Monday, December 23, 2013

घर से माल कमाने निकले, रंग बदलते गंदे लोग -सतीश सक्सेना

खद्दर पहने बाहर निकले, देश लुटाते गंदे लोग !
जनमानस में आग लगाने,घर से जाते गंदे लोग !

राजनीति में चोर बताया जाए, अच्छे लोगों को !
अपना माल छिपा,गंदे आरोप लगाते,गंदे लोग !


सभी जानते नेता बनकर, नोट बरसने लगते हैं ,
वोट जुटाने,कई तरह के भ्रम फैलाते गंदे लोग !

जेल दूसरा घर होता है ,चोर उचक्के लोगों का
खद्दर पहने,घोटाले कर, जेल में जाते गंदे लोग !

चोर डकैती में तो ख़तरा,बड़ा झेलना पड़ता है !
राजनीति में आसानी से,माल कमाते गंदे लोग !




Wednesday, December 18, 2013

किसके ऊपर लिखी रुबाई, धत्त तेरे की ! -सतीश सक्सेना

कहाँ पे जाके कलम चलाई धत्त तेरे की, 
किसके ऊपर लिखी रुबाई,धत्त तेरे की !

पूरे जीवन जिए शान से, नज़र उठा कर,

और कहाँ पे नज़र झुकाई, धत्त तेरे की !

सबसे पहले किससे हमने आँख मिलाई,
और किसे आवाज लगाई, धत्त तेरे की !


आँख न लगने दी,चौकन्ने थे, ड्यूटी पर 
और कहाँ जाकर झपकाई,धत्त तेरे की ! 

जीवन भर शेरों को जाकर,माँद में मारा
कहाँ पंहुच के हुई धुनाई, धत्त तेरे की !

कवि बन के हिन्दी की करते ऎसीतैसी  
पुरस्कार की हाथा पाई , धत्त तेरे की !

Saturday, December 14, 2013

क्या होगा , यदि कल का सूरज, मेरे प्राण नहीं देखेंगे -सतीश सक्सेना

दुनिया तो चलती जायेगी 
केवल हम ही साथ न होंगे 
एक दिवस तो जाना ही है 
कुछ बरसों में यहाँ न होंगे 
सबका अंत समय आना है,
तब क्यों डर डर जलें बुझेंगे ! 
क्या होगा , यदि कल का सूरज, मेरे प्राण नहीं देखेंगे !

यदि भय से कमजोर पड़ेंगे 
लोग खुशी से, राज करेंगे ! 
जो हमने सींचा मेहनत से 
उसको वे , बरबाद करेंगे !
कैसे हम विश्वास कर सकें , 
कच्चे फूल नहीं तोड़ेंगे !
रेगिस्तान में  वृक्ष उगाये , इनकी जड़ें नहीं खोदेंगे !

दुनियां भरी पड़ी ऐसों  से 
अपने कद को बड़ा समझते 
आधा जीवन बीत चुका है 
सारे जग में अकड़ दिखाते
बुद्धि ज़रा सी लेकर आये , 
लेकिन ज्ञान बहुत बांटेंगे ! 
लुटते बार बार फिर भी,दरवाजा खोल के ही सोयेंगे !

ऐसे  कैसे  जीवन साथी 
अपनों को सम्मान न देते 
छोटी छोटी सी बातों पर 
अपना जीवन नर्क बनाते  
नीम के पौधे ,कड़वे लगते, 
गिरते दांतों  को रोयेंगे !
जुते  हुए  तांगे  में कब से , मरते दम,  सीधे देखेंगे !

काश मानवों को अपने घर 
खुश होकर रहना आ जाये 
काश एक ही छत के नीचे
जीवन खुशबू दार बनाएँ !
थोड़े से दिन लेकर आये, 
मन का जमा अहम्  धोएंगे !
हँसते हँसते आँख बंद हों,पता नहीं किस दिन सोयेंगे !

Tuesday, December 10, 2013

हमको अपने से मनचाहे,लोग कहाँ मिल पाते हैं - सतीश सक्सेना

मन में  प्यार जगाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं !
जीवन साथ निभाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं !

अम्मा,दादी,चाची,ताई,किस दुनियां में चलीं गयीं , 
बचपन याद दिलाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं !

महज दिखावे के यह आंसू,आँख में भर के आये हैं,
गैर दुखों  में रोने वाले , लोग कहाँ मिल पाते हैं !

अपने अपने सुख दुःख लेकर इस दुनियां में आये हैं 
केवल सुख ही पाने वाले, लोग कहाँ मिल पाते हैं !

क्यों करते हो याद उन्हें,जो हमें अकेला छोड़ गए, 
दूर क्षितिज में जाने वाले, लोग कहाँ मिल पाते हैं !




Monday, December 9, 2013

घर को दीमक मुक्त कराने आये हैं झाड़ू वाले !!

काश देश के नौजवान , गीत में वर्णित झाडूवाले नौजवान बन जाएँ और देश को स्वच्छ बनाएँ ! यह एक कविता नहीं स्वप्न है जो एक दिन साकार होगा , यह रचना मेरे बेटे के अनुरोध पर लिखी गयी है !!

कूड़ा साफ़ करें बरसों का,नौजवान झाड़ू वाले !
घर को दीमक मुक्त कराने आये हैं झाड़ू वाले !

जलते घर में ठंडक लाने,जल लाये,झाड़ू वाले !
देशवासियों,बाहर आयें ,द्वार खड़े झाड़ू वाले !

हर बस्ती, निगरानी  करने, जायेंगे झाड़ू वाले !

महिलाओं को रखें सुरक्षित,ठान रहे झाड़ू वाले !    

मंदिर मस्जिद,चर्च बुहारेंगे आकर झाड़ू वाले !

राम,अली,ईसा मसीह को,आदर दें,झाड़ू वाले ! 

सारे धर्मों का सुख लेंगे, एक साथ, झाड़ू वाले !

आम आदमी साथ जियेंगे साथ मरें झाड़ू वाले !

शातिर चोर उचक्कों से, लड़ने आये झाड़ू वाले 
मत घबराओ टूटी कुटिया , छाएंगे  झाडू वाले !

Sunday, December 8, 2013

पुरवाई में तुमको कैसे , वही पुरानी चोट दिखाएँ - सतीश सक्सेना

लोकतंत्र में बेशर्मी से, धन की, लूट खसोट दिखाएँ !
धन के आगे बिकने बैठे, कितने काले कोट दिखाएँ ! 

जिन्हें देखकर दर्द उभरता, कैसे हंस कर गले लगाएं !
पुरवाई में  तुमको  कैसे, बड़ी पुरानी  चोट दिखाएँ !

लम्बी दाढ़ी, भगवे कपडे, तुम कैसे पहचान सकोगे !
भव्य प्रभामंडल के पीछे,कैसे तुमको खोट दिखाएं !

हमको अखबारी लगता है,भिक्षुक धनवानों की दूरी 
सिर्फ उन्हें झोपड़ बस्ती में,थोक में रहते वोट दिखाएं !

