Tuesday, December 29, 2015

एक अजनबी जाने कैसा गीत सुनाकर चला गया -सतीश सक्सेना

सो न सकूंगी आसानी से 
याद  दिलाती  रातों में !
बंद न हो पाएं  दरवाजे
कुछ तो था उन बातों में !
ले कंगन मनिहार बेंचने 
आया इकदिन आँगन में,
जाने कैसा सम्मोहन में , 
छेड़छाड़ कर चला गया !
पहली बार मिला, जूड़े में फूल सजा के चला गया !

रोक न पायीं अनजाने को
मंत्रमुग्ध सा आवाहन था !
सागर जैसी व्याकुलता में 
लगता कैसा मनमोहन था !
हृदयपटल ले गया चितेरा 
चित्र बनाकर, चुटकी में, 
सदियों के ये ओंठ कुंवारे, 
गीले करके, चला गया !
बैरन निंदिया ऐसी आयी, मांग सज़ा के चला गया !  

उसके हाथ सुगन्धित इतने
मैं मदहोशी में खोयी थी !
उसकी आहट से जागी थी
उसके जाने पर सोयी थी !
केशव जैसा आकर्षण ले 
आया था दिल आँगन में !
जाने कब मेंहदी से दिल का, 
चिन्ह बनाकर, चला गया !
कितनी परतों में सोया था दिल,सहला कर चला गया !

उसके सारे काम, हमारी
जगती आँखों मध्य हुए थे !
जाने कैसी बेसुध थी मैं ,
अस्तव्यस्त से वस्त्र हुए थे !
सखि ये सबके बीच हुआ
था,भरी दुपहरी आँगन में ,

पास बैठकर हौले हौले ,
लट सहला के चला गया !
एक अजनबी जाने कैसा, गीत सुनाकर चला गया !


Saturday, December 26, 2015

कौन गुस्ताख़ छेड़ता है हमें - सतीश सक्सेना

कोई हर वक्त  देखता है हमें ,
जैसे जनमों से जानता है हमें !

जिसने आवाज दी,यहाँ आये 
कौन गुस्ताख़, छेड़ता है हमें ?

वह बे मिसाल हौसला लेकर  
गहरी मांदों में खोजता है हमें ! 

नासमझ आशिकी सलामत है 
इतनी शिद्दत से चाहता है हमें !

इश्क़ ने दर्द , बेमिसाल दिया ,
कोई सपनों में हंसाता है हमें !

Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने इस राज में, कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते और घास की रोटी
किसने मज़दूर के घर,खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ उठाना भी अब गुलाबों को 
हमने भौंरों के बदन में , चुभे भाले देखे !

कैसे औरों का गिरेबान दिखाते जालिम 
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरस्वती है, जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे , देश में  नाले देखे !

Saturday, December 12, 2015

खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत - सतीश सक्सेना

जिन दिनों लेखन शुरू किया था उन दिनों भी, एक भावना मन में थी कि अगर मेरी कलम ईमानदार है तो किसी से प्रार्थना करने नहीं जाऊंगा कि मेरे लेखन को मान्यता मिले, आज नहीं तो कल, देर सवेर लोग पढेंगे अवश्य !
आश्चर्य होता है कि यहाँ के स्थापित विद्यामार्तंड, किस कदर चापलूसी पसंद करते हैं ……… 
 हमें हिंदी के सूरज और चांदों का विरोध करना चाहिए और जनता के सामने लाना चाहिए हो सकता है इन ताकतवर लोगों के खिलाफ बोलने से, इनके गुस्से का सामना करना पड़े मगर हमें इस तरह के घटिया सम्मान की परवाह नहीं करनी चाहिए ! मंगलकामनाएं हिन्दी को, एक दिन इसके दिन भी फिरेंगे !

कैसे कैसे लोग यहाँ पर
हिंदी के मार्तंड कहाए !
कुर्सी पायी है मस्के से
सुरा सुंदरी,भोग लगाए !
ऐसे राजा इंद्र  देख कर , 
हंसी उड़ायें मेरे गीत !
हिंदी के आराध्य बने हैं, कैसे कैसे लोभी गीत !


कलम फुसफुसी रखने वाले 
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी  
प्रतिभा नाक रगडती पाये  !
अभिलाषाएं छिप न सकेंगी,
इच्छा बनें यशस्वी गीत !
बेच प्रतिष्ठा गौरव अपना,पुरस्कार हथियाते  गीत !

इनके आशीषों से मिलता
रचनाओं का फल भी ऐसे
एक इशारे से आ जाता ,
आसमान, चरणों में जैसे !
सिगरट और शराब संग में 
साकी के संग बैठे मीत !  
पाण्डुलिपि पर छिडकें दारु,मोहित होते मेरे गीत !

चारण,भांड हमेशा रचते
रहे , गीत  रजवाड़ों के  !
वफादार लेखनी रही थी
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ही, 
खूब सुनाये  स्तुति गीत !
खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत !

Wednesday, October 21, 2015

कौन आये साथ मेरे दर्द सहने के लिए -सतीश सक्सेना

कौन आये साथ , गहरे दर्द सहने के लिए,
हम अकेले ही भले,जंगल में रहने के लिए !

जिस जगह जाओ वहां बौछार फूलों की रहे 
तुम बनाये ही गए , सम्मान पाने के लिए !

शिष्ट सुन्दर सुखद मनहर देवता आदर करें
कौन लाया जंगली से प्यार करने के लिए !

माँद के अंदर न जाएँ, ज़ख्म ताजे बह रहे
समय देना है,बबर के घाव भरने के लिए !

जाति,मज़हब,देश से इंसान भी आज़ाद हो,  
पक्षियों  से सीखिये,उन्मुक्त उड़ने के लिए !




Tuesday, September 15, 2015

मन के हारे, हार है - सतीश सक्सेना

 स्नेही दिनेशराय द्विवेदी  (फेस बुक पर ) जी के एक कमेंट के कारण, यह पोस्ट लिखने को विवश होना पड़ा !

" बड़े भाई घुूटनों के कार्टिलेज का ध्यान रखना। मैं उन्हें बरबाद कर चुका हूँ। बस चैक कराते रहना। शुभकामनाएँ!
इच्छा शक्ति की कोई कमी नहीं। अभी भी वह तो एवरेस्ट जाना चाहती है। पर हम प्रेक्टिस में अपने शरीर के किसी हि्स्से को इस कदर बरबाद न करें कि फिर से ठीक न हो सके। उम्र भी कोई चीज है। इस कारण लगातार निर्धारित अन्तराल से मेडीकल चैक अप जरूरी है। सभी स्पोर्टस्मेन के लिए "

यहाँ पर मैं आपसे सहमत नहीं हो पा रहा , दुनियां में अदम्य इच्छा शक्ति के लाखों उदाहरण हैं भाई जी जहाँ लोग उम्र की बिना परवाह किये लक्ष्य हासिल करते रहे हैं ! मैंने इससे पहले पिछले ४० वर्षों से कभी भी १०० मीटर नहीं भागा, ४५ मिनट का सामान्य वाक् अवश्य पिछले ४ वर्षों से शुरू किया है वह भी कभी नियमित नहीं रहा ! मगर काफी दिनों से सोंच रहा था कि मैं जल्दी ही रिटायर होने के बाद दौड़ना शुरू करूंगा और मुझे यह मौक़ा दिल्ली हाफ मैराथन (21Km दौड़ ) ने दे दिया !

