Monday, June 9, 2014

इंतज़ार है, क्षितिज में कबसे, काले, घने, बादलों का

इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे,काले घने,बादलों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये, पाठ जमीं पर रहने का !

गर्म  हवा के लगे, थपेड़े, 
वृक्ष न मिलते राही  को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल 
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के, 
सीना जलता जननी  का  ! 
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !

चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों   से !
पीने का जल,जहर बनाये   
मानव  अपने  हाथों  से  !
डेली न्यूज़ के सौजन्य से , अच्छा लगता है जब लोग
बिना भेजे, रचना को छपने योग्य समझे !आभार !
मां के गर्भ को खोद के ढूंढे ,
लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !

उसी वृक्ष को काटा हमने   
जिस आँचल में,  सोते थे ! 
पृथ्वी  के आभूषण, बेंचे 
जिनमें  आश्रय  पाते  थे !
मूर्ख मानवों की करनी से, 
जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन,  बुझाने का !

जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले   
हमसे प्यार , चाहती  थी !
दर्द  से तडप रही मां घर में, 
देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !

जल से  झरते, झरने सूखे 
नरम मुलायम पत्ते, रूखे 
कोयल की आवाज़ न आये 
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,  
है आवाहन  मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !

17 comments:

  1. से बिन पानी, छाया के, सीना जलता जननी का !
    रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !..

    अब तो आ ही जानी चाहिए रिमझिम की फुहार ... तपती धरती की है यही पुकार ...
    आपका गीत लाजवाब है सतीश जी ...

    ReplyDelete
  2. हमारी करनी का फल भुगतेंगे हमीं।

    ReplyDelete
  3. कल वृक्ष विहीन हाई-वे के ऊपर चटक चाँदनी धूप में ड्राइव करते हुये...कुछ ऐसा ही ख्याल दिल में आया था...राजा अशोक सड़क के दोनों ओर छाया और फलदार वृक्ष लगवाया करते थे...अब सब के पास सुस्ताने का समय भी नहीं है...

    ReplyDelete
  4. जलती हुई धरती..तपती हुई हवा और प्यासे प्राणी..अब तो बरसों हे मेघा..

    ReplyDelete
  5. आपकी लिखी रचना मंगलवार 10 जून 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  6. जल से झरते, झरने सूखे
    नरम मुलायम पत्ते, रूखे
    कोयल की आवाज़ न आये
    जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे

    बहुत सुन्दर भाव अभिव्यक्ति आभार

    ReplyDelete
  7. बहुत ही सुंदर लाजवाब गीत है सतीश जी ..

    ReplyDelete
  8. सटीक चित्रण-
    आभार आदरणीय-

    ReplyDelete
  9. हर रचना की तरह एक और लाजवाब रचना :)

    ReplyDelete
  10. Let this intense appeal brings showers!

    ReplyDelete
  11. ल से झरते, झरने सूखे
    नरम मुलायम पत्ते, रूखे
    कोयल की आवाज़ न आये
    जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
    यज्ञ हवन के, फल पाने को, है आवाहन मेघों का !
    हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !
    .. बहुत सटीक ... हम नासमझ इन्सान नहीं समझते तभी तो भोगते हैं
    .. अब तो आ बरसो बादलो!!
    हम अभी पचमढ़ी की वादियों में क्या गए कि शहर की आग उगलती सड़कों पर लौटने का मन नहीं कर पा रहा था ...खैर जाएँ भी तो कहाँ आखिर लौटकर घर आना ही पड़ता है

    ReplyDelete
  12. aaj ke sandarv me sarthak rachna.....

    ReplyDelete
  13. A soft environmental concern - an affiliation attachment with mother Earth. Good Composition. Regards.

    ReplyDelete
  14. सुप्रभात बहुत सुन्दर रचना अभिव्यक्ति आभार

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,