Wednesday, December 24, 2014

सनम सुलाने तुम्हें, हमारे गीत ढूंढते आएंगे - सतीश सक्सेना

आदरणीय ध्रुव गुप्त की दो पंक्तियाँ इस रचना के लिए प्रेरणा बनी हैं , उनको प्रणाम करते हुए ……  

यदि रूठोगे कहीं तुम्हें हम , रोज मनाने आएंगे,
चाहा सिर्फ तुम्हीं को हमने,रोज बताने आएंगे !

याद न करना मुझको,वरना हौले हौले रातों के 
अनचाहे सपनों में,अक्सर खूब सताने आएंगे !

सुना, चाँदनी रातों में तुम भूखे ही सो जाते हो
लिए पुरानी यादें तुमको संग खिलाने आयेंगे !

खूब सताएं दुनियां वाले,मंजिल अपनी पाएंगे 
जितना काटें बांस,  हरे हो नए सामने आएंगे !

कैसे निंदिया खो बैठे हो,यादों के उजियारे में  
सनम सुलाने तुम्हें , हमारे गीत  ढूंढते आएंगे !

Tuesday, December 23, 2014

कर न पायीं बातें ग़ज़लें , हंसने और हंसाने की - सतीश सक्सेना

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की !
कफ़न आ गया बिकने तेरा,बातें सबक सिखाने की !

अम्बर चाँद सितारे हम पर, नज़र लगाए रहते हैं,
कैसे नज़र इनायत होगी साक़ी औ मयखाने की !

रोज सुबह तौबा कर लेते, अब न हाथ लगाएंगे, 
और शाम को बातें करते पीने और पिलाने की !

रंज भुलाकर साथ बैठकर,हँसते,खाते, पीते हैं !
यहाँ न ऐसी बातें होती , रोने और रुलाने की ! 

इश्क़,बेरुखी,रोने धोने , से भी कुछ आगे आयें  
कर न पायीं बातें ग़ज़लें, हंसने और हंसाने की !

Thursday, December 18, 2014

इस्लाम की छाती पे , ये निशान रहेंगे - सतीश सक्सेना

लाशों पे नाचते तुम्हें,  यमजात कहेंगे !
शायर और गीतकार भी बदजात कहेंगे !

कातिल मनाएं जश्न,भले अपनी जीत का 
इस्लाम  की छाती पे, इन्हें  दाग़ कहेंगे !

इन्सान के बच्चों का खून,उनकी जमीं पर 
रिश्तों की बुनावट पे,हम आघात कहेंगे !

दुनियां का धर्म पर से, भरोसा ही जाएगा !
हम दूध मुंहों के रक्त से,खिलवाड़ कहेंगे !

महसूद, ओसामा  के नाम, अमिट हो गए 
हर  ज़ुल्म ए तालिबान,  ज़हरबाद कहेंगे !

जब भी निशान ऐ खून,हमें याद आएंगे 
इंसानियत के नाम , एक गुनाह कहेंगे !

Ref : https://www.theguardian.com/world/2014/dec/16/taliban-attack-army-public-school-pakistan-peshawar

Sunday, December 7, 2014

तुम मुझे क्या दोगे - सतीश सक्सेना

समय प्रदूषित लेकर आये,  क्या दोगे ?
कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ?

दैत्य , शेर , सम्राट   
ऐंठ कर , चले गए !
शक्तिपुरुष बलवान
गर्व कर  चले गए ! 
मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, 
तुम मुझे क्या दोगे ?  
हँसता काल विशाल,तुम मुझे क्या दोगे ?

मैं था ललित प्रवाह 
स्वच्छ जल गंगे का 
भागीरथ के समय 
बही, शिव गंगे का !
किया प्रदूषित स्वयं,
वायु, जल, वृक्षों को ?
कालिदास संतान ! तुम मुझे  क्या  दोगे ?

अपनी तुच्छ ताकतों 
का अभिमान लिए !
प्रकृति साधनों का 
समग्र अपमान किये  
करते खुद विध्वंस, 
प्रकृति संसाधन के !
धूर्त मानसिक ज्ञान,तुम मुझे क्या दोगे !

विस्तृत बुरे प्रयोग 
ज्ञान संसाधन  के  !
शिथिल मानवी अंग
बिना उपयोगों  के !
खंडित वातावरण, 
प्रभामण्डल  बिखरा ,
दुखद संक्रमण काल,तुम मुझे क्या दोगे !

यन्त्रमानवी बुद्धि , 
नष्ट कर क्षमता को,
कर देगी बर्वाद ,
मानवी प्रभुता को !
कृत्रिम मानव ज्ञान, 
धुंध मानवता पर !
अंधकार विकराल,तुम मुझे क्या दोगे !

Saturday, December 6, 2014

दर्द में भी , मुस्कराना चाहिए - सतीश सक्सेना

चाँद को माँ से,मिलाना चाहिए
नज़र का टीका लगाना चाहिए !

दर्द जब जब, आसमां छूने लगे,
गम भुलाकर मुस्कराना चाहिए !

आइये अब तो गले लग जाइये 
समय कम है,गीत गाना चाहिए !

कोई अपना रूठ जाए , भूल से, 
पास जा उसको मनाना चाहिए !

वक्त कम है काम बाकी है पड़े,   
नींद से,सबको जगाना चाहिए !

Sunday, November 30, 2014

मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे, इतनी सदियाँ आँखों में -सतीश सक्सेना

अरसे बाद मिली हैं नज़रें,छलके खुशियां आँखों में !
लगता खड़े खड़े ही होंगीं, जीभर बतियाँ आँखों में !

बरसों बाद सामने पाकर, शब्द न जाने कहाँ गए !
मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे इतनी सदियाँ आँखों में ! 

इतना भी आसान न होता, गुमसुम दर्द भुला पाना !
बहतीं और सूखती रहतीं,कितनी नदियां आँखों में !

