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Wednesday, February 15, 2023

लम्बे जीवन के लिए सुपरफूड केफीर -सतीश सक्सेना

कॉकेशस पर्वत के आसपास रहने वाले लोग , बहुत लम्बा जीवन जीने के लिए जाने जाते हैं , आधुनिक रिसर्च के अनुसार वे एक तरह के दही का उपयोग हज़ारों वर्षों से करते आ रहे हैं जिसे केफीर (Kefir) कहा जाता है , वे इसे गाय, बकरी या भैंस के दूध में केफीर ग्रेन मिलाकर प्राप्त करते थे ! केफीर ग्रेन 24 घंटों में दूध के साथ मिलाकर रखने पर दही में बदल जाता है , इस दही को छानकर केफीर ग्रेन दुबारा प्राप्त कर लेते हैं , इस तरह यह ग्रेन्स एक परिवार में न केवल जीवन भर चलते रहते हैं बल्कि खुद को बढ़ाते भी रहते हैं ! आश्चर्यजनक है कि एक चम्मच केफीर ग्रेन्स एक परिवार को आजीवन केफीर देने के लिए काफी है !

केफीर ग्रेन की उत्पत्ति के बारे में वहां के निवासियों का मानना है कि यह चमत्कारी भेंट उन्हें खुद हज़रत मोहम्मद साहब के द्वारा दिए गए ताकि वे और उनकी आने वाली पीढ़ियाँ स्वस्थ रहें और वहां इसे अमर रहने का रस कहा जाता है  ! हजारों साल से इन केफीर ग्रेन्स को वे लोग अपने परिवार में कीमती रत्नों की तरह सहेजते आये हैं , उनके परिवारों में सौ वर्ष तक जीना एक सामान्य बात है  !
और आजकल यही केफीर सुपर फ़ूड का दर्जा प्राप्त कर सारे यूरोप और अमेरिका में बिक रहा है  !

केफीर ग्रेन्स मानव निर्मित नहीं हैं बल्कि जीवित सूक्ष्म जीवाणु समूह (माइक्रो ऑर्गनिज़्म्स )हैं , सामान्य भाषा में वे जीवित बैक्टीरिया समूह हैं जो मानव शरीर के लिए जीवन अमृत की तरह काम करते हैं ! आजतक उनकी उत्पत्ति कैसे और कहाँ हुई, किसी को नहीं पता सिवाय इसके कि कॉकेशियस पहाड़ के आसपास के निवासी ही, उनके द्वारा फर्मेन्टेड दूध का उपयोग करते पाए गए !

मैंने कई वर्ष पहले इसके बारे में किसी फ़ूड रिसर्च जानकारी के जरिये पढ़ा था , मगर ग्रेन्स की उपलब्धता के बारे में कोई जानकारी न मिलने के कारण उपयोग न कर सका ,संयोग से पिछले वर्ष मित्र विद्याधर गर्ग शुक्ल से भेंट होने पर उन्होंने अपने परिवार में इसके उपयोग के बारे में सविस्तार बताया जिसे सुनकर मैंने इसका उपयोग करने का फैसला किया और यह जानकारी वाकई अद्भुत रही  !

Sunday, September 11, 2022

मेडिकल व्यापारियों से सावधान रहें -सतीश सक्सेना

इंसान अपने जीवन भर मृत्यु के बारे में कभी कोई विचार नहीं करता , बस खतरनाक बीमारी से लड़ते समय ही उसकी याद आती है और साथ ही मृत्यु भय भी, जो स्थिति की गंभीरता को कई गुना बढ़ा देता है ! इसके न होने की अवस्था में बीमारियों को मानव की आंतरिक रक्षा शक्ति रोग पर कुछ समय में काबू पा लेती है , मगर अगर मरीज को जान जाने के खतरे की संभावना बता दी जाए तो मानसिक तनाव के कारण कुछ समय में ही, सामान्य बीमारी भी कई गुना खतरनाक हो जाती है ! अफ़सोस यह है कि इस भय को मेडिकल व्यवसाय में अधिक से अधिक धन कमाने के लिए, अच्छी तरह भुनाया जाता है !

