Friday, June 14, 2013

कसम अल्लाह की उस रोज़ ग़ज़ल बनती है -सतीश सक्सेना

अगर बरसात जाड़ों में ,तो हज़ल बनती है !
गर्म लपटों पे बरसती, तो ग़ज़ल बनती है !

अगर यह, गुन गुनायी जाए , तेरे होठो से !
तभी पूजा पे,चढाने को ग़ज़ल बनती है !

अगर गैरों के लिए,आँख से,आंसू छलकें !
किसी पे मेहरबान हो तो ग़ज़ल बनती है !

अगर क़दमों पे कदम,रख के चल सकें साथी
तुम अगर हाथ पकड़ लो तो ग़ज़ल बनती है !

अगर भूखा मुझे पाकर,न तुमको नींद आये !
हाथ से जब खिला जाओ,तो ग़ज़ल बनती है !

39 comments:

  1. मैंने ,कलियों के हाथ , रात में चाक़ू देखा !
    दोनों हंसके,गले मिलतीं,तो ग़ज़ल बनती है !

    अच्छी रचना है
    बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  2. क्रोध में आके, अरुणिमा पड़ी मद्धम यारो
    कोई सूरज को,मना ले,तो ग़ज़ल बनती है !

    अपने नन्हे के बसेरे, को खुद, जला डाला !
    कोई बरसात करा दे, तो ग़ज़ल बनती है !

    गजल का एक एक शेर चुनिंदा मोतियों जैसा है. पूरी गजल आपके कथ्य को भावनात्मकता के साथ अपने दर्द को बयान करने में सक्षम है, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    ReplyDelete
  3. आपने आज के बच्चों का दर्द बखूबी बयान किया है. मां बाप को समझना चाहिये कि आज के बच्चे उनके समय के बच्चे नही हैं.

    हमारे समय में बच्चे 6/7 साल की उम्र तक बेधडक नंगे घूमा करते थे, आज के 2/3 साल के बच्चे भी ऐसा नही करते, इसका कारण यह है कि आज के बच्चों की समझ जल्दी बडी होती है, आज डेढ दो साल के बच्चों को स्कूल भेज दिया जाता है, तो उसी अनुपात में उनकी समझ जल्दी विकसित होती है. इतने छोटे बच्चों को स्कूल भिजवाने वाले पालक यह क्यूं भूल जाते हैं कि बच्चे को यह बोझ पालकों द्वारा ही लादा गया है. आज के माहोल में बच्चों के फ़ैसलों का सम्मान किया जाकर उन्हें जरूरत लगे तो सलाह दी जाना चाहिये. जबरन की दखल उनकी जिंदगी में कांटे ही बोयेगी.

    इस संदर्भ में आपकी गजल का यह शेर बडा सटीक लगता है:-

    अगर भूखा मुझे पाकर, न तुमको नींद आये !
    हाथ से जब खिला जाओ, तो ग़ज़ल बनती है !

    आज अक्सर हर तरफ़ ही यह समस्या है जिस पर बहुत ही शानदार कलम चलाई है आपने सतीश भाई. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    ReplyDelete
  4. aapke geeton me jiwan ka sandesh hota hai... kabeer kee tarah...

    ReplyDelete
  5. जीवन अर्थ समझाती ग़ज़ल ...बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  6. अगर गैरों के लिए, आँख से , आंसू छलकें !
    कसम अल्लाह की,उस रोज़ ग़ज़ल बनती है !
    ये समझ आज के बड़ों में आ जाये
    उनकी आँखों में प्यार छा जाये
    उनको बच्चों के मन समझ आयें
    वास्तव में ये ग़ज़ल बनती है .
    बहुत सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति . आभार . सब पाखंड घोर पाखंड मात्र पाखंड
    आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN क्या क़र्ज़ अदा कर पाओगे?

    ReplyDelete
  7. बेहतरीन, जब तक भाव नम न हों, शब्द कहाँ पिघलते हैं?

