Monday, April 11, 2016

सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये -सतीश सक्सेना

कल ही कुछ याद किया रात,सो नहीं पाये
और तड़प के जो बुलाया भी,तो नहीं पाये !

तेरी रुखसत का भरोसा ही नहीं है मुझको 
सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये !

कसम खुदा की सिर्फ खैरियत बता जाएँ ! 
खिले वसंत अहले दिल से,खो नहीं पाये !

जाने कब से थी मेरे साथ,जानता भी नहीं 
बिन कहे जान सकें अक्ल,वो नहीं पाये !

मैंने हर बार मना कर दिया था,मिलने को,
आज मन ढूंढता अहसास, जो नहीं पाये !

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ।

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  2. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 12/04/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 270 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

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  3. बहुत सुन्दर

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  4. "आज मन ढूंढता अहसास, जो नहीं पाये"

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  5. सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. ऐसा ही होता है ... एहसास बाद में ही जागते हैं ... बहुत सुन्दर ...

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  7. Imbued in own thoughts, not clear what is in mind. But definitely it is very intense pain coming out of poet's pen. Good. Regards.

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  8. सुन्दर रचना

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  9. मैंने हर बार मना कर दिया था,मिलने को,
    आज मन ढूंढता अहसास, जो नहीं पाये !
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ !

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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