिए पीड़ादायक था  !
और यह हो गया ... 
पता नहीं कितनों को, अपने ममत्व और स्नेह से सींचती, इंदु पूरी , बहुतों के दिल में रहती हैं !
ब्लॉग जगत के आभासी रिश्तों में,सबसे दमदार स्नेही रिश्ता निभाने वाली यह महिला, कम से कम मेरे सामने अमर रहे, यह कामना करता हूँ !

स्नेहमयी ,
मैंने तुम्हे कभी नहीं भुलाया और न ही तुम भुलाने योग्य भीड़ का हिस्सा हो, मगर आभासी दुनियां में जहाँ एक से एक विद्वजन और "विद्वजन" हमें पढ़ते हैं, यहाँ कौन, किस वाक्य का क्या अर्थ निकालेगा, कुछ नहीं मालुम ! तुम्हारे प्रति लिखे गए स्नेह में डूबा "तू " को समझने वाले कितने ब्लोगर हैं, नहीं कह सकते और यहाँ अक्सर प्रतिक्रिया,बिना उम्र और परिचय जाने , अधिकतम अपमान जनित दी जाती है  :) अतः ऐसी जगह से दूर रहना ही उचित होता है ! अफ़सोस तब और भी होता है जब इन लोगों को आप बहुत अच्छा मानते रहे हों !  
ममतामयी,
तुम जैसे लोग मानवता के लिए एक वरदान हैं ! सैकड़ों दुआओं को साथ लेकर चलने वाले लोग भुलाए नहीं जाते ! तुम्हारे जैसे लोगों की, संक्रमण काल से गुजरते भारतीय समाज को , सबसे अधिक आवश्यकता है
मुझे विश्वास है अब तुम्हे  कुछ नहीं होगा  ! 
हाँ अपने आपको निर्मम और क्रूर लोगों से दूर रखें , ये लोग आपके कोमल दिल को दुखाने के लिए, किसी भी हद को पार करते देर नहीं लगायेंगे !वे तुम्हारी जिन्दादिली से रात में सो नहीं पाते इन्दु माँ , वे बदला लेने में सुकून महसूस करते हैं ! मगर यह प्रवृत्तियां , विश्व में हमेशा रही हैं और आगे भी रहेंगी , भले लोगों के शिकार में भटकती रहेंगी !
तुम्हारी आवश्यकता है इंदु माँ , दुआ है कि अब तुम पहले से अधिक ताकतवर होकर हमारे बीच आओगी !
आभार आपका !

Wednesday, July 4, 2012

एकलव्य की व्यथा लिखूंगा - सतीश सक्सेना

ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे  
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे  ?
हानि लाभ का लेखा लिखते  ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, 
तुमको हो अहसास,लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

आज जोश में, भरे शिकारी
जहर बुझे कुछ तीर चलेंगे !
विषकन्या संग रात बिताते  
कल की सुबह, नहीं देखेंगे !    
वेद ऋचाएं  समझ न पाया,
मैं ईश्वर का  ध्यान लिखूंगा !  
विषम परिस्थितियों में रहकर, हंस हंसकर श्रंगार लिखूंगा !

शिल्प,व्याकरण,छंद, गीत ,   
सिखलायें जाकर गुरुकुल में
हम कबीर के शिष्य,सीखते
बोली , माँ  के  आँचल  से  !
धोखा, अत्याचार ,दर्द में ,
डूबे, क्रन्दन गीत  लिखूंगा !
जो न कभी जीवन में पाया,  मैं वह प्यार दुलार लिखूंगा !

हमने हाथ में,  नहीं उठायी ,
तख्ती कभी क्लास जाने को !
कभी न बस्ता, बाँधा हमने,
घर से, गुरुकुल को जाने को !
काव्यशिल्प, को फेंक किनारे,
मैं आँचल के गीत लिखूंगा !
प्रथम परीक्षा के, पहले दिन, निष्काषित का दर्द लिखूंगा !

प्राण प्रतिष्ठा गुरु की कब 
से, दिल में, करके बैठे हैं !
काश एक दिन रुके यहाँ 
हम ध्यान लगाये बैठे हैं !
जब तक तन में  जान रहेगी, 
एकाकी की व्यथा लिखूंगा !    
कितने आरुणि,मरे ठण्ड से,मैं उनकी तकलीफ लिखूंगा !

