Thursday, August 11, 2016

इन डगमग चरणों के सम्मुख, विद्रोही नारा लाया हूँ - सतीश सक्सेना

बरसाती कवियों के युग में
नवगीतों के, सूखेपन से , 

कुछ शब्दों के हेर फेर में
महागुरु की अनुकम्पा से
संवेदन मन की ह्त्या से,
विद्वानों के समर युद्ध में
खूब पुरस्कृत सेवक होते
ढेरों नवकवियों के युग में
गीतों की बंजर धरती पर, करने इक प्रयास आया हूँ !

मानवता को अर्ध्य चढाने,निश्छल 
जलधारा लाया हूँ !

सरस्वती की धार न जाने,
कबसे धरती छोड़ गयी थी !

माँ शारदा, ऋचाएं देकर 
कब से,रिश्ते तोड़ गयी थीं !
ध्यान,ज्ञान,गुरु मर्यादा का
शिष्यों ने रिश्ता ही तोड़ा !
कलियुग सर पे नाच नाच के

तोड़ रहा,हर युग का जोड़ा !
कविता के संक्रमण काल में , चेतन ध्रुवतारा लाया हूँ !
जनमानस को झंकृत करने अभिनव 
इकतारा लाया हूँ !

हिंदी जर्जर भूख प्यास से
भ्रष्ट काल में भी ज़िंदा है
कोई नहीं पालता इसको
कचरा खाकर भी ज़िंदा है !
कर्णधार हिंदी के,कब से
मदिरा की मस्ती में भूले !
साक़ी औ स्कॉच संग में
जर्जर हिंदी माँ, को भूले !
इन डगमग चरणों के सम्मुख, विद्रोही नारा लाया हूँ !
भूखी प्यासी सिसक रही, निज भाषा 
को चारा लाया हूँ !

राजनीति में पंहुच गुरु की
बड़े बड़े पदभार मिल गए !
गा विरुदावलि महाबली की
हिंदी के ,अध्यक्ष बन गए !
लालकिले से भांड गवैय्ये
भी भाषा की शान बन गए
श्रीफल, अंगवस्त्र, धन से
सम्मान विदेशों में करवाते,
धूर्त शिष्य, मक्कार गुरू के द्वारे, नक्कारा लाया हूँ !
दम तोड़ते काव्य सागर में, जल 
सहस्त्र धारा लाया हूँ !

जाते जाते, काव्यजगत में
कुछ तो रस बरसा जाऊंगा
संवेदना , प्रीति से भरकर
निर्मल मधुघट,दे जाऊंगा !

कविता झरती रहे निरन्तर 
चेतन,मानवयुग कहलाये
कला संस्कृति त्याग धूर्तता 
मानव मन, श्रृंगार बनाएं !
सुप्त ह्रदय स्पंदित करने, काव्यसुधा प्याला लाया हूँ !
पीकर, नफरत भुला हंस पड़ें , वह 
अमृतधारा लाया हूँ !

मुझे पता है शक्की युग में
चोरों का सरदार कहोगे !
ज्ञात मुझे है,चढ़े मुखौटों
में, इक तीरंदाज़ कहोगे !
बेईमानों की दुनिया में हम
बदकिस्मत जन्म लिए हैं !
इसीलिए कर्तव्य मानकर
मरते दम तक शपथ लिए हैं
इक बेबस आंसू की कीमत, तुमको दिखलाने आया हूँ !
जिसको तुम संभाल न पाए,
अक्षयजल 
खारा लाया हूँ !

9 comments:

  1. वाह ! बहुत खूब ! बधाई इस सुंदर रचना के लिए..

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  2. बहुत सही . नमन आपके उद्गारों को .

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  3. जो सत्य है उसे समय सिद्ध करेगा -किसी के मानने ,न मानने से क्या !

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  4. बहुत सुन्दर... दिल और दिमाग को झंकृत करते एक एक शब्द......

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  5. हिंदी जर्जर भूख प्यास से
    प्लास्टिक खाकर भी ज़िंदा है
    कोई नहीं पालता इसको
    कचरा खा खाकर ज़िंदा है !
    ..................
    जर्जर हिंदी माँ को भूले !
    ....
    भूखी प्यासी सिसक रही, निज भाषा
    का चारा लाया हूँ !

    दो टूक शब्दों में खरी खरी सुनाने का अंदाज अच्छा लगा , प्रेरक है ,,,,

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    Replies
    1. शिक्षक दिवस पर कविता-

      कर्ज है उनका हम पर अक्षर अक्षर
      मार दिया जिसने वो दानव, था कभी जो निरक्षर
      बना जिससे, कोई अल्पज्ञ तो कोई सर्वज्ञ
      पर छांया में इनकी रहा न कोई अज्ञ॥

      अज है जिनका पद, महानता है जिनकी अगम्य
      गर है इनका आशीश, होती न कोई मंजिल दुर्गम्य
      कागज़ पे नहीं उभरेगा, अनिर्वचनीय है इनका स्वभाव
      अलौकिक कहो या कहो ईश्वर, है इनमें तो हरइक भाव

      असंख्य शब्द न कर सके वर्णन, ऎसी है अद्भूत इनकी छवि
      मिलता है जिनसे ज्ञान का प्रकाश, केह दो भले ही उन्हें ज्ञान-रवि
      कहे कोई शिक्षक या कहे गुरू, किन्तु इनका धर्म एक है
      सत्-सत् प्रणाम करता हूँ उन्हें, जिनके परिणाम अनेक है॥

      Delete
  6. मन के भाव बाखूबी लिखे हैं आपने ...

    ReplyDelete
  7. शिक्षक दिवस पर कविता-

    कर्ज है उनका हम पर अक्षर अक्षर
    मार दिया जिसने वो दानव, था कभी जो निरक्षर
    बना जिससे, कोई अल्पज्ञ तो कोई सर्वज्ञ
    पर छांया में इनकी रहा न कोई अज्ञ॥

    अज है जिनका पद, महानता है जिनकी अगम्य
    गर है इनका आशीश, होती न कोई मंजिल दुर्गम्य
    कागज़ पे नहीं उभरेगा, अनिर्वचनीय है इनका स्वभाव
    अलौकिक कहो या कहो ईश्वर, है इनमें तो हरइक भाव

    असंख्य शब्द न कर सके वर्णन, ऎसी है अद्भूत इनकी छवि
    मिलता है जिनसे ज्ञान का प्रकाश, केह दो भले ही उन्हें ज्ञान-रवि
    कहे कोई शिक्षक या कहे गुरू, किन्तु इनका धर्म एक है
    सत्-सत् प्रणाम करता हूँ उन्हें, जिनके परिणाम अनेक है॥

    लेखक: अश्विन गोयल

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- सतीश सक्सेना

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