Wednesday, November 23, 2016

इक दिन के लिए द्वार पे , रहमान बन के आ - सतीश सक्सेना

किसने कहा कि दिल में तू मेहमान बनके आ, 
ये तेरी सल्तनत है, तू सुल्तान बन के आ !
इक दिन तो बोल खुल के, तड़पता मेरे बगैर !
दिल के गरीब एक दिन , धनवान बन के आ।
साँसे तो कुछ बाकी तेरे दीदार के लिए,
मुफलिस के पास कर्ज का भुगतान बन के आ !
कब तक यहाँ तड़पें सनम रह के भी बावफ़ा,
इक दिन के लिए द्वार पे , रहमान बन के आ !

पहली दो पंक्तियाँ सुदेश आर्या द्वारा लिखी हैं , उनके द्वरा अनुरोध किये जाने पर यह ग़ज़ल पूरी बन गयी !

7 comments:

  1. पता नहीं सही लगा या गलत पर कुछ ऐसा लगा जैसे ऐ टी म घर के बाहर खड़ा हो कर कह रहा हो जनाब ले लो आ गया हूँ ।

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 25 नवम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. इक दिन के लिए द्वार पे, रहमान बन के आ!

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  4. बहुत सुन्दर ......

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  5. शानदार पोस्ट .... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .... Thanks for sharing this!! :) :)

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  6. दुनिया ने दिल के रास्ते को इतना कठिन बना दिया है कि
    प्यार करना भी चाहा प्यार से बचना भी चाहा ऐसा कितनो ने
    न चाहा होगा !

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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