Tuesday, November 5, 2013

देश को , काट काट कर खाएं , बड़े कमीने बैठे हैं -सतीश सक्सेना

गांधी जी का चित्र लगाए, दल्ले सजके बैठे हैं !
पैग लगा के, देश को खाएं, बड़े कमीने बैठे हैं !

भीड़ के सम्मुख देश की चिंता में नेताजी डूबे हैं     
सोना बरसे राजनीति से , धन्ना  बनके बैठे हैं !

दल्लागिरी, चौथ बसूली,गुंडे सभी सलाम करें , 
जनता साली क्या कर पाए,राजा बनके बैठे हैं !
 
धरती बेचें, जंगल बेंचें, ट्रेन , हवाई अड्डे, बेचें !
भारत माता की जय बोलें, नोट कमाने बैठे हैं ! 

देश के काले धंधों ऊपर इनकी कृपा जरूरी है 
लक्ष्मी के संग नाच रहे , ता थैया करते बैठे हैं !

22 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. अरे मैंने किसी को बाहर नहीं किया भाई अब कोई स्कूल खुद ना आये तो क्या किया जाये वैसे अच्छा किया अगर पढ़ लिये होते कुछ हमसे तो फाके पड़ रहे होते :) !

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    1. वाकई फर्क पड़ गया होता भाई, मगर इन्हें इससे कोई शिकायत नहीं कि पढ़ नहीं पाए , यह खुश हैं कि पहले से बहुत ज्यादा कमा रहे हैं !

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    2. वैसे सच बोलूं ? नाराज मत होना प्लीज ! कविता बहुत अच्छी है पर ध्यान फोटो की ओर ज्यादा चला जा रहा है !

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    3. डॉ साहब ,
      लफंगई से मिलता जुलता यही फोटो मिला , वियना की एक दूकान का ! अच्छा लगा कि आपका ध्यान खींचा तो सही सर !

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  3. भई खूब लपेटा है कुर्सी चोरों को ... मज़ा आ गया ...

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  4. बहुत खूब ... अच्छे शेर हैं ...

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  5. राजनेतायों के धंधे के पैबंद के हर धागे को आपने उधेड़ दिया-बहुत खूब |
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !
    नई पोस्ट आओ हम दीवाली मनाएं!

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  6. आम आदमी के आक्रोश को प्रदर्शित करती धारदार पंक्तियाँ...

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  7. bahut badhiya rachana sach ko ujagar karti hui ... shubhakamanaye...

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  8. सचमुच क्या यही प्रजातंत्र है ?

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  9. क्या होगा, मेरे देश का..

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  10. जन सेवा लक्ष्मी सेवा में, ढ़ेर लगाया ,लक्ष्मी का ,

    लक्ष्मी के संग नांच रहे ,ता थइयां करने बैठें हैं।

    एक से एक बड़ी नौटंकी हर दम करते रहते हैं।

    एक से एक बड़े हैं मदारी ,लिए झमुरे बैठें हैं ,

    वाह सतीश भाई सक्सेना। गालियों के गहने पहरा दिए गीत को।

    संसद में गारी चलती है ,फिल्मों में सबसे आगे ,

    सब "दारी के "अपनी अपनी ,गारी देने बैठें हैं।

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    1. शुक्रिया वीरू भाई !
      आपके आने से जान पड़ जाती है !

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  11. बहुत मारक व्यंग.

    रामराम.

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  12. बहुत सुन्दर सक्सेना जी खूब व्यंग कसा है आपने पर इन मोटी चमड़ी वाले नेताओं कि खाल पर कोई असर नहीं होता ...आभार..
    कहना चाहूंगा
    जो जनता को काट काट कर खाएं ऐसे कसाई नेता बन बैठे हैं ,
    अपनी ऐसी दहशत पर हँसते ऐसे जालिम सत्ता में आ बैठे हैं.

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  13. सच्‍चाई असहनीय है।

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  14. सटीक व्यंगात्मक पंक्तियाँ

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  15. लेखनी का आक्रमक रूप ...मुबारक हो आपको भैया

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- सतीश सक्सेना

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