Monday, April 30, 2018

सागर इतना खारा क्यों है -सतीश सक्सेना

अनुत्तरित हैं प्रश्न तुम्हारे 
कैसे तुमसे नजर मिलाऊं
असहज कष्ट उठाए तुमने
कैसे हंसकर उन्हें भुलाऊं
युगों युगों की पीड़ा लेेेकर 
पूंछ रही है नजर तुम्हारी
मैं तो अबला रही शुरू से
तुम सबने, चूड़ी पहनाईं !
हर दरवाजा जीतने वाला , इस दरवाजे हारा क्यों है।

बचपन तेरी गोद में  बीता
कितनी जल्दी विदा हो गई !
मेरा घर क्यों बना मायका, 
कैसे  घर से जुदा हो गई !
अम्मा बाबा खुश क्यों हैं ?
ये आंसू भर के नजरें पूंछें !
आज विदाई है,आँचल से 
कैसे दुनियाँ को समझाए ! 
हिचकी ले ले रोये लाड़ली, उसको ये घर प्यारा क्यों है ?

जिस हक़ से अपने घर रहती 
जिस हक़ से लड़ती थी सबसे 
जिस दिन से इस घर में आयी 
उस हक़ से, वंचित हूँ तब से
भाई बहिन बुआ और रिश्ते 
माँ और पिता यहाँ भी हैं पर 
नेह,दुलार, प्यार इस घर में 
मृग मरीचिका सा बन जाये ! 
सदियों बादल थके बरसते ,सागर का जल खारा क्यों है !

जबसे आयी हूँ इस घर में 
प्रश्न चिन्ह ही पाए सबसे !
मधुर भाव,विश्वास,आसरा 
रोज सवेरे, बिखरे पाए !
कबतक धैर्य सहारा देता 
जलते सपनों के जंगल में 
किसे मिला,अधिकार जो
मेरे आंसू को नीलाम कराए
अपनापन बह गया फूट, अब उनका चेहरा काला क्यों है !

4 comments:

  1. मार्मिक रचना..

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन दादा साहब फाल्के और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. बादल बरस कर थके मगर समंदर खारा क्यों है.
    अच्छी पड़ताल की अच्छी कविता!
    आभार!

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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