आज दिनांक १५ sept २०१५ के मेरे प्रेक्टिस सत्र  पर नज़र डालें :
लक्ष्य : दिनांक 29 नवंबर 2015, दिल्ली हाफ मैराथन दौड़ = 21.097 किलोमीटर
सतीश सक्सेना- उम्र मात्र ६१ वर्ष , रेस में हिस्सा पहली बार, 40 वर्ष बाद ! जीवन की प्रथम रेस दिल्ली हाफ मैराथन2015 , उद्देश्य - जो समझना चाहें उन्हें अपरिमित मानव शक्ति का अहसास दिलाना …
15 september: (ट्रेनिंग दिन चौथा)
बिना रुके लगातार तेज वॉक एवं हलकी स्पीड दौड़ = 1घंटा 29 मिनट, कुल steps =9354,तय की गयी दूरी= 8.94 km, कैलोरी बर्न =549 , Max Speed=12.6km/h for a distance of 600meter, Avg. Speed=5.96km/h
जब मैंने यह रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरा तो उसमें एक विकल्प सीनियर सिटिज़न के लिए ५ किलोमीटर दौड़ भी था जिसकी फीस भी नाम मात्र की थी , दूसरा विकल्प १० किलोमीटर दौड़ का था और अंतिम विकल्प २१ किलोमीटर दौड़ का था जो अभी लगभग ११ सप्ताह आगे का था और मैंने इसे चुना ही नहीं बल्कि फेसबुक पर शेयर भी किया !
२९ नवंबर को होने वाली इस रेस के लिए मैंने रजिस्ट्रेशन १२ सितंबर को कराया है , मैंने इस रेस में अपनी हिम्मत बढ़ाने के लिए, अपने फेसबुक मित्रों से अपील की है कि वे आज से नित्य सुबह ५ बजे अपने घर से बाहर निकल कर अपनी सामर्थ्य अनुसार वाक् शुरू करें इससे मुझे हौसला मिलेगा कि मेरे मित्र जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे जानते तक नहीं, वे भी प्रोत्साहित कर रहे हैं ! मैं जानता हूँ कि कुछ कलमधनी मित्र इसका मज़ाक बनाएंगे मगर मेरा सोंचना है कि अगर एक मित्र भी मेरे साथ मुझ पर भरोसा करते हुए अपने घर के पार्क में आ गया तो मेरी मेहनत सफल कर देगा और आज ही कम से कम ३ मित्रों ने सुबह टहलना शुरू कर दिया और कुछ ने जीवन में पहली बार किया है इससे बड़ी मेरी जीत और हिम्मत अफ़ज़ाई क्या हो सकती है , मैं बेहद खुश हूँ और उन मित्रों का आभारी भी जो इसे सकारात्मक भाव से ले रहे हैं !
https://www.facebook.com/hashtag/delhihalfmarathon2015?source=feed_text&story_id=10205861039018438&pnref=story

२१ जून को रोम घूमते समय वारिश में स्लिप हो जाने के कारण मैंने अपना एंकल बुरी तरह से घायल कर लिया था इस समय भी वहां सूजन है , और एक साइड छूने पर दर्द भी होता है सामान्य स्थिति में मुझे स्वत रोकने के लिए यह खतरनाक चोट काफी होती मगर मुझे विश्वास है कि मैं इसके बावजूद दौड़ ही नहीं पूरी करूंगा बल्कि अपनी इच्छाशक्ति एवं प्राणशक्ति से इस घायल लिगमेंट को ठीक भी कर लूंगा  और वह भी बिना दवाओं के ! मानवीय शक्तियों की परख के लिए यह एक ऐसा प्रयोग है जिसे पूरा करने के लिए मुझे रिटायरमेंट तक का इंतज़ार करना पड़ा और अगर मैं स्व ट्रेनिंग में घायल नहीं हुआ तो मुझे विश्वास है कि इस प्रयोग में कामयाब रहूँगा और सबूत दूंगा कि बेकार रिटायर्ड व्यक्ति का तमगा लगाये एक सामान्य व्यक्ति ( नॉन एथलेटिक ) भी जवानों के लिए उदाहरण बन सकता है ! 

मेरा यह विश्वास है कि एलोपैथिक मान्यताओं को दृढ इच्छा शक्ति एवं मानवीय प्राणशक्ति आसानी से झूठा सिद्ध करने की क्षमता रखती है ! बीमारियों को ठीक करने का कार्य इंसान का है ही नहीं हमने शरीर की सेल्फ हीलिंग सिस्टम पर भरोसा खोकर अपना बहुत बड़ा अहित किया है ! मानवीय मुसीबत पर विजय पाने के लिए हमें अपने ऊपर विश्वास करना सीखना ही होगा !
मैंने बुढ़ापे को कभी स्वीकार ही नहीं किया अतः यह २१ किलोमीटर की दौड़ महज एक कौतूहल है साथ ही विश्वास है कि अगर इतने लोग कर रहे हैं तो मैं क्यों नहीं , उम्र मेरे लिए बाधा हो ही नहीं सकती क्योंकि मैंने कभी नहीं माना कि अधिक उम्र वाले जल्दी थक जाते हैं , उन्हें यह नहीं करना चाहिए उन्हें वो नहीं खाना चाहिए !

अतः ६१ साल की उम्र में, अपनी जीवन की पहली रेस ( २१ किलोमीटर ) को हँसते हुए पूरी करने की तमन्ना है कि अपने से छोटों और मित्रों को दिखा सकूँ कि अदम्य इच्छा शक्ति के बल पर शरीर कितना मज़बूत हो सकता है ! शायद इसी विश्वास पर आज मैंने लगातार केवल चार दिनों के प्रैक्टिस में, डेढ़ घंटा दौड़ कर बिना थके ९ किलोमीटर की दूरी बिना रुके तय की है जबकि दिल्ली मैराथन का आयोजन २९ नवंबर को है और अभी मेरे लिए ढाई माह बाकी है !

आप यकीन रखें यह काम वाहवाही अथवा प्रभामंडल विस्तार के लिए नहीं कर रहा इस स्टेटस को मेरे बच्चे,परिवार सब देख रहे हैं पिछले मात्र चार दिन की प्रैक्टिस से मुझे विश्वास है कि मैं यह दौड़ हँसते हँसते पूरी करूंगा बस अनुरोध है कि मेरे मित्रगण भी मेरा साथ दें और इस प्रयोग के गवाह रहें ! 

सादर आपका !

