Monday, March 21, 2016

इसी विश्वास पर, रूठों को हंसाने निकलें -सतीश सक्सेना

चलो सामान ही , बाजार से लाने निकलें !
क्या पता आज वे, मेले के बहाने निकलें !

काश इक बार और आएं , छेड़ने हमको,
क्यूँ न हम छेड़ने वालों को,बुलाने निकलें !

तुमने पूंछा था बहुत बार,क्या कहते तुमसे,
हम भी करते हैं तुम्हें प्यार, बताने निकलें  !

उन्हें हंसाने को, बस इक सलाम काफी है,
इसी विश्वास पर, रूठों को हंसाने निकलें  !

बहुत मज़ाक हुआ, एक बार फिर आओ,
तुम कहो रोज ही,मनुहार ही गाने निकलें !

6 comments:

  1. वाह जी..एक बार निकल ही पड़िये :)

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 23 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. Chaliye Nikalte hai, kuch door chalte hai

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  4. चलो सामान ही , बाजार से लाने निकलें !
    क्या पता आज वे, मेले के बहाने निकलें
    काव्य की यही खासियत है शायद संभावनाओं में,आशाओं में,
    अपेक्षाओं में सुख खोजने की कोशिश करना,बहुत बढ़िया लगी रचना !

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  5. Surkh galon pe muskarahaten bhee aa jaayengee
    Sirf mere naam Ko dil se auron Ko sunaane niklen

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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