सावन की हरियाली जाने कबसे याद न आयी है ,
तुम्हें देख लहरायीं कैसे, इतनी बगियाँ आँखों में !

इतना हंस हंस बतलाते हो कितना दर्द छिपाओगे !
कब से आंसू  रोके बैठीं, गीली गलियां आँखों में ! 



Monday, November 24, 2014

भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !! -सतीश सक्सेना

बे-ईमानों  की  दुनियां में , 
अरविन्द,नाम है सपने का !
आँखों की पट्टी खोल रहा,   
उदघोषक है परिवर्तन का !
घर के संपन्न कुबेरों ने, 
यारों से मिलकर हरा दिया !
धूर्तों से इलेक्शन हारा है,संकल्प नहीं हारा होगा !

इकला था,और लड़ा सबसे  
निर्धन था बिन संसाधन के
कुछ चापलूस बतखोर जुड़े
आंधी में,लालच में धन के  
मक्कार नकाब लगा आये, 
विश्वास जीतने को उसका !
आघात हुआ था घातक पर,निष्कपट नहीं हारा होगा !

धनवानों की इस बस्ती में
अहसान रहे श्रमजीवी का !
मानव मूल्यों की  रक्षा में 
सम्मान रहे ,आंदोलन का
टीवी प्रचार,मीडिया बिके,
आंदोलन ख़त्म कराने को !  
विश्वास यही इन हिज़डों से,यह मर्द नहीं हारा होगा !

ठट्ठा, मज़ाक, उपहास और 
अपमान हुआ है गांधी का !
चोरों, मक्कारों के  द्वारा   
अवमान हुआ है,आंधी का !
राजा , कुबेर , भ्रष्टाचारी , 
सब एक मंच पर पंहुच गए !
जनता, मूरख बन हारी है ,विश्वास नहीं हारा होगा ! 

बिन पैसे, इस आंदोलन में 
इकला धनवानों साथ लड़ा 
बीमार था , डंडे , लाठी खा 
राज्यशक्ति के साथ लड़ा !
बर्फीला पानी बरसाया,
दुबले पतले हठयोगी पर !
भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !

सारी  ताकतें साथ आयीं
योगी का साथ छुटाने को  
टीवी अखबार खरीद लिए 
स्मृति से आग,हटाने को !
वोटों के व्यापारी जीते,
जनता ही हार गयी,फिर भी !
ना समझों को,समझाने का, संघर्ष नहीं हारा होगा !

कुछ साथी जमीर हारे थे 
अखबार बिके थे सोने में !
घबराए हुए , कुबेरों  से   
टीवी बिक गए करोड़ों में !
जनता का टीवी आएगा ,
दस दस रूपये के चंदे से ! 
इन बिके प्रचार साधनों से,साहसी नहीं हारा होगा !

परिवर्तन कौन रोक पाया  
कितने आये और चले गए
साधू, सन्यासी, महामना
के सभी आवरण उतर गए
अवसरवादी, फ़क़ीर बनकर 
आये थे, बापस चले गए !
चोरों को,उजागर करने का ,अरमान नहीं हारा होगा !

संसद से चोर भगाने को,
लड़ना होगा धनवानों से
ईमानदार  युग लाने को  
पिटना होगा बेईमानों से
सारी शक्तियां एकजुट हों,
योगी पर ताली बजा रहीं !
थप्पड़ ,घूँसा ,अपमानों से ,  ईमान नहीं हारा होगा !


Friday, November 21, 2014

तुमने उसके अपने घर को, घर अपना बतलाया होगा - सतीश सक्सेना

कितनी बार सबेरे माँ ने , दरवाजा खटकाया होगा !
और झुकी नज़रों से उसने दामन भी फैलाया होगा !

वे भी दिन थे जब अम्मा की नज़र से सहमा करते थे
आज डांटकर तुमने उनको कैसे चुप करवाया होगा !

यह लड़की थी,जो भाई के लिए,हमेशा लडती थी !
तुमने उसको,फूट फूट कर,सारी रात रुलाया होगा !

वे  खुद सबके बीच बैठकर,  बेटे के गुण गाते रहते    
अब उनको परिवारजनों में, शर्मिंदा करवाया होगा !

वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी,
ताकतवर आसन्न बुढ़ापे से ही, उन्हें डराया होगा !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !  
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे ?

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन गीत लिखे हैं , निर्धन और अनाथों पर, 
जाने पर मेरे  गीतों के , दावे दार संभाल सकोगे  ?

जीवन भर तुम रहे अकेले, ऊँगली पकडे पापा की  
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हंस हंस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार संभाल सकोगे ?

Wednesday, November 5, 2014

तुम्हें देखकर बस मचल ही तो जाते - सतीश सक्सेना

मुझे देख कर तुम , बदल ही तो जाते,   
बिना देखे हमको निकल ही तो जाते !

विदाई से पहले , खबर तक नहीं की  
तुम्हें देखकर, बस मचल ही तो जाते !

बुलावा जो आता तो आहुति भी देते  
हवन में भले हाथ, जल ही तो जाते !

अगर विष न होता तो नारी को दुमुहें
न जाने कभी का,निगल ही तो जाते !

अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते 




Sunday, November 2, 2014

ये नेता रहे तो , वतन बेंच देंगे - सतीश सक्सेना

ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे

कलम के सिपाही अगर सो गए
हमारे मसीहा , अमन बेंच देंगे !

कुबेरों के कर्ज़े लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे !

Monday, October 27, 2014

अरे गुलामों कब जागोगे ? - सतीश सक्सेना

अरे गुलामों, कब जागोगे
देश लुट रहा,पछताओगे !

वतन हवाले, करके इनके   
तुम वन्देमातरम गाओगे !

राष्ट्रभक्ति के मिथ्या नारों
से कब तक मुक्ति पाओगे !

खद्दर कब से, मूर्ख बनाता,
इससे कब हिसाब मांगोगे !

राजनीति की इस बदबू में  
कैसे, खुली हवा लाओगे ?