खद्दर पहने हाथ जोड़ कर,सब की सेवा करने आये !   
जब भी काम कराना चाहें,इनके आगे नोट दिखाएँ !

Friday, December 6, 2013

अपने पेट उघाड़े रहना , राजा आने वाले हैं -सतीश सक्सेना

बरसों बाद गली में , अपने नेता आने वाले हैं !
आँख में आंसू लेके रहना,कुछ तो पाने वाले है!


इन ऊंचे लोगों को नीचे,नहीं दिखायी देता है !
अपने पेट उघाड़े रहना, राजा  आने वाले हैं !

झाड़ू पोंछा चूल्हा बर्तन, यही हमारा काम रहा !
पहले घर के मर्द, बाद में,हम भी खाने वाले हैं !

जरा दिखावा तो करना है कर्ज़ा देने वालों से 
चूल्हा बुझे दिखाते रहना, लाला आने वाले हैं !

ढेरों फूल बिछाए हमने,टूटी,फूटी सडकों पर ! 
जमके ढोल बजाते रहना,नेता आने  वाले हैं !

Tuesday, December 3, 2013

केवल बच कर रहना होगा, इतने बदबूदारों से - सतीश सक्सेना

मूरख जनता खूब लुटी है, पाखंडी सरदारों से !
देश को बदला लेना होगा,इन देसी गद्दारों से !

पूंछ हिलाकर चलने वाले,सबसे पहले भागेंगे !
सावधान ही रहना होगा, इन झंडे बरदारों से !

अक्सर धोखा देने वाले, बगल में पाये जाते हैं !
आँख खोल के सोना होगा,घर के पहरेदारों से !

कड़ी ठण्ड में बाबा ऊपर,आधा कम्बल डाला है !
आधा कम्बल हमें दिलाये,शिक्षा बरखुरदारों से !

जीवन भर ही वोट डालते रहे, तुम्हारे  कहने पर !
अब कैसे बच पाये इज्जत,इन डाकू सरदारों से !

राजनीति के मुहरों के रंग,देख लिए हैं,जनता ने !
केवल बच कर रहना होगा, इतने बदबूदारों से !


Monday, December 2, 2013

घर की इज्जत बेंच,किसी के घर का पानी भरते हैं -सतीश सक्सेना


कैसे, कैसे लोग राष्ट्र की ध्वजा उठाये चलते हैं !
राजनीति के मक्कारों के, चंवर उठाये चलते हैं !

नोट कमाने,राष्ट्रभक्त बन,खद्दर पहन के आये हैं !
पीठ पे नाम लिखाये उनका,पूंछ उठाये चलते हैं !

मंत्री का विश्वास मिला तो वारे न्यारे हो जाएंगे !
दल्लागीरी करते , मन में लड्डू खाये, चलते हैं !

नेता के मंत्री बनते ही, नोट कमाएंगे जी भर के,  
जोश जोश में दुश्मन के, कंगूरे ढाये चलते हैं !

खुद पार्टी के ड्रमर बन गए,बच्चे ढोल बजायेंगे,
धन पाने को राष्ट्रभक्ति के,रंग लगाये चलते हैं !

Friday, November 29, 2013

अपने मित्रों के स्नेह के, आभारी हैं मेरे गीत - सतीश सक्सेना

"मेरे गीत " पर, २४ मई २००८ को पहली कविता "पापा मुझको लम्बा कर दो "  प्रकाशित की गयी थी, जिसकी  रचना ३०-१०-१९८९ को हुई जब मेरी ४ वर्षीया बेटी के मुंह के शब्द कविता बन गए ! इस कविता का एक एक शब्द उस नन्हें मुख की मनुहार का सच्चा वर्णन है जो उसने अपने पापा से कही थी ! यह बाल कविता स्वर्गीय राधेश्याम "प्रगल्भ" को समर्पित की गई थी, जो कि उस समय "बालमेला" नाम की पत्रिका का संपादन कर रहे थे !

और आज ४०० प्रविष्टियों एवं १६२०६ टिप्पणियों एवं १,९६,३७२ पेज व्यू के साथ "मेरे गीत" को, अलेक्सा ट्रैफिक रैंक के अनुसार  भारत में १८६२६ एवं विश्व में १८१०३७ रैंक पर पाकर , खासा संतोष अनुभव कर रहा हूँ !

 शुरुआत में लेखन पर अधिक जोर था , मेरे एक पाठक ने उस समय लिखा था कि मेरे गीत पर गीत कम होते हैं , कहीं दिल को छू गया  और कविता ,पद्य लेखन शुरू किया और अब जब मैं गीत ग़ज़ल अधिक लिख रहा हूँ तो कुछ लोग मुझे कवि भी कहने लगे हैं !

आजकल लेखन में अक्सर मौलिकता की कमी पायी जाती है , मेरी कोशिश रही है कि किसी अन्य मशहूर कवि का प्रभाव मेरी रचनाओं में न आ सके जो कुछ निकले प्रभावी अथवा अप्रभावी मेरे दिल से निकले चाहे लोग पसंद करें या न करें , और शायद मैं इसमें कामयाब रहा हूँ ! इस पूरे रचना काल में मैंने कभी व्याकरण और शिल्प के सुधार की  आवश्यकता के कारण अपनी रचना को नहीं बदला ! मुझे लगता है , ईमानदार भाव अभिव्यक्ति, मौलिक और विशिष्ट होनी चाहिए न कि उसे पुरानी एवं खूब बखानी गयी शैली में बाँध दिया जाय !

कुछ ऐसा राग रचें मिलकर,
सुनकर उल्लास उठे मन से !
कुछ ऐसी लय संगीत  बजे 
सब बाहर आयें ,घरोंदों  से !
गीतों में यदि झंकार न हो,तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी !
रचना के मूल्यांकन में है  , इन  शब्दों की जिम्मेदारी  !


ब्लॉग जगत में सब लेखक हैं अतः पाठकों का अभाव रहता है , बहुत कम लोग ऐसे हैं जो मित्रों को ध्यान से पढ़ते हैं शायद इतना समय ही नहीं है अतः अक्सर बेहद उत्कृष्ट ब्लॉग लेखकों को भी, लोग पढ़ने से वंचित रह जाते हैं ! अफ़सोस है कि नवोदित लेखकों को, जो प्रोत्साहन हम सबसे मिलना चाहिए नहीं मिल पाता ! मेरा विचार है कि बड़े लेखकों द्वारा प्रोत्साहन के अभाव एवं विपरीत माहौल में और उत्कृष्ट लिखना चाहिए, मुझे विश्वास है आज नहीं तो कल कलम अपनी पहचान करा देगी ! 

ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे  
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे  ?
हानि लाभ का लेखा लिखते  ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

हमने हाथ में,  नहीं उठायी ,
तख्ती कभी क्लास जाने को !
कभी न बस्ता, बाँधा हमने,
घर से, गुरुकुल को जाने को !
काव्यशिल्प, को फेंक किनारे,मैं आँचल के गीत लिखूंगा !
प्रथम परीक्षा के,पहले दिन,निष्काषित का दर्द लिखूंगा !

