Friday, August 7, 2020

मानवता खतरे में पाकर, चिंतित रहते मानव गीत -सतीश सक्सेना

हम तो केवल हंसना चाहें  
सबको ही, अपनाना चाहें
मुट्ठी भर जीवन पाए हैं
हंसकर इसे बिताना चाहें
खंड खंड संसार बंटा है ,
सबके अपने अपने गीत ।
देश नियम,निषेध बंधन में, क्यों बांधा जाए संगीत ।

नदियाँ,झीलें,जंगल,पर्वत
हमने लड़कर बाँट लिए।
पैर जहाँ पड़ गए हमारे ,
टुकड़े,टुकड़े बाँट लिए।
मिलके साथ न रहना जाने,
गा न सकें,सामूहिक गीत ।
अगर बस चले तो हम बांटे,चांदनी रातें, मंजुल गीत ।

कितना सुंदर सपना होता
पूरा विश्व हमारा होता ।
मंदिर मस्जिद प्यारे होते
सारे धर्म , हमारे होते ।
कैसे बंटे,मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत ।
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।

काश हमारे ही जीवन में
पूरा विश्व , एक हो जाए ।
इक दूजे के साथ बैठकर,
बिना लड़े,भोजन कर पायें ।
विश्वबन्धु,भावना जगाने,
घर से निकले मेरे गीत ।
एक दिवस जग अपना होगा,सपना देखें मेरे गीत ।

जहाँ दिल करे,वहां रहेंगे
जहाँ स्वाद हो,वो खायेंगे ।
काले,पीले,गोरे मिलकर
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे ।
तोड़ के दीवारें देशों की,
सब मिल गायें मानव गीत ।
मन से हम आवाहन करते, विश्व बंधु बन, गायें गीत ।

श्रेष्ठ योनि में, मानव जन्में
भाषा कैसे समझ न पाए ।
मूक जानवर प्रेम समझते
हम कैसे पहचान न पाए ।
अंतःकरण समझ औरों का,
सबसे करनी होगी प्रीत ।
माँ से जन्में,धरा ने पाला, विश्वनिवासी बनते गीत ?

मानव में भारी असुरक्षा
संवेदन मन, क्षीण करे ।
भौतिक सुख,चिंता,कुंठाएं
मानवता का पतन करें ।
रक्षित कर,भंगुर जीवन को,
ठंडी साँसें लेते मीत ।
खाई शोषित और शोषक में, बढती देखें मेरे गीत ।

अगर प्रेम,ज़ज्बात हटा दें
कुछ न बचेगा मानव में ।
बिना सहानुभूति जीवन में
क्या रह जाए, मानव में ।
पशुओं जैसी मनोवृत्ति से,
क्या प्रभाव डालेंगे गीत !
मानवता खतरे में पाकर, चिंतित रहते मानव गीत ।

Friday, July 31, 2020

लॉन्ग डिस्टेंस रनिंग के फायदे और खतरे -सतीश सक्सेना

3 km या उससे अधिक रनिंग को लॉन्ग डिस्टेंस रनिंग कहा जाता है , 61 वर्ष में जब मैंने दौड़ना सीखना शुरू किया था तब 100 मीटर लगभग हर लॉन्ग डिस्टेंस रनर यह सुख रनिंग के दौरान या उसके तुरंत बाद महसूस करता है और उस समय शरीर में कोई स्ट्रेस  , दर्द महसूस नहीं होता !

पहला मैराथन रनर यूनानी सैनिक फिडीपिडिस  था जिसने मैराथन नामक जगह से एथेंस तक की लगभग 42 किलोमीटर की दूरी दौड़ते हुए तय की और राज दरबार में जाकर ईरान पर अपनी सेना की विजय की सूचना देने के बाद लड़खड़ा कर गिर गया और इतनी लम्बी दौड़ को शरीर सह न सका और उसकी मृत्यु हो गयी !

