वह दिन भूलीं कृशकाय बदन,
अतृप्त भूख से , व्याकुल हो,
आयीं थीं , भूखी, प्यासी सी
इक दिन इस द्वारे आकुल हो
जिस दिन से तेरे पाँव पड़े
दुर्भाग्य युक्त इस आँगन में !
अभिशप्त ह्रदय जाने कैसे ,
भावना क्रूर इतनी मन में ,
पीताम्बर पहने स्वर्णमुखी, तू अमरलता निष्ठुर कितनी !
सोंचा था मदद करूँ तेरी
इस लिए उठाया हाथों में ,
आश्रय , छाया देने, मैंने
ही तुम्हें लगाया सीने से !
क्या पता मुझे ये प्यार तेरा,
मनहूस रहेगा, जीवन में ,
राक्षसी भूख , निर्दोष रक्त
से कहाँ बुझे अमराई में !
निर्लज्ज,बेरहम,शापित सी, तुम अमरलता निर्मम कितनी !
धीरे धीरे रस चूस लिया,
दिखती स्नेही, लिपटी सी !
हौले हौले ही जकड़ रही,
आकर्षक सुखद सुहावनि सी
मेहमान समझ कर लाये थे
अब प्रायश्चित्त, न हो पाए !
खुद ही संकट को आश्रय दें
खुद ही संकट को आश्रय दें
कोई प्रतिकार न हो पाये !
अभिशप्त वृक्ष, सहचरी क्रूर , बेशर्म चरित्रहीन कितनी !
अभिशप्त वृक्ष, सहचरी क्रूर , बेशर्म चरित्रहीन कितनी !