Thursday, October 23, 2014

दीपोत्सव मंगलमय हो -सतीश सक्सेना

दीपोत्सव मंगलमय सबको 
गज  आनन,गौरी पूजा से !

दुष्ट प्रवृतियां, कम हो जाएँ  
अस्त्र मिले, खुद चतुर्भुजा से 

बुरी शक्तियां पास न आएं 
शक्ति मिले अर्जुनध्वजा से

हो सम्मानित, गौरव  तेरा 
तीक्ष्ण बुद्धि,अक्षय ऊर्जा से

सदा रहें , अनुकूल शारदा ,  
गृह रक्षित हो,अष्टभुजा से !



Tuesday, October 21, 2014

कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में - सतीश सक्सेना

कहीं क्षितिज में देख रही है
जाने क्या क्या सोंच रही है
किसको हंसी बेंच दी इसने
किस चिंतन में पड़ी हुई है

नारी व्यथा किसे समझाएं,
गीत और कविताई में !
कौन समझ पाया है उसको, तुलसी की चौपाई में !

उसे पता है,पुरुष बेचारा
पीड़ा नहीं समझ पायेगा
दीवारों में रहा सुरक्षित 
कैसे दर्द, समझ पायेगा
पौरुष कबसे वर्णन करता, 
आयी मोच कलाई में !
जगजननी मुस्कान ढूंढती , पुरुषों की प्रभुताई में !

पीड़ा,व्यथा, वेदना कैसे
संग निभाएं बचपन का 
कैसे माली को समझाएं 
26 अक्टूबर जनवाणी

कष्ट, कटी शाखाओं का 
सबसे कोमल शाखा झुलसी,
अनजानी गहराई में !
कितना फूट फूट कर रोयी , इक बच्ची तनहाई  में !

बेघर के दुःख कौन सुनेगा ,
कैसे उसको समझ सकेगा ?
अपने रोने से फुरसत कब
जो नारी को समझ सकेगा ?
कैसे छिपा सके तकलीफें, 
इतनी साफ़ ललाई में !
भरा दूध आँचल में लायी, आंसू मुंह दिखलाई में !

कैसे सबने उसके घर को
सिर्फ,मायका बना दिया
और पराये घर को सबने 
उसका मंदिर बना दिया
कवि कैसे वर्णन कर पाए , 
इतना दर्द लिखाई में !
कैसी व्यथा लिखा के लायी ,अपनी मांगभराई में !

Wednesday, October 8, 2014

कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी - सतीश सक्सेना

प्रतिबद्धता कहें अथवा लाचारी सी !
जगजननी लगती,कैसी गांधारी सी !

धुत्त शराबी से जीवन भर, दर्द सहे !
कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी ! 

किसने नहीं सिखाया,उसे विदाई में 
पूरे  जीवन रहना , एकाचारी  सी !

छोटी उम्र में क्या बस्ती से सीखा है,  
किसे सुनाये बातें , मिथ्याचारी सी !

धीरे धीरे कवच पुरुष का, तोड़ रही !
कमर है,मालिन जैसी,देह लुहारी सी !

छप्पर डाल के  सोने वाले , भूल गए 
नारी के मन सुलग रही चिंगारी सी !

ग्लानि,थकान,विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये, नारी हारी सी !

Sunday, September 21, 2014

मौत हर वक्त याद रखता हूँ ! - सतीश सक्सेना

सिर्फ इक बात याद रखता हूँ !
आखिरी रात , याद रखता हूँ !

मुझ पे प्यारों के,कर्ज बाकी हैं !
उनकी सौगात, याद रखता हूँ !

कौन जख्मों को सोंच कर रोये !
हर हसीं  रात,  याद रखता हूँ !

मौलवी और पंडितों को नहीं !
भले असरात , याद रखता हूँ !

जो कभी साथ ही न चल पाये
वे भी आघात, साथ रखता हूँ !





Saturday, August 30, 2014

आखिरी फैसला - सतीश सक्सेना

"बेटा मैंने वह ऍफ़ डी  तुड़वा  कर सारे पैसे निकाल लिए तुम भी अपनी बीबी के साथ हिल स्टेशन जा सकते हो....."
 

              उसी दिन दे देते तो दोनों भाइयों के साथ ही चला जाता न  तब सबके सामने इतनी गाली गलौज  की  जरूरत नहीं पड़ती उस दिन तो दबाये बैठे रहे कि आखिरी ऍफ़ डी है ! लाइए पैसे, भाइयों को मत बोलना कि मैंने आपसे लिए हैं ! नहीं तो वह मुझसे अपना हिस्सा लड़ के ले लेंगे ! आज मन करे तो बड़े भाई के कमरे में ऐ सी चलाकर सो जाओ अच्छी नींद आएगी , मैं किसी को नहीं कहूँगा ! जीने के नीचे गर्मी ज्यादा है !

"नहीं पांच छह सालों में मेरी अब मेरी आदत पड़ गयी है , मैं यही ठीक हूँ !"

                                                  ***********
                    जैसा आपसे बात हुई थी सारे अमाउंट का चेक आपकी बैंक में जमा करा दिया गया है यह रही रसीद ! अब आप यहाँ यहाँ दस्तखत कर दीजिये मगर अब आप अकेले कैसे रहेंगे  ?

          "मैंने इस घर के सामने वाले मकान में एक कमरा किराए  पर ले लिया है , काम करने को मेरी पुरानी नौकरानी रहेगी ! इन लड़कों ने धीरे धीरे मकान के तीनो कमरे कब्ज़ा लिए , ड्राइंग रूम में मेरे सोने से घर में इन्फेक्शन फैलता था सो पिछले २ वर्ष से सीढियों के नीचे मेरी खाट डाल दी, अब यह तीनो मेरे मरने का इंतज़ार कर रहे हैं ! मुझे कम पैसों की चिंता नहीं जो तुमने इस मकान के बदले दिए हैं मेरे बुढ़ापे के लिए काफी हैं ! रही बात मकान की , सो मैंने अपने पैसों से बनाया था , उसी मकान में मेरे इन लालची लड़कों ने , धीरे धीरे मुझे सीढियों के नीचे  तक पंहुचा दिया ! तुम तीनों कमरों का सारा सामान निकाल कर सड़क पर रख दो और बाहर एक चौकीदार रख दो, जब तक यह तीनों बापस आएं !"

