Tuesday, February 19, 2019

अनमोल जीवन के प्रति लापरवाही, पछताने का मौक़ा भी नहीं देगी -सतीश सक्सेना

बिना पूर्व तैयारी लम्बे रन दौड़ने का प्रयत्न करना, सिर्फ जोश में, बचकाना पन ही कहलायेगा , मानव देह को धीरे धीरे किसी भी योग्य बनाया जा सकता है वह हर स्थिति के अनुसार अपने आपको ढाल सकती है और इसके लिए उम्र बाधा कभी नहीं होती बशर्ते सोंचने वाले की समझ ब्लाक न हो !शरीर के जोड़, मूवमेंट के लिए बनाए गए हैं
अगर बरसों से आपने धनवान बनने के बाद, सिर्फ आराम किया है तो पक्का आपके जॉइंट जकड चुके हैं और शरीर में फ्लेक्सिबिलिटी समाप्त होने के कगार पर होगी , अधिकतर लोग इसी अवस्था को ही बुढापा कहते हैं जब यहाँ 50 वर्ष से ऊपर हर इंसान के चेहरे पर, उम्र जनित गंभीरता दिखती है , हँसना उनके विचार से जवानों का काम होता है अधिक उम्र में उन्मुक्त हंसना तो उन्हें बेहूदगी लगने लगता है ! हंसने के नाम पर वे अक्सर पार्क में हमउम्र बुड्ढों के साथ खड़े होकर हो हो हो हो कर जोर से आवाज निकाल कर हंसने को ही, हंसना मान लेते हैं !

मेरे विचार से जो उन्मुक्त मन हंस नहीं सकते वे निश्चित ही असमय बुढापे का शिकार हो चुके हैं , कारण चाहे कुछ भी हो , अपने अपने कष्टों के नीचे जीने की इच्छा खो बैठना, मानवता के प्रति सबसे बड़ा गुनाह है , ऐसे लोग अपनों के प्रति, अपने कर्तव्य भुलाकर , रोते रोते जीवन काटते हुए मानव के खूबसूरत जीवन के प्रति अपराध कर रहे होते हैं !

इंसान वही जो हँसते हुए उनके लिए जिए जिन्हें उसकी जरूरत है, इसके लिए मन में स्फूर्ति एवं सतत शौक
रखना और उन्हें सीखने की प्रक्रिया आवश्यक है , इच्छाओं और स्फूर्ति का मरना ही मृत्यु है , सो हंसने के लिए पार्क में अवसाद युक्त चेहरों के साथ खड़े होकर हो हो हो हो करने की निरर्थकता पर गौर करना होगा , हंसना आवश्यक है और उसके लिए नेचुरल उन्मुक्त हँसना, सीखना होगा !

सुबह लगभग एक घंटा पसीना बहाने की आदत डालिए आप इतने में ही उम्र्जनित अवसाद से मुक्त हो जायेंगे , तेज वाक के अंत को एक या दो मिनट तक दौड़ कर समाप्त करें और यह अधिक तेज न हो कि हांफना पड जाए ! इस प्रक्रिया से आपका शरीर दौड़ना सीख जाएगा , शुरू के एक साल शरीर में तरह तरह के दर्द होंगे जो मसल्स के पुनर्निर्माण की पहचान है , उनकी परवाह न करें ! रन /वाक से पहले और बाद में स्ट्रेचिंग और स्ट्रेंग्थ एक्सरसाइज अवश्य करें अन्यथा मांसपेशियां चोटिल हो सकती हैं !

अगर आप 5 km दौड़ना चाहते हैं तो सप्ताह में आराम से 10km दौड़ने का पूर्व अभ्यास बिना हांफे होना चाहिए , 10 km और 21Km के लिए यह दूरी क्रमश 20 और 40 Km होती है ! इसी तरह 5 Km दौड़ने से एक सप्ताह पहले आप कम से कम एक रन में, 4 km बिना हांफे दौड़ चुके हों , तभी शरीर को 5 km दौडाने का प्रयत्न करना चाहिए ! 10km और 21km की रेस के लिए यह दूरी 8 km और 18 km होगी !

50 वर्ष के ऊपर के नवोदितों के लिए 21 km की लम्बी दौड़ सिर्फ तब दौडनी चाहिए जब वे पिछले छह माह में कई बार 17km रन, दौड़ने के अभ्यस्त हों अन्यथा 8-10 km दौड़ने के अभ्यस्त को 21km दौड़ना घातक हो सकता है ! 21 km दौड़ते समय शरीर के तमाम अवयवों में लगातार कम्पन होता है और एनर्जी लॉस होता है , लगातार तीन घंटे , तक दौड़ने का जोश में किया गया, प्रयत्न जान लेने में समर्थ है और इसी भूल में कई धुरंधरों की मौत दौड़ते समय हुई हैं जो कई
मैराथन दौड़ चुके थे ! एक रनर जो अपने शरीर की आवाज नहीं पहचानता उसे दौड़ने से दूर रहना चाहिए , खतरनाक पलों और दिनों का अहसास शरीर अपने मालिक को महीनों पहले बताना शुरू कर देता है कि आप जबरदस्ती न करें अन्यथा बुरा घट सकता है !

हर शरीर अलग होता है, अधिक उम्र वाले वर्ष में दो या तीन हाफ मैराथन या एक मैराथन दौड़ना काफी होता है , अधिक संख्या में दौड़ने का अर्थ आपके कमजोर शरीर को खतरनाक ही साबित होगा ! अतः जल्दबाजी न करें , शरीर को धीरे धीरे कठिन मेहनत का अभ्यस्त बनाएं , तभी आप समझदार कहलायेंगे और शरीर को बीमारियों से मुक्त करने में दौड़ सहायक होगी !


Thursday, February 7, 2019

तू अमरलता, निष्ठुर कितनी -सतीश सक्सेना

वह दिन भूलीं कृशकाय बदन,
अतृप्त भूख से , व्याकुल हो,  
आयीं थीं , भूखी, प्यासी सी 
इक दिन इस द्वारे आकुल हो 
जिस दिन से तेरे पाँव पड़े  
दुर्भाग्य युक्त इस आँगन में !
अभिशप्त ह्रदय जाने कैसे ,
भावना क्रूर इतनी मन में ,
पीताम्बर पहने स्वर्णमुखी, तू अमरलता निष्ठुर कितनी !

सोंचा था मदद करूँ तेरी
इस लिए उठाया हाथों में ,
आश्रय , छाया देने, मैंने 
ही तुम्हें लगाया सीने से !
क्या पता मुझे ये प्यार तेरा,
मनहूस रहेगा, जीवन में ,
अनबुझी प्यास निर्दोष रक्त
से कहाँ बुझे अमराई में ! 
निर्लज्ज,बेरहम,शापित सी,तुम अमरलता निर्मम कितनी !

धीरे धीरे रस  चूस लिया,
दिखती स्नेही, लिपटी सी !
हौले हौले ही जकड़ रही,
आकर्षक सुखद सुहावनि सी
मेहमान समझ कर लाये थे 
अब प्रायश्चित्त, न हो पाए !
खुद ही संकट को आश्रय दें 
कोई प्रतिकार न हो पाये !
अभिशप्त वृक्ष, सहचरी क्रूर , बेशर्म चरित्रहीन कितनी !


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