शब्द अर्थ ही जान न पाए ,
विद्वानों  का वेश बनाए ! 
क्या भावना समझ पाओगे
धन संचय के लक्ष्य बनाए !
माँ की दवा, को चोरी करते, बच्चे की वेदना लिखूंगा ! 
श्रद्धा तुम पहचान न पाए,एकलव्य की व्यथा लिखूंगा ! 

अंत में सब मित्रों का आभार व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने जब तब मेरे ब्लॉग का ज़िक्र कर मेरा उत्साह वर्धन किया निस्संदेह उनका उपकार है मेरे ऊपर , इसके बिना शायद कलम में वह ताकत नहीं होती जिसके कारण मैं आत्मसंतुष्टि महसूस करता हूँ , मैं अपने मित्रों के इस उत्साह वर्धन को अपना सबसे बड़ा पुरस्कार मानता हूँ  ! 

अपने मित्रों के स्नेह के, आभारी हैं मेरे गीत !!

Wednesday, November 27, 2013

अब न उठेंगे , यह बंजारे , खूंटे पक्के दिखते हैं - सतीश सक्सेना

चेहरे पॉलिश किये घूमते कैसे फिक्के लगते हैं ! 
जब भी ये मैदान में उतरें, सीधे छक्के लगते हैं !

जबसे ताकत मिली है इनको आसमान में रहते हैं 
हमको तो इनकी गाडी के,जमें से चक्के लगते हैं !

वैसे तो पढ़ने वालों को,तालिबान का नाम दिया !
फिर कैसे स्याही के बदले, खूनी थक्के लगते हैं !

काम कराके वारे न्यारे , अनपढ़ खद्दर वालों के 
सिर्फ दलाली में सोने के, ढेरो सिक्के लगते हैं !

पीज़ा बर्गर खाते खाते,देसी आदत बिगड़ गयी !
अब न उठेंगे , यह बंजारे ,  खूंटे पक्के लगते हैं !

Wednesday, November 20, 2013

कैसे जाओगे यहाँ से, लेके प्यार, सजना - सतीश सक्सेना

विवाह पर गीत गाने की परम्परा, हमारे समाज में शुरू से ही है , सजधज कर मांगलिक अवसर पर महिलाओं द्वारा, ढोलक की थाप पर, यह गीत गुनगुनाइए एक बार …दूसरी बार रचना की है किसी विवाह गीत की  अगर आप पसंद करें तो सफल मानूं !
  

कैसे आये हो गली में लेके प्यार सजना ?
कैसे जाओगे यहाँ से, लेके प्यार सजना ?

सजके आये हो हमारे द्वार,खूब सजना !
कैसे जाओगे यहाँ से , ले उधार सजना ! 

फेरे डाले हैं यहाँ पे तुमने सात, सजना !
कैसे जाओगे यहाँ से, लेके हार सजना !

कसमें खायीं हैं,हमारे घर सात सजना   
कैसे दोगे तुम प्यार का, उधार सजना !

गांठें  बाँधी हैं , ननद ने , हमारी सजना !  
कैसे जाआगे छुटाके,पल्लू यार सजना !

खाना मामा ने खिलाया हमें साथ सजना !
कैसे खाओगे अकेले, अबकी बार सजना !

सारे नाचे हो गली में आके,आज सजना ! 
कैसे जाओगे गली से, ऐसे यार सजना !

यह आनंद दायक गीत अर्चना चाओजी की मधुर आवाज में सुने …  

Wednesday, November 13, 2013

तो हम होली दिवाली,माँ से मिलने घर गए होते -सतीश सक्सेना

अगर हम ऐसी वैसी धमकियों से, डर गए होते !
अभी तक दोस्तों के हाथ, कब के मर गए होते !

तेरे जज़्बात की हम को, अगर चिंता नहीं होती ,
तो हम होली दिवाली,माँ से मिलने घर गए होते !

अगर हम वाकई मन में ,यह शैतानी लिए होते !
तुम्हारे दिल  के , अंदेशे भी , पूरे कर गए होते !

अगर हमने भी डर के ऐसे, समझौते किये होते !
तो बरसों की मेरी मेहनत, कबूतर चर गए होते !

अगर हम  दोस्तों में ऐसे , कद्दावर नहीं  होते !
हमारे घर की दीवारें , वे काली कर गए होते !

Tuesday, November 12, 2013

आप भक्त हैं या भांड - सतीश सक्सेना

क्या किसी राजनेता का भक्त कहलाने से आप गर्व महसूस करते हैं ?
- खास तौर पर भारत में , अक्सर राजनेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जाने के बाद, वे चोरी के आरोप में जेल जाते हैं या जायेंगे ! 


-आप लोग किसी बच्चे के पिता और अपने घर के मुखिया हैं , आपकी पीठ पर एक राजनीतिज्ञ का लिखा नाम सबको नज़र आता होगा कि आप इस व्यक्ति के "आदमी" हैं , क्या आपके पीठ पर सिर्फ आपका नाम नहीं होना चाहिए ?


-किसी जमाने में राज दरवार के भांड हुआ करते थे जो अपने राजा की वंदना गाया करते थे क्या हम लोग उसी प्रथा का अनुसरण कर रहे हैं

- मेरा अनुरोध है कि कहें हम किसी के आदमी नहीं हैं , हमारा अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है , शायद यह सुन हमारे बच्चों को शक्तिशाली होने का अहसास होगा क्योंकि वे अपने पिता को दुनिया का सबसे शक्तिशाली आदमी समझते हैं ! किसी अन्य का नाम हमारी पीठ पर लिखा देख, निस्संदेह हमारे बच्चे अपने आपको शर्मिंदा पाएंगे !


-कृपया कहें कि हम किसी के भांड नहीं हैं और न बिकाऊ हैं ! विचारों का सपोर्ट करें मगर व्यक्ति का नहीं ! वह हम जैसा ही है, उसमे वे तमाम ऐब और कमजोरियां हैं जो हम सबमें होती हैं , उसे भगवन बना कर आप ईश्वर का अपमान और अपनी बेवकूफी उजागर कर रहे हैं !

अपने आपको किसी का भक्त न बताएं ! इससे आपके परिवार का स्वाभिमान सुरक्षित रहेगा !


आदर सहित, मात्र विचार करने के लिए अनुरोध !!

Wednesday, November 6, 2013

घुटने तुड़ा तुड़ा के सीखे,सारे सबक जवानी के -सतीश सक्सेना

कितने मीठे से लगते थे,किस्से अपनी नानी के 
राजा रानी ही रहते थे, नायक सदा कहानी के !

किसे बताएं किस्से अपने बचपन की नादानी के
घुटने तुड़ा तुड़ा के सीखे, सारे सबक जवानी के !

कैसे तब हम,हुक्म अदूली, करते थानेदारों की !
सुनाके यारों को हँसते हैं,वे किस्से निगरानी के !

कैसे कैसे काम किये थे, हमने अपने बचपन में
टूटी चूड़ी, फटी चिट्ठियां,टुकड़े बचे निशानी के !