वे तीनों आपसे लड़ेंगे बाबूजी !

"मुझे परवाह नहीं, पुलिस एस पी से मिल चूका हूँ उन्होंने मेरी रिपोर्ट दर्ज कर ली है किसी भी गलत हालत में तीनों अपनी बीबियों के साथ जेल जायेंगे,मैं अब डरता नहीं !"

Friday, August 22, 2014

आज तुम्हारे दरवाजे भी लगते खूब बुहारे से - सतीश सक्सेना

मुक्त हंसी के कारण चिंतित रहते,यार हमारे से !
अब तो इनके दरवाजे भी, लगते खूब बुहारे से !

कितनी झुकी झुकी ही रहतीं,नज़रें शर्म के मारे से 
कब आएगी रात,पूछतीं अक्सर सांझ सकारे से !

बीमारी में सो न सकोगे , इंसानों  की बस्ती में !
लोग जागरण  के चंदे को , फिरते मारे मारे से !

उठो नींद से,होश में रहना बस्ती नज़र आ रही है
गहरे सागर से बच आये , खतरा रहे किनारे से !

दर्द दगा और धोखे ने भी,यारों जैसा संग दिया     
हमने सारा जीवन अपना, काटा इसी सहारे से !

Monday, August 18, 2014

बार बार क्यों मन को बदले, इतनी बार दिखावा क्यों - सतीश सक्सेना

इतनी बार बदलकर कपडे
कुछ तो रंग निखारा होगा 
इस निर्दोष सौम्य चेहरे से
सबको मूर्ख बनाया होगा !
पूरे जीवन लगा मुखौटे 
घर परिवार चलाते आये 
निर्मल मन को गंदा करके,
ड्राइंग रूम सजाना क्यों ?
धन के पीछे पागल होकर, दीपावली मनाना क्यों ?

चौंक चौक रह जाते कैसे,
कहीं झूठ तो बोला होगा 
कैसे नज़रें, छिपा रहे हो,
गौरय्या को मारा होगा !
मोहक वस्त्र पहन के कैसे  
असली रंग छिपाते आये 
मेहमानों के  आगे,नकली 
मुस्कानों को  लाना क्यों ?
अविश्वास का पर्दा मन में, रिश्तों को उलझाना क्यों ?

सद्भावना समझ न आये 
औरों से सम्मान चाहिए
जीवन भर बेअदबी करके
अपने घर में अदब चाहिए
दादी माँ वृद्धाश्रम पंहुचा,
कैसे अपनी व्यथा घटाई 
आग लगा अपने हाथों से 
दैविक दोष बताना क्यों ?
संस्कारों की व्याख्या रोकर,आज दर्द में करना क्यों ?

बरसों बीते, गाली देते
अहंकार को खूब पूजते 
अपने पूरे खानदान  में 
मानवता शर्मिंदा करते
कितनी बेईमानी करके 
सारे जग में नाम कमाए
अंत समय मन क्यों घबराये,
गैरों को अपनाना क्यों ?
ऐसा क्या जो,सुना सुना के,इतनी कसमें खाना क्यों ?

जिसको विदा करा के लाये 
उसको खूब रुलाया होगा,
वृद्धावस्था में  बूढ़े  को ,
रोकर रोज सुलाया होगा ! 
अपनी माँ को धक्का दे के   
माँ दुर्गा के पाठ कराये !
अब क्यों डरते हो दर्पण से, 
ऐसे भी शर्माना क्यों ?
कैसे किये गुनाह अकेले इतना भी घबराना क्यों ?

Wednesday, August 6, 2014

खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को - सतीश सक्सेना

किन्हीं गुरुजन के सम्मान में जवाब के कुछ अंश :
आप विद्वान् हैं , मैं विद्वान नहीं हूँ और न विद्वता खोजने निकला हूँ , साहित्य को आगे ले जाना मेरा लक्ष्य नहीं है भाई जी , मेरा लक्ष्य है समाज के पाखण्ड और अपने चेहरों पर लगे मुखौटे उतार कर , सिर्फ इंसान बन पाने की तमन्ना ! अपना कार्य कर रहा हूँ और बिना नाम चाहने की इच्छा के ! सो मुझे यश नहीं चाहिए हाँ सरल भाषा के जरिये अगर कुछ लोग भी इन्हें आत्मसात कर पाए तो लेखन सफल मानूंगा !
मुखौटे उतारने होंगे 
आज कवि और साहित्यकार भांड होकर रह गए हैं पुरस्कारों के लालच में , लोगों के पैर चाटते हुए कवि अब घर, समाज, परिवार सुधार पर नहीं लिखते , धन कमाने को लिखते हैं ! इन्हें समझाने के लिए नियमों में बिना बंधे, काम करना होगा, साहित्यकारों को बताना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनके भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः अनपढ़ और सामान्य जन से उनकी कविता बहुत दूर चली गयी है , अब उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने के लिए नहीं लिखी जातीं  वे सिर्फ आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
भाव अभिव्यक्ति के लिए कवि किसी शैली का दास नहीं हो सकता , कविता सोंच कर नहीं लिखी जाती उसका अपना प्रवाह है बड़े भाई , अगर उसमें बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! तुलसी और कबीर ने किस नियम का पालन किया था ! आज भी, कुछ उनके शिष्य हो सकते हैं !
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
जहाँ तक गद्य की बात है मैंने लगभग ४५० रचनाएं की हैं उनमें कविता और ग़ज़ल लगभग २०० होंगी बाकी सब लेख हैं जो समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं , आपसे बहुत छोटा हूँ मगर कोई धारणा बनाने से पूर्व हो सके तो इन्हें पढियेगा अगर बड़ों का आशीर्वाद मिल सका तो धन्य मानूंगा !!
बहुत ज़ल्द ही ढोंग, मिटाने जागेंगे ,दुनिया वाले,
खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को !
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ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे ?
हानि लाभ का लेखा लिखते ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

Monday, August 4, 2014

दरो दीवार को , हर हाल बचाना होगा - सतीश सक्सेना

दर ओ दीवार को हर हाल बचाना होगा ! 
आंधी तूफ़ान से लड़ने का बहाना होगा !