कल्प वृक्ष के टुकड़े करते ,
जलधारा को दूषित करते !  
तपती धरती आग उगलती
सूर्य तेज का, दोष बताते  !   
जड़बुद्धिता समझ कुछ पाए,
ऐसे  मंत्र विशेष लिखूंगा ! 
तान सेन, खुद आकर  गाएँ, मैं  वह राग मेघ  लिखूंगा  !

शब्द अर्थ ही जान न पाए ,
विद्वानों  का वेश बनाए ! 
क्या भावना समझ पाओगे
धन संचय के लक्ष्य बनाए !
माँ की दवा,को चोरी करते,
बच्चे की वेदना लिखूंगा ! 
श्रद्धा तुम पहचान न पाए,एकलव्य की व्यथा लिखूंगा !

Thursday, June 28, 2012

गीता हरिदास -सतीश सक्सेना

कुछ दोस्त , रिश्तेदारों से भी बढ़कर होते हैं , जिनसे आप अपना कोई भी खुशी और दुख बाँट सकते हैं , इन मित्रों के लिए एक बार लिखा यह गीत याद आ गया !
धोखे की इस दुनियां में  ,
कुछ  प्यारे बन्दे रहते हैं !
ऊपर से साधारण लगते
कुछ दिलवाले रहते हैं  !
दोनों  हाथ  सहारा देते ,  जब भी ज़ख़्मी देखे गीत  !
अगर न ऐसे कंधे मिलते,कहाँ सिसकते मेरे गीत  !


हरिदास परिवार, मेरे जीवन के संकलित मोतियों में से एक हैं , जिन्हें मैं बहुत प्यार करता हूँ ! बहुत बुरे समय में, जो मित्र मुझे घेरे रहे उनमें हरिदास और गीता भाभी हमेशा साथ रहे  ! कैबिनेट सचिवालय में वरिष्ठ अधिकारी,  पोस्ट पर कार्यरत हरिदास से जब मैं पहली बार मिला था तो वे एक टफ व्यक्तित्व लगे थे , मगर थोड़े समय में ही इनकी सौम्यता और सरल स्वभाव ने दिल जीत लिया ! 30  मई 2012 को हरिदास, सक्रिय सेवा से रिटायर होकर अपने सरकारी मकान को छोड़ने की तैयारी ही कर रहे थे कि  7जून को गीता भाभी के ब्रेस्ट  बायोप्सी टेस्ट में कैंसर की पुष्टि हुई है ! उस दिन पहली बार मैंने हरिदास की मज़बूत आवाज में कंपन महसूस किया था !


Dr Geeta Kadayaprath 9810169286
उसके बाद शुरू हुआ , मित्रों की सहानुभूति और अस्पतालों की  दौड़धूप करते हरिदास अपना खाना पीना तक भूल गए ! अकेले में जब भी वे मेरे साथ होते, उनके आँखों की कोरों में आंसू साफ़ नज़र आते थे मगर गीता भाभी के चेहरे  पर तनाव कभी नहीं देखा ! हरिदास के कष्ट में चिंतित रहती वे, अपने भरपूर आत्मविश्वास के साथ कहती थी कि मुझे कुछ नहीं होगा !


२५ जून २०१२ को , मैक्स हॉस्पिटल, साकेत में डॉ हरित चतुर्वेदी और डॉ गीता कदायाप्रथ की अनुभवी टीम द्वारा, ५  घंटे तक चले सफल आपरेशन के बाद, जब मैंने अस्पताल पंहुचकर उनके ठन्डे हाथ पकडे, तब भी उनकी आँखों में वही मुस्कान देखी, जैसा उन्होंने मुझे वायदा किया था ! उनको हमेशा हिम्मत बंधाने वाला मैं, अपने आपको कमजोर पा रहा था मगर इस महिला ने बहादुरी की, जो मिसाल कायम  की, वह अद्वितीय थी ! 
इस ऑपरेशन में हरिदास परिवार का भरोसा, आपरेशन के समय , डॉ  गीता (कैंसर कंसल्टेंट ) की उपस्थिति पर था ! बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन  डॉ गीता, लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज से एम् बी बी एस , एम् एस एवं ग्लासगो (यू के) से एफ आर सी एस , यह कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर, राजीव गाँधी कैंसर अस्पताल दिल्ली, में कैंसर कंसल्टेंट रह चुकी हैं और ब्रेस्ट आपरेशन में सिद्धहस्त हैं !
मधुर मुस्कान के साथ अपने बीमार को हौसला देती यह लेडी डाक्टर इस सफल ऑपरेशन की निश्चित हकदार हैं ! 
महिलाओं में समस्त कैंसरों में, लगभग 30 % कैंसर, ब्रेस्ट  से सम्बंधित होते हैं !  ४० वर्ष या उससे ऊपर की महिलाओं में बगल अथवा स्तन में गांठ या सूजन जैसे लक्षणों पर तत्काल टेस्ट करवाना चाहिए, अफ़सोस है कि अक्सर महिलायें, यह कदम बहुत देर होने पर उठाती हैं ! 