होते आये, युगों युगों से, अत्याचार स्त्रियों पर !
सुने तो हैं ,हमने भी किस्से, देवों की हैवानी के !

रात्रि जागरण,माँ की सेवा से ही,खर्चे चलते है ! 
दारू पीकर,नाच नाचकर,गाते भजन,भवानी के!

कितने नखरे महिलाओं के,अभी झेलने बाकी हैं !
गुस्सा होना,धमकी देना, थोड़े लफ्ज़ गुमानी के !

Tuesday, November 5, 2013

देश को , काट काट कर खाएं , बड़े कमीने बैठे हैं -सतीश सक्सेना

गांधी जी का चित्र लगाए, दल्ले सजके बैठे हैं !
पैग लगा के, देश को खाएं, बड़े कमीने बैठे हैं !

भीड़ के सम्मुख देश की चिंता में नेताजी डूबे हैं     
सोना बरसे राजनीति से , धन्ना  बनके बैठे हैं !

दल्लागिरी, चौथ बसूली,गुंडे सभी सलाम करें , 
जनता साली क्या कर पाए,राजा बनके बैठे हैं !
 
धरती बेचें, जंगल बेंचें, ट्रेन , हवाई अड्डे, बेचें !
भारत माता की जय बोलें, नोट कमाने बैठे हैं ! 

देश के काले धंधों ऊपर इनकी कृपा जरूरी है 
लक्ष्मी के संग नाच रहे , ता थैया करते बैठे हैं !

Saturday, November 2, 2013

अपने अपने उल्लू ले , महिलायें बाहर निकलीं हैं -सतीश सक्सेना

देखो आज निठल्लू ले,महिलायें बाहर निकली हैं !
दीवाली में  लल्लू ले,महिलायें  बाहर निकली हैं !

आज खरींदे, सोना चांदी,धन की वारिश होनी है !
अपने अपने उल्लू ले , महिलायें बाहर निकलीं हैं !


पूंछ हिलाते देख इन्ही को , कुत्ते बस्ती छोड़ गए !
कैसे कैसे  पिल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !

कितने लोग आज भी ऐसे , जो  बंधने को बैठे हैं !
बड़े मनोहर पल्लू ले , महिलायें बाहर निकली हैं !


जीवन इनका राजनीति में, पूंछ हिलाते बीता है ! 
गोरे रंग का कल्लू ले,महिलायें बाहर निकली हैं !

Friday, November 1, 2013

क्या आप फिरदौस खान को जानते हैं - सतीश सक्सेना

यह फिरदौस खान हैं , भारत की लाड़ली बेटी ! ईश्वर उनकी सी हिम्मत, देश की हर लड़की को दे , दीपावली मुबारक हो Firdaus Khan !
अपनी ही तस्वीर पर बिंदी लगाने के ऐतराज़ पर उनका जवाब और कुछ अन्य कमेंट पढ़ें . .

" हमें बिंदी बहुत पसंद है... आप भी सभी मज़हबों को अपनाकर देखिए... यक़ीनन आपको बहुत अच्छा लगेगा... हम किसी विशेष मज़हब को नहीं मानते... हमारे लिए सभी मज़हब बराबर हैं... हमें जितना सुकून किसी मज़ार पर चिराग़ रौशन करके और अगरबत्तियां जलाकर मिलता है, उतना ही सुकून गिरजाघर में मोमबत्ती जलाकर और मंदिर में देवता को फूल चढ़ाकर मिलता है... "

"हम मन से ईसाई, संस्कृति से हिंदू और जन्म से मुसलमान हैं... ऐसा कहा जा सकता है..."

"समझ में नहीं आता... ’जिन लोगों’ को हिंदुओं और हिंदू संस्कृति से इतनी परेशानी है , तो वे हिंदुस्तान छोड़कर चले क्यों नहीं जाते... "

" कट्टरपंथी सिर्फ़ मौत की बात करते हैं... इसलिए दुनिया भर में मौत ही बांट रहे हैं... ये लोग ’जिओ और जीने दो’ में यक़ीन नहीं करते... इसलिए इनसे ऐसी उम्मीद करना ही बेकार है..."

फिरदौस खान की बहादुरी को सलाम !!

Wednesday, October 30, 2013

अवहेलना जरूरी है ! - सतीश सक्सेना

मानव रूपी, कुत्तों से
रात में जगे,भेड़ियों से
राजनीति के दल्लों से 
खादी की, पोशाकों से
बदन के भूखे मालिक से, सम्पादकी तराजू से !
अब संघर्ष जरूरी है !

साधू बने , डकैतों को
नफरत के हरकारों को
बेसिर की अफवाहों को
धर्म के ठेकेदारों को !
नक़ल मारते लड़कों को, जमाखोर गद्दारों को !
थप्पड़ एक जरूरी है !

इन भूखे मज़दूरों को 
नंगे पैर किसानो को 
चाय बेचने वालों को 
बिना सहारे वृद्धों को 
शिक्षक और स्कूलों को, घर की अनपढ़ माँओं को,
राहत बहुत जरूरी है!

वधूपक्ष को धमकी की 
धन अर्पण के रस्मों की
रिश्तेदार, लिफाफों की
बेमन जाती , भेंटों की
रिश्तों से उम्मीदों की , झूठे प्यार दिखावे की !
अवहेलना जरूरी है !

चिकने चुपड़े, चेहरों से
नफरत वाले , नारों से 
वीआईपी मक्कारों से
कृपा रूप , सम्मानों से 
बिके मीडिया वालों से, नेताओं  के वादों से !
प्रबल विरोध जरूरी है !

चोरी करती तोंदों को
नेताओं के धन्धों को ,
देश बेचते, दल्लों को 
घर के रिश्वतखोरों को 
पुलिस में बेईमानों को, संसद के गद्दारों को !
सीधी जेल जरूरी है !

Tuesday, October 29, 2013

जिसको लेखक समझा हमने,यह केवल हरकारा है - सतीश सक्सेना

कितने पुरस्कार सर धुनते,ज्ञान ध्यान से मारा है ,
हिंदी के गुरुघंटालों ने , आँगन खूब बुहारा है !

कर्णधार हिंदी के बन कर, मस्ती सुरा, सुंदरी में,
भावभंगिमा और आँखों से चलता साहूकारा है !

विद्वानों का रूप देखकर,हमको ऐसा लगता है !
जिसको ज्ञानी हमने माना वो केवल हरकारा है !

पहली बार मिले हैं तुमसे,ज़रा सांस तो लेने दो ! 
जल्दी ज्ञान कहाँ समझेंगे, आदत से बंजारा हैं !

धीरे धीरे समझ सकेंगे, इंसानों की फितरत को !
हमने सारा जीवन अपना,पशुओं साथ गुज़ारा है!