अक्सर लम्बी दौड़ में मसल्स फाइवर्स में सूजन हो जाती है और इसे ठीक होने में कम से कम 3 सप्ताह से 3 माह तक लगते हैं , रनिंग
एक हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज है जिसमें दौड़ते समय हर कदम पर, शरीर का तीन गुना वजन के बराबर इम्पैक्ट होता है , और शरीर का हर अंग अवयव कम्पन महसूस करता है ! इस खतरनाक एक्सरसाइज के कारण शरीर तरह तरह से रियेक्ट करता है , अस्वस्थ  शरीर, 
परिवार में हृदय रोग हिस्ट्री के रनर को लम्बी दूरी की इस हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज से बचना चाहिए अन्यथा हृदय आघात से मृत्यु की संभावना अधिक रहती है !

फिडीपीडीज़ अकेला रनर नहीं था जिसकी लम्बी दूरी दौड़ने के कारण मृत्यु हुई हो , अधिक समय तक जोश में लम्बी दूरी दौड़ने वाले अक्सर हृदय डैमेज के शिकार तो होते हैं साथ ही बरसाती गर्म मौसम, ठण्ड और बारिश की अक्सर बिना परवाह 3 से 6 घंटे दौडने वाले अक्सर  मसल्स की अंदरूनी चोट , जॉइंट एंड बोन के अलावा घातक हृदय डैमेज, अचानक स्ट्रोक , डिहाइड्रेशन और बेइंतिहा थकान का शिकार होकर अचानक मृत्यु के शिकार होते हैं और इन सब कारणों में अक्सर कुछ और बड़ा करने की तमन्ना और जोश अक्सर घातक होते हैं ! पिछले ४ वर्षों में भारत में ही कम से कम आठ मौतें रनिंग के कारण हुई हैं , जिनमें आधी से अधिक दौड़ते हुए हुई हैं !

मुझे याद है लखनऊ मैराथन के दौरान , लगभग 16 km के बाद ही पैरों में क्रैम्प्स आने शुरू होने के कारण मैं दौड़ने के स्थान पर लड़खड़ा कर मुश्किल से चल रहा था , पानी कम पीने के कारण उस दिन डिहाइड्रेशन के असर साफ़ दिख रहा था उस पर बहता हुआ पसीना , जैसे तैसे लड़खड़ाते पैरों के साथ मैंने उस दिन 21 km की दूरी पूरी की थी , शायद वह दिन मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा !
जब से मैं अपने हर दोस्त को जोश में दौड़ने से रोकता रहता हूँ , और उन्हें कहता हूँ कि 5 km की दौड़ भी अक्सर काफी रहती है !

प्रौढ़ों को वाक् के अंत में थोड़ी दूर तक मस्ती में दौड़ना आना चाहिए और यह दौड़ना किसी भी हाल में , बिना हांफे और बीपी बढे बिना होना चाहिए अन्यथा वे अपने को खतरे में डालेंगे !

अतः हर रनर को अपने शरीर की सीमा क्षमता से अधिक नहीं दौड़ना चाहिए , हर लम्बी रनिंग के बाद 1 दिन से 7 दिन अथवा सप्ताह में दो दिन  विश्राम आवश्यक है ताकि मसल्स में आयी सूजन ठीक हो सके और वे अधिक मजबूत हो ! पानी की मात्रा रनर के शरीर में बहुत अधिक होनी चाहिए , उसे हर वक्त यह याद रखना चाहिए कि 10 से 21 किलोमीटर में वह शरीर से लगभग 3 लीटर पानी पसीने के रूप में बह जाता है उसकी भरपाई न होने पर वह मुसीबत में आ सकता है !

याद रखें जहाँ सप्ताह में 4 - 5 दिन, 4 km की एवरेज रनिंग और एक दिन साइक्लिंग आपके लिए वजन मुक्ति, कब्ज , खून संचार, स्ट्रेस , डायबिटीज और हृदय रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए काफी होगी वहीँ जोश और जवानी दिखाने के लिए 10 km रोज की दौड़ , जान लेने में भी समर्थ है !

हैप्पी रनिंग टू आल !!