कल जब उनसे मिलने गया तो मैंने उनसे कहा कि मैं आपके साथ एक फोटो खिंचाना चाहता हूँ ताकि अपने पाठकों को आपसे परिचय करा सकूं , मगर उसके लिए बैठना पड़ेगा , चूंकि यह मेरे साथ आपकी पहली फोटो होगी अतः हँसते हुए खिंचवानी होगी !  दर्द में कराहते हुए, ऊपर उठाये दोनों हाथ , घायल सीने और बगल  के साथ, उन्होंने जो फोटो खिंचवाई इसे मैं अपनी अब तक खींची गयी , सबसे यादगार फोटो मानता हूँ !
इस पोस्ट को लिखने का उद्देश्य गीता भाभी की निडरता के साथ, एक पति हरिदास की तकलीफ से, पाठकों का परिचय करना था ! 
सीधा साधा यह जोड़ा जुग जुग जिए यही मंगल कामना है ! 

Monday, June 18, 2012

ब्लोगर साथियों के समक्ष, मेरे गीत का लोक समर्पण - सतीश सक्सेना

16 जून लगभग ५:३० सायं हिन्दी के प्रख्यात हस्ताक्षर डॉ राजेंद्र अग्रवाल जी, डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा , डॉ भारतेंदु मिश्र जी, श्री अशोक गुप्ता ,एवं प्रोफ़ेसर डॉ अम्बरीश सक्सेना, जिन्हें देश में मीडिया  गुरु का दर्ज़ा प्राप्त है , की उपस्थिति में, डॉ देवेन्द्र देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र " ने ज्योतिपर्व प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित पुस्तक "मेरे गीत " का विमोचन किया !


वयोवृद्ध आचार्य  श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" हिंदी के वरिष्ठ गीतकार हैं। उनकी 50 से अधिक पुस्तकें जिनमे गीत, कविता, ग़ज़ल और आलोचना की पुस्तके शामिल हैं, प्रकाशित हुई हैं ! दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष श्री इन्द्र पर कम से कम 20 विद्यार्थियों ने शोध किया है।यहाँ उपस्थिति ,टेलीविजन जर्नलिज्म के कद्दावर चेहरों में से एक डॉ अम्बरीश सक्सेना मेरे स्कूल दिनों के सहपाठी रहे हैं ! भयानक गर्मी में, सायं 5 बजे कड़ी धुप में,  घर से चलकर , एक किताब के विमोचन में पंहुचना आसान काम नहीं था , अतः साथियों का आवाहन करते समय मैंने यह पंक्तियाँ लिखी थीं !


आज तुम्हारे पदचापों  की ,
सांस रोककर आशा करता,
तेज धूप में घर से  निकलें
मैं दिल से,आवाहन करता,
देखें कितना प्यार मिला है,कितने घर तक पंहुचे गीत !
कड़ी  धूप में , घर से बाहर,  तुम्हें  बुलाते  मेरे गीत  !


इस दुनियां में मुझसे बेहतर
गीत, सैकड़ो लिखने वाले  !
मुझसे अच्छा कहने वाले,
मुझसे  अच्छा गाने वाले  !
भरी दुपहरी घर से निकलेसुनने आये मेरे गीत  !
मात्र उपस्थित होने से ही, गौरव शाली मेरे गीत !


इस गीत यज्ञ में उपस्थित गुरु जनों का स्वागत करने हेतु , कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं   ...


देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" मेरी नज़र में साक्षात् गीतेश भी हैं, उनके समक्ष गीत सुनाना, दुस्साहस सा लग रहा था ! मगर देव वंदना और गुरु वंदना किसी भी आयोजन में आवश्यक मानी गयीं हैं ...


बिल्व पत्र और फूल धतूरा
पंचामृत अर्पित शिव पर !
देवराज सम्मान हेतु, खुद
गज आनन्, दरवाजे पर  !
इन्द्रदेव को घर में पाकर ,शंख   बजाएं मेरे गीत !
आचार्यों की नज़र पड़ी है उत्साहित हैं मेरे गीत !


