शपथ उठाए संविधान की
Wednesday, January 4, 2023
अरे चीथड़ों कब जागोगे -सतीश सक्सेना
शपथ उठाए संविधान की
Saturday, December 10, 2022
रोबो चेयर, एक वरदान -सतीश सक्सेना
घर में कुर्सी पर बैठ कर लैपटॉप पर या कम्बल में टीवी , बाहर निकलो गाड़ी से ऑफिस में , लिफ्ट से ऑफिस में अपनी कुर्सी तक ,शाम को गाड़ी से घर वापसी , घर के अंदर सोफा तैयार , डाइनिंग कुर्सी पर बैठकर डिनर , और बाद में गर्म बिस्तर
सोचता हूँ कि पैरों का काम ही क्या है , घर में खड़े होकर कार तक पैदल जाना पड़ता है , हाई क्वालिटी रोबो व्हील चेयर बनवा लेता हूँ उसमें सामने लैपटॉप स्क्रीन लगी हो , सेंसर सड़क पर किसी से टकराने भी नहीं देंगे ! घुटनों की जरूरत भी सिर्फ उठते समय पड़ेगी जब सोने जाना होगा , यह कुर्सी लगभग एक लाख की आएगी , खरीदने की सोच रहा हूँ , आराम के लिए पैसा उपयोग न किया तो फिर किस काम आएगा !
घर में पूरे दिन बैठे रहकर टीवी देखते समय मेरी स्पोर्ट्स वाच रिमाइंडर देती रहती है कि अब कम से कम खड़े ही हो जाओ भैया ? इसे फेंक ही दूँगा किसी दिन गुस्से में !
Friday, December 9, 2022
हम पाखंडी -सतीश सक्सेना
अगर लेखक हैं और आम लोगों में मशहूर होना है तो सबसे पहले नाम बदलिए , बेहतरीन सांस्कृतिक नाम रखिए, दाढ़ी बढ़ा लीजिए बड़े बाल कंधे तक बनाइए, खादी कुर्ता पजामा, चेहरे पर गंभीरता , और कुछ चेले लेकर चलना शुरू करें फिर देखिए जलवा !
सबसे बढ़िया धंधा करना हो तो बाबा बन जाइए, सतीश सक्सेना जैसे बकवास नाम की जगह सत्यानंद सरस्वती अधिक प्रभावशाली रहेगा, दाढ़ी और सर के बाल बढ़ाकर नारंगी रंग की धोती पहनिए, पैरों में खड़ाऊँ हों तो क्या कहने, राह चलते लोगों में पैर छूने की होड़ लग जाएगी , आशीर्वाद दो और धन बरसने लगेगा !
और अगर 69-70 की उम्र में आकर, टी शर्ट, शॉर्ट पहन लिया तब लोगों से यह सुनने को तैयार रहिए, चढ़ी जवानी बुड्ढे नू ! मन को मारना सीख ले, इस उम्र में यह रंग, सब लोग क्या कहेंगे !
अभी हमें मानसिक तौर पर विकसित होने में, कम से कम 100 साल लगेंगे !
Saturday, December 26, 2020
तो फिर मेरी चाल देख ले -सतीश सक्सेना
शायद यह अकेला समाज है जहाँ ऊपरी दिखावे को सम्मान देना सिखाया जाता है ! अगर सामने से कोई गेरुआ वस्त्र धारी और पैर में खड़ाऊं पहने आ रहा है तो पक्का उस महात्मा के चरणों में झुकना होगा और आशीर्वाद मांगना ही है चाहे वह बुड्ढा पूरे जीवन डाके डालकर दाढ़ी बढ़ाकर छिपने के लिए बाबा क्यों न बना हो और किसी गए गुजरे का आशीर्वाद पाने के योग्य भी न हो !
Friday, November 13, 2020
दरी बिछाकर फटी तेरे , दरवाजे आके नाचेंगे -सतीश सक्सेना
Monday, June 8, 2020
बस्ती के मुकद्दर को ही जान क्या करेंगे -सतीश सक्सेना
बस्ती के मुकद्दर को ही जान क्या करेंगे ?
बेशर्म जमूरे और सच को जमीं बिछाकर
हथियार मदारी के , आह्वान क्या करेंगे !
जनतंत्र की व्यथा हैं, व्यवधान क्या करेंगे !
Friday, May 15, 2020
सदियों बादल थके बरसते ,सागर का जल खारा क्यों है -सतीश सक्सेना
कैसे तुमसे नजर मिलाऊं
असहज कष्ट उठाए तुमने
कैसे हंसकर उन्हें भुलाऊं
मैं तो अबला रही शुरू सेतुम सबने, चूड़ी पहनाईं !
