Monday, November 24, 2014

भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !! -सतीश सक्सेना

बे-ईमानों  की  दुनियां में , 
अरविन्द,नाम है सपने का !
आँखों की पट्टी खोल रहा,   
उदघोषक है परिवर्तन का !
घर के संपन्न कुबेरों ने, 
यारों से मिलकर हरा दिया !
धूर्तों से इलेक्शन हारा है,संकल्प नहीं हारा होगा !

इकला था,और लड़ा सबसे  
निर्धन था बिन संसाधन के
कुछ चापलूस बतखोर जुड़े
आंधी में,लालच में धन के  
मक्कार नकाब लगा आये, 
विश्वास जीतने को उसका !
आघात हुआ था घातक पर,निष्कपट नहीं हारा होगा !

धनवानों की इस बस्ती में
अहसान रहे श्रमजीवी का !
मानव मूल्यों की  रक्षा में 
सम्मान रहे ,आंदोलन का
टीवी प्रचार,मीडिया बिके,
आंदोलन ख़त्म कराने को !  
विश्वास यही इन हिज़डों से,यह मर्द नहीं हारा होगा !

ठट्ठा, मज़ाक, उपहास और 
अपमान हुआ है गांधी का !
चोरों, मक्कारों के  द्वारा   
अवमान हुआ है,आंधी का !
राजा , कुबेर , भ्रष्टाचारी , 
सब एक मंच पर पंहुच गए !
जनता, मूरख बन हारी है ,विश्वास नहीं हारा होगा ! 

बिन पैसे, इस आंदोलन में 
इकला धनवानों साथ लड़ा 
बीमार था , डंडे , लाठी खा 
राज्यशक्ति के साथ लड़ा !
बर्फीला पानी बरसाया,
दुबले पतले हठयोगी पर !
भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !

सारी  ताकतें साथ आयीं
योगी का साथ छुटाने को  
टीवी अखबार खरीद लिए 
स्मृति से आग,हटाने को !
वोटों के व्यापारी जीते,
जनता ही हार गयी,फिर भी !
ना समझों को,समझाने का, संघर्ष नहीं हारा होगा !

कुछ साथी जमीर हारे थे 
अखबार बिके थे सोने में !
घबराए हुए , कुबेरों  से   
टीवी बिक गए करोड़ों में !
जनता का टीवी आएगा ,
दस दस रूपये के चंदे से ! 
इन बिके प्रचार साधनों से,साहसी नहीं हारा होगा !

परिवर्तन कौन रोक पाया  
कितने आये और चले गए
साधू, सन्यासी, महामना
के सभी आवरण उतर गए
अवसरवादी, फ़क़ीर बनकर 
आये थे, बापस चले गए !
चोरों को,उजागर करने का ,अरमान नहीं हारा होगा !

संसद से चोर भगाने को,
लड़ना होगा धनवानों से
ईमानदार  युग लाने को  
पिटना होगा बेईमानों से
सारी शक्तियां एकजुट हों,
योगी पर ताली बजा रहीं !
थप्पड़ ,घूँसा ,अपमानों से ,  ईमान नहीं हारा होगा !


19 comments:

  1. एक चिंगारी एक आग अंदर ही जलती होगी
    फूँक देने की चाहत में सब कुछ कहीं पलती होगी
    जलते रावण के पुतले देख तसल्ली होती होगी
    राम की ही होगी आग राम ही जलाकर आ रहा होगा ।

    वाह बहुत खूब ।

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  3. राजा,कुबेर,भ्रष्टाचारी , सब एक मंच पर पंहुच गए !
    जनता, मूरख बन हारी है ,विश्वास नहीं हारा होगा !
    एक चिंगारी एक आग अंदर ही जलती होगी
    फूँक देने की चाहत में सब कुछ कहीं पलती होगी
    ....आग कभी न बुझे ...यह विश्वास जरुरी है

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  4. परिवर्तन की आस तो सबने देखी थी ... मगर स्वार्थ इंसान को कहाँ से कहाँ ला देता है इसका उधाहरण भी हैं अरविन्द जी ... इसलिए तपना चाहिए उन्हें ...

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  5. सतीश जी क्या जोरदार रचना रची है एक एक शब्द अक्षरक्ष: सत्य को समेटे दिल में उतर गयी …………बस यही सत्य है आज यदि वो अकेला है तो गम नहीं साथ उसके सत्य है और सत्य हमेशा अकेला ही खडा मिलेगा उसी का परिणाम है देश में परिवर्तन आया है और आगे भी आयेगा बस मशाल ये जलती रहनी चाहिए बेशक उसे नाम न मिले लेकिन ये पहली मशाल उसी ने सबके दिलों मे जलायी है जरूर रंग लाएगी एक दिन ऐसी मुझे उमीद है।

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  6. एक एक कण मिल कर ही
    आंधी बन जाया करता है
    एक हल्का सा तिनका ही
    आँखों में पड़ जाया करता है
    प्रचंड रश्मियाँ सूरज की
    पड़ जाती कम राह दिखाने को
    एक दीपक बन तम से नहीं हारा होगा ।

    उद्द्वेलित करता गीत

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  7. गीत की तरीफ किये बिना नहीं रह सकता... लेकिन राजनैतिक विषय है, इसलिये मौन हूँ!
    कमाल है भाई साहब!! बहुत ही धारदार गीत!

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  8. आज के हालात पे सार्थक अभिव्यक्ति आपकी है --शानदार,उम्मीद तो कायम रहनी चाहिये की सच्चाई हारे नहीं वरन एकजुट हो आमूल परिवर्तन लाय।

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  9. परिवर्तन कौन रोक पाया
    कितने आये और चले गए
    साधू, सन्यासी, महामना
    के सभी आवरण उतर गए
    अवसरवादी,फ़क़ीर बनकर आये थे, चोले उतर गए !
    चोरों को,उजागर करने का ,अरमान नहीं हारा होगा !

    बहुत सही कहा आपने, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  10. आपकी लिखी रचना बुधवार 26 नवम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  11. राजनीती में अच्छी प्रतिभाओं को जमने में थोड़ा वक्त लग सकता है !
    सुन्दर गीत है !

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  12. वाह वाह बहुत खूब

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  13. काश ऐसा ही हो...जनता एक बार फिर सर आँखों पर बिठा लेगी

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  14. विश्वास बिकेंगे अक्सर पर, अरविन्द नहीं हारा होगा,,,
    वाह वाह...... बहुत खूब !

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  15. वाह वाह बहुत खूब ,सुन्दर प्रस्तुति .बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें

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  16. सुन्दर प्रस्तुति...बहुत खूब...

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  17. सत्य-संकल्प का सही चेहरा समय के साथ और भी स्पष्ट होगा तो हार-जीत का निर्णय भी स्वयं होगा..लेकिन अभी तो स्वार्थ का चेहरा ही ज्यादा दिख रहा है .

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  18. सामयिक और बेहद प्रभावशाली रचना...

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  19. सटीक अभिव्यक्ति

    बेहद प्रभावशाली

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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