कैसी ज़िल्लत है नाचने में,बताने के लिए  
भरी महफ़िल में,मदारी को नचाना होगा !

माँ के तकिये में सिले,मेरे ही फोटो निकले 
मेरा ख़याल था, इसमें तो खज़ाना होगा !

आजकल आसमां पर,लोग नज़र रखते हैं
इन चमकते हुए , तारों को हटाना होगा !

कबसे ठहरा हुआ यह दर्द,पोंछने के लिए ! 
सूखे बंजर में भी मेंहदी को लगाना होगा !

Sunday, August 3, 2014

कभी कभी बेचारा मन -सतीश सक्सेना

माँ का रहा, दुलारा मन !
उन आँखों का तारा मन !

कितनी मायूसी में सोया 
उनके बिन बेचारा मन !

चंदा सूरज से लड़ आया
ऐसे कभी  न हारा मन !

कैसे बेमन होकर माना  
माँ ममता का मारा मन 

जाने किसको ढूंढ रहा है    
गलियो  में बंजारा मन !

Friday, July 25, 2014

मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना

मुझको सदियों से,रुलाता है कोई,
रोज आकर ,थपथपाता है कोई !

करवटें मुझको बदलता  पाकर ,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !

जब कभी दर्द , न सोने दें मुझे ,
नींद को,लोरी सुनाता है कोई !

एक बच्चे से ही, तो गलती हुई !
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !

जब कभी आँख से आंसू छलके,
हिम्मतें मुझको दिलाता है कोई 

कितनी रातें रूठ कर खाया नहीं 
एक कौरा,मुंह में दे जाता कोई !

Saturday, July 19, 2014

दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को ! - सतीश सक्सेना

अदब कायदा रखिए भाई,देख कुएं औ खाई को
गिरना है, वो गिर के रहेगा, देगा दोष खुदाई को ! 

सारे फ़र्ज़ निभाए हमने, अब जाने का वक्त हुआ !   
दरवाजे पर कौन खड़ा है, इतनी रात बधाई को !

घर मे कीचड़ से खेले हो, गर्वीले दिन भूल गए,     
आसानी से दाग़ न जाएँ , करते रहो पुताई को !

लेना देना, रस्म रिवाजों से ही , घर का नाश करें 
बहू तो कब से इंतज़ार में बैठी मुंह दिखलाई को !

प्रतिरोपण के लिए वृक्ष की कोमल शाखा दूर हुई, 
बरगद की  झुर्रियां बताएं , कैसे सहा विदाई को !

Wednesday, July 16, 2014

अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा करा कर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना

जाने से पहले दुनियां को,कुछ गीत सुनाकर जाऊंगा !
अनुराग समर्पण निष्ठा का सम्मान बढ़ाकर जाऊंगा ! 

श्री हीन हुए स्वर,गीतों के , झंकार उठाकर जाऊंगा !   
अनजाने कवियों के पथ में,ये फूल चढ़ाकर जाऊंगा !

निष्कपट आस्था श्रद्धा का अपमान न हों,बाबाओं से  
स्मरण कबीरा का करके,शीशा दिखलाकर जाऊँगा !

लाचार वृद्ध,अंधे,गूंगे, पशु, पक्षी की तकलीफों को !
लयबद्ध उपेक्षित छंदों में,सम्मान दिलाकर जाऊँगा !

कुछ वादे करके निकला हूँ अपने दिल की गहराई से
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा कराकर जाऊँगा !

Saturday, July 12, 2014

हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना

तुम जुगनू के व्यापारी हो 
हम प्रकाश ,फैलाने वाले !
तुम गीतों के सौदागर हो
हम निर्भय हो गाने वाले !
हमको कब हिन्दी दल्लों की, 
जीवन में परवाह रही है !
रचनाएं,कवियों की जग में,इकबालिया गवाह रही हैं !

सबक सिखाने की मस्ती में 
शायद, साँसे भूल गये हो !
चंद दिनों की हँसी और है 
शायद मरघट भूल गए हो ! 
स्वाभिमान को सबक सिखाने,
चेष्टा बड़ी,अदाह रही है !
हमको भी,तुम पर लिखने की इच्छा बड़ी अथाह रही है !

अरे ! तुम्हारा चेला  कैसे 
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले 
औ वो पद्मविभूषण पाया  !
कोई सूर बना गिरिधर का, 
कोई मीरा रसदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !

सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर  
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे,हुक्का भरकर 
तितली जगह जगह इठलाकर,
करती खूब विवाह रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ से ? दुनियां  में  अफवाह रही है !

बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो 
जीवन भर जो पाँव दबाये 
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , 
चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित,चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

गुरुवर तेज बनाये रखना 
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बलपर 
इनको कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों 
को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने करली, उतनी ही तनख्वाह रही है !

Thursday, July 10, 2014

कैसे कैसे लोग भी, गंगा नहाये इन दिनों ! ! -सतीश सक्सेना

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !

झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,
कैसे कैसे लोग भी , गंगा  नहाये इन दिनों !

सैकड़ों बलवान चुनकर , राजधानी आ गए !
आप संसद के लिए, आंसू बहायें इन दिनों !

देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों !

ये वही नाला है जमुना नाम था,जिसके लिए, 
साफ़ करने के लिए,चलती हवायें इन दिनों !

