Sunday, September 15, 2013

नमःशिवाय उच्चारण करते, मैं भी धन्य,हो गयी होती - सतीश सक्सेना

एक खतरनाक सा सपना,जो आज रात देखा , ज्यों का त्यों लिपिबद्ध कर दिया  : यह रचना व्यंग्य नहीं है केवल हास्य है , अधिक समझदार लोग, अधिक अर्थ न तलाश करें... 

बरसों बीते साथ तुम्हारे ,
खर्राटों में , सोते, जगते !
मोटी तोंद , पसीना टपके ,
भाग्य कोसते,पंखा झलते
पता नहीं,फूटी किस्मत पर, प्रभु तेरी कुछ , दया न होती !
कितनों के पति,बहे बाढ़ में,मैं भी तो, खुशकिस्मत होती !

सासू  लेकर, चारधाम  की 

यात्रा तुमको, याद न आई  !
कितने लोग तर गए जाकर
क्यों भोले की, याद न आई !  
काश उत्तराखंड की साजन,तुमको टिकट मिल गयी होती !
नमःशिवाय, उच्चारण करते, मैं भी धन्य, हो गयी होती  !

जिसदिन सूनामी आई थी 
तब तुम बाहर नहीं गए थे 
कितने लोग मरे थे बाहर 
तुम खर्राटों  में, सोये थे  !  
काश सुनामी में ,यह बॉडी, लहर में गोते, लेती होती  !
शोक संदेशा,आस लगाए,मैं भी खूब,बिलखती  होती !

कबतक करवा चौथ रखूंगी 

सजधज कर, गौरी पूजूँगी ,
सास के पैर, पति की पूजा 
कब तक मैं,इनको झेलूंगी 
कब से जलती, आग ह्रदय में ,कभी तो छाती ठंडी होती !
सनम जल गए होते,उस दिन ,काश दिए में, बत्ती होती !

अब तो जाओ,जान छोड़कर

कब तक भार उठाये, धरती 
फंड, पेंशन, एफडी, लॉकर ,
बाद में लेकर मैं क्या करती 
अगर मर गए, होते अब तक,साजन रोज आरती होती !
कसम नाथ की,मैं जीवन भर,तुम्हे याद कर रोती होती !

( कृपया इसमें गंभीरता न खोजें न अन्यथा अर्थ लगायें , यह व्यंग्य नहीं है विशुद्ध हास्य है इसे उसी स्वरुप में पढ़ें !  जिन्हें हंसना नहीं आता, वे क्षमा करें  )

27 comments:

  1. बहुत सुन्दर जनाब !!
    किन्तु इस रचना को भाभीजी नें पढ़ लिया तो बहुत मार पड़नें वाली है !

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  2. वाह, क्या व्यवस्थित ढंग से धोया है..आनन्दमयी।

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  3. एक दो को छोड़ दें,नही तो कोई भी पत्नी कभी अपने पति के लिए ऐसा नही सोचती..
    बेहतरीन हास्य प्रस्तुति, !!

    RECENT POST : बिखरे स्वर.

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  4. ब्हुत ही भावपुर्ण

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  5. हा हा हा हा हा हा हा !
    सपना तो वास्तव में बड़ा भयंकर था जो सारे हादसे याद दिला गया.
    क्या सोचते हुए सोये थे भाई जी ? :)

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  6. गंभीर विषयों को छोड़कर हास्य का पुट अच्छा लगा.
    आखिर हँसते रहने से यही दूभर जिंदगी आसान लगने लगती है।

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  7. हा हा हा हा मजा आ गया ये सपना है :) ??
    ये तो बहुतों के लिए सच्चाई है !

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  8. बहुत सुन्दर

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  9. वाकई मजा आ गया..... बहुत सुन्दर.......

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  10. हाय राम! हंसे वो जिनको कोई खतरा नहीं है। :)

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  11. बढ़िया हास्य।
    मेरी श्रीमती इसे पढ़कर लहालोट हो गईं।:-)

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    Replies
    1. मेरा आभार देना उन्हें ..

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  12. उफ़ ! हद कर दी आपने बखिया उधेड़ने की..वैसे यह सपना तो उन्हें आना चाहिए था जो फरियाद कर रहे हैं..

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  13. भाई ब्रजमोहन श्रीवास्तव जी का कमेन्ट :
    पहला छंद बाढ में बहने बाबत/दूसरे में उत्तराखण्ड न गईं,दुर्भाग्य से न सुनामी मे थीं न 9/11 मे थीं।फिर करवा चौथ का बृत रखने की परेशानी,और अन्त में हमें चैन तो मिलता । विशुध्द हास्य .पहले मै समझा कि यह निवेदन,प्रार्थना, गुजारिश सास से है तो लिख दिया था कि यदि सासू मां चली गई होती तो वे जो वर्तन मांझती थी और झाडू लगाना पडती थी उसके लिये बाई रखना पडती। अब तो और भी मजेदार नौक झौक होगई ।
    ....
    मैने भी कभी लिखा था——
    कलकल करती नदी किनारे, चट्टानें, बन, पेड़, पहाड़
    शीतल छाँव घनेरी
    नदी में मगरमच्छ मुंहफाड़े
    तड़पते भूंखे बेचारे
    द्रवित मन मेरा

    कैसे उनकी भूंख मिटाऊँ
    किसको अब में धक्का मारूं
    काश -साथ में तुम होतीं

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  14. देवेन्द्र पाण्डेय उर्फ़ बेचैन आत्मा :

    हाय राम! हंसे वो जिनको कोई खतरा नहीं है।

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  15. अब तो जाओ,जान छोड़कर
    कब तक भार उठाये, धरती
    फंड, पेंशन, एफडी, लॉकर ,
    बाद में लेकर मैं क्या करती
    अगर मर गए, होते अब तक,साजन रोज आरती होती !
    कसम नाथ की,मैं जीवन भर,तुम्हे याद कर रोती होती !

    सटीक ठोका.

    रामराम.

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  16. समझदार लोग जो भी
    निकालेंगे निकालेंगे
    हम तो बस
    सच्चाई दिल की
    निकाल रहे हैं
    आप से कुछ भी
    नहीं कह सकते हैं
    बस पूछना चाह रहे हैं
    आप कहां से
    मित्रों के बारे में
    अंदर की ये बातें
    ढूंढ निकाल रहे हैं ?

    :) :) :)

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  17. kya baat hai satish ji......nirdosh si hasya rachna.

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  18. हा हा हा .................

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  19. हा ..हा हा हा ....

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  20. ऐसे सपने देखने की बीमारी कब से है आपको ? :):)

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  21. वाह ...सपने इतने मज़ेदार भी होते हैं....ये नहीं पता था :))

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  22. हा..हा....हा..हा.... मस्त :D

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एक निवेदन !
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- सतीश सक्सेना

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