अधिक उम्र के अधेड़ , जो खूब धन सम्पन्न और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होते हैं , पूरे जीवन अपने सुख पर खर्च न करके , बुढ़ापे में इलाज के लिए पैसा जोड़ते रहते हैं जबकि उन्हें यह मालूम है कि इलाज से उम्र नहीं बढ़ सकेगी उसके बावजूद  65 वर्ष होते होते कम से कम एक ऑपरेशन, यह डरे हुए लोग करा चुके होते हैं  ! आज से तीस चालीस वर्ष पहले बहुत कम हॉस्पिटल में ऑपरेशन की सुविधा होती थी मगर आजकल चूँकि मेडिकल व्यापार में मोटी कमाई सिर्फ ऑपरेशन थियेटर के जरिये ही संभव है सो डॉक्टर के पास आए दर्द से कराहते हर इंसान में ऑपरेशन की सम्भावना तलाश की जाती है !बिना ऑपरेशन, बच्चे पैदा होना तो असंभव ही माना जाने लगा है , सामान्य प्रसव की बात शायद ही कोई सुनता होगा , मगर इस सब के बाद भी किसी को इस दुर्व्यवस्था पर सोचने का समय ही नहीं और हो भी तो वे खुद को उस समय असहाय महसूस करते हैं जब ईश्वरीय स्वरूप डॉक्टर, तुरंत ऑपरेशन करने में सहमति देने में समय बरबाद करना, बेहद खतरनाक घोषित कर देता हैं !

मैं मित्रों से कुछ सामान्य प्रश्नों पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ कि वे बताएं मानव शरीर कब से है और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कब से आया , साथ ही यह भी कि इस चिकित्सा विज्ञान में बिना शरीर को नुकसान किये कौन कौन से रोगों को ठीक पाने में सफलता हासिल की ? आज भी दुनिया के सुदूर क्षेत्रों में करोड़ों लोग हैं या नहीं जिन्हें एलोपैथी के बारे में कुछ भी पता ही नहीं और उनका शरीर बिना इलाज के रोगमुक्त मुक्त होता है या नहीं 

मुझे दांतों से खून आने की समस्या लगभग पचास वर्षों से हैं , पूरे जीवन डेंटिस्ट को नहीं दिखाया, पूरे जीवन में टूथपेस्ट और ब्रश का उपयोग महीने में दो तीन बार ही करता हूँ और मुझे दांतो में दर्द की कोई समस्या नहीं एक भी दांत न टूटा और न हिला , दर्द हुए और ठीक भी हुए ! आँखों में पहला चश्मा आज से 30-35 वर्ष पहले लगवाया था मगर उपयोग न के बराबर किया , बिना चश्में के उपयोग  -1.25 से बढ़ते हुए आजकल -2.5  के लगभग पावर है मगर 68 वर्ष की उम्र में सिर्फ बारीक अक्षर पढ़ते समय ही हलके पावर का चश्मा उपयोग करता हूँ , पूरे दिन में शायद आधा घंटा चश्मा लगाता हूँगा ! बेहद तकलीफ होती है जब मासूमों की आँखों पर चढ़ा चश्मा देखता हूँ  ! चश्में, पेस्ट, क्रीम, एंटीबायोटिक्स आदि अधिकतर सुझाव और साधन अंततः हमारे शरीर को बरबाद करने की भूमिका तैयार करते ही हैं, इनके ज्ञान से प्रभावित हम इनकी चालाकियों को जबतक समझ पाते हैं, बहुत देर हो चुकी होती है !धन कमाने की इच्छा व्यापारी मानव को कितना नीचे गिराएगी इसकी कोई हद मुक़र्रर नहीं !

