मेरे गीत पर सुमन पाटिल का एक कमेन्ट :
"शायद पूरी दुनिया में एक हमारा ही देश होगा जहाँ हजारों साल से एक ही धंधा चलता है बाबाओं का प्रवचन देना और लोगों का सुनना, सबसे ज्यादा सुनने वालों में महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है और महिलाओं को ही इन बाबाओं ने निन्दित किया है पता नहीं कैसे सुन लेती होंगी . . . ."
"शायद पूरी दुनिया में एक हमारा ही देश होगा जहाँ हजारों साल से एक ही धंधा चलता है बाबाओं का प्रवचन देना और लोगों का सुनना, सबसे ज्यादा सुनने वालों में महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है और महिलाओं को ही इन बाबाओं ने निन्दित किया है पता नहीं कैसे सुन लेती होंगी . . . ."
अगर आप भारत के गाँव / कस्बों से जुड़े हैं तो ऐसे प्रवचन आम हैं , और उन्हें सुनने के लिए दूर दूर से , लोग परिवारों के साथ पंहुचते हैं ! साधू संतो के प्रति यह श्रद्धा , भारतीय समाज का अभिन्न अंग है , जिसके फलस्वरूप दुखी और समस्याओं से घिरे लोग , इन संतों से मिलकर अपने आपको धन्य मानते हुए राहत महसूस करते थे !
आज सच्चे संतों की जगह , उन अनपढ़ों ने ले ली है जो पढने लिखने में फिसड्डी रह गए , पैसों के अभाव और मातापिता व् समाज से प्रताड़ित ऐसे लोग , बाबा न बनें तो और कहाँ जाएँ !
डंडा कमंडल उठाकर किसी गाँव में पंहुचने पर भोजन, दान, सम्मान की कोई कमी नहीं , जब तक चाहें रुकें, अगर कहीं अधिक पढ़े लिखे लोगों के मध्य भेद खुलने का भय हो तो मौन व्रत धारण करें बाबा , और अगर अनपढ़ों के मध्य हों तो खूब प्रवचन और कष्ट निवारण ! रोज शाम के भोजन में शुद्ध घी , आलू , दूध और पूड़ियाँ उपलब्द्ध रहतीं हैं अलग अलग भक्तों के घर ..शराब पीने की इच्छा हो तो भैरव भैरवी आवाहन, शमशान साधना और पता नहीं क्या क्या . . . बाबाओं ने शिष्यों से भरपूर फायदा उठाने के लिए,सब कुछ किताबों में लिख रखा है !
भोली जनता इज्ज़त देती
वेश देख , सन्यासी को !
घर में लाकर उन्हें सुलाए
भोजन दे , बनवासी को !
अलख निरंजन गायें, डोलें,मुफ्त की खाएं डाकू लोग !
इन बाबाओं को, घर लाकर ,पैर दबाएँ , सीधे लोग !
वेश देख , सन्यासी को !
घर में लाकर उन्हें सुलाए
भोजन दे , बनवासी को !
अलख निरंजन गायें, डोलें,मुफ्त की खाएं डाकू लोग !
इन बाबाओं को, घर लाकर ,पैर दबाएँ , सीधे लोग !
कब आएगी समझ, देश को . . . ?