Tuesday, July 28, 2020

टी विद अरविन्द कुमार -सतीश सक्सेना

हिंदी साहित्य में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो बिना किसी दिखावा शानशौकत के चुपचाप अपना कार्य करते हैं , उनमें ही एक बेहद सादगी भरा व्यक्तित्व अरविन्द कुमार का है जिनको मैंने जितना जानने का प्रयत्न किया उतना ही प्रभावित हुआ !
वे मेरठ पोस्ट  ग्रेजुएट  कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंस में मेडिकल फिजिक्स में प्रोफेसर एवं हिंदी जगत में कहानीकार एवं कवि हैं !
अरविन्द कुमार हिंदी इंग्लिश के अलावा रशियन भाषा के जानकार हैं , आजकल वे हिंदी जगत के प्रख्यात लेखकों, कवियों, कहानीकारों और आलोचकों से लाइव वार्ता कर रहे हैं , उनके प्रसारण का नाम टी विद अरविन्द कुमार है और यह वार्ता फेसबुक पर प्रसारित होती है !
मेरी खुशकिस्मती है कि अरविन्द कुमार ने मुझे भी इस चाय के लायक समझा और आज शाम को अपने साथ चाय पर आमंत्रित किया है उनके साथ मुख्य विषय शारीरिक फिटनेस होगा साथ में एक दो गीत भी उनके अनुरोध पर प्रस्तुत किये जाएंगे !
आप सब आमंत्रित हैं इस चर्चा में शामिल होने के लिए  ...
आज दिनांक 28.07.2020 (दिन मंगलवार) की शाम 8.00 बजे
https://www.facebook.com/tkarvind
आभार  ..!!
कल दिनांक 28.07.2020 (दिन मंगलवार) की शाम 8.00 बजे मेरे बातचीत के मंच पर होंगे गीतकार और द फिटनेस मैं Satish Saxena जी। उनसे उनकी जीवन यात्रा, रचना यात्रा और उनके फिटनेस मंत्र के बारे में बातें होंगी। आशा है हमारी यह गुफ्तगू आप सभी मित्रों के लिए प्रेरणादाई होगी। आपसे गुजारिश है कि आप सभी इस बातचीत में सक्रिय भागीदारी निभाएं। हमारी यह बातचीत मेरे फेसबुक वॉल पर लाइव स्ट्रीम होगी जिसका लिंक मैं नीचे दे रहा हूं---
https://www.facebook.com/tkarvind
 — with Satish Saxena 

Sunday, July 26, 2020

पता नहीं मां ! सावन में यह आँखें क्यों भर आती हैं - सतीश सक्सेना

जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई,मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते !
जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !

राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा ! अपने ही घर को  वह अपना नहीं कह पाती वह मायके में बदल जाता है ! !
नारी के इस दर्द का वर्णन बेहद दुखद है  .........

याद है उंगली पापा की 
जब चलना मैंने सीखा था ! 
पास लेटकर उनके मैंने 
चंदा मामा  जाना था !
बड़े दिनों के बाद याद 
पापा की गोदी आती है  
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !

पता नहीं जाने क्यों मेरा 
मन , रोने को करता है !

बार बार क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद आज, 
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !

क्यों लगता अम्मा मुझको

इकलापन सा इस जीवन में,
क्यों लगता जैसे कोई 
गलती की माँ, लड़की बनके,
न जाने क्यों तड़प उठी ये 
आँखे झर झर आती हैं !
अक्सर ही हर सावन में माँ, ऑंखें क्यों भर आती हैं !

एक बात बतलाओ माँ , 

मैं किस घर को अपना मानूँ 
जिसे मायका बना दिया या 
इस घर को अपना मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ 
गुड़िया की यादें आतीं हैं !
पायल,झुमका,बिंदी संग , माँ तेरी यादें आती हैं !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,

खुलके हंसना याद आया है,
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की 
चंचल यादें ,आती हैं !
सोते वक्त तेरे संग, छत की याद वे रातें आती हैं !

तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ 
तुम सब भूल गए मुझको 

पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?

छीना सबने, आज मुझे 
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग बिसरे, घर की यादें आती है !

Friday, July 24, 2020

न जाने क्यों कभी हमसे दिखावा ही नहीं होता -सतीश सक्सेना

जब से फ्री व्हाट्सप्प और कई तरह के मेसेंजर आये है तब से दोस्तों के, परिवार जनों के गुड मॉर्निंग, विभिन्न अवसर पर बधाई सन्देश इतने आने लगे हैं कि अगर सब संदेशों का जवाब दिया जाये तो रोज सुबह एक घंटा कम से कम लगता है ! सन्देश भेजने वाला दोस्त कॉपी पेस्ट कर उस सन्देश को २० मित्रों को एक साथ भेजता है और भूल जाता है , उसकी यह समझ है कि इससे मित्रता संबंधों में गर्माहट रहती है , जबकि सच्चाई यह है कि अगर नेट पर एक सन्देश भेजने की कीमत 5 रुपया कर दी जाए तो सारी गर्माहट और प्यार गायब हो जाएगा और एक भी सन्देश भेजना दूभर हो जाएगा !

