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Thursday, February 28, 2019

निरंकुश मीडिया बर्बाद कर देगा इस शानदार देश को,समाज को -सतीश सक्सेना

आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक वृद्ध मां को उसका बेटा निर्दयता पूर्वक जमीन पर घसीटता हुआ ट्रेक्टर के आगे ले जा रहा है ताकि उसे कुचल कर मार सके और यह घटना महाराष्ट्र 21जून की है जहाँ राष्ट्र गौरव की बातें सबसे अधिक की जाती हैं !
पिछले कुछ वर्षों में , हमारे देश में नफरत की खेती खूब की गयी है और उसका नतीजा भी नजर आने लगा है, मेरे अपने सर्किल में कई सरल ह्रदय व्यक्तियों के व्यवहार में फर्क आया साफ़ महसूस हो रहा है , पडोसी देश के प्रति उत्पन्न की गयी यह नफरत अब मोहल्ले, घर और ट्रैफिक में भी नजर आ रही है , सोशल मीडिया पर जिनके विचार हमसे न मिलें उन्हें अमित्र करना आम है ! अफ़सोस यह है कि नफरत फ़ैलाने वाले अधिकतर भोले लोग, यहाँ तक कि छोटे बच्चों तक के मानस में , टीवी पर चीखते एंकरों की बाते, अमिट निशान छोड़ रही हैं !

सीधा साधे शांत देश को , जिसमें समस्त जाति ,कौम के लोग आराम से रह रहे थे, इन लोगों ने अपने घरों में भी बच्चों को  झाग उगलते हुए गाली देना सिखा दिया है जिसे सब जोश के साथ आसानी से आत्मसात भी कर रहे हैं , इन जाहिलों को यह नहीं मालुम की स्नेह और प्यार की जगह अनजाने में तुम अपने घर में जहर बो रहे हो जिसकी आग में सबसे पहले तुम्हारे बच्चे ही झुलसेंगे जिन्हें इस माहौल में ही पूरी उम्र जीना है ! मानव की मानव के प्रति बढती हुई गुस्सा इन्हें जानवर बना देने में सक्षम है और शीघ्र यह सड़कों पर नजर आयेगी ! 

मारो , सबक सिखा दो के नारे लगाते, इन बेवकूफों को यह भी नहीं मालुम कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों में युद्ध का अर्थ , घना अन्धेरा होगा जिसमें दोनों ओर कोई नाम लेवा नहीं बचेगा , भारत पाकिस्तान में ताकत की तुलना सिर्फ पारम्परिक युद्ध होने तक ही संभव है , परमाणुशक्ति संपन्न देशों में यह तुलना सिर्फ मूर्खता पूर्ण विचार है , दोनों अपार जीव संहार और मानवता विनाश में सक्षम हैं यहाँ एक पक्ष के धन और जनशक्ति  का कोई मूल्य नहीं , परमाणु युद्ध होने पर लाखों सैनिकों, भरपूर हथियारों , हवाई जहाजों , और अरबों डॉलर का रिज़र्व धन एक क्षण में नष्ट हो जाएगा  और दो जाहिल शासकों के मनहूस स्मारक  के रूप में ,आसमान की जगह सिर्फ घना अन्धेरा बचेगा , जो सैकड़ों बरसों तक मानव की मूर्खता का अवशेष होगा !

यही कारण था कि विश्व का सबसे ताकतवर राष्ट्र अमेरिका का राष्ट्रपति आज वियतनाम आकर एक गरीब देश नार्थ कोरिया के राष्ट्रपति से हाथ मिलाने को विवश हो रहा है और यही समय की पुकार भी है कि परमाणुशक्ति संपन्न  देश आपस में युद्ध की सोंच भी न सकें ! 

आज मैंने अपने घर से ललकारने वाले समस्त चैनल विदा कर दिए , सौम्यता से बात करने वाले चैनल ही देखना है इस हेतु न्यूज़ चैनल कम से कम देखूंगा , देखना है कि इस युद्ध यूफोरिया पर लगाम लगाने के लिए हमारी सरकार कब कदम उठाती है ! दुआ करूंगा कि भारत पाकिस्तान नेपाल बंगलादेश एक साथ एक संघ राष्ट्र का निर्माण करें और हम ईद पर होली के उत्साह से ,गले मिलकर, नफरत की करवटें लेना छोड़, आराम की नींद सो सकें ! 