Friday, July 4, 2014

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो - सतीश सक्सेना

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो
सब को इबादतों का, अरमान मुबारक हो !


माता पिता को रखना ताउम्र प्यार से तुम !
अल्लाह का दिया ये , अहसान मुबारक हो ! 


इन रहमतों के क़र्ज़े , कैसे  अदा  करोगे ?
माँ-बाप का ये प्यारा दालान मुबारक हो !


रहमत के माह में तो कुछ काम नेक कर ले
जो दे सवाब तुम को रहमान , मुबारक हो !


मुझ को मेरे ख़ुदाया तू राहे हक़ प रखना
तेरा अता किया  , ये ईमान मुबारक हो !

Sunday, June 29, 2014

अनु को मेरे पूरे प्यार के साथ -सतीश सक्सेना

विद्वानों में गिने जाते हम लोग, अक्सर जीवन की सबसे बड़ी हकीकत, मौत की याद नहीं आती जब तक सामने कोई हादसा न हो जाए ! 
आज अनु की जन्मदिन पर वह मनहूस दिन याद आ गया जब उसने अपने नन्हें अजन्में पुत्र के साथ अंतिम सांस ली थी ! वह अपने घर की सबसे प्यारी लड़की थी जिसका खोना हम कल्पना भी नहीं सकते मगर घर के सब बड़े बूढ़ों को छोड़ सबसे पहले, वही, यहाँ से चली गयी !

दूर देश जाना,  था उसने ,
पंखों से, उड़ जाना उसने 
प्यार बांटकर हँसते हँसते 
परियों सा खो जाना उसने 
स्वर्णपरी कुछ दिन आकर ही,
सबको सिखा गयी थी गीत !
कहाँ खो गयी, हंसी  तुम्हारी  ,किसने छीन लिया संगीत   ?

ऐसा लगता , हँसते गाते 
तुझको कोई छीन ले गया !
एक निशाचर,सोता पाकर 
घर से तुमको उठा ले गया !
जबसे तूने छोड़ा हमको, 
शोक मनाते  मेरे गीत !
सोते जगते, अब तेरी,  तस्वीर बनाएं मेरे  गीत !

काश कभी तो सोंचा होता 
इतनी  बुरी  रात आयेगी ,
नाम बदलते,तुझे छिपाते 
बुरी घडी भी कट जायेगी !
बड़े शक्तिशाली बनते थे ,बचा न पाए तुझको गीत ! 
रक्त भरे वे बाल तुम्हारे , कभी  न  भूलें मेरे गीत ! 

ऐसा पहली बार  हुआ था  
हंसकर उसने नहीं बुलाया 
हम सब उसके पास खड़े थे 
उसने हमको, नहीं बिठाया  !
बिलख बिलख कर रोये हम सब,
टूट न पाई उसकी नींद ! 
उठ जा बेटा तुझे जगाते , सिसक सिसक कर रोये गीत  !

कितनी सीधी कितनी भोली 
हम सब की हर बात मानती 
बच्चों जैसी, लिए सरलता,
स्वागत करने हंसती आती !
जब जब, तेरे घर पर जाते,  
तुझको ढूंढें मेरे गीत  !
हर मंगल उत्सव पर बच्चे, शोक मनाएं मेरे गीत  !

जाकर भी वरदान दे गयी 
श्री धर  पुत्री, दुनिया को !
खुद केशव की  रक्षा करके ,
दान दे गयी , दुनिया को !
बचपन अंतिम , साँसे लेता , 
सन्न रह गये सारे गीत !  
देवकि पुत्री के जीवन को ,बचा  न  पाए  मेरे  गीत  !

                          अनु के असमय जाने को याद करते समय, आज सोंच रहा था कि पिछले ३७ साल की नौकरी में लगभग हर चार वर्ष बाद एक ट्रांसफर हुआ है , इस वर्ष ऑफिस वाला आखिरी ट्रांसफर (रिटायरमेंट) भी होना है , अगर इसी क्रम में गिनता जाऊं तो शायद दुनियां से, ट्रांसफर होने में अधिक समय बाकी नहीं है ! फोटोग्राफी का बचपन से शौक रहा है , शायद मैं अकेला लेखक हूँ जो कि अपनी हर रचना के साथ अपना चित्र अवश्य लगाता है ताकि सनद और मुहर लगती रहे इन कविताओं और विचारों पर कि ये किसके हैं ! जाने के बाद हम सिर्फ अपने निशान छोड़ सकते हैं , और अगर वे अच्छे और गहरे हों तो अनु की तरह लोग याद करेंगे और आंसुओं के साथ करेंगे  !!  
love you sweet girl  !

Saturday, June 28, 2014

कौन जाने यह विधाता कौन है ? - सतीश सक्सेना

ऐसी दुनियां को बनाता कौन है ?
कौन जाने,यह विधाता कौन है ?

इस बुढ़ापे में, नज़र क़ाफ़िर हुई,
वरना ऐसे , गुनगुनाता कौन है ?

इश्क़ की पहचान होनी चाहिए
बे वजह यूँ, मुस्कराता कौन है ?

आपको तो, काफिरों से इश्क है !
वर्ना इनको मुंह लगाता कौन है ?

चलके वृन्दावन में ही पहचान हो 
काफिरों को घर बुलाता कौन है ?