अभी सुप्रीम कोर्ट में एक रिट विचार के लिए है जिसमें यह कहा गया है कि जेनेरिक दवा पैरासिटामोल को किसी और नाम से लोकप्रिय बनाने के लिए मेडिकल व्यापारियों ने डॉक्टर्स के मध्य 1000 करोड़ से अधिक रुपया लुटाया है , और वह दवा इन दिनों सबसे अधिक बिकी भी है जबकि यही दवा बाजार में बहुत सस्ते दामों पर उपलब्ध है , ये व्यापारी धन लालच देकर रोगी को जो चाहे दवा खिला सकते हैं !  

अपने आपको मृत्यु भय से हर वक्त मुक्त रखकर, विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रखने का प्रयत्न करता हूँ जिससे कि इस खूबसूरत जीवन का हर पल एन्जॉय कर सकूँ, रोज सुबह उठते समय , अगला दिन बोनस में पाता हूँ , अच्छा लगता है कि एक दिन और मिला और फैसला करता हूँ कि आज का दिन कल से बढ़िया कैसे किया जाए ! 

विगत दिनों के बारे में सोचता हूँ तो खराब लगता है कि निष्क्रियता के कारण, कैसे कैसे मित्र अचानक विदा ले गए संसार से , जो बेहतरीन दिन बिता रहे थे एवं बहुत शक्तिशाली थे , उन्होंने सब कुछ किया था खुद को मजबूत रखने में, अगर नहीं किया तो सिर्फ अपने शरीर से मित्रता नहीं की और जिसे समझना सबसे आवश्यक था उसी को समझने में समय नहीं दे पाए और निस्संदेह यह लापरवाही उनके शरीर के अंगों ने माफ़ नहीं की और उन्हें इस खूबसूरत जीवन से असमय ही जाना पड़ा !

प्रणाम आप सबको इस अनुरोध के साथ कि अपने व्यस्त समय से, थोड़ा समय खुद के शरीर को समझने में  दें ! 


Wednesday, July 27, 2022

होमियोपैथी एक मज़ाक़ या चमत्कारिक औषधि ? -सतीश सक्सेना

आजकल के ताकतवर एलोपैथिक व्यवसाय के प्रभाव में, होमियोपैथी एक मज़ाक़ बनकर रह गयी है और इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं इसके चिकित्सक खुद हैं जो अपने आपको विद्वान तो होमियोपैथी का बताते हैं मगर खुद रोगी का इलाज गलत तरीके से करते हैं शायद उनके बस का ही नहीं कि इसका सही उपयोग कर, किसी को रोग मुक्त कर पाना और अगर वे प्रयास भी करें तब इसके लिए समुचित समय नहीं उनके पास ! 

जब कोई रोगी होमियोपैथ के पास आता है तब होमियोपैथ का सबसे पहला उद्देश्य रोगी के गहरे मानसिक व्यवहार के मुख्य मुख्य पहलू जानना और उनकी लिस्ट बनाना होता है जैसे रोगी की खानपान की आदतें ,उसका अन्य लोगों के प्रति व्यवहार , उसकी पसंद नापसंद , रहन सहन के तौर तरीके , उसके शरीर पर गरमी, जाड़े और बरसाती मौसम का प्रभाव , समुद्र तट और पहाड़ों पर शरीर की प्रतिक्रिया ,  गुस्सा , बेचैनी , झूठ और सत्य के प्रति रुझान , लापरवाह , खुशमिजाज या दुखी ,हिम्मती या डरपोक , भयभीत या निडर, भुलक्कड़ ,आलसी , मेहनती , जलन ,झगड़ालू , जिद्दी आदि जानकारी इकट्ठे कर इन गुण / अवगुणों के आधार पर उसे मटेरिया मेडिका से इन्ही गुण दोषों वाली (drugpicture) होमियोपैथी औषधि ढूंढनी पड़ती है ! इस उद्देश्य के लिए होमियोपैथी उन महान  एलोपैथ्स चिकित्सकों की शुक्रगुज़ार है जिन्होंने अपना पूरा जीवन, होमियोपैथी दवाओं की मानवों पर प्रूविंग कर ,उसके असर को लिपिबद्ध कर, रिपर्टरी की रचना की ! आज की होमियोपैथी में योगदान करने वाले चिकित्सक ढूंढे भी नहीं मिलते हाँ अगर हैं तो उस योगदान से धन कमाने की असफल कोशिशें जिसके लिए होमियोपैथी बनी ही नहीं !

