Monday, November 11, 2013

हम इसी नौकरी में अच्छे , जी करता नहीं बगावत को -सतीश सक्सेना

सारे मुज़रिम मुखिया बनते,इज्जत दे कौन शराफत को
हर समय पैरवी चोरों की,जी करता नहीं वकालत को !

बरसों बीते, तेरे पीछे ,चलते चलते, अब जाएँ कहाँ ?
हम इसी नौकरी में अच्छे,जी करता नहीं बग़ावत को !

धरती प्यासी, अम्बर सूखे, हरियाली नज़र नहीं आये !
अपने मालिक को दिखलाये,ये कौन कहे ऐरावत को !

पहले कहते थे,दुनिया में,कोई झूंठ के पांव नहीं होते ! 
अब इन शब्दों में जान नहीं,लगता है,बने कहावत को !
आवारागर्द मोहल्ले के , अनपढ़ ही रहे लेकिन यारों,
खादी  के श्वेत वस्त्र पहने, आये हैं सिर्फ वज़ारत को !

24 comments:

  1. जबरदस्त!! वाह!!

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  2. जी करता नहीं वकालत को ……बस इन लोगों को यही उदासीनता तो चाहिए !
    निराशा की सटीक अभिव्यक्ति !

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    1. निराशा की सटीक अभिव्यक्ति ............एकदम सौ टका खरी बात

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  3. धरती प्यासी,अम्बर सूखे , हरियाली नज़र नहीं आये !
    अपने मालिक को ले आये , ये कौन कहे ऐरावत को !....bahut hi sunder !

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  4. अच्‍छा चिंतन।

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति सोमवारीय चर्चा मंच पर ।।

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    1. आपका स्वागत है रविकर जी !!

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  6. वो 'statutory warning' वापस लगा ले तो नए पाठकों को सुविधा होगी :)

    बाकी आपके विचार वहाँ मकम्मल होते दिखते है, जहाँ से कोई उम्मीद नज़र नहीं आती, शायर के लिए ऐसी स्थिति अच्छी नहीं। हमारे हिसाब से भी जब मौत का दिन मु'अय्यन है, तो रोज़ कि नींद क्यों ख़राब कि जाए :)

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    1. राजनीति से बाहर निकलिए सरकार, कभी कभी मित्रों के यहाँ भी दर्शन देते रहा करें, आपकी गोलियां भी अच्छी लगती रही हैं , प्यार महसूस होता है :)
      आभार !

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  7. ये भी ले लूं
    उसके मन में
    भी आता है
    क्या करे बेचारा
    ले कहां पाता है
    शराफत है तो
    बस खुद के लिये है
    वो ही क्या उसका
    कुत्ता तक काटना
    चाहता है :) :) :)

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    1. आभार आपका डॉ उलूक सर !!
      :)

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    2. अब दिखा ना आपको मैं :)

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  8. पहले कहते थे, दुनिया में,कोई झूंठ के पांव नहीं होते !
    अब इन शब्दों में जान नहीं,लगता है,बने कहावत को ..

    सच कहा है .. अब तो केवल बोलबाला ही झूठ का रह गया है ... जीता जागता इंसान बन गया है झूठ ...

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  9. पहले कहते थे, दुनिया में,कोई झूंठ के पांव नहीं होते !
    अब इन शब्दों में जान नहीं,लगता है,बने कहावत को !
    बिलकुल सही कहा है आज के संदर्भ में यह कहावत कुछ इस प्रकार फिट बैठती है
    झूठ के पांव ही नहीं हाथ भी होते है, सार्थक रचना !

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  10. वाह गजब जी गजब , एकदम कमाल के बन पडे हैं सब के सब

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  11. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार १२ /११/१३ को चर्चामंच पर राजेशकुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है

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  12. मन में कहीं कसक सी पैदा करने वाली रचना है ।

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  13. बहुत खुब. शानदार रचना.

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  14. बरसों बीते , तेरे पीछे , चलते चलते , अब जाएँ कहाँ ?
    हम इसी नौकरी में अच्छे, जी करता नहीं बग़ावत को !
    ..बहुत सही ...सच आखिर बगावत कर जायंगे भी कहाँ ..रहना सबके साथ जो है ...

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  15. वाह जी बहुत खूब

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  16. या झूंठ देवी तेरा सहारा
    तूने ही बेडा पार उतारा.

    रामराम.

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- सतीश सक्सेना

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