Monday, March 27, 2017

एक राजा के ही बस, ढोल बजाने होंगे ! -सतीश सक्सेना

जोश और शान से कुछ झूठ, सुनाने होंगे !
तालियों के लिए कुछ , काम  गिनाने होंगे !

 
वोट पाने  को  हमें , बेहतरीन  लोगों पर  , 
आज ही विष बुझे कुछ तीर चलाने होंगे !

वोट पाने को तो सौजन्य मुखौटा ही नहीं 
कुछ मुसलमान भी , सीने से लगाने होंगे !

हमने पर्वत से तो नाले भी, निकलते देखे !
हर जगह तो नहीं , गंगा के मुहाने होंगे !

धन कमाना हो खूब, मीडिया में आ जाएँ 
एक राजा के ही बस , ढोल बजाने होंगे !

Tuesday, August 2, 2016

मालिक ये हाथ रखें नीचे,हम हाथ उठाना सीख गए - सतीश सक्सेना

डमरू तबला कसते कसते,हम धनक उठाना सीख गये,
तेरा गंद उठाकर सदियों से, तेरा आबोदाना सीख गये !


हमसे ही अस्मिता भारत की, परिहास बनाना बंद करें
सदियों से पिटते पिटते ही, तलवार चलाना सीख गए !

मालिक गुस्ताखी माफ़ करें,घरबार हिफाज़त से रखना
बस्ती के बाहर भी रहकर, हम आग जलाना सीख गये !

बेपर्दा घर, जूता, गाली, मजदूरी कर हम  बड़े हुए !
जाने कब, ऊंचे महलों की दीवार गिराना सीख गए ! 

तेरे जैसा ही जीवन पाकर, पशुओं जैसा बर्ताव मिला,
मालिक ये हाथ रखें नीचे, हम हाथ उठाना सीख गए !

Thursday, July 16, 2015

बड़ी पहचान छोटी हो,गवारा दिल नहीं करता -सतीश सक्सेना

कहीं बंध जाएँ खूंटे से आवारा दिल नहीं करता !
भरोसा करके सो जाए बंजारा,दिल नहीं करता !

दया पाकर कोई भिक्षा,फकीरों को नहीं भाती 
तुम्हारे  द्वार जाने को, दुबारा दिल नहीं करता !

मेरे हिन्दोस्तां की शान खो जायेगी , नफरत में  
बड़ी पहचान छोटी हो,गवारा दिल नहीं करता !

जमाने भर के भोजन को, मेरे पुरखों ने खोला है,
ये लंगर बंद करने को, हमारा दिल नहीं करता !

जिन्होंने साथ छोड़ा था मुसीबत में , पहाड़ों पर 
उन्हीं बैसाखियों का लें सहारा दिल नहीं करता !

Saturday, April 25, 2015

किन्नर मन्नू महंत से बातचीत - सतीश सक्सेना

पिछले सप्ताह दिन में एक काल आयीं जिसमें अगर समय हो तो बात करने का अनुरोध था , दूसरी तरफ हरियाणा से मन्नू महंत
नामक किन्नर मुझसे अपने समाज के बारे में बात करना चाहते थे !उनसे बात करते समय यह लगभग साफ़ था कि वे अपनी बात कहने में बेहद गंभीर, व्यवस्थित और विद्वान थे और हरियाणा में अपनी गद्दी के प्रधान भी !  
इन्होने मेरा एक लेख पढ़कर ही मुझे फोन किया था , मेरे लेख एवं किन्नरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण के प्रति धन्यवाद कहते हुए उन्होंने लगभग आधा घंटा बात की जिसमें अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति समाज से शिकायत और बेहतर सम्मान की मांग शामिल थी  !
किन्नरों के प्रति समाज का रवैया न्याय पूर्ण नहीं है इसमें कोई संदेह नहीं , इन्हें समाज हमेशा शक की नज़र से ही देखता है व इनकी समस्याओं और स्थिति को जाने बिना , बदले में सिर्फ भय और नफरत ही देता है !
मानवता दया करुणा के नाम पर बड़ी बड़ी बातें करते हम लोग किन्नरों के प्रति जानवरों से भी खराब रवैया अख्तियार करते हैं , वे लोग सामान्य व्यक्तियों की भांति जीवन यापन करना चाहते हैं जो समाज करने नहीं देता ! 