किसी भी भयानक एवं जीर्ण रोग के इलाज के लिए , एक चिकित्सक को सबसे पहले रोगी का भरोसा जीतते हुए उसका मानसिक अवस्था का सही आकलन करना होता है , और इस कार्य में उसे अपना काफी समय देना होता है , उसके बाद सावधानी से चुने गए महत्वपूर्ण मानसिक लक्षणों , के आधार पर एक एक करके उसकी ड्रग पिक्चर वैल्यूज तलाश करनी होगी और अंत में हजारों दवाओं में से , टॉप दस दवाओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर , उनमें उसके रोग लक्षण तलाश करने होंगे ! जिस दवा में रोगी के अधिक मानसिक लक्षण मिलेंगे वही उसकी मुख्य दवा मानी जायेगी ! उसके बाद उस दवा की शक्ति का चुनाव बेहद सावधानी से किया जाता है , और इस प्रकार सही शक्ति की सही दवा की मात्र एक बूंद, उस भयानक बीमारी का नामोनिशान मिटाने में सक्षम होती है !

मगर इतना समय एक चिकित्सक अगर एक रोगी को देगा तब पूरे दिन में वह मात्र दो रोगी ही देखने का समय निकाल सकता है ! हमारे देश में होमियोपैथ की कदर न के बराबर है उनका खर्चा निकलना भी मुश्किल होता है इस मेहनतकश प्रैक्टिस में ! सो वे अधिकतर रोगियों को दवा देने में 10-15 मिनट लगाते हैं और दिन में कम से कम 30 रोगी आसानी से देख लेते हैं ! इन रोगियों को वे होमियोपैथी के निर्देशानुसार इलाज न करके , क्रूड मेडिसिन उनके कॉम्बिनेशन द्वारा करते हैं जो आजकल आसानी से बाजार में उपलब्ध हैं , साथ ही बायोकेमिक दवाओं को साथ देते हैं ताकि जैसे तैसे ही सही मगर रोगी को कुछ आराम तो हो ताकि कुछ दिन उसकी चिकित्सा द्वारा खर्चा निकलता रहे !

होमिओपैथी की शक्ति, उनकी शक्तिकृत सिंगल दवाओं में ही निहित है , मगर उनका सिलेक्शन करना एक मुश्किल और बेहद एकाग्रचित्त होकर करने वाला कार्य है अन्यथा असफल होने की गुंजायश अधिक रहती है , और यह अकेली दवा , एक साथ शरीर को अधिकतर बीमारियों से मुक्ति दिलाने में समर्थ होती है !

उदाहरण के रूप में मैं नक्स वोमिका का मानवीय चित्र दे रहा हूँ ऐसा मानव /मानवी जो तेज तर्रार , नेता, बड़े ओहदे पर , आधुनिक व्यसनों सिगरेट , शराब का शौक़ीन , आलसी , धनी , अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध, चालाक , कुर्सी पर बैठकर काम करने वाला , गैस्ट्रिक, कब्ज आदि का शिकार व्यक्ति के अधिकतर रोग , नक्स वोमिका के कुछ डोज़ से गायब हो जाते हैं ! होमियोपैथी में किसी भी दवा की ड्रग पिक्चर को पढ़ने से लगेगा कि किसी इंसान के चरित्र को पढ़ रहे हैं ! इसी लिए अगर कोई व्यक्ति खुद इसे समझने का प्रयास करेगा तब आसानी से वह अपने को रोग मुक्त कर पायेगा !