    ReplyDelete
  8. @घर के बड़ों द्वारा, बच्चों के जीवन में, हर समय नज़र रखना और उनको अपने फैसले न करने देना ,
    आपकी इस बात से अभी कुछ दिन पहले घटी एक दर्दनाक घटना याद आ रही है !
    अगर बात अनपढ़ों की हो तो समझ आती है पर पढ़े लिखे लोग भी अपने बच्चों को
    समझ नहीं पाते तब बड़ा दुःख होता है ! खाने पीने पहनने तक छुट तो दे दी है लेकिन
    शादी जैसा महत्वपूर्ण फेसला आज भी अभिभावकों के हाथ में है चाहे बच्चा विदेश में ही
    क्यों न पढ़कर आया हुआ हो ! हमारे एक वकील मित्र है उन्होंने अपने एकुलते एक बच्चे
    को अपने ही पसंद की लड़की से शादी करने से इस प्रकार जोर डाला की बच्चे ने ख़ुदकुशी कर ली ! आज वे वकील साहब बिलकुल विक्षिप्त से हो गए है जिंदगी में बिलकुल अकेले !न जानी ऐसी कितनी सारी घटनाएँ है हमें विचलित कर देती है ! आज बच्चे समझदार हो रहे है कुछ फैसले उन्हें भी करने का अधिकार होना चाहिए आखिर जिंदगी उनकी है !

    ReplyDelete
  9. अगर यह, गुनगुनायी जाए , तेरे होठो से !
    तभी पूजा पे, चढाने को ,ग़ज़ल बनती है !

    सार्थक उपरके लेख से मेल खाती सुन्दर रचना है !

    ReplyDelete
  10. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  11. छोटों पर स्नेह से आंखे जब सजल बनती है।
    ममत्व भरी अनुकम्पा से ही गजल बनती है।

    ReplyDelete
  12. मैंने ,कलियों के हाथ , रात में चाक़ू देखा !
    दोनों हंसके,गले मिलतीं,तो ग़ज़ल बनती है !
    यकीनन तब गज़ल बनती है

    ReplyDelete
  13. बात जो दिल से निकले और दिल तक पंहुचे
    तो एक गज़ल बनती है ???
    आप की दिल से निकली बात ..दिल तक पंहुची !
    सार्थक सन्देश .....
    शुभकामनायें!

    ReplyDelete
  14. मान सम्मान पर माली, लड़े हैं,अक्सर ही ,
    नन्हें फूलों को बचा लें ,तो ग़ज़ल बनती है !sahi bat .....

    ReplyDelete
  15. मान सम्मान पर माली, लड़े हैं,अक्सर ही ,
    नन्हें फूलों को बचा लें ,तो ग़ज़ल बनती है ! sahi bat ...

    ReplyDelete
  16. क्या बात है! छा गए सर .....
    अक्सर आ जाती है उनके चेहरे पर शिकन
    कभी जब मुस्करायें वे तो ग़ज़ल बनती है :-)

    ReplyDelete
  17. साहब, आपके अंदर शायरी करने क़ी जो नैसर्गिक ललक है, उसने जहाँ से अंदाज़े बयाँ पाना शुरू करा , वहाँ से तो आप गजब ढा देगे :)

    लिखते रहिये ...

    ReplyDelete
  18. वाह...क्या खूबसूरत ग़ज़ल बनी....
    मैंने ,कलियों के हाथ , रात में चाक़ू देखा !
    दोनों हंसके,गले मिलतीं,तो ग़ज़ल बनती है !
    लाजवाब!!!

    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  19. बच्चों के मामले में,आप से सहमत हैं हम भी,
    कविता लिखते लिखते, ये भी ग़ज़ल बन गई।

    ReplyDelete
  20. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(15-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  21. bahut khoob ,behatareen gazal

    ReplyDelete
  22. बहुत सुंदर !

    ReplyDelete
  23. सब समझ लें रिश्तों की गरिमा को तो उस समाज की भी तक़दीर बन जाती है.

    ReplyDelete
  24. सब समझ लें रिश्तों की गरिमा को तो उस समाज की भी तक़दीर बन जाती है.