Saturday, October 26, 2013

काले घने, अँधेरे घेरें , धीरे धीरे अम्मा को - सतीश सक्सेना

जिन प्यारों की, ठंडी छाया 
में तुम पल कर बड़े हुए हो ! 
जिस आँचल में रहे सुरक्षित 
जग के सम्मुख खड़े हुए हो !
बढ़ती उम्र, बिमारी भारी 
लेकिन तुम तो बड़े हुए हो 
उस ममता को छोड़ा कैसे,
कब से  भूले, अम्मा को ! 
घर न भूले, खेत न भूले , केवल भूले, अम्मा को !

उस सीने पर थपकी पाकर 
तुम्हे नींद आ जाती  थी !
उस ऊँगली को पकडे कैसे  
चाल बदल सी, जाती थी !
तुम्हें उठाने, वे पढ़ने को 
कितनी रातें जागती  थींं , 
वो ताक़त कमज़ोर दिनों में,
धोखा देती , अम्मा को !
काले  घने , अँधेरे  घेरें ,  धीरे - धीरे  , अम्मा को ! 

जिस सुंदर चेहरे को पाकर
रोते रोते  चुप हो जाते !
अगर दिखे न कुछ देरी को
रो रो कर,पागल हो जाते !
जिस कंधे पर सर को रखकर  
तुम अपने को रक्षित पाते !
आज वे कंधे बीमारी से , 
दर्द दे रहे , अम्मा को !
इकलापन ही, खाए जाता, धीरे धीरे अम्मा को !

वही पुराना , आश्रय  तेरा ,
आज बहुत बीमार हुआ है !
जिसने तुमको पाला पोसा 
आज बहुत लाचार हुआ है !
जब जब चोट लगी थी तुमको  
माँ ने ही पट्टी करवाई !
रातें बीतें  करवट बदले , 
नींद न आये अम्मा को !
कौन सहारा देगा इनको, नज़र न आये अम्मा को !

कितने अरमानों से उसने
भैया तेरा व्याह रचाया !  
कितनी आशाओं से उसने 
अपना बेटा,बड़ा बनाया !
धुंधली आँखों रोते रोते
सन्नाटे में घुलती रहती !
कैसा शाप मिला था भैया,
तेरे जन्म से , अम्मा को !
व्याह रचाकर , कुछ बरसों में , भूले केवल अम्मा को !


Friday, October 25, 2013

तुम माँ बन मुझे सुलाओ, तो सो सकता हूँ - सतीश सक्सेना

मैं चाहूँ भी , सिद्धार्थ नहीं बन सकता हूँ 
राहुल यशोधरा को कैसे खो सकता हूँ !

जग जाने कब से गीत,युद्ध के  गाता है
क्या गीतों से विद्वेष रोज धो सकता हूँ !

यूँ आसानी से, हमको भुला न पाओगे !
आशाओं के मधुगीत रोज बो सकता हूँ !

जी करता आग लगा दूँ,निष्ठुर दुनियां में 
माँ आकर मुझे मनाये, तो रो सकता हूँ !

बरसों से नींद न आयी  मुझको रातों में ,
कोई आकर लोरी गाये,तो सो सकता हूँ !

Thursday, October 24, 2013

दिन में कसमें यारी की -सतीश सक्सेना

रात में जमकर धोखा देते,दिन में कसमें यारी की !
साकी और शराब रोज़ हो , रस्में चारदीवारी की !

अक्सर बासिन्दे शहरों के, असमंजस में दिखते हैं !      
अभिलाषाएं,धुएं में जीवित,चिंता है बीमारी की !

जब भी लगती आग,धमाका नहीं सुनाई पड़ता है !
ऎसी कौन सी ताकत होती,छोटी सी चिंगारी की !  

पता नहीं,ये शख्श भरोसे लायक,मुझे न लगता है !
मीठी मीठी , बातें करता , पर आँखें अय्यारी की ! 

इस बस्ती में लोग हमेशा , लगा मुखौटे रहते हैं ,
सूरत से धनवान दीखते, सीरत वही भिखारी की !

Tuesday, October 22, 2013

करवाचौथ पर भूखे प्यासे,कैसा लोकाचार किया - सतीश सक्सेना

जीवन भर तपते मरुथल को, नंगे पैरों पार किया !
रंजिश अपने द्वारे पाकर,उसका भी सत्कार किया !

क्या देखोगे ज़ख्म हमारे, कहाँ कहाँ पर चोट लगी !
जैसा मौका जिसने पाया , उसने वैसा वार किया !

पशुपक्षी और असहायों को गले लगाके जीवन में   
हमने सारे नियम तोड़कर,कैसे वर्जित प्यार किया !

लोग यहाँ पर,जुआ खेलकर,लक्ष्मी पूजा करते हैं !  
आधे जीवन  रहे  मुसद्दी, आधे  हाहाकार किया !

पूरे जीवन रो कर हंस कर , जैसे तैसे काट लिया,
करवाचौथ पर भूखेप्यासे, कैसे लोकाचार किया !

Saturday, October 19, 2013

कितने भेद छिपाए बैठा, एक दुपट्टा, औरत का - सतीश सक्सेना

आओ खेलें, खेल देश में , लालच और जरूरत का !
जो जीतेगा वही करेगा, देश में शासन नफ़रत का !


भ्रष्टाचार ख़तम करने का , हल्ला गुल्ला  हैरत का ! 
जनता साली क्या जानेगी,किला जीतना भारत का !

टेलीविज़न पर नेताओं को, काले धन की चिंता है !
चोरों से सत्ता हथियानी, लक्ष्य पुराना हज़रत का !

ऐसा लगता बदन रंगाये,बिल्ला जमीं पर उतरा है !
यह तो वही पुराना डब्बा, लगे चुनावी कसरत का !

तरस, दया, हमदर्दी खाकर ,हाथ फेरना बुड्ढों का ! 
यह तो  वही पुराना फंडा,उस्तादों की फितरत का !

पढ़े लिखे क्या समझ सकेंगे,मक्कारों की बस्ती में !
कितने भेद छिपाए बैठा , एक  दुपट्टा, औरत का !



Friday, October 18, 2013

हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है -सतीश सक्सेना

हमेशा ही अभावों में सभी ने व्यस्त पाया है ! 
मुसीबत में सदा सबने हमें आश्वस्त पाया है !

हमें कुछ भी नहीं उम्मीद, ऐसे वक्त में तुमसे  !
ज़रुरत में, हमेशा ही तुम्हें, ऋणग्रस्त पाया है !


जरा सी चोट में कैसे ये आंसू छलछला उठे 
हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है !

अभी तो कोशिशें करते हैं, सबसे दूर रहने की !
भरोसा ही सदा हमने,यहाँ क्षतिग्रस्त पाया है !


मुफलिसी में भी,मेरे द्वार से खाली न जाओगे
हमें लोगों ने खस्ता हाल में विश्वस्त पाया है !

Wednesday, October 16, 2013

खतरनाक काँटों का, ध्यान रहे बेटा - सतीश सक्सेना


16 अक्टूबर  पर :

कभी, अपना भी कुछ ,ख़याल रहे बेटा !