 
 

Monday, July 25, 2022

होमियोपैथी औषधि और मानवीय व्यवहार -सतीश सक्सेना

होम्योपैथिक उपचार में उपयोग की जाने वाली शक्तिकृत दवाओं को दवा का दर्जा देना उचित नहीं क्योंकि दवा , एक केमिकल पदार्थ होता है जिसमें केमिकल का होना साबित किया जा सकता है जबकि होमियोपैथी की शक्तिकृत दवाओं में केमिकल गुण मिलने का प्रमाण किसी भी साइंस लैब द्वारा नहीं जाना जा सकता एलोपैथिक सिस्टम की नज़र में यह असंभव है जब वे आर्सेनिक की सूक्ष्मीकृत होम्योपैथिक दवा में आर्सेनिक का टेस्ट करते हैं तो उन्हें नहीं मिलता ! क्योंकि एलोपैथिक लैब एक बूंद केमिकल के एक करोड़ वें भाग को खोजने में असमर्थ है जबकि होम्योपैथिक दवाओं में उससे भी हजारों गुना कम दवा का अंश होता है , जिसे वे उस ड्रग की शक्ति कहते हैं और जिसके होने का प्रमाण आधुनिक संसार खोज नहीं पाता !

जहर ही जहर को मारता है, यही सिद्धांत होमियोपैथी का भी है , बस होमियोपैथी दवाओं में क्रूड मेडिसिन इतनी कम मात्रा में करते जाते हैं कि उसका अंश मिलना भी असम्भव हो जाए ! यही कारण है कि आर्सेनिक एल्बम नामक दवा की 3 शक्ति तक तो आधुनिक लैब बता देगी कि यह दवा आर्सेनिक नामक जहर से बनायी गयी है मगर आर्सेनिक 12, 30 , 200 या अधिक शक्ति की दवा के टेस्ट में उनका रिजल्ट शुद्ध अलकोहल आता है जिसमें आर्सेनिक का नामोनिशान नहीं मिलता मगर यही दवा होमियोपैथी में बेहद कारगर है , जिसे एलोपैथी क्वेकरी का दर्जा देती आयी है !

डॉ जगदीशचंद्र बसु का एक प्रयोग था जिसमें उन्होंने पौधों में जीवन की पुष्टि की थी और उसे विश्व के वैज्ञानिकों ने स्वीकार भी किया था ! उन्होंने प्रूव किया था की उनमें मानव जैसा ही जीवन एवं जनन चक्र है और वे अपने आसपास के वातावरण के प्रभाव का वही असर महसूस करते हैं जैसे कि हम और इसमें सुख दुःख क्रोध भय आदि सबका अहसास शामिल है ! विश्व में लगभग हर पैथी में दवा निर्माण अधिकतर इन्हीं प्लांट के रस, जड़ और पत्तों से होता है , बस उनका बनाने का तरीका और चरित्र भिन्न होता है ! एलोपैथिक तरीके में अधिकतर क्रूड मेडिसिन की सीमित मात्रा उपयोग में लायी जाती हैं , जबकि होमियोपैथी में इसी सिद्धांत का उपयोग करते हुए उस दवा की न्यूनतम मात्रा , इतनी कम कि उसे किसी लैब में तलाश न किया जा सके , का उपयोग करते हैं , जिसे होमियोपैथ उस प्लांट की शक्ति कहते हैं !

होमियोपैथी में दवा निर्माण करने से पहले उसका मानवों पर प्रयोग किया जाता है , उसकी बेहद कम मात्रा की एक खुराक रोज कुछ दिन तक देने के पश्चात उसकी मात्रा को धीरे धीरे बढ़ाया जाता है और उसके परिणाम को मानवों के ऊपर सावधानी से नोट किया जाता है , जहरीली दवा की मात्रा बढ़ाने से जो बीमारियां उस इंसान में उत्पन्न हुईं और उसकी मानसिक दशा में जो बदलाव आये उनका सावधानी पूर्वक लिखा गया विवरण ही दवा बनाने का सिद्धांत है ! 

होमियोपैथी का यह विश्वास है कि जितने तरह के इंसान दुनिया में पाए जाते हैं उनके व्यवहार से हूबहू मिलते हुए पौधे भी मौजूद हैं , अगर हम किसी इंसान का व्यवहार का सही अध्ययन कर उसी व्यवहार के पौधे की खोज कर लें तब उस पौधे से बनायी गयी होम्योपैथिक औषधि उस व्यक्ति के लिए संजीवनी का कार्य करेगी फिर बीमारी का नाम कुछ भी क्यों न हो !