Friday, June 20, 2014

विदेश जाने में डर..- सतीश सक्सेना

जीवन की आपाधापी में ३६ साल की नौकरी कब पूरी हो गयी,पता ही नहीं चला ! घर की जिम्मेवारियों और बच्चों के लिए साधन जुटाने में, समय के साथ दौड़ते दौड़ते अपने लिए समय निकालना बहुत मुश्किल रहा ! कई बार लगा कि जवानी में जो समय अपने लिए देना चाहिए शायद वह कभी दे ही नहीं पाए ! अक्सर इसका कारण पूर्व नियोजित लक्ष्य,बच्चों के भविष्य,की आवश्यकता पूरा करते करते धन का अभाव रहा अथवा अपने मनोरंजन के लिए आवश्यक हिम्मत और समय ही नहीं जुटा पाए !
बचपन में सुनता था कि जवाहर लाल नेहरु के कपडे पेरिस धुलने जाते थे ! धनाड्य लोगों के किस्से सुनकर उनके आनंद को, हम निम्न मध्यम वर्ग , महसूस कर, खुश हो लेते थे ! उड़ते हवाई जहाज की एक झलक पाने को, खाना छोड़कर छत पर भागते थे कि वह जा रहा है एक चिड़िया जैसा जहाज और फिर अपने सपने समेट कर, चूल्हे के पास आकर, रोटी खाने लगते थे ! उन दिनों उड़ते हवाई जहाज में बैठने की, कल्पना से ही डर लगता था !

पेरिस रेलवे स्टेशन 
गौरव अपनी कंपनी कार्य से, जब जब देश से बाहर गए हर बार उसका अनुरोध रहता कि पापा एक बार आप जरूर आ जाओ विभिन्न देशों की संस्कृति, रहनसहन और खानपान  में  बदलाव आपको अच्छा लगेगा ! हर बार व्यस्तता और छुट्टी न मिलने का बहाना करते हुए मैं, उन्हें असली बात कभी नहीं बता पाता था !

मुख्य कारण दो ही थे, पहला पता नहीं कितना खर्चा कितना होगा और दूसरा विदेशियों के परिवेश में घुलने, मिलने, बात करने में, आत्मविश्वास की कमी ....
और यह भय इतना था कि अगर यूरोप के टिकट अचानक बुक नहीं किये जाते तो शायद मैं अपने जीवन काल में कभी विदेश यात्रा का प्लान नहीं बना पाता !
यह प्रोग्राम अचानक ही बन गया जब नवीन ने वियना से अपने माता पिता के साथ मुझे भी वियना आने का
वेनिस की पानी से लबालब गलियां 
निमंत्रण दिया था ! उसके पत्र मिलने के साथ ही, अप्पाजी ने, अपने साथ साथ मेरा  टिकट भी, मेरे द्वारा कभी हाँ कभी न के बावजूद , बुक करा लिए थे ! उस शाम आफिस से लौटने पर पहली बार लगा कि मैं वाकई यूरोप यात्रा पर जा रहा हूँ ! 
उसके बाद, सफर पर जाने के लिए आवश्यक, बीमा कराया गया ! 15 दिन के इस सफर के लिए, आई सी आई सी आई लोम्बार्ड ने  लगभग ५५०० रुपया लिया था ! इस बीमा के फलस्वरूप हमें बीमारी अथवा किसी अन्य  वजह से होने वाली क्षति का मुआवजा शामिल था !
मगर जब पहली बार, विदेश पंहुच गए तब जाकर पता लगा कि बेबुनियाद भय, आत्मविश्वास को किस कदर कम करता है ! अतः सोचा कि मित्रों में अपना अनुभव अवश्य बांटना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति और लोग न महसूस करें !
वियना ट्राम 
अधिकतर मेरे मित्र लगभग हर वर्ष देश भ्रमण पर खासा पैसा खर्च करते हैं मगर विदेश जाने के बारे में प्लानिंग की छोड़िये, अपने घर में इस विषय पर चर्चा भी नहीं करते हैं और यह सब आत्मविश्वास और जानकारी के अभाव के कारण ही होता है !  

स्वारोस्की फैक्ट्री ऑस्ट्रिया 
शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि विदेश जाएँ या न जाएँ मगर हर परिवार के पास पासपोर्ट होना बहुत आवश्यक है, यह एक ऐसा डोक्युमेंट हैं जिसके जरिये भारत सरकार आपके बारे में, यह सर्टिफिकेट देती है कि पासपोर्ट धारक भारतीय नागरिक है तथा इस परिचयपत्र में आपके नाम और पते के अलावा जन्मतिथि,  तथा जन्मस्थान लिखा होता है ! किसी भी देश में प्रवेश करने  की परमीशन(वीसा) के लिए, इसका होना आवश्यक है ! यह कीमती डॉक्यूमेंट आपके घर के पते और जन्मतिथि के साथ आपके परिचय पत्र की तरह भी भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है !

इंटरलेकन, स्विट्ज़रलैंड
यह जानना आवश्यक है कि विदेश यात्रा हेतु , अगर दो माह पहले, किसी भी देश की फ्लाईट टिकिट बुक करायेंगे  तो लगभग आधी कीमत में मिल जाती है ! दिल्ली से पेरिस अथवा स्वित्ज़रलैंड जाने का सामान्य आने जाने का एक टिकट, लगभग ३५ हज़ार का पड़ता है जबकि यही टिकट तत्काल लेने पर ६० हज़ार का आएगा ! सामान्यता एक अच्छा टूरिस्ट होटल ३००० रूपये प्रति दिन में आराम से मिल सकता है !
अगर आपकी ट्रिप ४ दिन की है तो एक आदमी के आने जाने का खर्चा लगभग मय होटल ४५०००.०० तथा भोजन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट  मिलकर ५००००-६०००० रुपया

में ! अगर आप यही ट्रिप किसी अच्छे टूर आपरेटर के जरिये करते हैं तो आपका कुछ भी सिरदर्द नहीं, साल दो साल में  ५० - ६० हज़ार रुपया बचाइए और ४ दिन के लिए पेरिस, मय गाइड घूम कर आइये !