    ReplyDelete
  25. वाह! बेहद खूबसूरत..

    ReplyDelete
  26. बहुत उम्दा ख्याल लिए हुए है यह ग़ज़ल..हर शेर बहुत खूबसूरत हाउ.
    यांत्रिक जीवन में रिश्तों की अहमियत न खो जाए ,बच्चों से बचपन उनकी मासूमियत न छीने...यही बड़ो का प्रयास होना चाहिए.

    ReplyDelete
  27. नेक विचार. बच्चों को भी स्पेस देना जरुरी है. वैसे आज के बच्चे बहुत स्पष्ट मंतव्य रखते हैं.

    ReplyDelete
  28. जिंदगी का हर लम्हा....अच्छा या बुरा ...वो एक गज़ल ही है पर नजरिया अपना अपना लिए हुए

    ReplyDelete
  29. रात भर फूट के , रोये थे , दोनों कमरे में ,
    कोई पापा को मनाये ,तो ग़ज़ल बनती है ..

    बहुत खूब सतीश जी ... हर शेर लाजवाब है खिलता हुवा ...
    उम्दा गज़ल ...

    ReplyDelete
  30. अगर क़दमों पे कदम,रख के चल सकें साथी
    तुम्हारा हाथ, पकड़ कर के, ग़ज़ल बनती है !

    aapane dil ki baat kah di waah nihshabd karte alfaz

    ReplyDelete
  31. अगर क़दमों पे कदम,रख के चल सकें साथी
    तुम्हारा हाथ, पकड़ कर के, ग़ज़ल बनती है !
    aapane dil ki baat kah di . khubsurat alfaz

    ReplyDelete
  32. मान सम्मान पर माली, लड़े हैं,अक्सर ही ,
    नन्हें फूलों को बचा लें ,तो ग़ज़ल बनती है !
    sundar baat ....

    ReplyDelete
  33. रात भर फूट के,रोये थे ,दोनों कमरे में ,
    कोई पापा को मनाये,तो ग़ज़ल बनती है ..

    भावपूर्ण अभिव्यक्ति बहुत सुंदर लाजबाब गजल ,,,बधाई सतीश जी

    RECENT POST: जिन्दगी,

    ReplyDelete

  34. कुछ मधुशाला का रस लेने
    आये थे , सुनने गीतों को !
    कुछ तो इनमें मस्ती ढूँढें ,
    कुछ यहाँ खोजते मीतों को !
    यह कैसे बतलाएं सबको,कैसे लिख जाते हैं गीत !
    कष्टों के घर, पले हुए हैं ,प्यार न जाने मेरे गीत !
    स्वप्न गीत से हटा लिया टिपण्णी का ऑप्शन मेरे मीत ,

    बुरा कहो या भला कुछ न कहेंगे मेरे गीत .

    ReplyDelete
  35. अगर भूखा मुझे पाकर, न तुमको नींद आये !
    हाथ से जब खिला जाओ, तो ग़ज़ल बनती है !

    रात भर फूट के , रोये थे , दोनों कमरे में ,
    कोई पापा को मनाये ,तो ग़ज़ल बनती है !

    .बहुत सुंदर, इतना अच्छा पढने को मिलेगा तो हम भी कुछ सिख लेंगे आभार

    ReplyDelete
  36. सबक सिखाएं जिन्दगी भी हजल बनती है !
    ख़ुदकुशी फूल न करलें,तो ग़ज़ल बनती है !

    अगर यह, गुनगुनायी जाए , तेरे होठो से !
    तभी पूजा पे, चढाने को ,ग़ज़ल बनती है !
    utkrisht rchna sir ji.

    ReplyDelete
  37. सबक सिखाएं जिन्दगी भी हजल बनती है !
    ख़ुदकुशी फूल न करलें,तो ग़ज़ल बनती है !

    अगर यह, गुनगुनायी जाए , तेरे होठो से !
    तभी पूजा पे, चढाने को ,ग़ज़ल बनती है !
    utkrisht rchna sir ji.

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,