Monday, July 4, 2016

तेरी इस बादशाहत में, मेरी मुस्कान खतरे में - सतीश सक्सेना

हाल में ढाका हादसे पर अातंकवादियों और उनके रहनुमाओं के लिए ....

न है इस्लाम खतरे मे, न हैं श्री राम खतरे मे !
तुम्हारे शौक़ में, इंसानियत, इंसान खतरे में !

न हिंदुस्तान खतरे में न, पाकिस्तान खतरे में !
तेरी अय्याशियां औ महले अालीशान खतरे में !

न अायत ही कभी पढ़ पाए,न श्लोक गीता के, 
चाय का कांपता कप हाथ में,हैरान,खतरे में !

भले बच्चे हों पेशावर के, कत्लेआम ढाका हो !
कहीं रोये तड़प कर माँ,इसी अनजान खतरे में !

बुरा हो तेरी मक्कारी औ अंदाज़े बयानी का !
तेरी इस बादशाहत में,मेरी मुस्कान खतरे में !

11 comments:

  1. बहुत सही और सामयिक।

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  2. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 06 जुलाई 2016 को लिंक की गई है............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. गहन विचारणीय पंकितयां ...

    आभारी.



    http://yaaden.in/%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88-%E0%A4%A4%E0%A5%8B-%E0%A4%B2%E0%A5%8C%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%8F/

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  4. बुरा हो तेरी मक्कारी औ अंदाज़े बयानी का !
    तेरी इस बादशाहत में, मेरी मुस्कान खतरे में !
    ..बहुत खूब ...दो टूक ...

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  6. सही कहा है, धर्म को खतरे में बताने वाले धर्म का अर्थ ही नहीं जानते.

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  7. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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  8. तेरी इस बादशाहत में मेरी मुस्कान खतरे में....क्या बात है सतीश जी, लाजवाब

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- सतीश सक्सेना

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