जहाँ तक खर्चे की बात है , हर परिवार में पूरे साल घूमने फिरने और बाहर खाने पर जो खर्चा होता है ,उसमें हर महीने कटौती कर पैसा बचाना शुरू करें तो कुछ समय में ही आधा पैसा बच जायेगा, बाकी का इंतजाम करने में बाधा नहीं आएगी !एक बार विदेश जाने के बाद आपके और बच्चों के आत्मविश्वास में जो बढोतरी आप पायेगे, उसके मुकाबले यह खर्चा कुछ भी नहीं खलेगा ! 
यूनाइटेड नेशंस , जेनेवा
अक्सर हम मरते दम तक अपनी सिक्योरिटी के लिए धन जोड़ते रहते हैं ,और बुढापे में , महसूस होता है कि जीवन में , और भी बहुत कुछ देख सकते थे जो  कर ही नहीं पाये और इतनी जल्दी जीवन की रात हो गयी ! मेरा अपना सिद्धांत है कि बेहद उतार चढ़ाव युक्त जीवन को, जब तक जियेंगे, हँसते मुस्कराते जियेंगे ! एक बात हमेशा याद रखता हूँ कि
  
" न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ..."
        
विदेश जाकर अच्छी इंग्लिश न बोल पाने के लिए न बिलकुल न डरें , आप वहाँ पंहुच कर पायेंगे कि अधिकतर जगह पर, इंग्लिश जानने वाले बहुत कम हैं ! आपको लगेगा कि आप ही सबसे अच्छी इंग्लिश / अंगरेजी बोलते हैं :-))
जिंदगी जिंदादिली का नाम है !!

Monday, June 16, 2014

उनको द्वारे पे ही अल्लाह याद आएंगे -सतीश सक्सेना

हम अगर दिख गए तो याद खुदा आएंगे 
ये तो तय है , वे मुझे देख के घबराएंगे !

एक अर्से के बाद, दर पे उनके आया हूँ !
देख मुझको,उन्हें अल्लाह नज़र आएंगे !

काश उस वक़्त,सहारे के लिए हो कोई !
वे मुझे  देख के हर हाल, लडख़ड़ायेंगे !

वे तो शायद मुझे, पहचान ही नहीं पाएं !
सूनी आँखों से छिने ख्वाब याद आएंगे !

यादें उनको तो वहीँ छोड़ के आना होगा !
वरना मिलने पे तो, वे होंठ थरथराएँगे !

Sunday, June 15, 2014

अलंकार,श्रंगार बिना हम दिल की बातें करते हैं ! -सतीश सक्सेना

जीवन में बदलाव करे उस गीत की बातें करते हैं ,
जो मन को छू जाये उसी संगीत की बातें करते हैं !

अम्मा दादी नानी बाबा से ही हम चलना सीखे , 
स्नेही आँचल में  कटे , अतीत की बातें करते हैं !

जीवन भर तूलिका चलाकर वैसी बना न पाये हैं  
जैसा सपनों में आया उस मीत की बातें करते हैं !

हमको कौन शाबाशी देगा, सन्नाटों में चलते  हैं !
कब्रों के संग बैठ जमीं से,प्रीत की बातें करते हैं !

कंगूरों से  रही लड़ाई ,  इंसानों से प्यार किया !
इतने बुरे समय में भी हम जीत की बातें करते हैं ! 

Wednesday, June 11, 2014

अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख ! - सतीश सक्सेना

ज्ञान सदा सम्मानित होगा खूब पुस्तकें पढ़ना सीख !
पुस्तक पढ़ने से पहले ही,बच्चे ध्यान लगाना सीख !

कड़ी धूप में, बहे पसीना, हार न माने, जीना सीख !
प्रतिद्वंदी फुर्तीला होगा,लेकिन पाँव बढ़ाना सीख !

हंसकर करें हमेशा स्वागत, मित्रों का अपने दरवाजे 
सारे धर्मों का,आदर कर,साथ बैठ कर,खाना सीख !

जीवन लगे असम्भव जीना,दृढ निश्चय से आंसू पोंछ  
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !

कभी न रोना न घबराना, कहीं पे हाथ नहीं फैलाना  
अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख !

Monday, June 9, 2014

इंतज़ार है, क्षितिज में कबसे, काले, घने, बादलों का

इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे,काले घने,बादलों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये, पाठ जमीं पर रहने का !

गर्म  हवा के लगे, थपेड़े, 
वृक्ष न मिलते राही  को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल 
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के, 
सीना जलता जननी  का  ! 
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !

चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों   से !
पीने का जल,जहर बनाये   
मानव  अपने  हाथों  से  !
डेली न्यूज़ के सौजन्य से , अच्छा लगता है जब लोग
बिना भेजे, रचना को छपने योग्य समझे !आभार !
मां के गर्भ को खोद के ढूंढे ,
लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !

उसी वृक्ष को काटा हमने   
जिस आँचल में,  सोते थे ! 
पृथ्वी  के आभूषण, बेंचे 
जिनमें  आश्रय  पाते  थे !
मूर्ख मानवों की करनी से, 
जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन,  बुझाने का !

जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले   
हमसे प्यार , चाहती  थी !
दर्द  से तडप रही मां घर में, 
देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !

जल से  झरते, झरने सूखे 
नरम मुलायम पत्ते, रूखे 
कोयल की आवाज़ न आये 
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,  
है आवाहन  मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !

Saturday, May 31, 2014

जाने कैसी नज़र लगी,खलिहानों को !-सतीश सक्सेना

मूरख जनता चुन लेती धनवानों को !
बाद में रोती, रोटी और मकानों को !

रामलीला मैदान में,भारी भीड़ जुटी,
आस लगाए सुनती,महिमावानों को !

काली दाढ़ी , आँख दबाये , मुस्कायें ,
अब तो जल्दी पंख लगें,अरमानों को !

रक्तबीज  शुक्राचार्यों  के , पनप रहे 
निंदा, नहीं सुनायी देती , कानों को !

दद्दा , ताऊ  कितने, गुमसुम रहते हैं !
जाने कैसी नज़र लगी,खलिहानों को !



नोट :  यह रचना आज जयपुर में छपी , बताने के लिए संतोष त्रिवेदी का आभार 
http://dailynewsnetwork.epapr.in/283149/Daily-news/04-06-2014#page/8/2 

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