Thursday, July 28, 2016

हमारी दुनियां न्यारी रे - सतीश सक्सेना

लगा सब धर्मों का मेला
अनपढ़ों का रेलम पेला

अजान में है खिचाव भारी
भजन में आत्मा दिल हारी
बैठना , गिरिजा में चाहें ,
आँख में जब आंसू आएं !
मुहब्बत करना सिखलायें 
कतारें,  लंगर की प्यारे !
सभी घर अपने से लागे,सब जगह वही प्यार इज़हार !
फ़क़ीरों का अल्हड संसार
हमारी सबसे यारी रे !

सभी को, कष्टों में दरकार 
तभी आता अपनों का ध्यान
मुसीबत में ही आते याद
सिर्फ परमेश्वर के दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे 
हर भवन में , ईश्वर न्यारे ,
पीठ पर है निर्भय अहसास 
आस्था के , वारे न्यारे !
हर जगह सम्मोहन भारी, भक्ति में कहाँ दुश्मनी यार !
सूफियों का विरक्त संसार 
हमारी दुनियां न्यारी रे !!

मिले शर्तों के बदले राह
बड़े बूढ़े अब रहे कराह !
खाय कसमें जीवनसाथी
रोज ही बदले जाते यार
भर गया पेट सरे बाजार
देख प्यारों का ऐसा हाल !
कटी उंगली पर मांगे धार
बताओ क्या देंगे सरकार
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
मानवों का लोभी संसार
जहाँ सारे व्यापारी रे !!

शुरू से ऐसी ही ठानी
मिले, अंगारों से पानी
पिएंगे सागर तट से ही 
आंसुओं में डूबा पानी,
कौन आयेगा देने प्यार
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को 
डुबायें दर्द, दीवानी में !
बहुत कुछ समझ नहीं पाये, इश्क़ न करें किसी से यार !
मानवों से ही डर लागे 
पागलों में ही, यारी रे !!

Sunday, July 17, 2016

अच्छे दिन भी आते होंगे , हर हर मोदी बोल किसानों -सतीश सक्सेना


मेहनत करते जीवन बीता,मेहनत करते रहो ,किसानों !
अच्छे दिन भी आते होंगे ,हर हर मोदी बोल किसानों !


जित्ती चादर ले के लाये, पैर मोड़ सो जाओ किसानों !
भला करेंगे, राम तुम्हारा, कोई शक न करो किसानों !

रखो भरोसा नेताओं पर , क्यों हताश होकर मरते हो,
बेटी की शादी में तुमको, लाला देगा, कर्ज किसानों !

अफ्रीका में खेत दाल के, लगते सुंदर बहुत किसानों !
दाल उगाएं वे, हम खाएं , हर हर गंगे बोल किसानों !

केजरी झक्की , खांसे इतना , नींद न आने दे, रातों में ,
कांग्रेस,मीडिया,कचहरी और भी गम हैं,बहुत किसानों !


Saturday, July 9, 2016

संवेदना बिलख कर रोये,कवि न वहां पाये जाएंगे - सतीश सक्सेना

यह कैसा माहौल अब यहाँ द्वेष गीत गाये जाएंगे !
संवेदना बिलख कर रोये,कवि न वहां पाये जाएंगे !

दयाहीनता के आलम में उम्मीदें तो कम हैं लेकिन   
संवेदन संतप्त ह्रदय की, हम कसमें खाये जाएंगे !

द्वेषभाव को जल देने को,ढेरों लोग उगे हैं फिर भी 
दिल से दूषित भाव हटाने, गंगा हम लाये जाएंगे !

आग लगाते इन शोलों में, ह्रदय वेदना कौन पढ़ेगा, 
जब तक सूरज आसमान में,हम छप्पर छाये जाएंगे !

राजनीति के इन धूर्तों ने,  बेशर्मी  की हदें पार कीं,
जल्द आयेगा वक्त,रेत के किले सभी ढाए जाएंगे !

Monday, July 4, 2016

तेरी इस बादशाहत में, मेरी मुस्कान खतरे में - सतीश सक्सेना

हाल में ढाका हादसे पर अातंकवादियों और उनके रहनुमाओं के लिए ....

न हैं इस्लाम  खतरे मे, न है भगवान खतरे मे !
तुम्हारे शौक़ में, इंसानियत , इंसान खतरे में !

न हिंदुस्तान खतरे में न, पाकिस्तान खतरे में !
तेरी अय्याशियां औ महले अालीशान खतरे में !

न अायत ही कभी पढ़ पाए,न श्लोक गीता के, 
चाय का कांपता कप हाथ में,हैरान,खतरे में !

भले बच्चे हों पेशावर के, कत्लेआम ढाका हो !
कहीं रोये तड़प कर माँ,इसी अनजान खतरे में !

बुरा हो तेरी मक्कारी औ अंदाज़े बयानी का !
तेरी इस बादशाहत में,मेरी मुस्कान खतरे में !

Friday, July 1, 2016

अा जाएँ , बैठें पास मेरे , बतलायें, भारत कहां लिखूं - सतीश सक्सेना

लो अाज कष्ट की स्याही से
संतप्त ह्रदय का गान लिखूं
धनपतियों से इफ्तार दिला 
मैं निर्धन का रमजान लिखूं 
बतलाओ तुमको यार कहूँ ,
या केवल मित्र सुजान लिखूं !
अनुराग कहां सम्मानित हो
मनुहार  लुटाते चरणों में  !
अा जाएं कभी अानंदमयी, कह जाएं, व्यथा मन कहां लिखूं ! 

नेताओं को कह, देश भक्त  
अधपके देश की शान लिखूं 
धन पर मरते, सन्यासी को  
दरवेशों का लोबान लिखूं !
या बरसों बाद मिले जीवन 
में भूखे का जलपान लिखूं 
धनपति बनने को राष्ट्रभक्त 
उग अाये, रातों रात यहाँ !
कह जाएं किसी दिन रूपमयी , मन का वृंदाबन कहां लिखूं ! 

दरवाजे मंगलगान सहित मैं 
किसका स्वागत गान लिखूं
धीरे-धीरे  मरते , निर्जल 
इन वृक्षों को उपहार लिखूं 
या दूर सही , बौछार सहित, 
अाती वारिश जलधार लिखूं !
लगता है, प्यार बहुत कम है 
नफ़रत फैलाती दुनियां में !
कब आयेंगीं अनुरागमयी, बोलो न बुलावन, कहां लिखूं !

इस धूर्तकाल के गीत बना
कर छंदों का अपमान लिखूं  
संक्रमण काल में गीतों की 
चोरी कर काव्य महान लिखूं ! 
या छन्दों का इम्तहान बता 
कर हिंदी का अपमान लिखूं  
कवितायें जन्म कहाँ लेंगीं ?
गुरुशिष्य बिकाऊ जिस घर में,
अा जाएं एक दिन दिव्यमयी, बतलायें, स्तवन कहां लिखूं  !

बंगाल सिंध कश्मीर कटा, 
नफरत में, हिंदुस्तान लिखूं ,
जिसके रिश्ते, अाधे उसमें 
उस घर को,पाकिस्तान लिखूं !
गांधार,पाणिनी अार्यक्षेत्र को 
अब अफ़ग़ानिस्तान लिखूं !
कुल,जाति,धर्म,फ़र्ज़ी गुरुर 
पाले, नफरत में  हांफ रहे !
अा जाएं बताएँ, करुणमयी , समझाएं तपोवन कहां लिखूं !

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