Monday, September 16, 2013

हाय द्रवित मन मेरा कहता, काश साथ तुम मेरे होतीं -सतीश सक्सेना

"इस पार प्रिये , गम हैं, तुम हो
उस पार तो कुछ, अच्छा होगा "

इन पंक्तियों वाले भाई बृजमोहन श्रीवास्तव ने कल एक ऐसा कमेन्ट दिया कि काफी देर हंसता रहा , उनके कमेन्ट पर ही आगे बढाते हुए यह हास्य रचना लिख मारी है ...
देखते हैं कितने लोग इसे समझ पायेंगे :)

कलकल करती नदी किनारे,
पर्वत जंगल और चट्टानें !

शीतल शीतल , छाँव घनेरी
गहरी खाई है , मुंह फाड़े !
नदी में, मगरमच्छ मुंह फाड़े , तड़प रहे , भूखे बेचारे !
हाय !द्रवित मन मेरा कहता,काश साथ तुम मेरे होतीं !

लगता भूखे प्याए कब से ?
आशा करते , मुझे निहारें
नब्बे किलों माल के बदले
इनके होते , वारे न्यारे !
तन का क्या है अगर काम कुछ,इन बेचारों के आ जाता !
अपना प्यार, समर्पित करता , काश साथ तुम मेरे होतीं !

हम मानव तो जीवन भर
पीज़ा , बर्गर, खाते रहते !
जो बेचारे मांग न पायें,
उनके पेट पे ध्यान न देते !
कहते हैं भूखे को, खाना देना , धर्म का , पुण्य काम है !
बैटर हाफ समर्पित करता , काश साथ तुम मेरे होतीं !

गंगा में कब से , भूखे हैं !
मिली नहीं इनको गांगेयी
किसी आदमी के बच्चे को
इन्हें देख कर दया न आई !
लगता बरसों से इन सबने , अच्छा भोजन चखा नहीं है !
बढ़िया दावत, इनको मिलती, काश साथ तुम मेरे होती !



यह रचना ,पिछली छपी, हास्य रचना की पूरक है ...उसके साथ इसे पढ़ें तो इसका आनंद अधिक आयेगा ! अधिक समझदारों की तरह, इसमें कोई अर्थ न ढूंढें ! बस हंसाना ही इसका उद्देश्य है ! जिन्हें हंसना नहीं आता .....
वे क्षमा करें ...
:)


30 comments:

  1. .....यानी हास्य का डबल-डोज़ !

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  2. मगरमच्छ की सेवा में बेटर हाफ को समर्पित कर पूण्य कमाना चाहते है=बहुत पूण्य मिलेगा ..हा हा हा latest post कानून और दंड
    atest post गुरु वन्दना (रुबाइयाँ)

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  3. हंसने के लिए मजेदार सामग्री.... लेकिन अपने श्रीमती से बचाकर रखें ... हा हा ...

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  4. कल का गीत आज का गीत दोनों एक दुसरे के पूरक है
    दोनों पक्षों को अब कोई शिकायत भी नहीं होगी :)
    मजेदार हास्य से भरपूर रचना है ….

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  5. लगता भूखे प्यासे कब से ,
    आशा करते , मुझे निहारें
    नब्बे किलों माल के बदले
    इनके होते , वारे न्यारे !
    तन का क्या है अगर काम कुछ,इन बेचारों के आ जाता !
    अपना प्यार, समर्पित करता , काश साथ तुम मेरे होतीं !
    प्यार समर्पित करने का क्या उदारवादी तरीका है :)

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  6. गहरी खाई है , मुंह फाड़े !
    नदी में, मगरमच्छ मुंह फाड़े , तड़प रहे , भूखे बेचारे !
    हाय !द्रवित मन मेरा कहता,काश साथ तुम मेरे होतीं ..

    सतीश जी .. भाभी तो नहीं पढ़तीं न आपका ब्लॉग ... खुदा खैर करे ... हमने तो पत्नी को कह दिया है हम नहीं जानते सतीश जी कौन हैं ...

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  7. अरे वाह सतीश जी । वाकई यह है शुध्द शाकाहारी हास्य। 90 किलो बापरे —कभी काका हाथरसी ने लिखा था ''ढाई मन से कम नहीं तौल सके तो तौल —किसी किसी के भाग्य में लिखी ठोस फुटबौल''। यह भी सच है कि पीज़ा वर्गर कहां लिखा है उन बेचारों के भाग्य में— और भूखे को भोजन देना —इससे बढा कोई पुण्य नहीं।
    ऐसे हास्य व्यंग्य जीवन में होते रहना चाहिये । इसी का नाम जीवन है सतीश जी। वाकी तो यह दुनिया का मेला एक खेला है बस बीच में इनकमटैक्स का झमेला है।

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  8. ☆★☆★☆


    नदी में, मगरमच्छ मुंह फाड़े , तड़प रहे , भूखे बेचारे !
    हाय !द्रवित मन मेरा कहता,काश साथ तुम मेरे होतीं !

    हा हा हा... वाऽहऽऽ…!
    मगरमच्छ का भला हो जाए , लेकिन 'उनको' हर हाल में सताना है...
    काश साथ तुम मेरे होतीं ...
    ...
    प्रिय सतीश जी
    मजेदार रचनाओं के लिए बधाई !

    ...टीका-टिप्पणी हमारे ही लिए छोड़ देते हैं सारी,
    आप अपनी रचनाएं भाभीजी को भी पढ़ाया कीजिए न !
    :)

    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  9. sahi kaha aapne ye last wali ki poorak hai ........bina kisi par kichad ucchale aur doosron ka mazak udaye bina itna sundar aur swacch hasya parosne ke liye aabhar aapka :-))

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  10. रचना बहुत ही मजेदार है ...सतीश जी..परन्तु आपकी श्रीमती जी की कैसी प्रतिक्रिया थी इसके बारे में ..

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  11. रचना बहुत ही मजेदार है ...सतीश जी..परन्तु आपकी श्रीमती जी की कैसी प्रतिक्रिया थी इसके बारे में ..

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  12. बहुत सुन्दर ..

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  13. अरे बाप रे ...भाभीजी के लिये प्रार्थना व शुभकामनाएं ।

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  14. हे भगवान ! ये हो क्या रिया है?:)

    रामराम.

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  15. प्रेम हो तो कुछ
    ऐसा ही हो
    इधर से ये ऊपर
    जा रहा हो
    उधर से वो ऊपर
    हो जा रहा हो
    यहां मिलने का
    मजा सारा
    ऊपर दोबारा
    मिलने पर
    ढबल हो जा
    रहा हो !

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  16. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १७/९/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है।

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  17. ये काश बेहद खास है..आमीन..

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  18. बड़े खतरनाक विचार मन में आए :):) रोचक

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  19. हास्य से भरपूर रचना है.......... ….

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  20. यही तगड़ा जवाब है पिछली कविता का।

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  21. हास्य रस से सराबोर रचना .

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  22. हम मानव तो जीवन भर
    पीज़ा , बर्गर, खाते रहते !
    जो बेचारे मांग न पायें,
    उनके पेट पे ध्यान न देते !
    कहते हैं भूखे को, खाना देना , धर्म का , पुण्य काम है !
    बैटर हाफ समर्पित करता , काश साथ तुम मेरे होतीं
    !एक खुराक पर दूसरी खुराक,लगातार देते रहे तो सतीश जी हमारे पेट में बल पड़ जायेंगे.सुन्दर

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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