Thursday, February 23, 2012

नेह निमंत्रण -सतीश सक्सेना

आशीर्वाद दें, इन बच्चों को कि वे दोनों मिलकर एक सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकें !
आप सबको आदर सहित......

इस नेह पत्रिका के  द्वारा ,
आमंत्रण भेज रहा सब को !
अंजलि भर, आशीषों की है 
बस चाह, हमारे बच्चों को !
दिल से  निकले  आशीर्वाद ,दुर्गम पथ  सरल  बनायेंगे  !
विधि-गौरव के नवजीवन में, सौभाग्य पुष्प बिखराएंगे  !


दिव्या सतीश का कुल गौरव 
एक विदुषी को घर लाया है
विमला के घर, स्नेह सहित ,
विश्वास ,राज  का पाया है !
अब हाथ पकड़ विधि का गौरव, कुल का सम्मान बढ़ाएंगे
जिस नेह को दुनिया याद रखे, वह प्यार सभी में बाँटेंगे !


चंदा कुटीर में गरिमा और,
हँसते इशान,रोली, अक्षत  
अर्चना थाल,नूपुर, कंगन ,
जलकलश,खड़े दरवाजे पर 
विधि रथ आने पर स्वागत में, ये सबसे  पहले  जायेंगे  !
गौरैया कोयल चहक चहक कर, स्वागत गीत सुनायेंगे  !


आशीष नेह से दें इनको, 
समृद्ध,यशस्वी हों दोनों !
पैरों की आहट से इनके ,
झंकार उठे , वीरानों में  !
गुलमोहर के वृक्षों ने भी,उस दिन को इकट्ठे फूल किये 
कहते  हैं, उस दिन झूम झूम, फूलों को वे  बरसाएंगे  !



Tuesday, February 21, 2012

सम्मान और श्रद्धा -सतीश सक्सेना

दूसरों के धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होना मुझे हमेशा अच्छा लगता है , मेरा प्रयत्न रहता है कि वहां उनके अनुष्ठानों के प्रति पूरा सम्मान भी, भाग लेने पर ,ईमानदारी के साथ व्यक्त किया जाए !

अधिकतर ऐसे पूजा आयोजनों में दुखी और कष्टों में सताए लोग उपस्थित होते हैं जो अपने ईश के प्रति सम्मोहन युक्त श्रद्धा के साथ, वहां हिस्सा लेते देखे जाते हैं ! ईश आराधना में तल्लीनता इतनी होती है कि वे अक्सर अपने आपको परमहंस अवस्था में पाते हैं ! गुरु ( पथ प्रदर्शक) के सामने, गहरे ध्यान में, भाव विह्वल, आंसू बहाते यह लोग, सामान्य एवं कमजोर लोगों पर निस्संदेह, गहरा चमत्कारिक प्रभाव छोड़ते हैं !
यह मानवीय तन्मयता और भाव विह्वलता प्रसंशनीय होती है , इस  स्थिति को प्राप्त करने वाले, अक्सर अपने आपको पारिवारिक मोहमाया से मुक्त महसूस करते हैं और शनैः शनैः घर परिवार की जिम्मेवारियों से कट कर, अपने आपको पंथ मार्ग में प्रवाहित पाते हैं !
गुरु और धर्म प्रचारक वहां बैठे लोगों को उत्प्रेरित करने के लिए, लोगों से गवाहियाँ और दुहाईयाँ दिलवाते हैं कि गुरु पूजा और उनके सानिंध्य में उन्हें कैसे भयानक बीमारियों से मुक्ति मिली ! गुरु की सम्मोहक आवाज और हर वाक्य समाप्ति के साथ मिलती समर्थन ध्वनि , वहां के वातावरण को सम्मोहित बनाने में कामयाब थी  !
मेरे जैसे  पूर्ण वयस्क बच्चों के पिता और पारिवारिक माया मोह में  पड़े व्यक्ति (व्रह्म राक्षसी योनि ) के लिए जहाँ यह भयावह  :-) थी वहीँ गुरु प्रभावित लोगों के लिए,उनके द्वारा किये गए ईश आवाहन से मानसिक, शारीरिक कष्टों से मिली मुक्ति, इस विश्वास को  और गहरा करने में कामयाब थी   !

शायद यह श्रद्धा और विश्वास, मानव जीवन सुरक्षा के लिए बहुत आवश्यक है.... 

Monday, February 6, 2012

हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ? -सतीश सक्सेना

एक दिन सपने में पत्नी श्री से कुछ ऐसा ही सुना था ,समझ नहीं आया कि यह सपना था कि हकीकत ....
हास्य रचना का आनंद महसूस करें, मुस्कराएं..... ठहाका लगाएं ! 
हो सकें तो सुधर भी जाएँ ...
:-)

जब से व्याही हूँ साथ तेरे
लगता है मजदूरी कर ली
बर्तन धोये घर साफ़ करें

मस्ती से ही दूरी कर ली !
जब से पापा ने शादी की,  फूटी किस्मत, अरमान लुटे  !
जब देखो तब बटुआ खाली,हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

ना नौकर है , न ड्राइवर है,  
ना बाल मिले इस गंजे को !
घर बैठे कन्या दान मिला

ऐसे भिखमंगे चिरकुट को,
कालिज पार्टी,तितली ,मस्ती, बातें लगती सपने जैसी
चौकीदारी इस घर की कर, हम बात तुम्हारी क्यों मानें


पत्नी , सावित्री सी चहिए,  
पतिदेव की सेवा करने को 
गंगा स्नान के मौके पर  ,
जी करता धक्का  देने को !
 

तुम पैग हाथ लेकर बैठो , हम गरम गरम भोजन परसें !
हम आग लगा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


हम लवली हैं ,तुम भूतनाथ
हम जलतरंग,तुम फटे ढोल
हम जब चलते, धरती झूमें 
तुम चलते , लगते बड़े ढोल, 
तुम आँखे दिखाओ, लाल हमें, हम  हाथ जोड़  ताबेदारी  ?
हम धूल उड़ा दें दुनिया की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?




ये शकल कबूतर सी लेकर
पति परमेश्वर बन जाते हैं !
जब बात खर्च की आए तो
मुंह पर बारह बज जाते हैं !

पैसे निकालते दम निकले , महफ़िल  में  बनते  शहजादे ! 
हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?