शक्ति चुकी है,चलते चलते
जीवन की संध्या में, ऐसे
बेमन,भारी कदम न उठते !
वृन्दाबन से,मन मंदिर में,मुझको भी घनश्याम चाहिए !
ढूंढ रहे, बचपन से गोदी !
बिना किसी की उंगली पकडे , जैसे तैसे चलना सीखा !
ह्रदयविदारक उन यादों से,मुझको भी अब मुक्ति चाहिए !
बिन थपकी के सोना कैसा ?
ना जाने कब नींद आ गयी,
बिन अपनों के जीना कैसा ?
खुद ही आँख पोंछ ली अपनी,जब जब भी, भर आये आंसू
आज नन्द के राजमहल में , मुझको भी गोपाल चाहिए !
बरसों बीते ,चलते चलते !
भूखे प्यासे , दर्द छिपाते !
तुम सबको मज़बूत बनाते
मैं हूँ ना,अहसास दिलाते !
कभी अकेलापन, तुमको अहसास न हो, जो मैंने झेला ,
जीवन की आखिरी डगर में,मुझको भी एक हाथ चाहिए !
जब जब थक कर चूर हुए थे ,
खुद ही झाड बिछौना सोये
सारे दिन, कट गए भागते
तुमको गुरुकुल में पंहुचाते
अब पैरों पर खड़े सुयोधन !सोंचों मत, ऊपर से निकलो !
वृद्ध पिता की भी शिक्षा में, एक नया अध्याय चाहिए !
सारा जीवन कटा भागते
तुमको नर्म बिछौना लाते
नींद तुम्हारी ना खुल जाए
पंखा झलते थे , सिरहाने
आज तुम्हारे कटु वचनों से, मन कुछ डांवाडोल हुआ है !
अब लगता तेरे बिन मुझको, चलने का अभ्यास चाहिए !
( इस रचना पर अली सय्यद साहब द्वारा दिए गए कमेन्ट के जरिये , मेरे गीत पर पाठकों के १०००० कमेन्ट पूरे हुए ! आभार आप सबका ! )