Sunday, August 16, 2015

बेशर्म गज़ल - सतीश सक्सेना

आजकल हिंदी में चोरों की बहुतायत है और अधिकतर चोर हैं जो दूसरों की शैली और रदीफ़ बेशर्मी के साथ कापी करते हैं ! मज़ेदार बात यह है कि उनका विरोध करने कोई आगे नहीं आ पाता क्योंकि ऐसा उन्होंने भी किया है अतः उनके पास इसे सही ठहराने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता ! सो हिंदी में ग़ज़ल लिखने वालों की धूम है ,और तालियां बजाने वालों की कोई कमी नहीं ! सो सोंचा आज हम भी हाथ फिरा लें दुष्यंत कुमार पर  …। 

माल बढ़िया लगे तो मुफ्त उड़ा लो यारो 
कौन मेहनत करे, हराम की खा लो यारो !

इसे लिख के कोई दुष्यंत मर गया यारो  !
उसकी शैली से ज़रा नाम कमा लो यारो ! 

बड़े बड़ों ने इस रदीफ़ का उपयोग किया
सबको अपनी ही तरह चोर बताओ यारो 

ग़ज़ल रदीफ़ तो , सब ने ही बनाये ऐसे
मीर ग़ालिब पे भी इलज़ाम लगाओ यारो 

बुज़दिलों जाहिलों में नाम कमाओ जमके 
बेहया आँख से इक  बूँद गिरा लो यारो !

Friday, August 14, 2015

जब तुम पास नहीं हो मैंने, सब कुछ हारा सपने में -सतीश सक्सेना

ऐसा क्या करता है आखिर संग तुम्हारा सपने में
कितनी बार विजेता होकर तुमसे हारा सपने में !

पूरे जीवन हमने अक्सर  छल मुस्काते पाया है,
निश्छल मन ही रोते देखा, टूटा तारा सपने में !

सारे जीवन थे अभाव पर,महलों के आनंद लिए
बेबस जीवन को भी होता एक सहारा सपने में !

कई बार हम बने महाजन कंगाली के मौसम में
कितनी बार हुई धनवर्षा,स्वर्ण बुहारा सपने में !

यादें कौन भुला पाया है, जाने या अनजाने ही,
धीरे धीरे भिगो ही जाता, एक फुहारा सपने में !

Thursday, July 16, 2015

बड़ी पहचान छोटी हो,गवारा दिल नहीं करता -सतीश सक्सेना

कहीं बंध जाएँ खूंटे से आवारा दिल नहीं करता !
भरोसा करके सो जाएँ बंजारा दिल नहीं करता !

दया पाकर कोई भिक्षा,फकीरों को नहीं भाती 
तुम्हारे  द्वार जाने को, दुबारा दिल नहीं करता !

मेरे हिन्दोस्तां की शान खो जायेगी , नफरत में  
बड़ी पहचान छोटी हो,गवारा दिल नहीं करता !

जमाने भर के भोजन को, मेरे पुरखों ने खोला है,
ये लंगर बंद करने को, हमारा दिल नहीं करता !

जिन्होंने साथ छोड़ा था मुसीबत में , पहाड़ों पर 
उन्हीं बैसाखियों का लें सहारा दिल नहीं करता !

Saturday, June 27, 2015

डूबती हिंदी बिचारी और हम बेबस खड़े - सतीश सक्सेना

भाषा सहोदरी पत्रिका के लिए हिंदी पर लिखने का अनुरोध पाकर उलझन में हूँ,  मैं हिंदी विद्वान नहीं हूँ और न इस कष्टकारक और नीरस विषय पर लिखने में सिद्धहस्त मगर आपका अनुरोध टाला भी नहीं जा सकता अतः एक कवि होने के नाते हिंदी की दुर्दशा और कारणों का विश्लेषण अपनी अल्प बुद्धि अनुसार करना चाहूँगा !
आज कवि और साहित्यकार धन ,नाम और पुरस्कारों के लालच में भांड होकर रह गए हैं , प्रभावी लोगों के पैर चाटते हुए कवि और लेखक अब प्यार ,स्नेह,समाज सुधार पर नहीं लिखते, बल्कि धन कमाने के लिए बेहद आवश्यक अपने प्रभामंडल विस्तार के लिए, अख़बारों पत्रिकाओं में छपने के लिए लिखते हैं ! 
आज के समय में साहित्यकारों को समझना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनकी  भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः सामान्य जन से उनकी रचना बहुत दूर चली गयी है , आज उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने में असमर्थ हैं और वे सिर्फ महत्वपूर्ण पदों पर बैठे, हिंदी के मशहूर टटपूंजी ठाकुरों के, आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
प्रभावी भाव अभिव्यक्ति के लिए रचनाकार की ईमानदारी व मधुर कोमल भावनाएं सर्वाधिक प्रभावी भूमिका निभाती हैं , जो बनावटी रचनाकारों में दूर दूर तक नहीं मिलतीं अतः उनके सृजन में व्यावसायिक छाप और नीरसता नज़र आना निश्चित है ! हिंदी के ज़रिये नाम व धन कमाने की होड़ में आगे पंहुचने का संक्षिप्त रास्ता, सिर्फ हिंदी मठाधीशों और अधिकारियों  के घर से होकर जाता है और  चाटुकारिता कर्म आसानी से उसकी समझ में आ जाता है !  उसके बाद शुरू होता है, जोड़तोड़ और पैर दबा कर उच्च पद पर बैठे एक सड़ियल व्यक्ति के साहित्य कर्म की तारीफों का पुल बाँधना, इस क्रम में  उसे हिंदी साहित्य सम्राट की पदवी देने वालों की लाइन लग जाती है ! विडम्बना यह है कि इन मठाधीशों के दरवाजे पर कुछ सम्मानित हिंदी विद्वान भी शर्म से सर झुकाये, बेमन ही सही पर घुटनों के बल बैठे नज़र आते हैं !
चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ,
इनकी मेहनत का वतन से मान मिलना चाहिए !
काम इतना सा है यारों,जब भी नेताजी दिखें, 
शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए !
कवियों का हाल और भी बुरा है,बेचारे हिंदी रचनाकारों की भीड़ में अपनी पहचान के लिए अपने नाम से पहले कवि लिख कर मंचों पर भावभंगिमाओं और फूहड़ चुटकुलों के साथ घटिया दर्शकों से तालियां बजवाकर अपने आप को कवि बनाये रखने की आवश्यक मानसिक खुराक पाता रहता है ! किसी गंभीर किस्म के व्यक्ति को आजकल के कवि मंचों को झेलना आसान नहीं ये सिर्फ शराबी  रिक्शे वालों और नौटंकी देखने वाली मानसिकता का सस्ता मनोरंजन मात्र रह गए हैं ! 
इंटरनेट ने लेखन को बेहद आसान और सस्ता बना दिया है , मगर इसके दुर्गुण भी कम नहीं ! हिंदी के धुरंधर विद्वान भी दूसरों की रचनाओं में भाव और शैली खोजते रहते हैं , इन उस्ताद विद्वानों के लिए, कम प्रसिद्द मगर प्रभावीशाली रचनाकारों की शैली , शब्दों और संवेदनशील अभिव्यक्ति की चोरी करना बेहद आसान है, सिर्फ थोड़ा सा बदलाव कर बड़ी आसानी से प्रभावशाली रचना बन जाती है और इनके मशहूर नाम के साथ यह बेईमान रचना बहुत सारे अखबार और पत्रिकाओं में आसानी से स्थान पा 
जाती है !  वास्तविक लेखक को पता चल जाने पर भी वह इस उस्ताद का कुछ नहीं बिगाड़ पाता और न कोई आसानी से उस पर भरोसा करता है , थोड़ा रोने पीटने के बाद वह बेचारा चुप बैठ जाता है और हिंदी उस्तादों का कार्य, इस बेधड़क चौर्यकर्म के साथ चलता रहता है !
सहज रचनाकार किसी की शैली का दास नहीं हो सकता, मेरा यह विश्वास है कि रचना सोंच कर नहीं की जाती उसका अपना प्रवाह है जो भावनाओं में डूबने पर अपने आप बहता है, अगर उसमें अतिरिक्त बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! 
तुलसी,मीरा,रसखान,  कालिदास और कबीर ने किसी नियम का पालन नहीं किया था और न उसके पीछे कोई लालसा थी  ! आज भी, उनके कुछ संवेदनशील शिष्य यहाँ वहां बिखरे हैं जिनको कोई नहीं जानता हाँ उनकी यह रचनाएं, खादी पहने मोटी तोंदों वाले प्रभावशाली हिंदी गिद्धों की दृष्टि की शिकार अक्सर होती रहती है ! और हिंदी इन चुराई हुई मिश्रित रचनाओं से फल फूल रही है यह और बात है कि इन गिद्धों के नोचने से नए प्रभावशाली रचनाकार उभर नहीं पा रहे ! 
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
अंत में यही कि भाषा बेहद मधुर है बशर्ते वह सही सृजन के माध्यम से निकले , वर्तमान में हिंदी की दशा बेहद दयनीय है , अनाथ हिंदी को जब तक एक माई बाप नहीं मिलता यह समाज का सम्मान नहीं ले पायेगी ! इसकी मधुरता तभी तक है जब तक हिंदी को प्यार करने वाले रचनाकार उसे सहारा देते रहेंगे !
कैसे करते इतनी गति से अनुवाद गीत भाषाओं का !
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम  भाषाओँ का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें,जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