किन्नर आदिकाल से पाये जाते हैं , पौराणिक काल में शिव के एक अवतार अर्धनारीश्वर की चर्चा है जिनका आधा
भाग नारी और आधा पुरुष का था , किन्नर शिव के इस रूप को पूजते हैं ! महाभारत में भी इनकी चर्चा है कि द्रुपद पुत्र शिखंडी, स्त्री स्वरूपा पैदा हुआ था, और उसकी आड़ में अर्जुन ने भीष्म पर तीर चलाये थे , चूंकि भीष्म की प्रतिज्ञा थी कि वे किन्नरों पर , निहत्थों पर एवं स्त्री पर प्रहार नहीं करेंगे युद्ध भूमि में पिछले जन्म की अम्बा को शिखंडी रूप में पहचान, उन्होंने हथियार एक और रख दिए और किन्नर शिखंडी की आड़ से, अर्जुन को भीष्म पर घातक वार करने का मौका मिला !

इनके बारे में तमाम गलत धारणाएं समाज में फैलायी गयी हैं , जिन लोगों को इनसे कोई सहानुभूति नहीं वही इनके बारे में सबसे अधिक अनर्गल प्रचार करते हैं !वे नाच गा कर  भिक्षा यापन कर अपना गुज़ारा करते हैं , उनका यह भी दावा है कि वे यक्ष , गन्दर्भ, किन्नर समाज के लोग हैं और नाच गाना उनका पुरातन पेशा है , उन्हें अपनी स्थिति से कोई शिकायत नहीं  बल्कि उसे पसंद करते हैं , समाज से उन्हें एक ही शिकायत है कि अगर समाज उनका आदर न कर सके तो भी उसे उनके अपमान का कोई अधिकार नहीं ! वे सूफी संत सम्प्रदाय की राह पर चलने वाले लोग हैं और उनकी दुआओं में उतनी ही शक्ति है जितनी किसी और और वास्तविक संत में ! 
इनके साथ अपराध होने की स्थिति में टेलीविजन मीडिया अथवा अखबारों में इन्हें कोई महत्व अथवा प्रमुखता नहीं दी जाती बल्कि इन्हें हेय व अपमानजनक दृष्टि से देखा जाता है !  वे अपने आपको किन्नर कहलाना पसंद करते है , हिजड़ा उर्फ़ छक्का शब्द एक गाली है जो इन्हें, निर्मम समाज की देन है , किन्नर हर धर्म का सम्मान करते व मानते  हैं , मृत्यु होने की दशा में किन्नरों को उनके धर्म  के आधार पर  दफनाया या जलाया जाता है !

इनको ट्रेन यात्रा अथवा बस यात्रा में कोई सीट नहीं देता चाहें यह बीमार ही क्यों न हों उनके साथ खाना पीना तो दूर लोग बैठना भी पसंद नहीं करते !
 अख़बारों के हिसाब से माने तो छत्तीस गढ़ में कोई कानून बनाने का प्रयत्न हो रहा है  जिसमें इन्हें ऑपरेशन द्वारा स्त्री या पुरुष बनाने की बात कही गयी है ? अगर यह सच है तो यह अमानवीय है ! उनका मानना है कि यह लोग अल्पमत में हैं और कम संख्या में हैं इनका सरंक्षण होना चाहिए न कि इन्हें समाप्त ही कर दिया जाये !

इनकी देवी का नाम  बहुचरा माता है जिनका मंदिर बलोल , संथाल , गुजरात में है !  मन्नू महंत का कहना है कि 

" चाहे इस्लाम हो या हिन्दू , हर धर्म में इन्हें सम्मान दिया गया है और इनकी चर्चा है ! वे आगे कहते हैं कि हाल में उन्होंने पढ़ा है कि किन्नरों को ऑपरेशन द्वारा महिला या पुरुष बना दिया जाएगा कितने दुर्भाग्य की बात है कि जिस भारत देश में किन्नरों को साधू संत और असली फ़क़ीर माना जाता है उनके अगर सुबह दर्शन हो जाएँ तो माना जाता है कि सारे आज काम पूर्ण होंगे , जिन्हे अल्लाह , वाहे गुरु , यीशु मसीह , भगवान के बहुत करीब माना जाता है वही मालिक के बन्दे अपनी पहचान के लिए भी किसी सरकार या हुकूमत के आगे मज़बूर हैं क्या इनके हकों के लिए क़ानून बनाने से पहले इनसे पूंछना जरूरी नहीं ?
क्या आपको नहीं लगता कि वे उन बेजुबान जानवरों में से नहीं जिनके बारे में कानून बनाने से पहले उनसे पूंछा भी नहीं जाता ? क्या आपको नहीं लगता कि कुदरत और प्रकृति से छेड़छाड़ करना गलत है ?
किन्नर अपनी जिन्दगी से बहुत खुश हैं वो सबको दुआएं देते हैं , सबका भला चाहते हैं , वे सूफी साधू संत हैं , भिक्षा यापन से गुज़ारा करते हैं  और ऐसे ही रहना चाहते हैं उन्हें नौकरी आदि कुछ नहीं चाहिए अगर समाज या सरकार उन्हें कुछ देना चाहती है तो उनके थोड़ी इज़्ज़त दे इस पंथ का अपमान न करे !"  
- मन्नू महंत, गद्दी नशीन गुरु, गांव -भुन्ना ,तहसील - गुहला, जिला कैथल, हरियाणा -136034 
फोन - 9991789432 