अब एलोपैथिक सिस्टम के रोने का कारण समझने का प्रयास करते हैं , होमियोपैथी में मान लो बेलाडोना पौधे के रस की एक बूँद दवा को 100 बूंद अलकोहल में मिलाकर जो दवा बनती है उसे बेलाडोना -1 कहा जाता है ! अब बेलाडोना -1 का एक बूंद 100 बूंद एल्कोहल में डालने पर जो दवा बानी उसे बेलाडोना -2 कहा जाएगा ,  बेलाडोना -2 की एक बूंद 100 भाग शुद्ध अल्कोहल में डालने पर जो दवा बनी उस पर बेलाडोना -3 कहा जाएगा ! इस प्रकार अगर बेलाडोना -3 को किसी लैब में टेस्ट कराने हेतु भेजा जाए तो उसमें वन ड्राप बेलाडोना का 100X100X100 वां  हिस्सा ही मिलेगा , मगर इसके बाद इसी प्रकार बनायी गयी बेलाडोना 4 अथवा बेलाडोना 30 में विश्व की कोई लैब उसमें केमिकल पदार्थ नहीं पा सकती ! जब कि क्रोनिक या तथाकथित लाइलाज बीमारियों का इलाज करते समय हमें सबसे बेहतरीन रिजल्ट इन्ही शक्तियों से मिलते हैं !

क्रमश: 


Tuesday, July 19, 2022

होमियोपैथी, प्रचार शक्ति के अभाव में, एक आश्चर्यजनक प्रभावी मगर उपेक्षित विधा -सतीश सक्सेना

आधुनिक युग में प्रचार साधनों का जिसने भी बेहतर उपयोग कर लिया वही ज्ञानी और समृद्ध माना जाता है ! समाज में अधिकतर लोग लकीर के फ़क़ीर होते हैं जहाँ सब जाते हैं उसी रास्ते जाना सही समझते हैं , प्रमाण के रूप में प्रसाधनिक जैसे फेस पाउडर को लीजिये इसका फायदा गिनाते हैं सुंदरता बढ़ाना , पसीना रोकना , शरीर से बदबू भगाना और हम यह फ़ायदा, बिना सोचे, स्किन के महीन छेद बंद करके पाते हैं जो खुद में एक हेल्थ ब्लंडर है ! 

इसी तरह से विशाल विश्व में स्वास्थ्य सुधार की तमाम विधाएँ प्रचलित रही हैं , जिनको आधुनिक धनवान मेडिकल व्यवसाय ने, प्रचार के जरिये खा लिया , विश्व में न जाने कितनी खूबसूरत स्वास्थ्य विधाएँ या तो लुप्त हो चुकी हैं या दम तोड़ रही हैं ! ताकतवर एलोपैथी ने होमियोपैथी को समझने की बिना कोशिश किये उसे फेथ हीलिंग का दर्जा दे दिया वे यह भूल गए कि जिन जिन एलोपैथिक डॉक्टर्स ने उसे समझने और आजमाने की कोशिश की वे एलोपैथी को छोड़कर , होमियोपैथी को अपना चुके हैं , बहुत कम लोग जानते होंगे कि होमियोपैथी का जनक खुद एक एलोपैथिक डॉक्टर थे ! इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि आज विश्व में हजारों एलोपैथिक प्रैक्टिशनर होमियोपैथी के जरिये अपने रोगियों का उपचार करते हैं मगर एलोपैथिक दवा व्यवसाय इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं क्योंकि उनके व्यवसाय का अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा क्योंकि होमियोपैथी में कोई बीमारी असाध्य नहीं है जबकि एलोपैथी में तमाम बीमारियों यहाँ तक कि जुकाम का इलाज ही नहीं वे सिर्फ एंटीबायोटिक /स्टेरॉयड का उपयोग कर शरीर की जीवाणुओं को मारकर इलाज करते हैं जिसमें शरीर एक बीमारी से मुक्त होकर अन्य बीमारियों का शिकार हो जाता है ! 

