Wednesday, December 18, 2013

किसके ऊपर लिखी रुबाई, धत्त तेरे की ! -सतीश सक्सेना

कहाँ पे जाके कलम चलाई धत्त तेरे की, 
किसके ऊपर लिखी रुबाई,धत्त तेरे की !

पूरे जीवन जिए शान से, नज़र उठा कर,

और कहाँ पे नज़र झुकाई, धत्त तेरे की !

सबसे पहले किससे हमने आँख मिलाई,
और किसे आवाज लगाई, धत्त तेरे की !


आँख न लगने दी,चौकन्ने थे, ड्यूटी पर 
और कहाँ जाकर झपकाई,धत्त तेरे की ! 

जीवन भर शेरों को जाकर,माँद में मारा
कहाँ पंहुच के हुई धुनाई, धत्त तेरे की !

कवि बन के हिन्दी की करते ऎसीतैसी  
ज्ञान बाँटते,  हाथा पाई , धत्त तेरे की !

19 comments:

  1. सुन्दर रचना । मज़ा आ गया । बधाई ।

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  2. गजब की शिकायत और सीख जीवन की कड़ियाँ खोलती और जोड़ती
    बेहतरीन गीत बधाई

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  3. कमी आपके लेखन में बतलायें कैसे,
    हमको कमी नज़र ना आयी, धत्त तेरे की!
    अनुज आपके हैं, सीखा है आपसे कितना,
    कमी बताकर करें ढ़िठाई, धत्त तेरे की!

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  4. रुशवाईओ का दौर है धत तेरे की .....

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  5. हा हा, सच में, धता तेरे की ही हो गयी जिन्दगी।

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  6. कुछ कहना चाहता था पर अब नहीं कह सकता जब आप ने कह दिया ज्ञानी कमी बताएं आकर ,धत तेरे की !

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  7. अपना फ़लसफ़ा बहुत रोचक तरीके से पाठकों तक पंहुचाया...अब कोई ज्ञान देने कि कोशिश नहीं करेगा...

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  8. लेखन भी हिन्दी में,आये हैं लिखने को !
    ज्ञानी कमी बताएं आकर ,धत तेरे की !
    हमारे प्रशंसक वही कहते है जो हमें अच्छा लगता है
    वो नहीं जो सच है,कही मैंने गलत तो नहीं कह दिया धत तेरे की :)

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  9. ☆★☆★☆


    धत तेरे की !
    वाह…!
    आदरणीय सतीश जी भाईसाहब
    मस्त लिखा

    :)
    लेखन भी हिन्दी में,आये हैं लिखने को !
    ज्ञानी कमी बताएं आकर ,धत तेरे की !

    बधाई और शुभकामनाएं !

    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  10. वाह सतीश जी ... लाजवाब में कमी कोई कैसे बताए ...
    धत तेरे की ... जय हो ...

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  11. पूरे जीवन जिए शान से,नज़र उठा कर,
    और मरे थे कहाँ पंहुचकर,धत तेरे की !
    गैरों के शक पर अब करें शिकायत कैसी
    तुम भी कौन समझ पाए थे, धत तेरे की !
    सुन्दर प्रस्तुति
    क्या क्या कब कब हो गया पता चला नहीं धत तेरे की.

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  12. बहुत ही उम्दा,प्रस्तुति केलिए बधाई सतीश जी !

    RECENT POST -: एक बूँद ओस की.

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  13. धत्त तेरों की जिन्होंने ऐसी स्थिति लाई

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  14. बहुत बढिया..आभार

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  15. कितनी प्यारी रचना,,पढ़ने में मज़ा आया ,कहाँ जाके अंत होता है--धत तेरे की।

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  16. इतनी दौड़ धूप और फिर ऐसी कविताई
    अद्भुत कला आपने पाई . . . .
    सादर

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- सतीश सक्सेना

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