-नई दिल्ली। भारतीय संसद के इतिहास में 40 साल बाद कोई निजी विधेयक कानून बनने की दहलीज पर खड़ा हुआ है जो किन्नरों को समाज में बराबरी के अधिकार देने की क्रांतिकारी नींव रखेगा।
राज्यसभा ने शुक्रवार को यह ऐतिहासिक पहल द्रमुक के तिरूचि शिवा की ओर से पेश किये गये इस गैर सरकारी विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। यह विधेयक अब लोकसभा के दरवाजे पहुंच गया है जहां यह तय होगा कि यह कानून का रूप ले पाता है या नहीं।
इसके बाद विधेयक सदन के नियमों के अनुसार विचार और पारित करने के लिए पेश किया जायेगा। किन्नरों के प्रति सहानुभूति देखते हुए सरकार लोकसभा में भी इस विधेयक के समर्थन में आ सकती है जहां सरकार का बहुमत है।
राज्यसभा में सदन के नेता अरूण जेटली का कहना था कि इस संवेदनशील मुददे पर सदन बंटा हुआ नजर नहीं आना चाहिए। राज्यसभा में सख्याबल के आधार पर मजबूत स्थिति में खड़े विपक्ष ने इस गैर सरकारी विधेयक के पीछे अपनी ताकत झोंक दी जिसके सामने सरकार इसे ध्वनिमत से पारित कराने पर सहमत हो गई है।
- India, probably the world, will get its first transgender college principal when Manabi Bandopadhyay takes charge of Krishnagar Women's College in West Bengal


किन्नरों के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएँ !

Monday, March 24, 2014

आज यह कैसे खून की बूंदे, टपक रहीं शाखाओं से -सतीश सक्सेना

धर्म और राजनीति के बेतुके मेल की, यह जहरीली शाखाएं, इस देश को बरसों पीछे ले जाएंगी ! किसी भी देश में धार्मिक कट्टरता , अगर राजनीति के साथ खड़ी हो गयी तो इस शताब्दी में उस देश का रसातल में जाना तय है ! धन के लालच में उगीं यह दाढ़ियाँ, उस देश की उन्नति को बर्वाद करने में सक्षम हैं !

कैसे नफरत आग बुझाएं , जल बरसे शाखाओं से 
द्वेष देखकर,जीवन रोये,विष छलके शाखाओं से !

धर्म कर्म के छंद सिखायें,ऋषियों की आवाजों में    
दिखने में तो कल्पवृक्ष,पर आग झरे शाखाओं से !

कितने भ्रम फैलाते आकर,अपनी बात बताने में !
चन्दा तारों से भय लगता,सुन किस्से शाखाओं से !

काहे इतना जहर घोलते, अपने घर के आँगन में ! 
सोये बच्चे ही  भुगतेंगे , जहर गिरे शाखाओं से !

वृक्ष हमेशा ही मानव को  फल औ छाया देता था,  
आज यह कैसे खून की बूँदें भी छलके शाखाओं से !