सावन का अंधा क्या समझे जीवन स्नेहिल रंगों को,
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनियां को कुटिलों ने   
ये शब्द समर्पण न जानें,अभिमान हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !
सिर्फ एक आशा है कि इंटरनेट ने बहुत सारे लेखकों को सुविधा दी है लिखने की , मुझे उम्मीद है कि इन रचनाकारों में से कई बेहद प्रभावी सिद्ध होंगे हाँ हिंदी धुरंधरों के कारण उनकी पहचान में भले बरसों लगे क्योंकि लेखन अमर है, सो वह कभी न कभी पढ़ा अवश्य जाएगा बस यह समाज के लिए हितकारी रहे यही दुआ है !
जहाँ तक मेरी बात है मैंने लगभग ५०० रचनाएं की हैं उनमें कविता और हिंदी ग़ज़ल लगभग २५० होंगी बाकी सब लेख हैं जिनमें अधिकतर समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं ! 
भारत सरकार से अवकाश प्राप्त अधिकारी , नॉएडा में निवास 
http://satish-saxena.blogspot.com/
http://satishsaxena.blogspot.com
satish1954@gmail.com

Monday, June 15, 2015

तेरे झंडों से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा - सतीश सक्सेना

जो यहाँ जन्में उन्ही का देश माना जाएगा !
तेरे झंडों  से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा !

साधू,बाबा,तांत्रिकों ने देश शर्मिन्दा किया 
आस्था से धन कमाने का ज़माना जाएगा !

शहर जीता जब उन्होंने तब नशे में लोग थे 
होश आने दे शहर को ये ठिकाना जाएगा !

शुक्र है अब नौजवां, अंधे नहीं इस देश के
नबी के बच्चों से झगडे का बहाना जाएगा !

मिटा पाओगे निशां,अल्बर्ट,सेखों,हमीद के ?
सरजमीं पे उन्हीं का अधिकार माना जाएगा !

Saturday, June 6, 2015

शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए ! - सतीश सक्सेना

चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ,
इनकी मेहनत का वतन से मान मिलना चाहिए !

काम टेढ़ा कम नहीं है, जब भी नेता जी दिखें 
शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए !

दांत तीखे हों,नज़र दुश्मन पे, मौक़ा ताड़ कर
मालिकों के दुश्मनों पर, वार करना चाहिए !

मालिकों की शान में जितने कसीदे हों, पढ़ें 
धूर्त को योगी, विरागी भी,  बताना चाहिए !

पार्टियों में सूट हो पर , जाहिलों के बीच में
राष्ट्रभक्तों को धवल खद्दर, पहनना चाहिए !

Wednesday, May 27, 2015

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

पहली  बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें , फीकी पाओगे !

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे,गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया, चाँद सितारों ने
मीठे गीत न गाओ तुम फंस जाओगे !




Saturday, May 23, 2015

असरदारों से, न लड़ना चाहिए -सतीश सक्सेना

समझदारों को समझना चाहिए,
जीतने को, धन लुटाना चाहिए !

सारी दुनिया देख ले,सरदार को
असरदारों से, न लड़ना चाहिए !


मूर्खों के देश को, समझा दिया
कैसे मजमें को लगाना चाहिए !

दम भी है आवाज में,वादें भी हैं
भाई बहनों को समझना चाहिए 

चले थे लड़ने, खुदा से छोकरे
मूर्खों को, धन कमाना चाहिए !

Tuesday, May 19, 2015

कभी मुस्काएं गैरों पर, किसी दिन राह में थम कर - सतीश सक्सेना

आस्था का सहारा लेकर धन कमाने में व्यस्त ये जालसाज :
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आस्था बेच के देखें, कि छप्पर फाड़ आता क्या !
बड़ा रूतबा है दाढ़ी में,मनीषी क्या विधाता क्या !

यहाँ इक झोपडी में छिपके रहता इक भगोड़ा था 
निरक्षर सोंचता था मैं , वीरानों  में ये करता क्या !

तिराहे पर पुलिस के हाथ जोड़ा करता बरसों से,
मैं मूरख सोंचता था, इन मज़ारों से ये खाता क्या ! 

कमाई आधी रिश्वत में  निछावर कर, बना मंदिर !
शहर अंधों का उमड़ा ले चढ़ावा और पाता क्या !

अब इस प्राचीन मंदिर में दया बरसाई है प्रभु ने 
खड़ी है कार होंडा भवन में, तंगी से नाता क्या ! 

कभी मुस्काएं गैरों पर,किसी दिन राह में थमकर
बेचारा भूल के गम अपने सोचेगा,यह रिश्ता क्या !

Sunday, May 10, 2015

कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !-सतीश सक्सेना

यह एक संपन्न भरेपूरे घर की वृद्धा का शब्द चित्र है , जो कहीं दूर से भटकती एक बरगद की छाँव में अकेली रहती हुई ,अंतिम दशा को प्राप्त  हुई ! भारतीय समाज के गिरते हुए मूल्य हमें क्या क्या दिन दिखलायेंगे ? 

