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| उर्मिला दीदी |
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रात रात भर ,सो गीले में ,
अपनी अंतिम बीमारी में ,
बच्चा कैसे जी पायेगा ,वे निश्चित ही रोई होंगी !
सबको प्यार बांटने वाली,अपना कष्ट छिपाती होंगी !
अपनी बीमारी में, चिंता
सिर्फ लाडले ,की ही होगी !
गहन कष्ट में भी , वे ऑंखें
मेरे कारण चिंतित होंगी !
अपने अंत समय में अम्मा ,मुझको गले लगाये होंगी !
मेरे नन्हें हाथ पकड़ कर ,फफक फफक कर रोई होंगी !
माँ ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही, जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता ! अपने बचपन की यादों में उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा !
मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....
जो कभी नही लिखना चाहता था !
-बुखार में तपते, अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ ....
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँ को मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे सब ले गए मेरी माँ को ....
इस दुनिया से लड़ते लड़ते , तेरा बेटा थक कर चूर हुआ !
तेरी गोद में सर रख सो जाएँ, इस चाह को लेकर बैठे हैं !
जब से होश संभाला, दुनिया में अपने आपको अकेला पाया, शायद इसीलिये दुनिया के लिए अधिक संवेदनशील हूँ ! कोई भी व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस न करे इस ध्येय की पूर्ति के लिए कुछ भी , करने के लिए तैयार रहता हूँ !
आज के समय में परस्पर स्नेह, जैसे परिवार से मिटता जा रहा है !असुरक्षित पुरानी पीढ़ी,अपने ही बच्चों से , अपने संसाधन, छिपाने में लगे रहते हैं ! अपने ही खून से,झूठ बोल, सहयोग व सेवा की उम्मीद, परिवार शब्द का मज़ाक बनाने के लिए काफी है ! बदकिस्मती से आज समाज में हर रिश्ता, एक दूसरे के प्रति अविश्वास के लिए अपराधी है !
किसी से भी आदर पाने के लिए निश्छल स्नेह और आदर देना आवश्यक होता है ! और यही मजबूत घर की बुनियाद होती है !हमारे होते , अपनों की आँख से आंसू नहीं गिरने चाहिए ,इन आँखों से गिरता हर आंसू , स्नेहमाला के टूटते हुए मोती हैं ....
गंभीर और कष्टकारक स्थितियों में, हमें अपने बड़ों का साथ देना चाहिए न कि हम उनका उपहास करें और उनकी कमियां गिनाते हुए उपदेश दें , ऐसे उदाहरण, मात्र क्रूरता माना जायेंगे ! ममता भरे आंसुओं को न पहचान सकने वाले अभागे हैं , भविष्य और इतिहास ऐसे लोगों को कभी प्यार नहीं करेगा !
सारा जीवन कटा भागते
तुमको नर्म बिछौना लाते
नींद तुम्हारी ना खुल जाए
पंखा झलते थे , सिरहाने
आज तुम्हारे कटु वचनों से, मन कुछ डांवाडोल हुआ है !
अब लगता तेरे बिन मुझको, चलने का अभ्यास चाहिए !
परिवार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बहू को, शायद ही बिना उसके दोष निकाले,अपनी बच्ची की तरह, कभी प्यार किया गया हो जबकि हर बेटी ईश्वर से दुआ मनाती हुई, नए घर में प्रवेश लेती है कि वहां उसे एक माँ और पापा मिल जाएँ , मगर अक्सर वहां माँ की जगह सास की तौलती निगाहें और पिता के स्नेह की जगह,ससुर की गंभीरता ही पाती है और शुरू होता है तनाव के साथ, बेमन एक घर में रहने की विवशता ! अक्सर पति , माता पिता और पत्नी में बैलेंस बनाने के प्रयास में त्रिशंकु बना रहता है !पुरानी पीढ़ी, अपने जमाने की सीखी सारी परम्पराएं, इन घबराई हुई लड़कियों(नव वधुओं) पर निर्ममता के साथ लादने की दोषी है ! मैंने कई जगह प्रतिष्ठित ओहदों पर बैठे लोगों के सामने भी यह परम्पराएं होती देखीं ! इन परम्पराओं के जरिये बहू को "शालीनता" के साथ बड़ों का "सम्मान" करना सिखाया जाता है ! कॉन्वेंट एजुकेटेड इंजिनियर और मैनेजर बहू, घूंघट काढ कर, बैठी रहे ...थकी होने पर भी सास ननद को काम न करने दे आदि आदि...
और अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में, उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !
अपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची(नव वधु) से,जो उस समय,घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं ! हमें अन्याय का विरोध, सड़क पर जाने से पहले,अपने घर से शुरू करना चाहिए !गृहस्वामिनी को,ससुराल में बेटी की चिंता करने से पहले, अपनी बहू का ध्यान रखना होगा ! समाज में बदलाव लाने के लिए हमें हिम्मत भरे काम करने होंगे ...
इस बार पकड़ना हाथ जरा, मजबूती से साथी मेरे !
इन रचनाओं में, परिवार में विभिन्न रिश्तों के मध्य तकलीफें बयान की हैं जो अगर हम सब महसूस करलें तो इन गीतों का लिखना सफल मानूंगा !सुनील -सुनीता के विवाह के अवसर पर पटियाला में, सुनील की तरफ से नव वधू के लिए लिखा, यह गीत मुझे बहुत पसंद है ...
उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में
अर्पित , प्रणय संगिनी को
इस आशा के साथ , कि समझें भाषा अपने प्यार की ,
प्रेयसि पहली बार लिख रहा, चिट्ठी तुमको प्यार की !