Thursday, March 25, 2010

हिजड़े(Eunuch) - क्या आपने कभी इनके बारे में सोचा है ? -सतीश सक्सेना

सवाल रोटी के इंतजाम का ...??
                  शादी विवाहों और ख़ुशी के अवसरों पर,  अकसर मनचाहे पैसे न मिलने पर जबान  चलाते किन्नर (हिजड़े - एक गाली ) आपको अवश्य याद होंगे ! हर ५-१० वर्षों में इन अवसरों पर अक्सर इनके द्वारा की गयी बेहूदगियों से  आपका मन भी अवश्य खराब हुआ होगा ! मगर क्या आपने कभी इनके बारे में सोचने के लिए अपना वक्त दिया है ?
                  अक्सर मैं भिखारियों को पैसा नहीं देता , हमारे देश में यह अब संगठित व्यवसाय बन चुका है , अतः मैं इस उद्योग की कोई मदद नहीं करता और चिल्लर गाड़ी में नहीं रखता ! मगर यदि मुझे कोई हिजड़ा, चौराहे पर भीख मांगता दिख जाये तो मैं उसे भीख न देकर, १०-५० रुपये तक की मदद हमेशा करने की कोशिश करता हूँ !
                    परमपिता परमात्मा से भी उपेक्षित, शारीरिक विकलांगता से ग्रसित यह इंसान ,पुरुष और  महिला वर्ग में न होने के कारण, जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर है  ! शायद यही एक वर्ग ऐसा है जिसे परिवार से लेकर, बाज़ार तक भी कहीं कार्य नहीं दिया जाता  ! पूरा समाज  इन इंसानों की जो मज़ाक उड़ाता है  वैसा जानवरों  के साथ भी नहीं होता  ! क्या आपने कभी सोचा हैं कि .....
  • इन्हें हम  घर में नहीं घुसने देते और इनसे बिना दोष,सिर्फ शारीरिक विकलांगता के कारण नफरत करते हैं ! भिखारियों को खाना देते समय तक , हम इन्हें खिलाने की कल्पना तक नहीं करते ! समाज में गरीबों और भूखों को खाना खिलाने  में , पुण्य मिलने की बात कही गयी है ! मगर हिजड़ों को खाना खिलाते, आपने किसी को नहीं देखा होगा !
  • इन्हें व्यावसायिक प्रतिष्ठानों , दुकानों आदि में मजदूरी का कार्य भी नहीं मिलता अतः आपने किसी दुकान , माल में भी इन अभागे इंसानों को काम करते नहीं देखा होगा  ! 
  • शरीर के अस्वस्थ होने की स्थिति में, इनका इलाज़ कौन करेगा  ? समाज में हिकारत की द्रष्टि से देखे जाते यह लोग , बीमारी की स्थिति में, अच्छे प्राइवेट डाक्टर की सुविधा से लगभग वंचित हैं  ?
  • मानसिक अवसाद में जीते इन बच्चों के लिए, किसी इंस्टीटयूशन में पढाई हेतु दाखिला, एक दिवा स्वप्न ही है ? अच्छे परिवार के बच्चों के मध्य यह मानसिक विकलांग बच्चे, किसी कालेज में शिक्षा ले सकें, आधुनिक भारत में  अभी यह केवल एक कल्पना मात्र ही है !  
  • किसी मंदिर में इनके लिए विधिवत पूजा का कोई प्रावधान नहीं है ! अतः अक्सर इनकी  ईश आराधना एवं पूजा कार्य, अपने घर में ही सीमित होती है शायद इसीलिए इनकी प्रथाएं एवं अनुष्ठान लगभग गोपनीय होते हैं ! 
  • अपने खुद के परिवार में इनका स्थान बेहद दयनीय है  ! अक्सर परिवार के लोग, यह बताते हुए शर्मिंदा महसूस करते हैं कि यह उनके परिवार में पैदा हुए हैं ! अतः जन्म से लेकर मृत्यु तक अपने परिवार , एवं  समाज से लगभग कटे रहने के लिए विवश हैं !  
  • सामाजिक स्थल जैसे पार्क,रेस्टोरेंट, कम्यूनिटी सेंटर, स्टेडियम, आदि में, आम व्यक्तियों  के साथ इन्हें हिस्सा नहीं लेने दिया जाता  ? सामान्य जन के लिए बनाए पब्लिक स्वीमिंग पूल में कोई हिजड़ा स्नान करने की सोंच ही नहीं सकता !
              इन अभागों का पूरा जीवन, अपने लिए रोटी और बुढ़ापे की बीमारियों के इंतजाम करने में बर्बाद हो जाता है ! पहले किसी जमाने में नवाबों,सुल्तानों ने इन्हें सिर्फ हरम की चौकीदारी के लिए ही योग्य पाया था या फिर ये लोग सिर्फ नाच गाने कर अपना पेट पालते थे ! आज समय के साथ, इनके यह दोनों काम भी ख़त्म हो गए ! अब जब दूसरों की खुशियों , शादी विवाह जैसे मौकों पर, अपना पारंपरिक कार्य नाच गाने का आयोजन करने का प्रयत्न करते हैं तो हम लोगों को लगता है कि  धन उगाहने के लिए, यह अनचाहे मनहूस मेहमान यहाँ क्यों कर आ गये !
             अधिकतर ऐसे मौकों पर यह लोग धन की मांग करने के लिए घेरा बंदी करते हैं ! इनकी दलील रहती है कि और किसी मौकों पर, उन्हें किसी प्रकार का धन नहीं दिया जाता अतः शादी अथवा बच्चा पैदा होने की ख़ुशी  में ही दानस्वरूप उचित पैसा मिलना ही चाहिए जिससे कि वे अंत समय तक के लिए, कुछ आवश्यक धन बचा सकें ! और अक्सर इसी कारण लोग इन्हें और भी हिकारत की  नज़र से देखते हैं !
            अफ़सोस है कि सरकार ने भी इनके पुनर्वासन के लिए अभी तक समुचित ध्यान नहीं दिया है !
कृपया बताएं , यह रोटी कहाँ से खाएं  ??

