Thursday, May 10, 2018

चिंतित माँ की चौकीदारी क्या समझेंगे ? -सतीश सक्सेना

घर कुटुंब की जिम्मेदारी क्या समझेंगे ?
शक संशय में रिश्तेदारी,क्या समझेंगे ?

पर निंदा ,उपहास में, रस तलाशने वाले
व्यथित पिता की हिस्सेदारी क्या समझेंगे ?


नन्हीं बच्ची, तिनके चुग्गा लाने निकली
चिंतित माँ की चौकीदारी क्या समझेंगे ?

सुंदरता में फंस कर ,कितने राजा डूबे
धूर्त कैकेयी की मक्कारी क्या समझेंगे ?

अभी नशे में डूबे हैं , सरकार हुस्न की
चकाचौंध में,आपसदारी क्या समझेंगे ?

3 comments:

  1. अभी नशे में डूबे हैं , सरकार हुस्न की
    चकाचौंध में,आपसदारी क्या समझेंगे ?

    वाह और गजब भी।

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  2. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १४ मई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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  3. माँ पिता की चिंता नहीं समझते ...
    गज़ब के छंद ... बहुत लाजवाब ... बधाई ...

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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