Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने इस राज में, कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते और घास की रोटी
किसने मज़दूर के घर,खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ उठाना भी अब गुलाबों को 
हमने भौंरों के बदन में , चुभे भाले देखे !

कैसे औरों का गिरेबान दिखाते जालिम 
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरस्वती है, जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे , देश में  नाले देखे !

15 comments:

  1. आ गया हाथ उठाना भी अब गुलाबों को
    कितने भंवरों के बदन में चुभे भाले देखे !

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  2. वाह...
    कड़वी सच्चाई बयां करती सुन्दर रचना
    सादर

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  3. भला हुआ कि सरस्वती है, जमीं के नीचे
    नाम नदियों का रखे,कितने ही नाले देखे !---सुन्दर रचना जिसकी हर पंक्तियाँ मुग्ध करती है.

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  4. आज के हालात को बखूबी बयाँ करती प्रभावशाली पंक्तियाँ..

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  5. कैसे औरों पे आसानी से उठाते, उंगली!
    तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे!
    बिल्कुल सही कहा आपने, दूसरों पर उंगली उठाने से पहले इंसान को अपने अंदर झांकना चाहिए। सुंदर प्रस्तुति...

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  6. हर नदिया है गंगा जैसी उसका ऑचल उज्ज्वल रखो ।

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  7. सच्चाई को वयां करती सुंदर रचना ।

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  8. सच बोलती; इक सुंदर रचना ।

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  9. कटु सत्य. बहुत खूब. बधाई.

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  10. क्या बात है सतीश जी !बेहद सार्थक व सटीक रचना...

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  11. कड़वी सच्चाई बयां करती सुन्दर रचना

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  12. आपके गीत की वेदना का स्वर स्पष्ट मुखरित हुआ है। समाज में व्याप्त दुख को अपनी कला के माध्यम से लोगों के ह्रदय तक पहुंचाने के लिए आपका नमन।

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  13. कैसे औरों पे आसानी से उठाते, उंगली !
    तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

    दूसरों पर ऊँगली उठाना आसान लगता है
    लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन लगता है !
    वाकई , सटीक रचना !

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- सतीश सक्सेना

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