तुम्ही से  खुशी है   
तुम्ही से है  आशा !
तुम्ही से तो चेहरे   
पे रौनक, हमेशा  !
कठिन  हो समय 
तो न घबराना बेटा !
न अपमान औरों का, हो तुमसे बेटा !

तुम्ही प्यार का
दूसरा नाम हो !
अपने नन्हे घरौंदे
की तुम जान हो !
ख़याल अपना,मेरे 
लिए रखना बेटा !  
समय कम बड़ों पर, न  सो जाना बेटा !

तुम्ही मेरे जीवन 
की  पहचान हो !
तुम्हीं मेरे पुण्यों 
का परिणाम हो ! 
मेरे जीवन के मूल्यों 
का हो ध्यान बेटा !
खतरनाक  काँटों  से , सावधान  बेटा !

तुम्ही मेरे मंदिर 
के इकले कन्हैया 
तुम्हीं नाव के अब 
बनोगे खिवैय्या !
अगर गहरे जाओ,
तो ध्यान रहे बेटा  !
पापा के गौरव का,  ख्याल  रहे  बेटा !

Tuesday, October 15, 2013

मुझसे मिलने सकुचाता सा , बच्चा इक प्यारा आया था -सतीश सक्सेना

                 आज मेरे दूसरे बेटे ( दामाद ) इशान का जन्मदिन है, यह और गरिमा दोनों ही एक मशहूर अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं , बेहद हंसमुख इशान,जब से मेरे परिवार में शामिल हुए हैं , घर की रौनक में चार चाँद लग गए हैं !  

मेरे  परिवार के अम्बर में , ईशान सा  तारा कौन हुआ ,
मेरी लाड़ली जिसको प्यार करे,ऐसा बंजारा कौन हुआ ?

जिसके आने से महफ़िल में,चेहरों पर रौनक आ जाए ,
रिमझिम सी,आवाजों वाला,ये नीर फुहारा कौन हुआ ?

जो अपनी चिंता भुला,सभी को खूब हंसाये खुश होकर !
लोगों को हंसना सिखलाये,ईशान से प्यारा कौन हुआ !

मुझसे मिलने,संकोच लिये,बच्चा इक प्यारा आया था !

लगता सदियों से जान रहे, इस तरह हमारा कौन हुआ !

इस मीठे स्वर के जादू ने, तकलीफ मिटाई गलियों से !
जो अपने कष्ट कभी न कहे, इस तरह सहारा कौन हुआ !
 

Monday, October 14, 2013

शायद तुमसे पहले जग में सूरज नहीं उगा करता था - सतीश सक्सेना


कितनी बार,करवटें लेकर, सारी  रात जगा करता था !
जो विश्वस्त रहा था अपना अक्सर वही दगा करता था !

हम तो यहाँ ठहर जायेंगे , मगर बुआ यह कहतीं थीं !
जो सराय महफूज़ सी होती,राही वहीँ ठगा करता था !

पता है बरसों से दुनिया को, तुम्ही अकेले खींच रहे थे ! 
शायद तुमसे पहले जग में, सूरज नहीं उगा करता था !

वे भी क्या रिश्ते थे मन के,सारी दुनियां फीकी लगती !  
सारी रात जगाये मुझको,मन को कौन रंगा  करता था !

लगता जैसे अब यह बस्ती, रहने लायक नहीं रही है !
कितने बुरे बुरे  दिन देखे , ऐसा नहीं लगा करता था !

( यह रचना दैनिक जनवाणी के २० अक्टूबर २०१३ के रविवारीय परिशिष्ट में , गुनगुनाहट कालम में छपी है , यह सूचना डॉ मोनिका शर्मा ने दी है , उनका आभार ! )  

Thursday, October 10, 2013

जब से तालिबान जन्में हैं, विश्व में नफरत आई है - सतीश सक्सेना

तालिबानियों ने,गैरों से द्वेष की फितरत पायी है !
जहाँ गए ये,उठा किताबें, वहीँ हिकारत पायी है !

हैरत में हैं लोग,  इन्होने नफरत  , खूब उगायी है !
इनकी संगति में नन्हों ने ,खूब  अदावत पायी है !

लगता पिछली रात , चाँद ने , अंगारे बरसाए थे !
इस ठहरे पानी में हमने , आज  हरारत  पायी है ! 

हवा,नदी,मिटटी की खुशबू,भी ये बाँट के खायेंगे !  
इन्होने माँ के टुकड़े करने की भी शोहरत पायी है !

घर के आँगन में,बबूल के वृक्ष को,रोज़ सींचते हैं !
इन्हें देखकर , बच्चे सहमें , ऎसी  सूरत  पायी है  !

Wednesday, October 9, 2013

दुरवाणी ही याद रहेगी यूँ आखिर -सतीश सक्सेना

"Excuse me aunty . . ." 
झूठ मूठ नाम रख लिया वाणी , दुर्वाणी हुई जा रही हो "  
यह शब्द हैं वाणी जी की लड़कियों श्रेया और श्रुति के और बोले हैं अपनी माँ से. . . .  

मैंने आज इस नोक झोंक का काफी देर आनंद लिया , और कुछ पंक्तियाँ लिख गयीं माँ और बेटियों पर , वे वाकई खुश किस्मत हैं कि उन्हें दो दो पुत्रियाँ मिलीं और वह भी लड़ाका :)
माँ बेटियों में यह स्नेहिल नोक झोंक चलती रहे , मंगलकामनाएं इस प्यारे परिवार को !

इक दिन ये घर को छोड़ जायेगी ही आखिर !

कितने दिन अम्मा पास रखेगी , यूँ अाखिर !

ये बच्चों सी , शैतानी भी,  खो जायेगी ! 
ये रूठी रूठी कब तक रहेंगी, यूँ आखिर !

इकदिन जब,इसकी डोली, इसको ढूँढेगी
ये लाड़ली अपनी कहाँ रुकेगी, यूँ आखिर !

ये आँखें, इनको यहाँ वहां, जब ढूँढेंगीं !
फिर केवल हिचकी याद करेगी यूँ आखिर !

ये प्यार बेटियों का, किसका हो पाया है , 
ये एक जगह फिर,कहाँ मिलेंगीं यूँ आखिर !

माँ की वाणी, तब याद बहुत ही आयेगी !
तब दुर्वाणी भी भली लगेगी यूँ आखिर !

हर बेटी को बस विदा एक दिन होना है,
ये सारा जीवन मस्त जियेगी यूँ आखिर ! 

Monday, October 7, 2013

राजा हैं वे, औ हम है प्रजा , वे और बढ़ावा क्या देते - सतीश सक्सेना

अच्छा है दिखावे ख़त्म हुए,ये भूत कलावा क्या देते !
मंदिर में घुसने योग्य नहीं, ये लोग चढावा क्या देते ! 

आते, जाते,बातें करके, कुछ उखड़ा मन बहलाये थे !

वे अपने चेहरे दिखा गए,औ इसके अलावा क्या देते !

उसदिन तो हमारी तरफ देख ,वे हौले से मुस्काये थे !
राजा हैं वे,औ हम है प्रजा, वे और बढ़ावा क्या देते !