अगर आपस में वास्तविक प्यार है तो वह वक्त पर अपनी पहचान भी करा देगा और अहसास भी , उसके लिए कृत्रिम शब्दों का प्रयोग बिलकुल आवश्यक नहीं बल्कि केवल दिखावा मात्रा है अगर प्यार का दिखावा करना आवश्यक हो तभी इन संदेशों की उपयोगिता है अन्यथा यह हमारे चारो और एक मास्क आवरण का काम ही करते हैं जो वक्त पर कभी दिखाई नहीं पड़ेंगे !  

यह दिखावा शायद हमारे देश में सबसे अधिक होता है , हैरानी की बात यह है कि कुछ अच्छे और शानदार व्यक्तित्व भी इसे आवश्यक मानकर इतना आत्मसात कर चुके हैं कि वे इसे आवश्यक मानते हैं और दूसरी तरफ से यही उम्मीदें भी करते हैं ! स्नेह और प्यार का अहसास अब इन कृत्रिम बधाई और नमन संदेशों ने ले लिया है !

मैंने आजतक अपने परिवार और बेहद नजदीकी दोस्तों को कभी धन्यवाद् और शुभकामना सन्देश नहीं दिए , मैं जिनसे दिखावा नहीं करता उन्हें यह सन्देश कभी नहीं देता कि मुझे तुम्हारी चिंता है , और मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ ! मुझे लगता है कि प्यार की समझ जानवर को भी होती है , अगर मैं अपने लोगों से वास्तविक लगाव रखता हूँ तो उसे जताने की कोई जरूरत नहीं , वह देर सबेर उसे खुद अहसास हो जाएगा ! सो मुझे कई बार अपने बच्चों का जन्मदिन याद नहीं रहता और मेरा बेटा अक्सर फोन कर "पापा हैप्पी बर्थडे टू मी" कहता है तब मेरे मुंह से निकलता है ओके तो आज तुम्हारा जन्मदिन है , बताओ आज क्या चाहिए अपने सांताक्लाज से ? 

कुछ लोग मुझे कवि समझते हैं कुछ साहित्यकार जबकि यह सम्बोधन सुनकर मुझे चिढ होती है , 300 से अधिक कवितायें लिखी हैं
मैंने , जिनमें से एक भी कविता की दो पंक्तियाँ भी मुझे याद नहीं क्योंकि मैं उन्हें कही और कभी सुनाना पसंद नहीं करता , न अपने लिखे लेखों कविताओं को, सम्पादकों के पास छपने हेतु आवेदन करता ! मेरी कवितायें और लेख अक्सर अखबार खुद छाप देते हैं और मुझे पता भी नहीं चलता क्योंकि घर में हिंदी अखबार आते ही नहीं ! सरदार पाबला जी ने एक ब्लॉग बनाया था जो पिछले कई साल से बंद हो गया है , जिसमें वे ब्लॉगरों के छपती रचनाओं को बता दिया करते थे , जब से वह बंद हुआ मुझे अपनी एक भी रचना के छपने की खबर नहीं मिली और न मैं परवाह करता हूँ ! मुझे लगता है कि मैंने एक ईमानदार अभिव्यक्ति अपने मन को प्रसन्न करने के लिए लिखी है न कि साहित्य या समाज पर अहसान करने को , जिसे भी यह रचनाएं पसंद आएं वह इन्हें कहीं भी ले जाने , छापने को स्वतंत्र है , मेरी रचनाएं मुक्त हैं इनसे मुझे कोई फायदा नहीं चाहिए ! 