अच्छा है बुढ़िया चली गयी,थी थकी हुई बदली जैसी
दर्दीली रेखाएं लेकर, निर्जल, निशक्त, कजली  जैसी !

बरगद के नीचे ठंडक में कुछ दिन से थी बीमार बड़ी !
धीमे धीमे बड़बड़ करते,भूखी प्यासी कुम्हलायी सी !   

कुछ  बातें करती रहती थी, सिन्दूर,महावर, बिंदी से  
इक टूटा सा विश्वास लिए,रहती कुछ दर्द भरी जैसी !

भूखी पूरे दिन रहकर भी, वह हाथ नहीं फैलाती थी,
आँखों में पानी भरे हुए,दिखती थी अभिमानी जैसी ! 

कहती थी, उसके मैके से,कोई लेने,आने वाला है ! 
पगली कुछ बड़ी बड़ी बातें,करती थीं महारानी जैसी !

अपनी किस्मत को कोस रहीं, अम्मा रोयीं सन्नाटे में  
कुछ प्रश्न अधूरे से छोड़े,बहती ही रही पानी जैसी !

कल रात हवा की ठंडक में,कांपती रहीं वे आवाजें !
कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !

Thursday, May 7, 2015

कुछ तो बातें, ख़ास रही हैं चेले में - सतीश सक्सेना

कैसे यह सरदार गिर गया खेले में,
कुछ तो गहरी बात, रही है चेले में !

कैसे बादल फटे,अभी तो फेंका था   
इतनी ताकत कहाँ लगी थी,ढेले में !

गाली देकर,इनके ही सारथियों ने  
रथ के पीछे, बाँध घसीटा मेले में !

ऐसे ही शुभ लाभ  चाहने वालों ने !
लालाजी बिक गए नकासे धेले में !

पुनर्जन्म लंकेश का हुआ रघुकुल में
अबकी राम लड़ेंगे, युद्ध  अकेले में !


Wednesday, May 6, 2015

ये ग़ज़ल कैसी रही ? - सतीश सक्सेना

गर्दिशों में खिलखिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !
आंसुओं में झिलमिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

इस उदासी का सबब, कैसे बताएं,आप को,
सिर्फ रस्मों को निभाती, ये ग़ज़ल कैसी रही !

काबा, कंगूरों से चलकर, मयकदे के द्वार पे 
खिदमतों में सर झुकाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

मीर गालिब औ जिगर ने शौक से गहने दिए
हाथ जीवन भर पकड़ती ये ग़ज़ल कैसी रही !

कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही ! 

Monday, May 4, 2015

घनघोर घटायें बन जातीं,बंजारिन अखियाँ शाम ढले ! - सतीश सक्सेना

कड़वे तानें दरवाजे पर , दे जाएँ सखियाँ  शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

मेरे आँगन में इक जोड़ा , 
बरसों से चीं चीं करता है !
जाने क्यों आता देख मुझे,
कुछ गुमसुम हो जाता है !
कसमें, वादे, सपने जैसे 
हँसते रोते , ही बड़े हुए  !
जाने किन पश्चातापों से, 
भर आईं अँखियाँ शाम ढ़ले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

शहनाई की धुन में अक्सर 
मंज़र , बाराती हो जाए !
ढोलक मृदंग के साथ,खुलीं 
चौखटें गुलाबी हो जाएँ !
ये स्मृतिचिन्ह न जाने कब
से प्रश्नचिन्ह बन खड़े हुए !
जाने क्यों नज़र झुकाएं हैं,
चूड़ी की कनियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

सावन भादों तेरी यादों के 
दुनियां से छिपाए रहता हूँ !
ऐसे भी दिखाएँ क्यों आंसू 
वारिश में, चलते रोता हूँ !
कितने सपने रो पड़े बिना  
फूटी किस्मत से, लड़े हुए !
घनघोर घटायें बन जातीं,
बंजारिन अखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

क्यों जाम उठाने से पहले 
आँखें भी छलके जाती हैं
मदिरालय में,मेरे आते ही 
साकी भी छल के जाती है
मैं आता दर्द भूलने को ,
पर जैसे  भाले गड़े हुए  !
हर बार शराबी प्याले में, 
रंजीदा अँखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

कोई भी उदासी का फोटो,
तेरी नज़रें, दिल दहलाएं !
मुस्कान किसी चेहरे पे हो 
तू बार बार सम्मुख आये !
वे ख्वाब सुनहरे भी टूटे 
जो नवरत्नों से जड़े हुए  !
दिन जैसे तैसे कट जाता, 
लहराती रतियाँ शाम ढ़ले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

Monday, April 27, 2015

इतना देकर दुःख मुझको थक जाती होंगीं -सतीश सक्सेना

इतना दुःख देकर मुझको,थक जातीं होंगीं
करवट ले ले खुद को, खूब जगातीं होंगीं !

दिन तो कटता जैसे तैसे , मगर रात भर,
स्वयं लगाए ज़ख्मों को सहलातीं होंगीं !

शब्द सहानुभूति के विदा हुए , कब के !
अब सखियों में बेचारी,कहलातीं होंगीं !

जीवन भर का संग लिखा कर ले आयीं हैं 
फूटी किस्मत पा कितनी पछतातीं होंगीं !

जाने कितनी बार तसल्ली खुद को देकर , 
अभिमानों को स्वाभिमान बतलातीं होंगीं !

Saturday, April 25, 2015

किन्नर मन्नू महंत से बातचीत - सतीश सक्सेना

पिछले सप्ताह दिन में एक काल आयीं जिसमें अगर समय हो तो बात करने का अनुरोध था , दूसरी तरफ हरियाणा से मन्नू महंत
नामक किन्नर मुझसे अपने समाज के बारे में बात करना चाहते थे !उनसे बात करते समय यह लगभग साफ़ था कि वे अपनी बात कहने में बेहद गंभीर, व्यवस्थित और विद्वान थे और हरियाणा में अपनी गद्दी के प्रधान भी !  
इन्होने मेरा एक लेख पढ़कर ही मुझे फोन किया था , मेरे लेख एवं किन्नरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण के प्रति धन्यवाद कहते हुए उन्होंने लगभग आधा घंटा बात की जिसमें अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति समाज से शिकायत और बेहतर सम्मान की मांग शामिल थी  !
किन्नरों के प्रति समाज का रवैया न्याय पूर्ण नहीं है इसमें कोई संदेह नहीं , इन्हें समाज हमेशा शक की नज़र से ही देखता है व इनकी समस्याओं और स्थिति को जाने बिना , बदले में सिर्फ भय और नफरत ही देता है !
मानवता दया करुणा के नाम पर बड़ी बड़ी बातें करते हम लोग किन्नरों के प्रति जानवरों से भी खराब रवैया अख्तियार करते हैं , वे लोग सामान्य व्यक्तियों की भांति जीवन यापन करना चाहते हैं जो समाज करने नहीं देता ! 

