Wednesday, May 27, 2015

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

पहली  बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें , फीकी पाओगे !

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे,गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया, चाँद सितारों ने
मीठे गीत न गाओ तुम फंस जाओगे !




Saturday, May 23, 2015

असरदारों से, न लड़ना चाहिए -सतीश सक्सेना

समझदारों को समझना चाहिए,
जीतने को, धन लुटाना चाहिए !

सारी दुनिया देख ले,सरदार को
असरदारों से, न लड़ना चाहिए !


मूर्खों के देश को, समझा दिया
कैसे मजमें को लगाना चाहिए !

दम भी है आवाज में,वादें भी हैं
भाई बहनों को समझना चाहिए 

चले थे लड़ने, खुदा से छोकरे
मूर्खों को, धन कमाना चाहिए !

Tuesday, May 19, 2015

कभी मुस्काएं गैरों पर, किसी दिन राह में थम कर - सतीश सक्सेना

आस्था का सहारा लेकर धन कमाने में व्यस्त ये जालसाज :
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आस्था बेच के देखें, कि छप्पर फाड़ आता क्या !
बड़ा रूतबा है दाढ़ी में,मनीषी क्या विधाता क्या !

यहाँ इक झोपडी में छिपके रहता इक भगोड़ा था 
निरक्षर सोंचता था मैं , वीरानों  में ये करता क्या !

तिराहे पर पुलिस के हाथ जोड़ा करता बरसों से,
मैं मूरख सोंचता था, इन मज़ारों से ये खाता क्या ! 

कमाई आधी रिश्वत में  निछावर कर, बना मंदिर !
शहर अंधों का उमड़ा ले चढ़ावा और पाता क्या !

अब इस प्राचीन मंदिर में दया बरसाई है प्रभु ने 
खड़ी है कार होंडा भवन में, तंगी से नाता क्या ! 

कभी मुस्काएं गैरों पर,किसी दिन राह में थमकर
बेचारा भूल के गम अपने सोचेगा,यह रिश्ता क्या !

Sunday, May 10, 2015

कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !-सतीश सक्सेना

यह एक संपन्न भरेपूरे घर की वृद्धा का शब्द चित्र है , जो कहीं दूर से भटकती एक बरगद की छाँव में अकेली रहती हुई ,अंतिम दशा को प्राप्त  हुई ! भारतीय समाज के गिरते हुए मूल्य हमें क्या क्या दिन दिखलायेंगे ? 

अच्छा है बुढ़िया चली गयी,थी थकी हुई बदली जैसी
दर्दीली रेखाएं लेकर, निर्जल, निशक्त, कजली  जैसी !

बरगद के नीचे ठंडक में कुछ दिन से थी बीमार बड़ी !
धीमे धीमे बड़बड़ करते,भूखी प्यासी कुम्हलायी सी !   

कुछ  बातें करती रहती थी, सिन्दूर,महावर, बिंदी से  
इक टूटा सा विश्वास लिए,रहती कुछ दर्द भरी जैसी !

भूखी पूरे दिन रहकर भी, वह हाथ नहीं फैलाती थी,
आँखों में पानी भरे हुए,दिखती थी अभिमानी जैसी ! 

कहती थी, उसके मैके से,कोई लेने,आने वाला है ! 
पगली कुछ बड़ी बड़ी बातें,करती थीं महारानी जैसी !

अपनी किस्मत को कोस रहीं, अम्मा रोयीं सन्नाटे में  
कुछ प्रश्न अधूरे से छोड़े,बहती ही रही पानी जैसी !

कल रात हवा की ठंडक में,कांपती रहीं वे आवाजें !
कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !

Thursday, May 7, 2015

कुछ तो बातें, ख़ास रही हैं चेले में - सतीश सक्सेना

कैसे यह सरदार गिर गया खेले में,
कुछ तो गहरी बात, रही है चेले में !

कैसे बादल फटे,अभी तो फेंका था   
इतनी ताकत कहाँ लगी थी,ढेले में !

गाली देकर,इनके ही सारथियों ने  
रथ के पीछे, बाँध घसीटा मेले में !

ऐसे ही शुभ लाभ  चाहने वालों से  !
लालाजी बिक गए नकासे,धेले में !

पुनर्जन्म लंकेश का हुआ रघुकुल में
अबकी राम लड़ेंगे, युद्ध अकेले में !


Wednesday, May 6, 2015

ये ग़ज़ल कैसी रही ? - सतीश सक्सेना

गर्दिशों में खिलखिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !
आंसुओं में झिलमिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

इस उदासी का सबब, कैसे बताएं,आप को,
सिर्फ रस्मों को निभाती, ये ग़ज़ल कैसी रही !

काबा, कंगूरों से चलकर, मयकदे के द्वार पे 
खिदमतों में सर झुकाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

मीर गालिब औ जिगर ने शौक
 से गहने दिए
दर्द में भी  मुस्कराती , ये ग़ज़ल कैसी रही !

कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही !

Monday, May 4, 2015

घनघोर घटायें बन जातीं,बंजारिन अखियाँ शाम ढले ! - सतीश सक्सेना

कड़वे तानें दरवाजे पर , दे जाएँ सखियाँ  शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

मेरे आँगन में इक जोड़ा , 
बरसों से चीं चीं करता है !
जाने क्यों आता देख मुझे,
कुछ गुमसुम हो जाता है !
कसमें, वादे, सपने जैसे 
हँसते रोते , ही बड़े हुए  !
जाने किन पश्चातापों से, 
भर आईं अँखियाँ शाम ढ़ले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

शहनाई की धुन में अक्सर 
मंज़र , बाराती हो जाए !
ढोलक मृदंग के साथ,खुलीं 
चौखटें गुलाबी हो जाएँ !
ये स्मृतिचिन्ह न जाने कब
से प्रश्नचिन्ह बन खड़े हुए !
जाने क्यों नज़र झुकाएं हैं,
चूड़ी की कनियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

सावन भादों तेरी यादों के 
दुनियां से छिपाए रहता हूँ !
ऐसे भी दिखाएँ क्यों आंसू 
वारिश में, चलते रोता हूँ !
कितने सपने रो पड़े बिना  
फूटी किस्मत से, लड़े हुए !
घनघोर घटायें बन जातीं,
बंजारिन अखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

क्यों जाम उठाने से पहले 
आँखें भी छलके जाती हैं
मदिरालय में,मेरे आते ही 
साकी भी छल के जाती है
मैं आता दर्द भूलने को ,
पर जैसे  भाले गड़े हुए  !
हर बार शराबी प्याले में, 
रंजीदा अँखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

कोई भी उदासी का फोटो,
तेरी नज़रें, दिल दहलाएं !
मुस्कान किसी चेहरे पे हो 
तू बार बार सम्मुख आये !
वे ख्वाब सुनहरे भी टूटे 
जो नवरत्नों से जड़े हुए  !
दिन जैसे तैसे कट जाता, 
लहराती रतियाँ शाम ढ़ले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !
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