अपने श्रोताओं में , सहसा,
तुम्हे देखकर मन सकुचाया !
कैसे आये, राह भूलकरमैं
लोभी,कुछ समझ ना पाया !
साधक जैसी श्रद्धा लेकर, तुम भी सुनने आये गीत !
कहाँ से वह आकर्षण लाऊँतुम्हें लुभाएं मेरे गीत !


हमारी मूल पुस्तकों में लिखा है कि गुरुकुल में, उच्च कोटि के प्राध्यापकों में, आचार्य, गुरु और उपाध्याय होते थे जिनमें आचार्य सर्व गुण संपन्न थे वहीँ उपाध्याय अपनी जीविकार्जन के लिए कुछ धन लेकर विद्यार्थी को वेद का कोई एक भाग पढाने पर सहमति व्यक्त करते थे ! इस सभा भवन में मेरे समक्ष न केवल गुरुजन मौजूद थे  बल्कि आचार्यवर की  भी उपस्थिति थी और मैं एक ऐसा विद्यार्थी जिसे कभी उपाध्याय के पाँव छूने का अवसर भी न मिला हों, संकोच में था कि वह  आचार्य समुदाय के समक्ष कैसे सुनाये और क्या सुनाये ....






गीतों का आकलन हेतु ,
आचार्य ,गुरु दरवाजे पर
उपाध्याय के पांव न देखे
क्या जाऊं , दरवाजे पर
सत्यवाक,ध्रतिमान सामने,हतप्रभ होते मेरे गीत !
पद्मनाभ की स्तुति करते, संकोचित हैं, मेरे गीत !


आज हवन को पूरा करने
कमल अष्टदल, आये हैं !
अक्षत पुष्प हाथ में लेकर
गुरु जन, घर में आये हैं !
यज्ञ अग्नि में समिधा देने, मंत्रोच्चारण करते  गीत !
स्वस्ति ध्वनि के साथ,गरजते बादल,देखें मेरे गीत !


मेरे गीतों की रचना कभी भी पुस्तक का आकार अथवा आकर्षण केंद्र बनने के लिए नहीं की गयी ! इस पुस्तक में संकलित मेरे गीत , पिछले २३ वर्षों में लिखे गए थे , शुरू के दिनों के लिखे कुछ गीत अपने मूल स्वरुप और अनगढ़  अवस्था में हैं एवं उन्हें कभी व्यवस्थित करने का भी प्रयास नहीं किया गया ! अधिकतर गीत सामाजिक जीवन की सच्चाइयों से सबक लेकर लिखे गए !


जब भी व्यक्तिगत अथवा किसी मित्र की वेदना का अनुभव हुआ , उसी समय अक्सर बिना प्रयास, एक गीत रचना हुई !


समस्त गीत बेहद ईमानदार हैं , वे तालियों की चाह के लिए अथवा किसी प्रकार के धनोपार्जन के लिए नहीं रचे गए ! सभा में ५-६ मेरे ऐसे सहकर्मी मित्र भी उपस्थिति थे जो मुझे २५ वर्षों से जानते थे और वे  यह देख अचंभित थे कि मैंने यह गीत बरसों पहले लिखे थे और इन्हें पहले कभी नहीं सुनाया गया ! मैंने अपने लेखन कर्म की चर्चा , अपने सहकर्मियों में  कभी नहीं की थी !


जहाँ माता,पिता, बहिन, भाई और वृद्धजनों पर मैं अक्सर गीत अथवा लेख लिखता रहा हूँ वहीँ एक और विषय मुझे अक्सर मुझे उद्वेलित करता रहा है ,हर पिता की लाडली पुत्री की, शेष बचे जीवन के लिए, अपने घर से विदाई ....


यह मेरे लिए बेहद तकलीफ देह है ! मज़बूत पिता के कठोर बदन का यह सबसे कमज़ोर हिस्सा , हमेशा के लिए, नए लोगों के मध्य अपना नया घोंसला बनाने के लिए, विदाई लेता है ! घर की  सबसे नाज़ुक डाली ही अपने वृक्ष से , नव जीवन रचना के लिए,  काट दी जाती है !