( उपरोक्त यू वीडियो - आभार यथार्थ पिक्चर )

Saturday, October 18, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली (पांचवां भाग) - सतीश सक्सेना

लेकर निर्बल की हाय पुत्र !
होगा जग में उद्धार नहीं,
अपने दिल पर रख हाथ देख
आत्मा को लज्जित पाओगे
लज्जित मन से क्यों काम करो 
गंगा सा निर्मल मन लेकर,
निर्बल का ऋण लेकर मन पर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वैष्णव जन कहलाये वह ही
जो कष्ट दूसरों का समझे,
पीड़ा औरों की निज मन में
महसूस करे, आगे आकर ,
सारे तीर्थों का सुख मिलता, 
सेवा निर्बल की करने में ,
अपने सुख की कामना लिए, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अन्याय सहन करने वाला
अन्यायी से भी पापी है,
न्यायार्थ दंड भाई को दो
यह कर्म ज्ञान है गीता का
अन्यायी बनकर जीने से, 
कुल कीर्ति नष्ट हो जाती है
केशव की बातें बिसरा कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वह दिन दिखलाओ महाशक्ति
जिसमें कोई न, प्रपंच रहे !
धार्मिक पाखण्ड समाप्त करो
वास्तविक साधू सन्यासी हों
जाती बंधन को काट मूल से, 
मुक्ति दिलाओ नरकों से
अपराध बोध लेकर मन में क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो जो
नष्ट , वर्ण-संकट कर दे !
अपने अपने कर्मानुसार,
मानव समाज का काम करे
खेलें रंग और गुलाल सभी, 
हर कौम गले मिलकर होली
औरों के लिए घृणा लेकर ! क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Sunday, June 15, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( चौथा भाग ) - सतीश सक्सेना


इस पृष्ठ पर लिखी अधिकांश पंक्तियाँ, मेरे १३ वर्षीय , किशोर विद्यार्थी बेटे के उलझन भरे प्रश्नों के उत्तर तथा एक पिता के सुझाव हैं ! ज्ञात हो की यह कविता १९९३ में लिखी गई थी !
समाज की बुराईयों तथा अन्याय के खिलाफ लड़ने की एक अतिरिक्त इच्छा मेरे अन्दर शुरू से थी, उस दर्द की परिणिति इन रचनाओं के माध्यम से हुई! मगर कभी प्रसिद्धि की इच्छा नही थी इसलिए यह कवितायें डायरी में बंद रहीं ! गूगल  ट्रांसलिटरेशन एवं ब्लोगिंग के कारण यह सम्भव हुआ ! और वो कवितायें आपके सम्मुख आ पा रहीं हैं, अगर पसंद आयें तो लेखन सफल मानूंगा  !


सदियों का खोया स्वाभिमान
वापस दिलवाना है इनको ,

हम  लोगों द्वारा ही बोये  
काँटों से मुक्ति मिले इनको 
ठुकराए गए भाइयों का , 
अधिकार दिलाने आ आगे ,
अधिकार किसी का छीन अरे,क्यों लोग मनाते दीवाली?