आज हिंदी साहित्यकार गिने चुने ही बचे हैं और जो वाकई साहित्यकार हैं उनमें से भी अधिकतर अपनी जयकार बोलते चेलों से घिरे रहते हैं तो मुझे लगता है कि ऐसे व्यक्तित्व सिर्फ अपने शिष्यों के बीच में ही साहित्यकार है , अभिव्यक्ति से इसका शायद ही कोई सरोकार हो और जिसकी भाषा ही सामान्य जन अभिव्यक्ति के किसी काम की न हो वह साहित्यकार हो ही नहीं सकता वह सिर्फ क्लिष्ट हिंदी शब्दों का उपयोग कर, अपनी विद्वता सिद्ध करने की कोशिश करता , एक तुच्छ जीव है जो गरीब हिंदी के ऊपर सवार होकर अपनी जयकार  बुलवाने में सफल रहा है !

प्रणाम आप सबको !!
    

Saturday, June 27, 2020

मजबूत इच्छा शक्ति और कोरोना बचाव - सतीश सक्सेना

इस भयावह समय में अपने आप को व्यस्त रखना और मस्त रहना बेहद आवश्यक है , इससे जीवनी शक्ति में ताजगी बनी रहती है , इस शक्ति के आगे कोरोना अपने आपको बहुत कमजोर पाता है और एक सामान्य फ्लू से अधिक नुकसान नहीं कर पाता !  अधिकतर लोग इसे बढ़ाने के लिए खाने पीने पर अधिक जोर देते हैं मगर मेरा अपना अनुभव इससे अलग है ! किसी व्यक्ति का इम्यून सिस्टम बढ़ाने के लिए उसका फुर्तीला और तनाव रहित होना आवश्यक है ! तनाव दूर करने के लिए आप अपने आपको वे नए शौक सिखाएं जिससे मन जवानों जैसा प्रफुल्लित रहे , हर  बीमारी के लिए दवा लेने न भागें और न खाएं अपनी शारीरिक शक्ति पर भरोसा रखना बहुत आवश्यक है , खुद पर भरोसा टूटने का अर्थ ही बुढ़ापे का आगाज़ है बीमारियों की शुरुआत है !


बीमारियों से भय मुक्ति का एक सरल उदाहरण देता हूँ जो मेरा अपना है , पढ़ने में दिक्कत होने पर मेरी आँख में चश्मा आज से लगभग 30 वर्ष पहले लगा था , और उसके बाद मैंने लगभग १५ वर्ष तक विभिन्न शक्ति के ग्लासेस उपयोग किये और बाद में धीरे धीरे छोड़ दिया , आज ६५ वर्ष की उम्र में मुझे चश्मा लगाने की आवश्यकता केवल बहुत छोटे शब्द पढ़ने पर ही पड़ती है यह पोस्ट मैं बिना चश्मे के लिख रहा हूँ और मुझे कोई परेशानी नहीं होती मेरे घर में +1 से लेकर +3 तक के कम से कम 8 - 9 चश्में रखें हैं जो मैंने समय समय पर अपने लिए ख़रीदे थे , मैं हमेशा सोंचता रहा हूँ कि आई ग्लास के आविष्कार से पहले भी लोग अंधे नहीं हो जाते थे वे बखूबी देख सकते थे हम लोग जिस सुविधा की आदत डाल लें वही हमारी आदत में शुमार हो जाता है ! 
मैं पिछले ३ माह से घर में बंद हूँ , और सरकार की और से सीनियर सिटीजन के लिए बाहर निकलना निषेध भी है मगर आज सुबह एक मित्र जिनका घर लगभग 12 km दूर है ,को होम्योपैथिक दवा देने जाने के लिए , कपडे पहनने लगा था कि उनका फोन आ गया कि अब वे स्वस्थ हैं और आप इतनी दूर आने की तकलीफ न करें !हालाँकि मुझे इस उम्र में यह डर नहीं था कि मुझे खतरा हो सकता है !

अधिकतर लोग कहते हैं कि इस उम्र में बीमारियां इतनी हैं कि हंसने की हिम्मत ही नहीं होती , मुझे भी ५ वर्ष पहले ऐसी ऐसी बीमारियां थीं जो मुझे भय के कारण आराम से सोने भी नहीं देती थीं मगर ज़िंदा रहने की तेज इच्छा के कारण उनकी उपेक्षा करना शुरू की और एक आलसी और कमजोर शरीर से एक लम्बी दूरी का धावक निकल कर बाहर आया जो लगातार तीन घंटे तक बिना रुके दौड़ता था इस करामात ने जो मजबूत आत्मविश्वास दिया उससे न केवल चेहरे की रौनक जवानों से अधिक बेहतर बन गयी बल्कि मैं अपनी जवान शक्ति को महसूस भी करने लगा था  और मैं वाकई हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया !!