उस दिन देवों ने , उत्सव में, नर नारी भी बुलवाए थे ! 
बादल गरजे,बिजली चमकी,वे और बुलावा क्या देते !

रुद्राभिषेक करने हम तो, परिवार सहित जा पंहुचे थे  !
भक्ति के बदले मुक्ति मिली,वे और छलावा क्या देते !


Saturday, October 5, 2013

आखिर कुछ तो बात रही है, कंगूरों मीनारों में - सतीश सक्सेना

इतने  भी बदनाम नहीं हैं , गिनती हो आवारों में !
तुम लाखों में एक,तो हम भी जाते गिने,हजारों में!

माना तुम हो ख़ास,बनाया बैठ के,रब ने फुर्सत में !
हम भी ऐसे आम नहीं जो, बिकते हों बाजारों में !

यूँ  ही  नहीं, हज़ारों बरसों से , ये मेले लगते हैं !
आखिर कुछ तो बात रही है , कंगूरों मीनारों में !

जनता का विश्वास जीतने , पाखंडी घर आये हैं ! 
नेताओं  के मक्कारी , की चर्चा है ,अखबारों में !

यूँ ही राधा नहीं, किसी की धुन में,डूबी रहतीं थीं ! 
कुछ तो ख़ास बुलावा होगा,मोहन की मुस्कानों में !

भीड़ का हिस्सा हैं हम - सतीश सक्सेना

              अफ़सोस है कि मीडिया प्रचार तंत्र का रंग हमारे दिलोदिमाग पर इस कदर हावी हो रही है कि वे संवेदनशील  बुद्धिजीवियों से भी, अपने शब्द बुलवाने में, समर्थ होते दिख रहे हैं ! हमें वास्तविक एवं गंभीर मूल्यांकन करना चाहिए अन्यथा नेता और दूसरों को देख बने, नेता में कोई फर्क नहीं रह जाएगा !
              आज इस देश में, हर फैसले को तुरंत भ्रष्टाचार के चश्मा से देखने का प्रयत्न किया जा रहा है , मिडिया प्रचार तंत्र का इतना खौफ है कि मिडिया में उपलब्द्ध विद्वान् लोग भी, अपने आपको,मीडिया के इस तेज बहाव से निकालने में असमर्थ  पा रहे हैं ! फायदा उठाने में माहिर, मगर दूसरों की नज़र में ईमानदार, हम सब लोग, अपनी अपनी तरह से भ्रष्टाचार , पर प्रहार कर रहे हैं !

               ईमानदार अधिकारी जो पहले से अल्प संख्यक थे ,भयभीत हैं और जनहित में त्वरित फैसले लेने की हिम्मत नहीं कर रहे हैं और जो भ्रष्ट थे उनपर इसका कोई असर नहीं पड़ा है उल्टा वे ईमानदारी की मज़ाक और बना रहे हैं !


               इसी अधकचरी बुद्धि के होते, विश्व का सिरमौर बनने के लायक और सफल कोशिश करते देश की विश्व में स्थिति, आकंठ चोरो के देश में परिवर्तित हो गयी है और हम सब तालियाँ  बजा रहे हैं ! पिछले तीन वर्ष में ही ब्राजील ,रूस ,इंडिया और चाइना में हम सबसे पीछे हो चुके हैं !

                अब इंजीनियरों और डाक्टरों की कोई तारीफ़ नहीं करता, सब को चोर बताया जाता है ! सफल और शानदार कामनवेल्थ खेलों के बाद भी देश में शायद ही कोई खेल निकट भविष्य में हो पायें और शायद ही कोई अधिकारी देश हित में तेजी से काम कराने लायक साहस जुटा पायेगा ! 

                चोरों को सजा जरूर मिलनी चाहिए मगर ईमानदार लोग भी डर जाएँ ऐसा माहौल बनाना सही नहीं ! बाज़ीगरों के सामने भीड़ हमेशा तालियाँ  बजाती है !

हो सकें तो  भीड़ का हिस्सा न बनें ...


Friday, October 4, 2013

हम गुलाम लीक के -सतीश सक्सेना

             विश्व में सर्वाधिक निरक्षर, मूर्ख क्षेत्र में रहते हम लोग, परस्पर रंजिश और असहिष्णुता के कारण, इंसानों पर ही हमले करने की प्रवृत्ति बढती जा रही है और ऐसा करके हम जानवरों की तरह,अपनी शक्तिशाली होने का गर्व, कर लेते हैं ! कंक्रीट के जंगल में रहते, हम असभ्य लोग, धार्मिक किताबों में लिखे आचरणों का अनुकरण कर, अपने बचे हुए ३० -४० वर्ष के जीवन को धन्य मान लेते हैं !           आदिम समाज में अधिकतर दो तरह के लोग रहते थे,एक जो अपने आपको गुरु मानते था तथा इस     जाति पर शासन करने की समझ बूझ रखते थे , उन्होंने सेवकों और अपने अनुयायियों को समझाने के लिए धार्मिक  किताबे और परमात्मा की तरफ से,मनमोहक आदेशों की रचना की, जिनके अनुसार मरने के बाद काल्पनिक स्वर्ग के सुख साधन ,और इस जीवन में आचरण के,तौर तरीके बताये गए !
              दूसरे जो समझने और सीखने योग्य पाए गए, वे अपने गुरु के अनुयायी कहलाये , और समाज में शिष्य और सांस्कारिक माने गए ये लोग, अक्सर गुरु के समक्ष, भीड़ स्वरुप खड़े रहकर, शिक्षा और दीक्षा लेकर अपने को सौभाग्यवान मानते रहे हैं ! नमन,चरनामृत ,दंडवत प्रणाम , मंत्र , दीक्षा और गुरु की बातें याद रखना ही उनके जीवन का प्रथम कर्तव्य होता है ! इन धर्म गुरुओं ने मानव जीवन में कुछ भी व्यक्तिगत नहीं छोड़ा हर जगह पर जाकर, अपने आपको योग्य सिद्ध करते हुए, अनुपालन हेतु आदेश लिख छोड़े !
               इन तौर तरीकों में ,एक आदेश  हर पंथ में स्पष्ट है कि धर्म गुरुओं का आदर अवश्य हो उन्हें राजा से भी बड़ा समझा जाए ! और इन हिदायतों को मानने वालों को, संसार में अच्छा आदमी और न मानने वालों को बुरा आदमी घोषित कर दिया गया यहाँ तक कि  जो इन आदेशों की वैधता को चुनौती देगा उसे समाज से बाहर कर दिया जाये अथवा उसकी जान ले ली जाये !
                स्वाभाविक है, कतार बनाकर इन्हें सुनने वालों के लिए,यह सम्मोहक व्यक्तित्व वाले लोग , सर्वोच्च हो गए और निस्संदेह उस आदिम समाज में यह धार्मिक गुरु ,सामने बैठे और साथ साथ निवास करते मूर्खों में, सबसे अधिक विद्वान् थे !   
                सेवकों ने आदेश मानना सीख लिया , गुरुओं का प्रभाव उनके घर में सबसे अधिक था , माता पिता भी अपने बच्चों को, सबसे पहली शिक्षा, इन आदेशों को सम्मान देने की देते थे ! नतीजा जवान होने से लेकर बुढापे तक हम आपसी प्यार से पहले धार्मिक प्यार का सम्मान करना सीख गए !
                 आज माता पिता  का अपमान वर्दाश्त है मगर धार्मिक शिक्षा का अपमान वर्दाश्त नहीं , खून खौल उठता है, इन सदियों पुराने गुलामों का,और इस गुलामी के आगे अपने खूबसूरत परिवार की बलि भी देने में नहीं झिझकते ! 
                 आश्चर्य की बात यह है कि इस खून खराबे में,नफरत भड़काने वाले, एक भी नेता का बाल बांका नहीं होता एक भी  धार्मिक गुरु पर आंच नहीं आती ,मरते हैं तो बेचारे हम गुलाम और हमारे मासूम बच्चे !!