हर दरवाजा जीतने वाला , इस दरवाजे हारा क्यों है।
बचपन तेरी गोद में बीता
कितनी जल्दी विदा हो गई !
मेरा घर क्यों बना मायका,
कैसे घर से जुदा हो गई !
ये आंसू भर के नजरें पूछें !
आज विदाई है, आँचल से
कैसे दुनियाँ को समझाए !
हिचकी ले ले रोये लाड़ली, उसको ये घर प्यारा क्यों है ?
जिस हक़ से अपने घर रहती
जिस हक़ से लड़ती थी सबसे
जिस दिन से इस घर में आयी
उस हक़ से, वंचित हूँ तब से
भाई बहिन बुआ और रिश्ते
नेह, दुलार, प्यार इस घर में
मृग मरीचिका सा बन जाये !
सदियों बादल थके बरसते ,सागर का जल खारा क्यों है !
प्रश्न चिन्ह ही पाए सबसे !
मधुर भाव,विश्वास,आसरा
रोज सवेरे, बिखरे पाए !
कबतक धैर्य सहारा देता
जलते सपनों के जंगल में
किसे मिला,अधिकार जो
अपनापन बह गया फूट, अब उनका चेहरा काला क्यों है !
Tuesday, March 31, 2020
शाही सलाम में कलम, क्या ख़ाक लिखेगी ? -सतीश सक्सेना
अभिव्यक्ति को वतन में, खतरनाक लिखेगी !
अवसाद में निराश कलम , ज्ञान लिखेगी ?
मन भाव ही कह न सकी, चार्वाक लिखेगी ?
तकलीफ ए क़ौम को भी इत्तिफ़ाक़ लिखेगी !
किसने दिया था दर्द, वह बतला न सकेगी !
दरबार के खिलाफ ,क्यों बेबाक लिखेगी ?
सुलतान की जय से ही, वो धनवान बनेगी !
एतराज ए हुक्मरान को , नापाक लिखेगी !
Monday, January 20, 2020
थोड़े से दर्द में ही , क्यूँ ऑंखें छलक उठी -सतीश सक्सेना
मुर्दा हुए शरीर को , जीना सिखाइये !मरते हुए ज़मीर को , पीना सिखाइये !
इतने से दर्द में ही , क्यूँ ऑंखें छलक उठी
गुंडों की गली में इन्हें , रहना सिखाइये !
सरकार,शाही खौफ से, डरना सिखाइये !
नज़रें उठायीं तख़्त पे दिलदार, तो खुद को ,
सरकार के डंडों को भी,सहना सिखाइये !
Friday, May 10, 2019
यज्ञ सदियों तक चले, जडबुद्धि अभ्युत्थान में -सतीश सक्सेना
कौन आएगा नमन को , मेरे हिंदुस्तान में ?
धूर्तों ने धन कमाने , घर में, कांटे बो दिए !
रोयेंगी अब पीढ़िया, परिवार पुनरुत्थान में !
कौम सारी हो चुकी बदनाम , बहते खून से ,
कई युग बीतेंगे अपनी क़ौम के भुगतान में !
यज्ञ सदियों तक चले जडबुद्धि अभ्युत्थान में !
इस मदारी राज में सब , दिग्भ्रमित से हैं खड़े
औ लगाओ जोर हइन्सा राज ध्वजोत्थान में !
Tuesday, May 7, 2019
क्या जानों सरकार हमारे बारे में -सतीश सक्सेना
क्या समझे हो यार हमारे बारे में !
इसीलिये अब, तुमसे दूरी रखते हैं
दिल न दुखे सरकार,हमारे बारे में !
हमको रोज परिंदे ही बतला जाते
कितने हाहाकार , हमारे बारे में !
जो वे चाहें करें फैसला,किस्मत का
है उनका अधिकार, हमारे बारे में !
मरते दम तक तुम्हें नहीं समझायेंगे
कितने गलत विचार हमारे बारे में !
Saturday, January 5, 2019
अब एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में -सतीश सक्सेना
जैसे लगती जान जाए
अस्थमा झकझोरता है,
रात भर हम सो न पाए
धुआँ पहले खूब था अब
यह धुआँ गन्दी हवा में
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने
दीप आँखों में जले,अब
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !
धूर्त,बाबा बन बताते
स्वयं को ही राज्यशोषित
और नेता कर रहे नेतृत्व
को अवतार घोषित !