अपने बचे हुए पूरे जीवन यह लडकियां अपने पिता और भाई को आशा भरी नज़र से देखती हैं कि वे उसे याद रखे रहेंगे !हमारा यह दायित्व है कि उनकी यह आशा हम हमेशा बनाए रखें और अपने घर के इस पौधे को, सदा हरा भरा रखने के लिए, उसके आसपास बने रहे ! अक्सर बेटी पर लिखे गीत पढ़ नहीं पाता , ऑंखें अक्सर साथ छोड़ जाती हैं ! आशा है पाठक इन भावनाओं के साथ इन गीतों को बेहतर आनंद ले पायेंगे ! 

इस सम्मलेन की विशेषता, दूर दूर से ब्लोगर साथी मेरा साथ देने को वहाँ उपस्थित हुए थे  यह मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था ! हालाँकि अरुण चंद्र रॉय आशंकित थे कि कड़ी गर्मी में इस प्रकार के आयोजन में १० - १५ लोग से अधिक लोग नहीं आ पाते हैं वहाँ इस छोटे से सभागार में लगभग १०० लोग एकत्रित थे ! इसी समारोह  में सुश्री रश्मि प्रभा द्वारा संकलित गीतों के  एक संग्रह खामोश खामोशी और हम का भी विमोचन किया गया !   

उपस्थित सम्मानित ब्लागर साथियों में, समाज को अपनी सेहत के लिए जागरूक बनाते  सर्वश्री कुमार राधारमण  , दिल्ली सरकार से गोल्ड मैडिल सम्मानित न्यूक्लियर मेडिसिन फिजिशियन  डॉ तारीफ़ दराल , संजय भास्कर, अमरेन्द्र त्रिपाठी, अस्वस्थ होने के बावजूद अविनाश वाचस्पति, मितभाषी निशांत मिश्र , ब्लागरों में इकलौता बाबा , दीपक बाबा , जय बाबा बनारस का उद्घोष  करते पुरविया कौशल किशोर मिश्र , स्नेही जज्बाती  एम् वर्मा , पहली बार संजू जी के बिना उपस्थित,हंसाते रहो के मस्त मौला  राजीव तनेजा , जिन्दगी की राहों में अपना साफसुथरा रास्ता तैयार करते  मुकेश कुमार सिन्हा , नवजवान कवि विनोद पाण्डेय, प्रेमी ह्रदय के साथ प्रेमरस वाले शाहनवाज़ सिद्दीकी, तेजतर्रार मगर गुरु के आरुणि  संतोष त्रिवेदी, के अतिरिक्त महिला ब्लोगरों की उपस्थिति मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य रहा !

बेहतरीन स्नेही मेज़बान सुश्री सुनीता "शानू "पिलानी से खास तौर पर अपने सुदर्शन,सुसंस्कृत पुत्र के साथ वहाँ आयीं थी , वहीँ क्षितिजा फेम  संवेदन शील एवं स्नेही अंजू चौधरी  "अनु " करनाल से अकेली पंहुचीं थीं ! हंसमुख  वंदना गुप्ता को अनायास वहाँ पाकर मैं आश्चर्य चकित था ,उनके वहां पंहुचने की  कोई पूर्व सूचना नहीं थी   ! स्टार न्यूज़ एजेंसी की ग्रुप एडिटर फिरदौस खान ऐसे आयोजनों में बहुत कम जाती हैं , वे भी वहाँ पूरे सब्र के साथ अंत तक उपस्थित थीं ! निस्संदेह इन महिलाओं की उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ी है और मैं व्यक्तिगत तौर पर इसके लिए आभारी हूँ !

अनुज खुशदीप सहगल की अनुपस्थिति, उनके अस्वस्थ होने के कारण बहुत अधिक खलती रही .......

"मेरे गीत " के बारे में विद्वानों की राय ...


अंतर्मंथन : http://tsdaral.blogspot.in/2012/05/blog-post_19.html
गीत मेरी अनुभूतियाँ : http://geet7553.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
क्वचिदन्यतोपि : http://mishraarvind.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
बैसवारी : http://www.santoshtrivedi.com/2012/06/blog-post.html
हरिभूमि : http://epaper.haribhoomi.com/Details.aspx?id=5377&boxid=142647772
जख्म जो ...http://redrose-vandana.blogspot.in/2012/06/blog-post_17.html
पुस्तकायन : http://padhatehue.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
न दैन्यं न पलायनम : http://praveenpandeypp.blogspot.in/2012/06/blog-post_20.html
पंजाब केसरी :http://www.punjabkesari.com/E-Paper/Magzine/adv_3.pdf
न्यूज़ ट्रैक इंडिया : http://www.newstrackindia.com/photogallery/images/view/1708-MERE-GEET---Book-Release.html

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