जबरदस्त आत्मविश्वास और जवान इच्छा शक्ति आपकी उम्र बढ़ाने के लिए , और बीमारियों का आपके शरीर से नामोनिशान मिटाने के लिए काफी है दोस्त आप अपनी प्रतिरक्षा शक्ति पर यकीन तो करें !

एक कविता ऐसे ही किसी मस्त समय में लिखी है हालांकि मेरी उम्र के लोगों को यह कविता पसंद नहीं आएगी , इसे बेहद दोस्ताना अंदाज़ में लिखा गया है और वे इसके आदी नहीं हैं , 50 वर्ष से ऊपर के लोग बच्चों की तरह हंसने में असहज होते हैं उन्हें सिर्फ सम्मान चाहिए और वह भी सभ्यता के साथ और जीर्ण शरीर और बुढ़ापा भी यही चाहते हैं !

शाब्बाश बुड्ढे ! यू कैन रन ! 
तवा बोलता छन छन छन !

सारे जीवन काम न करके
तूने सबकी वाट लगाईं !
ढेरों चाय गटक ऑफिस में
जनता को लाइन लगवाई !
चला न जाना हस्पताल में
बेट्टा , वे पहचान गए तो
जितना माल कमाया तूने
घुस जाएगा डायलिसिस में
बचना है तो भाग संग संग
रिदम पकड़ कर छम छम छम ,
शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !

जब से उम्र दराज बने हो 
सबके आदरणीय बने हो
सारी दुनियां के पापों को
खुलके आशीर्वाद दिए हो !

इस सम्मान मान के होते
देह हिलाना भूल गए हो
पिछले दस वर्षों से दद्दू
छड़ी पकड के घूम रहे हो
आलस तुझको खा जाएगा
फेंक छड़ी को रन,रन,रन , शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !

साठ बरस का मतलब सीधा
साठ फीसदी ताकत कम
ह्रदय बहाए खून के आंसू
बरसे जाएँ झम झम झम
चलना फिरना छोड़ा कबसे
घुटने रोते , चलते दम !
साँसे गहरी, भूल चुका है
ऑक्सीजन पहले ही कम
अभी समय है रख्ख भरोसा
गैंग बना कर धम धम धम ,शाब्बाश बुड्ढे, यू कैन रन !


डायबिटीज खा रही तुझको 
ह्रदय चीखता, जाएगा मर
सीधा साधा इक इलाज है
उठ खटिया से दौडने चल
आधे धड को पैर मिले हैं
उनको खूब हिलाता चल
ताकतवर शरीर होगा फिर
मगर तभी जब,मेहनत कर
सब देखेंगे जल्द , करेंगे
दुखते घुटने,बम बम बम , शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !

Friday, June 26, 2020

पंहुचेंगे कहीं तक तो प्यारे,ये कपोत दिलेर,हमारे भी -सतीश सक्सेना

खस्ता शेरों को देख उठे, कुछ सोते शेर हमारे भी !
सुनने वालों तक पंहुचेंगे, कुछ देसी बेर हमारे भी !

पढ़ने लिखने का काम नहीं बेईमानों की बस्ती में !
बाबा-गुंडों में स्पर्धा , घर में हों , कुबेर हमारे भी !


चोट्टे बेईमान यहाँ आकर बाबा बन घर को लूट रहे 
जनता को समझाते हांफे, पुख्ता शमशेर हमारे भी !

जाने क्यों वेद लिखे हमने, हँसते हैं हम अपने ऊपर
भैंसे भी, कहाँ से समझेंगे, यह गोबर ढेर, हमारे भी !


फिर भी कुछ ढेले फेंक रहे ,शायद ये नींदें खुल जाएँ ! 
पंहुचेंगे कहीं तक तो प्यारे,ये कपोत दिलेर,हमारे भी !

Monday, June 8, 2020

बस्ती के मुकद्दर को ही जान क्या करेंगे -सतीश सक्सेना


ये कौम ही मिटी, तो वरदान क्या करेंगे !
धूर्तों से मिल रहे ये, अनुदान क्या करेंगे ?