Wednesday, October 2, 2013

हमें पता है,स्वर्ग के दावे,कितने कच्चे दुनियां में -सतीश सक्सेना

मेरे गीत पर सुमन पाटिल का एक कमेन्ट :
"शायद पूरी दुनिया में एक हमारा ही देश होगा जहाँ हजारों साल से एक ही धंधा चलता है बाबाओं का प्रवचन देना और लोगों का सुनना, सबसे ज्यादा सुनने वालों में महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है और महिलाओं को ही इन बाबाओं ने निन्दित किया है पता नहीं कैसे सुन लेती होंगी . . . ."


अगर आप भारत के गाँव / कस्बों से जुड़े हैं तो ऐसे प्रवचन आम हैं , और उन्हें सुनने के लिए दूर दूर से , लोग परिवारों के साथ पंहुचते हैं ! साधू संतो के प्रति यह श्रद्धा , भारतीय समाज का अभिन्न अंग है , जिसके फलस्वरूप दुखी और समस्याओं से घिरे लोग , इन संतों से मिलकर अपने आपको धन्य मानते हुए राहत महसूस करते थे !
आज सच्चे संतों की जगह , उन अनपढ़ों ने ले ली है जो पढने लिखने में फिसड्डी रह गए , पैसों के अभाव और मातापिता व् समाज से प्रताड़ित ऐसे लोग , बाबा न बनें तो और कहाँ जाएँ !

डंडा कमंडल उठाकर किसी गाँव में पंहुचने पर भोजन, दान, सम्मान की कोई कमी नहीं , जब तक चाहें रुकें, अगर कहीं अधिक पढ़े लिखे लोगों के मध्य भेद खुलने का भय हो तो मौन व्रत धारण करें बाबा , और अगर अनपढ़ों के मध्य हों तो खूब प्रवचन और कष्ट निवारण ! रोज शाम के भोजन में शुद्ध घी , आलू , दूध और पूड़ियाँ उपलब्द्ध रहतीं हैं अलग अलग भक्तों के घर ..शराब पीने की इच्छा हो तो भैरव भैरवी आवाहन, शमशान साधना और पता नहीं क्या क्या . . . बाबाओं ने शिष्यों से भरपूर फायदा उठाने के लिए,सब कुछ किताबों में लिख रखा है !

भोली जनता इज्ज़त देती
वेश देख , सन्यासी को !
घर में लाकर उन्हें सुलाए
भोजन दे , बनवासी को !
अलख निरंजन गायें, डोलें,मुफ्त की खाएं डाकू लोग !
इन बाबाओं को, घर लाकर ,पैर दबाएँ , सीधे लोग !

कब आएगी समझ, देश को . . . ?

Tuesday, October 1, 2013

प्यार न कोई बंदिश माने, कितने हैं आजाद कबूतर -सतीश सक्सेना

छत पर मुझे अकेला पाकर, करते कुछ संवाद कबूतर !
अक्सर गुडिया को तलाशते,करते उसको याद कबूतर !

हमें धर्म की परिभाषाएं,गुटुर गुटुर कर सिखला जाते !  
मंदिर मस्जिद रोज़ पंहुचते,करते नहीं ज़िहाद कबूतर !

कुल के मुखिया के कहने पर,आते,खाते,उड़ जाते हैं ! 
सामूहिक परिवार में कैसे ,करते अनहद नाद कबूतर !

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में, बिना डरे ही घुस जाते हैं  !
उलटे सीधे नियम न मानें , कितने हैं आजाद कबूतर !

खुद भी खाते साथ और कुछ बच्चों को ले जाते हैं ! 
परिवारों में, वचनवद्धता की, रखते बुनियाद कबूतर !

Sunday, September 29, 2013

कुछ खस्ता सेर हमारे भी - सतीश सक्सेना

अनुराग शर्मा को समर्पित :

खस्ता शेरों को देख उठे, कुछ सोते शेर हमारे भी ! 
सुनने वालों तक पंहुचेंगे, कुछ देसी बेर हमारे भी !

भूखी डरपोक भीड़ कैसे, जानेगी वोट की ताकत को   
इस देश के दर्द में खड़े हुए,कुछ घायल शेर हमारे भी !

जैसे तैसे जनता आई ,कितना धीरज रख पायेगी ! 
कल रात से , अंडे सड़े हुए ले , बैठे  शेर  हमारे भी !

प्रतिभा लक्ष्मी का साथ नहीं बेईमानों की नगरी में ! 
बाबा-गुंडों में  स्पर्धा , घर में हों , कुबेर हमारे भी !

जाने क्यों वेद लिखे हमने,हँसते हैं अब,अपने ऊपर !
भैंसे भी, कहाँ से समझेंगे, यह गोबर ढेर, हमारे भी !

चोट्टे बेईमान यहाँ आकर,बाबा बन धन को लूट रहे ! 
जनता को समझाते हांफे, पुख्ता शमशेर हमारे भी !

फिर भी कुछ ढेले फेंक रहे ,शायद ये नींदें खुल जाएँ ! 
पंहुचेंगे कहीं तक तो प्यारे,ये कपोत दिलेर,हमारे भी !

Friday, September 27, 2013

पंचों से फैसला करा के ,मम्मी पापा बाँट लिए -सतीश सक्सेना

बरसों से झगडा अापस में,अाधा अाधा बाँट लिए !
पंचों से फैसला करा के , मम्मी पापा बाँट लिए !

अम्मा के जेवर तो पहले से ही, गिरवी रक्खे थे !
स्वर्ण फूल दोनों बहनों ने,चुप्पा चुप्पा बाँट लिए !  

एक बार आँखें खोलें तो , हस्ताक्षर करवाना है  !
दादाजी के पूरे जीवन का , अपनापा बाँट लिए !

सब चिंतित थे उनके हिस्से में जाने क्या आयेगा 
अम्मा के मैके से आये,गणपति बप्पा बाँट लिए !

आधे दरवाजे से घुसने, दो फुट जगह ही बाकी है ! 
नज़र बचाने को दादी के हाथ के,थापा बाँट लिए !

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