Friday, August 14, 2015

जब तुम पास नहीं हो मैंने, सब कुछ हारा सपने में -सतीश सक्सेना

ऐसा क्या करता है आखिर संग तुम्हारा सपने में
कितनी बार विजेता होकर तुमसे हारा सपने में !

पूरे जीवन हमने अक्सर  छल मुस्काते पाया है,
निश्छल मन ही रोते देखा, टूटा तारा सपने में !

सारे जीवन थे अभाव पर,महलों के आनंद लिए
बेबस जीवन को भी होता एक सहारा सपने में !

कई बार हम बने महाजन कंगाली के मौसम में
कितनी बार हुई धनवर्षा,स्वर्ण बुहारा सपने में !

यादें कौन भुला पाया है, जाने या अनजाने ही,
धीरे धीरे भिगो ही जाता, एक फुहारा सपने में !

21 comments:

  1. अति सुन्दर.........

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  2. ऐसा क्या करता है आखिर संग तुम्हारा सपने में
    कितनी बार विजेता होकर तुमसे हारा सपने में !


    यादें कौन भुला पाया है, जाने या अनजाने ही,
    धीरे धीरे भिगो ही जाता, एक फुहारा सपने में !

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  3. जो दुखो और अभावो में जीते हैं उनके कितने ही सपने , सपने में ही पूरे होते हैं। इस संवेदना को छूती हुई कविता। कल फिर कुछ सपने बांटे जायेंगे लालकिले के प्राचीर से।

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  4. यादें कौन भुला पाया है, जाने या अनजाने ही,
    धीरे धीरे भिगो ही जाता, एक फुहारा सपने में ---ओह! क्या कोमल अहसास।

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  5. बहुत ही प्यारा गीत है . अकिंचन के पास सपनों का ही धन होता है उम्मीदों का एक सहारा . और उम्मीद पर तो आसमान टिका होता है . बहुत भावभरी रचना .

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  6. बेहतरीन अभिव्यक्ति..... भैया माफी चाहता हूँ बहुत दिन बाद आना हुआ है..

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    1. स्वागत है नीलेश आपका !

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  7. सारे जीवन थे अभाव पर,महलों के आनंद लिए
    बेबस जीवन को भी होता एक सहारा सपने में !

    बहुत भावपूर्ण गीत. बधाई सतीश जी.

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  8. बहुत खूबसूरत!!
    भाव जितने भोले, लफ्ज़ों का चयन भी उतना ही नज़ाकत भरा
    आपके नग़्मे गहरा असर छोड़ जाते हैं दिल पर !!!

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  9. हारने में होती है जीत पता है
    हार हार के हारा सपनों में :)

    वाह !

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  10. जो यथार्थ में संभव नहीं उसे संभव बनाते है सपने !
    सार्थक रचना !

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  11. सपने कितना कुछ कर जाते हैं ... बहुत खूब ...

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  12. यादें कौन भुला पाया है, जाने या अनजाने ही,
    धीरे धीरे भिगो ही जाता, एक फुहारा सपने में
    ......... कोमल अहसास बहुत खूब

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  13. सारे जीवन थे अभाव पर,महलों के आनंद लिए
    बेबस जीवन को भी होता एक सहारा सपने में !
    वाह, कितनी सच्ची बात।

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  14. पूरे जीवन हमने अक्सर छल मुस्काते पाया है,
    निश्छल मन ही रोते देखा, टूटा तारा सपने में !
    __-------------------------------------------बहुत ख़ूब

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  15. बहुत सुंदर। सपने ही साकार भी हो जाते हैं।

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- सतीश सक्सेना

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