कुछ कार्य नया करने आओ
आओ नवयुग की संतानों

अपने समाज में व्याप्त रहीं  
इन बुरी रीतियों को जानों  
हो शादी विवाह मानवों में,

जाति बन्धन का नाम मिटे ,
रूढ़ि  बन्धन में बंधे बंधे , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?

बच्चों मानवकुल ने अपने
कुछ लोग निकाले घर से हैं !

बस्ती के बाहर ! जंगल में ,
कुछ और लोग भी रहते हैं !
निर्बल भाई को बहुमत से , 

घर बाहर फेका है हमने !
आचरण बालि के जैसा कर क्यों लोग 
मनाते दीवाली?

घर के आँगन में लगे हुए
कुछ वृक्ष बबूल देखते हो !
हाथो उपजाए पूर्वजों ने ,

कांटे राहों में, देखते हो !
काटो बिन मायामोह लिए,

इन काँटों से दुःख पाओगे
घर में जहरीले वृक्ष लिए , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

आओ हम शक्ति आजमाएं 
उन दुर्योधनों  से लड़ते हैं !
जो निर्बल, बाल ,ब्रद्ध, नारी
कुल को अपमानित करते हैं
रक्षित बन इनके जीवन में , 

तुम पुण्य कमाओगे भारी
शक्ति का करके दुरुपयोग , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?
......क्रमश







Friday, June 13, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( तीसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

मुझे एक मित्र ने कहा कि आज स्थिति , ऐसी नहीं जैसी अपने वर्णित की है ! जो लोग शहरों में रहते हैं , उन्हें शायद वस्तुस्थिति का ज्ञान नही है, मूल भारत में आज भी स्थिति वैसी ही है ! मेरा यह मानना है कि सच्चाई को सामने आना ही चाहिए चाहे वह कितनी ही कड़वी क्यों न हो !

छाया प्रकरण से भी आगे 

कुछ महा धर्म ज्ञानी आये 
पदचिन्ह मिटे पैदल चलते 
पैरों में झाड़ीं, बांधी थी !
पशुओं से भी बदतर जीवन,

कर दिया धर्म रखवालों ने !
मानव जीवन पर ले कलंक, क्यों लोग मानते दीवाली ?

पानी पीने को पनघट पर
कुत्ता आ जाए अनिष्ट नहीं
पर शूद्र अगर मुंडेर से भी
छू जाए , महा अपराधी है
प्यासा गरीब जल के बदले,

पिटता है वस्त्र रहित होकर !
मानव को प्यासा मार अरे ! क्यों लोग मानते दीवाली ?

अधिकार नाम से दिया नहीं
कुछ धर्म के इन विद्वानों ने
धन अर्जित संचित करने का
अधिकार लिया रखवालों ने
जूठन एकत्रित कर खाओ, 

धन का तुम को कुछ काम नहीं !
तन मन धन शोषण कर इनका, क्यों लोग मानते दीवाली ?

वंचित रखा पीढियों इन्हें
बाज़ार ,हाट, दुकानों से !
सब्जी,फल,दूध,अन्न अथवा
मीठा, खरीद कर खाने से !
हर जगह सामने आता था, 

अभिमान सवर्णों का आगे !
मिथ्या अभिमानों को लेकर क्यों लोग मानते दीवाली ?

उच्चारण मंत्रों का अशुद्ध ,
कर अपने को पंडित माने।
मांगलिक समय पर श्राद्धमंत्र
मारण पर मंगलगान करें !
संस्कृत का,क ख ग न पढ़ा,

व्याकरण तत्व का ज्ञान नहीं !
ऐसे पंडित कुलगुरु बना , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?


भोजन में लेते मांस और 
मदिरा पीते जल के बदले
पूजा में बैठ आचरण पर
वेदों की ऋचा सुनाते हैं
ऐसे ज्ञानी पुरोहितों से है  
त्राहि त्राहि माँ  सरस्वती  !
अधकचरा ज्ञान धर्म का ले क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ईश्वर समक्ष अपने को रख
बनियों को अर्थ हेतु माना
क्षत्रिय को सौंपी निज रक्षा
खुद पूज्य बने सारे युग के
सेवा करने को निम्न कोटि,
शूद्रों को जन चाकर माना ,
करवा संशोधित,आदि ग्रन्थ क्यों लोग मानते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो ,
जो नष्ट वर्ण संकट करदे !
अपने अपने कर्मानुसार
मानव,समाज का काम करे !
मिल बैठें आपस में सारे 
व्राह्मण और शूद्र साथ होकर
औरों के लिए घृणा लेकर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Thursday, June 12, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (दूसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

जिन्हें सीने से लगाना चाहिए , उन्हें आज भी इस देश में अछूत कहा जाता है ! इस दुर्भाग्य से निकलने हेतु मेरा यह प्रयास है और आशा है कि काश एक दिन यह कलंक दूर हो सके ! और हम अपने को सभ्य कहलाने लायक बन सकें !


