Monday, January 5, 2015

संदिग्ध नज़र,जाने कैसे ,माधुर्य सहज भाषाओं का - सतीश सक्सेना

कटु मन कैसे कर पायेगा, अनुवाद गीत भाषाओँ का,
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम  भाषाओँ का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें,जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

सावन का अंधा क्या समझे जीवन स्नेहिल रंगों को,
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनियां को कुटिलों ने   
ये शब्द समर्पण न जानें,अभिमान हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !

16 comments:

  1. आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाकर बैठे हैं,
    भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !
    .सच ..ऐसे लोग इंसान की तरह जरूर नज़र आते हैं लेकिन असल में जानवर और शैतान से कुछ ज्यादा ही होते है..
    ..बहुत सटीक ..
    आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!

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  2. बहुत ही सुन्दर भाव ... लाजवाब रचना है सतीश जी ... नव वर्ष मंगलमय हो ...

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  3. आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाकर बैठे हैं,
    भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !

    बहुत सही कहा है...नये वर्ष की शुभकामनायें...

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  4. बहुत बढ़िया ....सुंदर रचना.

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  5. क्लिष्ट शब्द,सार्थक भाव--सुन्दर रचना

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  6. वाह !
    देर से आया ।
    नेट नहीं चल रहा था ।
    दरों की कृपा है :)

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    1. दरों को बंदरों पढ़ा जाये :)

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  7. सावन का अंधा क्या जानें , जीवन स्नेहिल रंगों को
    संदिग्ध नज़र,जाने कैसे,माधुर्य सहज भाषाओं का !
    बिलकुल सही कहा है, सभी पंक्तियाँ सुन्दर लगी !

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  8. बिलकुल सही बात कही आपने !

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  9. Very melodious. Understanding is a complex process which involves similar wave-lengths of minds. People have their designs and agenda in life and are attracted accordingly. You are doing fine job, some people will definitely recognize. Be steadfast in your resolutions. Regards.

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  10. Very melodious. Understanding others is a complex process which involves similar wavelengths of mind, and all don't appreciate. You are doing a fine job and some will surely acknowledge. So remain steadfast in your resolutions. Regards.

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  11. बहुत सुन्दर रचना

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  12. शानदार सार्थक प्रस्तुति...

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  13. आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाकर बैठे हैं,
    भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !

    बहुत सही कहा है....सतीश जी

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- सतीश सक्सेना

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