किन्नर आदिकाल से पाये जाते हैं , पौराणिक काल में शिव के एक अवतार अर्धनारीश्वर की चर्चा है जिनका आधा
भाग नारी और आधा पुरुष का था , किन्नर शिव के इस रूप को पूजते हैं ! महाभारत में भी इनकी चर्चा है कि द्रुपद पुत्र शिखंडी, स्त्री स्वरूपा पैदा हुआ था, और उसकी आड़ में अर्जुन ने भीष्म पर तीर चलाये थे , चूंकि भीष्म की प्रतिज्ञा थी कि वे किन्नरों पर , निहत्थों पर एवं स्त्री पर प्रहार नहीं करेंगे युद्ध भूमि में पिछले जन्म की अम्बा को शिखंडी रूप में पहचान, उन्होंने हथियार एक और रख दिए और किन्नर शिखंडी की आड़ से, अर्जुन को भीष्म पर घातक वार करने का मौका मिला !

इनके बारे में तमाम गलत धारणाएं समाज में फैलायी गयी हैं , जिन लोगों को इनसे कोई सहानुभूति नहीं वही इनके बारे में सबसे अधिक अनर्गल प्रचार करते हैं !वे नाच गा कर  भिक्षा यापन कर अपना गुज़ारा करते हैं , उनका यह भी दावा है कि वे यक्ष , गन्दर्भ, किन्नर समाज के लोग हैं और नाच गाना उनका पुरातन पेशा है , उन्हें अपनी स्थिति से कोई शिकायत नहीं  बल्कि उसे पसंद करते हैं , समाज से उन्हें एक ही शिकायत है कि अगर समाज उनका आदर न कर सके तो भी उसे उनके अपमान का कोई अधिकार नहीं ! वे सूफी संत सम्प्रदाय की राह पर चलने वाले लोग हैं और उनकी दुआओं में उतनी ही शक्ति है जितनी किसी और और वास्तविक संत में ! 
इनके साथ अपराध होने की स्थिति में टेलीविजन मीडिया अथवा अखबारों में इन्हें कोई महत्व अथवा प्रमुखता नहीं दी जाती बल्कि इन्हें हेय व अपमानजनक दृष्टि से देखा जाता है !  वे अपने आपको किन्नर कहलाना पसंद करते है , हिजड़ा उर्फ़ छक्का शब्द एक गाली है जो इन्हें, निर्मम समाज की देन है , किन्नर हर धर्म का सम्मान करते व मानते  हैं , मृत्यु होने की दशा में किन्नरों को उनके धर्म  के आधार पर  दफनाया या जलाया जाता है !

इनको ट्रेन यात्रा अथवा बस यात्रा में कोई सीट नहीं देता चाहें यह बीमार ही क्यों न हों उनके साथ खाना पीना तो दूर लोग बैठना भी पसंद नहीं करते !
 अख़बारों के हिसाब से माने तो छत्तीस गढ़ में कोई कानून बनाने का प्रयत्न हो रहा है  जिसमें इन्हें ऑपरेशन द्वारा स्त्री या पुरुष बनाने की बात कही गयी है ? अगर यह सच है तो यह अमानवीय है ! उनका मानना है कि यह लोग अल्पमत में हैं और कम संख्या में हैं इनका सरंक्षण होना चाहिए न कि इन्हें समाप्त ही कर दिया जाये !

इनकी देवी का नाम  बहुचरा माता है जिनका मंदिर बलोल , संथाल , गुजरात में है !  मन्नू महंत का कहना है कि 

" चाहे इस्लाम हो या हिन्दू , हर धर्म में इन्हें सम्मान दिया गया है और इनकी चर्चा है ! वे आगे कहते हैं कि हाल में उन्होंने पढ़ा है कि किन्नरों को ऑपरेशन द्वारा महिला या पुरुष बना दिया जाएगा कितने दुर्भाग्य की बात है कि जिस भारत देश में किन्नरों को साधू संत और असली फ़क़ीर माना जाता है उनके अगर सुबह दर्शन हो जाएँ तो माना जाता है कि सारे आज काम पूर्ण होंगे , जिन्हे अल्लाह , वाहे गुरु , यीशु मसीह , भगवान के बहुत करीब माना जाता है वही मालिक के बन्दे अपनी पहचान के लिए भी किसी सरकार या हुकूमत के आगे मज़बूर हैं क्या इनके हकों के लिए क़ानून बनाने से पहले इनसे पूंछना जरूरी नहीं ?
क्या आपको नहीं लगता कि वे उन बेजुबान जानवरों में से नहीं जिनके बारे में कानून बनाने से पहले उनसे पूंछा भी नहीं जाता ? क्या आपको नहीं लगता कि कुदरत और प्रकृति से छेड़छाड़ करना गलत है ?
किन्नर अपनी जिन्दगी से बहुत खुश हैं वो सबको दुआएं देते हैं , सबका भला चाहते हैं , वे सूफी साधू संत हैं , भिक्षा यापन से गुज़ारा करते हैं  और ऐसे ही रहना चाहते हैं उन्हें नौकरी आदि कुछ नहीं चाहिए अगर समाज या सरकार उन्हें कुछ देना चाहती है तो उनके थोड़ी इज़्ज़त दे इस पंथ का अपमान न करे !"  
मन्नू महंत, गद्दी नशीन गुरु, गांव -भुन्ना ,तहसील - गुहला, जिला कैथल, हरियाणा -136034 
फोन - 9991789432 

-नई दिल्ली। भारतीय संसद के इतिहास में 40 साल बाद कोई निजी विधेयक कानून बनने की दहलीज पर खड़ा हुआ है जो किन्नरों को समाज में बराबरी के अधिकार देने की क्रांतिकारी नींव रखेगा।
राज्यसभा ने शुक्रवार को यह ऐतिहासिक पहल द्रमुक के तिरूचि शिवा की ओर से पेश किये गये इस गैर सरकारी विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। यह विधेयक अब लोकसभा के दरवाजे पहुंच गया है जहां यह तय होगा कि यह कानून का रूप ले पाता है या नहीं।
इसके बाद विधेयक सदन के नियमों के अनुसार विचार और पारित करने के लिए पेश किया जायेगा। किन्नरों के प्रति सहानुभूति देखते हुए सरकार लोकसभा में भी इस विधेयक के समर्थन में आ सकती है जहां सरकार का बहुमत है।
राज्यसभा में सदन के नेता अरूण जेटली का कहना था कि इस संवेदनशील मुददे पर सदन बंटा हुआ नजर नहीं आना चाहिए। राज्यसभा में सख्याबल के आधार पर मजबूत स्थिति में खड़े विपक्ष ने इस गैर सरकारी विधेयक के पीछे अपनी ताकत झोंक दी जिसके सामने सरकार इसे ध्वनिमत से पारित कराने पर सहमत हो गई है।
- India, probably the world, will get its first transgender college principal when Manabi Bandopadhyay takes charge of Krishnagar Women's College in West Bengal


किन्नरों के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएँ !

Wednesday, April 22, 2015

बुरे हाल में साथ न छोड़ें देंगे साथ किसानों का - सतीश सक्सेना

                 15 से 19 अप्रैल 2015 यवतमाळ जिला में आनंद ही आनंद और भारतीय शांति परिषद के संयुक्त तत्वावधान में गाँव गांव पैदल जाकर किसानों से मिलने का दुर्लभ मौका मिला जहाँ पिछले कुछ वर्षों से सर्वाधिक किसान आत्महत्या करते हैं ! पूरे विश्व में
भारत की शानदार संस्कृति और बौद्धिकता के झंडे उठाये लोगों के देश में, सीधे साधे किसान आत्महत्या करें इससे शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता ! सन  2012 में हमारे देश में 14000 किसानों ने आत्महत्या की है , और हमारे राजनेता बिना इन अनपढ़ों की चिंता किये अगले इलेक्शन की तैयारी में जन लुभावन घोषणाएं करते रहते हैं !
यवतमाळ पदयात्रा 

              किसान हमारी प्राथमिकताओं में कहीं नहीं आता , भारतीय किसानों के बारे में टसुये बहाने वालों को यह भी नहीं मालुम कि साधारण किसान की सामान्य दिनचर्या क्या है वह किन समस्याओं से जूझ रहा है और शायद इसकी जरूरत भी नहीं है क्योंकि इलेक्शन के समय यह फटेहाल भोला व्यक्ति अपने दरवाजे पर आये, अपने ही गांव के प्रमुख लोगों से घिरे, इन महामहिमों को निराश करने की हिम्मत नहीं कर पाता और उसे अपने पूरे कुनबे खानदान के साथ वोट इन्हीं खद्दर धारी दीमकों को देना पड़ता है !

             यह पदयात्रा युवा आचार्य विवेक के आह्वान में पूरी हुई जिनकी मीठी वाणी और मोहक व्यक्तित्व से लगता है कि स्वामी  विवेकानंद का पुनर्जन्म हो चुका है , शिवसूत्र उपासक  विवेक पिछले कई वर्षों से , अपनी विदेशी नौकरी और विवाह त्याग कर, अध्यात्म साधना पथ पर चल रहे हैं , सुखद आश्चर्य है कि दिखावटी महात्माओं, बाबाओं के देश में, खादी का कुरता पैंट पहने यह सहज सरल युवा आचार्य,जनमानस पर अपनी छाप छोड़ने में समर्थ रहा है ! इस यात्रा में चलने वालों में विभिन्न समुदायों के लोग जिनमें वयोवृद्ध पुरुष, नवजवान और महिलायें शामिल थे, अपने कार्य छोड़कर इस कड़ी धूप में किसानों के साथ दुःख बांटने को तत्पर दिखे और यह विशाल साधना कार्य बिना किसी अखबार , टेलीविजन न्यूज़ चैनल्स को बिना दावत पार्टी दिए , रोटी दाल खाते हुए बड़ी सादगी से किया गया !

विवेक जी के इस कथन पर कि आनंद ही आनंद किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता से नहीं जुड़ा है और न हम इसके कार्यक्रमों में किसी राजनीतिक दल को शामिल करेंगे, हम जैसे बेआशीष फक्कड़ ने भी किसानों के दर्द में जाने का फैसला किया था और इस राह के आध्यात्मिक आयोजनों में भी, मैंने यही पाया यह मेरे लिए एक बड़े संतोष और राहत का विषय था !

               इस दौरान हमने विवेक जी के शिष्यों की गाड़ियों में लगभग 700 km यात्रा की जिसमें लगभग 85 किलोमीटर की दूरी तेज धूप में पैदल चलकर तय की गयी ! पदयात्रा के रास्ते में आचार्य बिनोबा भावे का पवनार आश्रम एवं  महात्मा गांधी के सेवाग्राम के दर्शन सुखद रहे ! उससे भी सुखद यह था कि एक आध्यात्मिक फ़क़ीर के पीछे कवि , साहित्यकार , डॉक्टर , इंजीनियर , सॉफ्टवेयर इंजीनियर , व्यापारी , किसान , मजदूर , चार्टर्ड एकाउंटेंट ,महिलायें , गृहणी और उनके बच्चे सब शामिल थे ! महिलायें न केवल कार चला रहीं थी बल्कि पैदल यात्रिओं के लिए भोजन पानी की व्यवस्था इस ४० डिग्री तेज धूप में पैदल चल कर , कर रही थीं और शामिल लोग इतनी विविधिता लिए थे कि उनसे बात करके थकान का नाम नहीं रहता ! ६० वर्षीय राजेश पारेख जो कि नागपुर के बड़े ज्वैलर्स में से एक हैं, ऐसे ही एक आदर पुरुष थे !  


और इस भक्ति भावना का प्रभाव ग्रामीणों पर भी पड़ा , शुरू में किसान पदयात्रा के उद्देश्य से शंकित थे क्योंकि पहले गांव में काफिला सिर्फ महामहिमों का आता था और ढेर सारे वादे देकर जबरन वोट ले जाता था मगर जब उन्हें यह कहा गया कि हमारा वोटों से कोई लेना देना नहीं , हम भाषण देने नहीं, आपको सुनने आये हैं तब राहत की सांस लेते किसानों ने अपना दर्द खुल कर बताया ! उनके कष्ट अवर्णनीय हैं, उनके अपने उपजाए देसी बीज, खाद , कीटनाशक छीन लिए गए और उन्हें बाज़ार का प्रोडक्ट खरीदने को मजबूर करने के कानून बना दिए गए यही नहीं उनकी फसल की कीमत भी खरीदार तय करेंगे, यह कानून बना दिया गया ( फसल का रेट सरकार तय करती है )  ! 


आचार्य विवेक 
इस देश में आज किसान अपने आपको हारा और बंधुआ मज़दूर मानने को मजबूर है और शायद ही कोई नेतृत्व उन्हें दिल से प्यार करता हो सब के सब इन भेंड़ों से अपनी रुई लेने आते हैं और यह झुण्ड अपना बचाव भी नहीं कर पाता ! इनकी पूरे साल की कमाई (उत्पादन ), सरकार की मदद से, अपनी मनमर्जी का पैसा देकर, कुटिल शहरी व्यापारी ले जाकर खरीद की मूल्य से आठगुने, दसगुने भाव पर बेंच कर अपनी तिजोरी भरते हैं और इलेक्शन के समय राजनेताओं को मदद के बदले धन देते हैं ताकि वे अगले ५ वर्षों के लिए दुबारा सत्ता में आ जाएँ और फिर इन्हें नोचते रहें , उनकी खुशकिस्मती से यह असंगठित भेड़ें भी करोड़ों की संख्या में हैं , सो कोई समस्या दूर दूर तक नहीं ! दैहिक, मानसिक शोषण और प्रताड़ना की यह मिसाल, पूरे विश्व में अनूठी व बेमिसाल है ! यही एक देश है जहाँ मोटे पेट वाले बेईमान सबसे अधिक भारत माता की जय बोलते नज़र आते हैं !

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !


झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,  
कैसे कैसे लोग भी , योद्धा कहायें इन दिनों !

मेरा यह दृढ विश्वास है कि हर क्षेत्र में हमारी ईमानदारी, पतन के गर्त तक पंहुच चुकी है , हम कोई भी काम बिना फायदे के नहीं करते , निर्ममता से अपनी छबि निर्माण के लिए कमजोरों  को सिर्फ धोखा देते हैं और शक्तिशालियों से धोखा खाते हैं ! पूरा देश बेईमानों का गढ़ बन गया है अब यहाँ जीने के लिए और धनवान बनने के लिए राष्ट्रप्रेम के नारे के झंडे के साथ अपनी पीठ पर और गले में मालिक (राजनीतिक दल  ) की पट्टी आवश्यक है !  लोग आपको देख भयभीत होकर आदर देते दुम हिलाएंगे ही ! 