गुंडों के राज में भी, जीना लिखा के लाये
बस्ती के मुकद्दर को ही
  जान क्या करेंगे ?

आशीष कुबेरों का लेकर, बने हैं हाकिम  
लालाओं के बनाये दरबान, क्या करेंगे ?

घुटनों पे बैठ पगड़ी पैरों में मालिकों के !
बोतल में बंद हैं ये, मतदान क्या करेंगे ?

बेशर्म जमूरे और सच को जमीं बिछाकर
हथियार मदारी के , आह्वान क्या करेंगे !

इक दिन छटे अँधेरा विश्वास की किरण है 
जनतंत्र की व्यथा हैं, व्यवधान क्या करेंगे !

Sunday, June 7, 2020

एनसीआर और भूकंप जोन 4 -सतीश सक्सेना

पिछले 45 दिन से लगातार आ रहे भूकंप के झटके , आपको और सावधान रहने की भविष्यवाणी कर रहे हैं !!
कल भूकंप से निपटने की आपातकालीन किट ( पानी की बोतलें, बैटरी सेल, इमरजेंसी पावरफुल टोर्च, वेदर रेडियो, वाकी टाकी, सिग्नलिंग सिस्टम,हथौड़ा या कुल्हाड़ी, पावर बैंक ,ड्राई मिल्क, ड्राई फ्रूट्स , बिस्किट, ओडोमॉस ,हेड प्रोटेक्शन,मास्क और दवाईयाँ ) बनानी शुरू कर दी , एनसीआर बेहद खतरनाक सिस्मिक जोन 4 में आता है !
2020 बेहद खराब साबित होगा हम सबके लिए अगर हम लापरवाही करेंगे !
अफसोस कि मीडिया से सूचना के नाम पर कुछ भी नही मिल रहा है ...
मृत्यु से न डरें बल्कि अगर सामने भी हो तो मुकाबला करें , यक़ीनन आप लंबा जी पाएंगे , इन दिनों व्हाट्सप्प ज्ञानियों और जाहिलों से बचकर रहें, सावधानी ही बचाव है ...
सस्नेह मंगलकामनाएं !!!
https://seismo.gov.in/content/dos-donts

Friday, May 15, 2020

सदियों बादल थके बरसते ,सागर का जल खारा क्यों है -सतीश सक्सेना

अनुत्तरित हैं प्रश्न तुम्हारे
कैसे तुमसे नजर मिलाऊं
असहज कष्ट उठाए तुमने

कैसे हंसकर उन्हें भुलाऊं
युगों युगों की पीड़ा लेेेकर
पूछ रही है नजर तुम्हारी
मैं तो अबला रही शुरू से
तुम सबने, चूड़ी पहनाईं !
हर दरवाजा जीतने वाला , इस दरवाजे हारा क्यों है।

बचपन तेरी गोद में बीता
कितनी जल्दी विदा हो गई !
मेरा घर क्यों बना मायका,
कैसे घर से जुदा हो गई !
अम्मा बाबा खुश क्यों हैं ?
ये आंसू भर के नजरें पूछें !
आज विदाई है, आँचल से
कैसे दुनियाँ को समझाए !
हिचकी ले ले रोये लाड़ली, उसको ये घर प्यारा क्यों है ?

जिस हक़ से अपने घर रहती
जिस हक़ से लड़ती थी सबसे
जिस दिन से इस घर में आयी
उस हक़ से, वंचित हूँ तब से
भाई बहिन बुआ और रिश्ते 
माँ और पिता यहाँ भी हैं पर
नेह, दुलार, प्यार इस घर में
मृग मरीचिका सा बन जाये !
सदियों बादल थके बरसते ,सागर का जल खारा क्यों है !


जबसे आयी हूँ इस घर में
प्रश्न चिन्ह ही पाए सबसे !
मधुर भाव,विश्वास,आसरा
रोज सवेरे, बिखरे पाए !
कबतक धैर्य सहारा देता
जलते सपनों के जंगल में
किसे मिला,अधिकार जो
मेरे आंसू को नीलाम कराए
अपनापन बह गया फूट, अब उनका चेहरा काला क्यों है !

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