बीसवीं सदी में पले बड़े
कंगूरों  के ठेकेदारो  !
मन्दिर के द्वारे खड़े हुए ,

मासूमों के चेहरे देखो ! 
बचपन से इनको गाली दे , 

क्या बीज डालते हो भारी !
इन फूलों को अपमानित कर,क्यों लोग मनाते दीवाली !

तीसरा भाग जनसंख्या का
शूद्रों के हिस्से में आया !

हँसते समाज के साथ जियें 
ऐसा अधिकार नहीं पाया ! 
मन्दिर प्रवेश वर्जित करते, 

कैसे ब्राह्मण ? अपराधी हैं !
परमेश्वर के कर द्वार बंद , क्यों लोग मनाते दीवाली  !

आरक्षण का विरोध करने
वालो कुछ सहकर तो देखो

सदियों से तड़पाया जैसा   
अहसास दर्द सह कर देखो 
कितने प्यासों ने जाने दी थीं,
तड़प तड़प कर बिन पानी ,
पीने का पानी वर्जित कर , क्यों लोग मनाते दीवाली !

आरक्षण अगर मिटाना है
तो शुरू करो ब्राह्मण कुल से

अनपढ़ वामन रक्षित होकर  
सम्मानित होता समाज से ! 
अनपढ़ वामन पंडित होता,
शिक्षित अछूत को हेय मान
इस महाज्ञान को धर्म मान, क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

वे भी हम जैसे इंसान थे   
कैसे अपमान झेलते थे !
छाया शूद्रों की पड़ने पर
कोढे लगवाए जाते थे !
यों धर्म नष्ट हो जाने पर , 

करते थे  प्रायश्चित्त, महा
गंगा में धोकर महापाप ! क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?


Friday, June 6, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (पहला भाग) - सतीश सक्सेना


निम्न कविता की रचना इस देश से कुरीतियाँ व अस्पृश्यता   मिटाने के प्रयास में शामिल होने हेतु लिखी गई थी (1992-93)! निस्संदेह यह मेरी सर्वोत्तम कविताओं में से एक है ! इसे स्वान्तः सुखाय ही लिखा था ! बहुत लंबा गीत है , कुछ लाइने निम्नलिखित हैं !


मानव कुल में ले जन्म, बाँट
क्यों रहे, अरे अपने कुल को ?
कर वर्ण व्यवस्था नष्ट,संगठित
कर पहले अपने कुल को ,
हो एक महामानव विशाल ! 

त्यागो यह भेदभाव भारी !
तुलसी की विह्वलता में बंध, क्यों लोग मनाते दीवाली !

हरिजन को सेवा करने के
बदले में नफरत देते हो   ?
यह तो कुल में लक्ष्मण जैसा
क्यों पास नहीं बैठाते हो  ?
सेवा सम्मानित कर न सके,

उपहास घृणा का पात्र बना ,
लक्ष्मण का सेवा भाव भूल , क्यों लोग मनाते दीवाली ?

मत भूलो रचनाकार प्रथम
श्री रामचरित रामायण के,
थे महापुरुष श्री बाल्मीकि
ऋषि,ज्ञानमूर्ति,रामायण के
हो शूद्र कुलोदभव,फिर भी 

जगजननी को पुत्री सा समझा
उनके वंशज , अपमानित कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?


बचपन से ही कक्षाओं में 
गुणगान देश का सुनता था
गौतम,गाँधी से महापुरुष
अपनी शिक्षा में पढता था
गौतम ने छोड़ा राजपाट, 

क्या यही न्याय दिलवाने को ,
अंगुलिमालों का हार पहन, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

गाँधी ने अपने जीवन में ,
कुछ माँगा देशवासियों  से
चाहा दिलवाना हरिजन को
सामाजिक न्याय हिन्दुओं से
माँगा इस लज्जाजनक रूप से,

मुक्ति मिले इन दलितों को
बापू इच्छा को रौंद तले , क्यों  लोग  मनाते  दीवाली  ?
.....क्रमश
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