             इस बेहद खराब माहौल में  " चला गांवां कडे " का नारा दिया है आचार्य विवेक ने , इस नारे को सार्थक बनाने के लिए एक ऑफिस खोला गया है जिसका कार्य गाँव की समस्याओं का अध्ययन करना है ! विदर्भ के विभिन्न गांवों से वर्तमान व्यवस्था से व्यथित युवाओं और स्वयं सेवकों ने ग्राम प्रतिनिधि का कार्य करने को अपना नाम दिया है ! मैनेजमेंट के बेहतरीन जानकार, विवेक ने अपना कार्य बड़ी सादगी और शालीनता से किया है, पूरी यात्रा में इस नवयुवक आचार्य के चेहरे पर थकान, विषाद  का एक भाव नज़र नहीं आया हर वक्त एक आत्मविश्वास से सराबोर प्रभावशाली स्नेही प्रभामंडल नज़र आता था जिसे उसके प्रशंसक एवं शिष्य हर समय घेरे रहते ! उनके कई मजबूत समर्पित शिष्य उनके हर आदेश को मानने को तत्पर रहते थे !


             विवेक जहाँ जहाँ जा रहे थे , महिलाओं और पुरुषों ने ,घर से निकल निकल उनका तिलक लगाकर अभिनन्दन किया ! मेरा विश्वास है कि मध्य भारत क्षेत्र में, आने वाले समय में तेजी से बढ़ती उनकी लोकप्रियता निश्चित ही स्वयंभू नेताओं और मठाधीशों को चौंकाने के लिए काफी होगी ! 

              इन पांच दिनों में आनंद ही आनंद  की ओर से, बिना किसी भाषण बाजी के केवल अपना और आचार्य विवेक का संक्षिप्त परिचय देकर किसानों से अपनी बात कहने का अनुरोध किया जाता था ! इन धुआंधार मीटिंगों से जो बातें सामने आयीं वे निम्न थीं !

  • आज तक गाँव में कोई सरकारी मदद नहीं मिली , जो घोषणाएं हुई भी हैं वे बरसों से दसियों इंस्पेक्टरों की जांच होते होते नगण्य रह जाती हैं ! 
  • पहले किसान अपनी फसल  उगाने के लिए बिना एक पैसा खर्च किये, अपने खुद के द्वारा जमा किये गए बीज ,खाद और कीटनाशकों पर निर्भर था वहीँ अब उसे हाइब्रिड बीज , विशिष्ट कीटनाशक और खाद बाहर से खरीदने पड़ते हैं जिसमें उसकी जमा पूँजी अथवा कर्ज का एक भारी हिस्सा खर्च हो जाता है , सूखा या अतिवृष्टि के कारण फसल नष्ट होने की हालत में यह कर्जा और अगले साल की भोजन की समस्या , शादी व्याह और सामाजिक दवाब उसके आगे भयावह स्वप्न जैसे खड़े नज़र आते हैं और उसकी स्थिति बदतर करने के लिए भरी रोल अदा करते हैं !  
  • बैंक का पैसा हर हालत में वर्ष के अंत में बापस करना पड़ता है चाहे फसल से भारी लागत लगाने के बावजूद एक रूपये का भी मुनाफ़ा न हुआ हो या सारी फसल असमय वर्षा या सूखा से खराब क्यों हुई हो !
  • सरकार द्वारा निर्धारित कपास का समर्थन मूल्य, लागत से भी काम पड़ता है , यह वर्तमान में 4000 /= है जो किसानों के हिसाब से कम से कम 6000 /= पर क्विंटल होना चाहिए !
  • यह विडम्बना है कि किसान अपना धन और श्रम लगाकर फसल उगाता है और उसका मूल्य निर्धारण शहरों में बैठे सरकारी दफ्तर के बाबू करते हैं , छोटे किसान जिसको लागत अधिक पड़ती है और बड़े किसान दोनों को एक सा मूल्य दिया  जाता है , सरकारी व्यवस्था को, विभिन्न कारणों से फसल खराब होने अथवा जानवरों व मौसम  द्वारा बर्वादी से कोई मतलब व जानकारी नहीं अतः लगभग हर किसान ने एक मत से अपनी फसल का मूल्य निर्धारण स्वयं करने की मांग की ! वे चाहते हैं कि बाजार की डिमांड के हिसाब से वे अपनी फसल को बेंचें तभी गांवों में खुशहाली आ सकती है !
  • आज किसानों के बच्चे किसी हाल में किसान नहीं बनना चाहते उनका कहना था कि शहरों से सम्मन देने वाला चपरासी गाँव में टू व्हीलर से आता है जबकि हमारे पास साईकल भी नहीं होती हम कुछ भी कर लेंगे पर किसान नहीं बनना चाहते , स्वतंत्र भारत में , अपनों के द्वारा अपनों के शोषण की यह जीती जागती तस्वीर किसी का दिल दहलाने को काफी है !अनपढ़  किसानों और गृहणियों के मध्य जमकर नोट कूटता चालाक टेलीविजन मिडिया आजकल धनपतियों को सुबह शाम दो बार सलाम करता है और फिर जो माई बाप कहते हैं वही करता है ! किसानों के बारे में नीरस जानकारी देने के लिए
  • मशहूर दूरदर्शन के दिखावटी  कृषि चैनल खोलकर सरकार मस्त है लोकल खद्दरधारी दीमकों ने शेतकारी कमिटी , किसान यूनियन व अन्य किसान नामधारी संगठन बनाकर अपने शराबी चमचों को वहां अध्यक्ष और सेक्रटरी बना दिया है यह राष्ट्रप्रेमी शिष्य गण अपने दफ्तरों में भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद की तस्वीर लगाकर शाम को दारु सम्मेलनों में किसानों की समस्याओं पर चर्चा कर अपना कर्तव्य पालन कर मस्त रहते हैं ! 
बड़ी क्रूरता के साथ, अपनी सीधी साधी गाय मारकर, उसे परोसकर हम सिर्फ धनवानों को  और ताकतवर और हृष्ट पुष्ट बना रहे हैं  !पहली बार जीवन में मुझे कोई लेख लिखते समय अपने दिल में कम्युनिस्टों के प्रति आदर सम्मान की भावना जाग्रत हो रही है , मगर उन बेचारों के, मार्क्स लेनिन को अनपढ़ किसान समझे कैसे ? 
                                           *********************************************


उपरोक्त लेख नवसंचार समाचार ने सम्पादकीय पृष्ठ पर छापा है , इस सम्मान के लिए उनका आभार !
http://navsancharsamachar.com/%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A5-%E0%A4%A8-%E0%A4%9B%E0%A5%8B%E0%A5%9C%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A6%E0%A5%87/

ग्राम विधवाएं, जिनके पति चले गए  

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