चोर सब मिल गा रहे हैं
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक
देख ठट्ठा मारते, अब
राम बंधक बन चुके हैं , कातिलों के शहर में !
सुगन्धित खुशबू बिखेरें
फूल दिखते ही नहीं हैं
जाने कब भागीरथी भी
मोक्षदायिनि सी रहीं हैं
कृष्ण की अठखेलियाँ भी
थीं, कभी कृष्णा किनारे
उस जगह रोती हैं गायें ,
अपने केशव को पुकारें
किस गली खोये स्वर्ण
अवशेष मेरे देश के ?
हाँ , एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में !
Thursday, November 8, 2018
कल दिवाली मन चुकी है ,जाहिलों के शहर में -सतीश सक्सेना
जैसे लगती जान जाए
अस्थमा झकझोरता है, रात भर हम सो न पाए
धुआं पहले खूब था अब
यह धुआं गन्दी हवा में
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने
दीप आँखों में जले,अब
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !
धूर्त, बाबा बन बताते
स्वयं को ही राज्यशोषित
और नेता कर रहे हैं ,
स्वयं को अवतार घोषित
चोर सब मिल गा रहे हैं
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक
देख ठट्ठा मारते, अब
राम बंधक बन चुके हैं , जाहिलों के शहर में !
Tuesday, May 22, 2018
भगवा लिवास को कभी लुच्चा नहीं कहते -सतीश सक्सेना
इस पाशविक प्रवृत्ति को,कच्चा नहीं कहते !
उस रात एक स्वप्न का , दम घोट चुका है ,
बच्चा है ये शैतान का , टुच्चा नहीं कहते !
बस्ती में जाहिलों की,चोर डाकुओं को भी
भगवा लिवास में, कभी लुच्चा नहीं कहते !
सारे डकैत मिल के , चोर चोर कह रहे !
अरविन्द को इस देश में सच्चा नहीं कहते !
Wednesday, May 16, 2018
उनसे कहिये,चलने का अंदाज़ बदल लें -सतीश सक्सेना
झूठी खबरों के सस्ते अखबार बदल लें !
चलते, अहंकार की चाल,नज़र आती है !
उनसे कहिये,चलने का अंदाज बदल लें !
बच जाएगा, आया ऊँट पहाड़ के नीचे
उंची गर्दन, नीची करके , चाल बदल ले !
तीखी उनकी धार , नहीं दरबार सहेगा !
चंवर बादशाही से ही,तलवार बदल लें !
कोई मसालेदार खबर इन दिनों न आई
उनको कहिये अपने गोतामार बदल लें !
Thursday, March 22, 2018
तीक्ष्ण अभिव्यक्ति को,खतरे भी उठाने होंगे - सतीश सक्सेना
रूप संतों का रखे , चोर - उचक्के पूजे ,
एक दिन आँख खुलेंगीं जरूर भक्तों की
अब न गुरुदेव मिलेंगे किसी डेरे में यहाँ
रिश्ते दिखावे के -सतीश सक्सेना

Monday, January 8, 2018
करें दंडवत महलों जाकर,बड़े महत्वाकांक्षी गीत !-सतीश सक्सेना

नफरत फैला,निर्मम गीत !
लेके चलते , भूखे खप्पर,
इन पर श्रद्धा कर के बैठे
जाने कब से टूटे छप्पर !
को,रहे ताकते निर्बल गीत !
डरकर इन्हें दिलाती जीत !
किसमें दम है आँख मिलाये
चारण बनकर ,गाते गीत !
बोतल ले कर मिलते मीत !
बिका मीडिया हर दम गाये, अपने दाताओं के गीत !
खादी कुरता, गांधी टोपी,
में कितने दमदार बन गये !
श्रद्धा और आस्था के बल
मूर्खों के सरदार बन गये !
वोट बटोरे झोली भर भर,
देशभक्ति के बनें प्रतीक !
राष्ट्रप्रेम भावना बेंच कर, अरबपति बन जाएँ गीत !
Thursday, June 22, 2017
ध्यान बटाने को मूर्खों का, राजा के सहयोगी आये ! - सतीश सक्सेना
Monday, June 5, 2017
कितनी आशाएं पाली थीं, बिके हुए अखबारों से -सतीश सक्सेना
बेबाकी उन्मुक्त हंसी पर, दुनियां शंका करती है !
निरे झूठ को बार बार दुहराकर , गद्दी पायी है !
सबसे पहले बिका भरोसा,शिकवा नहीं बज़ारों से !