लोग पूंछते तरह तरह के
प्रश्न , लिए शंका मन में ,
किसको क्या बतलाऊं कैसा
रंग चढ़ा व्याकुल मन में ,
गली गली में चर्चा चलती सजनी अपने प्यार की !
लिख लिख बारम्बार फाड़ता, चिट्ठी तेरे नाम की !
कवि ह्रदय की विशालता रचनाओं में अक्सर चर्चित रही है , एक निश्छल मन से बड़ा कोई नहीं , यह परमहंस सरीखा मन, समझना हर किसी के बस का नहीं ..
विस्तृत ह्रदय मिला ईश्वर से
सारी दुनिया ही, घर लगती
प्यार नेह करुणा और ममता
मुझको दिए , विधाता ने !
यह विशाल धनराशि प्राण, अब क्या में तुमसे मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !
जिसको कहीं न आश्रय मिलता
हर निर्बल की रक्षा करने
का वर मिला , विधाता से
दुनिया भर में प्यार लुटाऊं, क्या निर्धन से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !
मानव जीवन का उपभोग पूरी उन्मुक्तता के साथ करने के बजाय , छिप छिप कर खुश होने के अवसर तलाशना ,न केवल अपनी शक्ति के साथ धोखा है बल्कि खूबसूरत मानव जीवन के प्रति अपराध है ! नाटक छोडिये और जीवन में आज का, एक एक क्षण का, आनंद लें क्या पता कल सुबह होगी भी या नहीं होगी ....
जो शब्द ह्रदय से निकले हैं
उन पर न कोई संशय आये
वाक्यों के अर्थ बहुत से हैं ,
मन के भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की, हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी
क्या जाने अर्थ निकालेगी, इन छंदों का, दुनिया सारी !
मैं एक नियमित खून दाता ( ओ प्लस ) हूँ और दिल्ली के कई हास्पिटल में अपना नाम लिखवा रखा है कि अगर किसी को मेरे खून की जरूरत पड़े तो मुझे किसी भी समय बुलाया जाए, उपलब्द्ध रहूँगा ! बीसियों मौकों पर,जब मैं अनजान लोगों को खून देने पंहुचा तो भरे पूरे परिवार के लोग कृतार्थ भाव से हाथ जोड़े खड़े पाए जाते हैं , कि चलो एक यूनिट मुर्गा तो फंसा, और रक्तदान के बाद मैं अक्सर इन स्वार्थी ,डरपोक रिश्तेदारों और तथाकथित दोस्तों पर हँसता हुआ ब्लड बैंक से बाहर आता हूँ !
एक फ़िल्मी गीत, जो बचपन से सबसे अधिक पसंद है, "सदियों जहान में हो चर्चा हमारा" अक्सर गुनगुनाता हूँ ! जीवन में कुछ ऐसा करने की तमन्ना रही है जो कोई और न कर सका हो , कुछ ऐसा, जो दूसरों के लिए किया जाए , मानवता के लिए उदाहरण बनें ! अपने लिए भरपूर जीना ,और खुश रहना, कोई जीना नहीं हुआ !
इस गीतखंड के छपने के अवसर पर, अपने परिवार के साथ मैं , आज याद करना चाहता हूँ अपने उन प्यारों को,जिन्होंने मुझे खड़ा करने में मदद की !

सबसे पहले उन्हें, जिन्होंने मुझे उंगली पकड़ के चलना सिखाया , अगर वे हाथ मुझे सहारा न देते तो शायद मेरा अस्तित्व और यह भरा पूरा परिवार और मुझे चाहने वाले , कोई भी न होते ! उनमें से कुछ हैं और कुछ मेरी अथवा परिवार की लापरवाही के कारण, समय से पहले, छोड़ कर चले गए ! शायद उस समय उनकी अस्वस्थता पर मैंने उचित ध्यान दिया होता तो वे अभी मेरे साथ होते ! इन बड़ों के साथ, मैं अपने आपको हमेशा स्वार्थी महसूस करता हूँ , उनके साथ ही मैं सबसे कम कर पाया जिनके साथ सबसे अधिक करना चाहिए, हमेशा उनका ऋणी ही रहूँगा , उनका कर्जा लेकर मरना मेरी नियति होगी ...
विधि गौरव, ईशान गरिमा यह दोनों जोड़े बेहद मेहनती एवं कुशाग्र बुद्धि हैं , निश्छल मन के साथ मेरे यह बच्चे आसमान की ऊंचाइयां छुएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है !
अंत में आभारी हूँ ,गृहस्वामिनी दिव्या का जिनके सहयोग बिना मेरे गीत ही नहीं, परिवार भी अधूरा होता ,शायद पत्नी की अपेक्षाओं पर उतरना बेहद मुश्किल होता है और मैं भी अपवाद नहीं रहा ! जहाँ मैं उन्हें सहयोग नहीं दे पाया उसके लिए अपनी अयोग्यता को दोषी ठहराता हूँ...
रुचियाँ -जिनका कोई न हो उनकी मदद करना, "आँचल" ट्रस्ट का संस्थापक , सर्विस संगठन में कार्य करना, फोटोग्राफी , होमिओपैथी पढना और लिखना, जीवन को हँसना सिखाना ...
मेरे लेख पढ़ते समय कृपया ध्यान रहे कि मुझे गीत ,कविता और ग़ज़ल के शिल्प का कोई ज्ञान नहीं है, न ही हिंदी भाषा का विद्वान् हूँ तथा लिखते समय वर्तनी की गलतियाँ स्वाभाविक हैं !व्याकरण की समझ नहीं है अतः भाषागत त्रुटियों हेतु, गुरुजनों से क्षमाप्रार्थी रहूँगा !





















