Monday, October 14, 2013

शायद तुमसे पहले जग में सूरज नहीं उगा करता था - सतीश सक्सेना


कितनी बार,करवटें लेकर, सारी  रात जगा करता था !
जो विश्वस्त रहा था अपना अक्सर वही दगा करता था !

हम तो यहाँ ठहर जायेंगे , मगर बुआ यह कहतीं थीं !
जो सराय महफूज़ सी होती,राही वहीँ ठगा करता था !

पता है बरसों से दुनिया को, तुम्ही अकेले खींच रहे थे ! 
शायद तुमसे पहले जग में, सूरज नहीं उगा करता था !

वे भी क्या रिश्ते थे मन के,सारी दुनियां फीकी लगती !  
सारी रात जगाये मुझको,मन को कौन रंगा  करता था !

लगता जैसे अब यह बस्ती, रहने लायक नहीं रही है !
कितने बुरे बुरे  दिन देखे , ऐसा नहीं लगा करता था !

( यह रचना दैनिक जनवाणी के २० अक्टूबर २०१३ के रविवारीय परिशिष्ट में , गुनगुनाहट कालम में छपी है , यह सूचना डॉ मोनिका शर्मा ने दी है , उनका आभार ! )  

31 comments:

  1. दिल को छू गई यह छोटी सी कविता।

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  2. लगता जैसे अब यह बस्ती , रहने लायक नहीं रही है !
    कितने बुरे बुरे दिन देखे , ऐसा नहीं लगा करता था !

    बेहतरीन, सुंदर गजल !
    विजयादशमी की शुभकामनाए...!

    RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

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  3. बहुत अच्छी बात,उम्दा ग़जल के साथ।

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  4. हृदयस्पर्शी गहन अभिव्यक्ति ....सतीश जी ....विजयदशमी की शुभकामनायें .....!!

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  5. बहुत बहुत सुन्दर....
    वे भी क्या रिश्ते थे दिल के,अब तक नहीं भुला पाए हैं !
    सारी रात जगाये मुझको,मन को कौन रंगा करता था !

    मन को छू गयी हर पंक्ति...
    सादर
    अनु

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  6. जो विश्वस्त रहा जीवन में , अक्सर दगा वही करता था !
    क्यों करते हैं ऐसा लोग कि किसी पर भी यकीन मुश्किल हो !

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  7. पता है बरसों से दुनिया को, तुम्ही अकेले खींच रहे थे !
    शायद तुमसे पहले जग में, सूरज नहीं उगा करता था !
    .----- कुछ को ये भ्रम हो जाता है-------- बहुत सुन्दर ......

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  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (14.10.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की गयी है ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

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  9. जिन पर आश्रय अधिक रहा,
    उन पर ढेरों नीर बहा।

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  10. भाई जी ...
    बुआ जी बिलकुल ठीक कहती थी ........

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  11. जोरदार अभिव्यक्ति

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  12. no words to say .....harek pankti ne dil ko jhakjhod diya utkrish bhaw ........

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  13. सुंदर रचना अभिव्यक्ति ... बधाई
    दशहरा पर्व पर हार्दिक बधाई शुभकामनाएं

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  14. shnaadar satish sir... tussi great ho :)

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  15. कितनी बार,करवटें लेकर, सारी रात जगा करता था !
    जो विश्वस्त रहा जीवन में,अक्सर वही दगा करता था !
    कितनी सरलता से सटीक बात कही है, बहुत खूब !
    वे भी क्या रिश्ते थे दिल के,अब तक नहीं भुला पाए हैं !
    सारी रात जगाये मुझको,मन को कौन रंगा करता था !
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ मन को छू गई रचना !

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  16. बहुत सुन्दर .
    नई पोस्ट : रावण जलता नहीं
    नई पोस्ट : प्रिय प्रवासी बिसरा गया
    विजयादशमी की शुभकामनाएँ .

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  17. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-15/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -25 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  18. अद्वितीय, अभूतपूर्व, अनिवर्चनीय ।

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  19. सुन्दर ,यथार्थ वचन

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  20. वे भी क्या रिश्ते थे दिल के,अब तक नहीं भुला पाए हैं !
    सारी रात जगाये मुझको,मन को कौन रंगा करता था !
    बहुत सुन्दर .......
    अभी अभी महिषासुर बध (भाग -१ )!

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  21. बेहद सटीक रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  22. भावमय करते शब्‍दों का संगम है यह प्रस्‍तुति

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  23. बेहतरीन ग़ज़ल हैं ये.

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  24. वाह बहुत खुबसूरत ग़ज़ल |

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  25. आज के वक्त में रिश्ते और सोच दोनों ही बदलते हैं

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  26. पता है बरसों से दुनिया को, तुम्ही अकेले खींच रहे थे !
    शायद तुमसे पहले जग में, सूरज नहीं उगा करता था --शानदार रचना है आपकी।

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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