आज से लगभग 42 वर्ष पहले मुझे सर्वाइकल स्पोंडोलाइटिस हुआ था , तमाम एलोपैथिक जांच और इलाज के बावजूद ठीक नहीं हुआ , डॉ विरमानी मशहूर डॉक्टर के अनुसार अब यह बोन डेफ्लेक्शन ठीक होना असंभव है , केवल एक्सरसाइज के जरिये मसल्स मजबूत बनाइये एवं मसल्स कमजोर होने पर अधिक उम्र में कॉलर का उपयोग ताउम्र करना होगा ! उन दिनों रात रात भर दर्द से तड़पता रहता था ! इंफ्रारेड लैंप के जरिये सिकाई करने पर आराम मिलता था मगर बढ़े दर्द के समय इंफ्रारेड लैम्प का अधिक उपयोग करने से गर्दन के पिछले हिस्से में बर्न हो गए थे और स्किन जल कर काली हो गयी थी तब घबरा कर मैंने होमियोपैथी की शरण ली , करोल बाग़ में दो मशहूर डॉक्टर बनर्जी और चटर्जी के पास इलाज कराया जिनके यहाँ लम्बी लाइन में लगने के बाद नंबर आता था ! दो माह में बहुत कम आराम मिला मगर उनकी दुकान से ही लाइन में लगे लगे होमियोपैथी की दो किताबें खरीदी और पढ़ना शुरू किया तो पता चला कि उनकी दी हुई दवाएँ तो होमियोपैथी के मूल सिद्धांत के खिलाफ थीं और इससे मैं कभी ठीक नहीं हो सकता !

अपने जिद्दी स्वभाव के अनुसार मैंने रात रात भर जागकर वो दोनों किताबें ख़त्म कर होमियोपैथी सिद्धांत से अपना इलाज खुद करने का फैसला लिया और अगले दो महीने में पूर्ण स्वस्थ हो गया उसके बाद आज 40 साल बाद भी वह दर्द दुबारा नहीं हुआ !  

होमियोपैथी के जरिये अगर कोई डॉ अपनी रोजी रोटी चलाना चाहता है तब यह बहुत मुश्किल होगा कि वह रोगियों के साथ न्याय कर सके क्योंकि होमियोपैथी में एक रोगी पर पहले दिन ही डॉ को बहुत समय देना होगा वह पूरे दिन में मात्र एक या दो रोगियों का उपचार करने हेतु ही समय निकाल पायेगा जिसमें उसका खर्चा निकलना भी असम्भव होगा अगर वह पूरे दिन में 20 या अधिक रोगियों को ठीक करने का प्रयत्न करेगा तब उसे कम से कम 24 घंटे काम करना होगा जो असम्भव होगा और डॉ अपना खर्चा निकालने को यही करते हैं और वे अक्सर आंशिक तौर पर ही रोगी को ठीक करने में कामयाब होते हैं एवं होमियोपैथी का नाम खराब करते हैं !

होमियोपैथी सिद्धांत के अनुसार संसार में हर रोग का इलाज प्रकृति में उत्पन्न पौधों में छुपा है , उनका विश्वास है कि संसार में जितने प्रकार और व्यवहार के मानव, मानवी हैं उतने ही प्रकार या व्यवहार के पौधें हैं जो जाग्रत ,पूर्ण जीवित और इनसान के आचरण के हैं ! अगर इंसानों और पौधों के स्वभाव और आचरण का सही अध्ययन कर लिया जाए तब रोगी के आचरण के पौधे के रस से बनी दवा , उसी आचरण के इंसान के लिए संजीवनी बूटी का काम करेगी चाहे उस रोगी के रोग का नाम कुछ भी क्यों न हो ! 

ध्यान रहे होमियोपैथी में दवा का नाम नहीं होता , अलग अलग व्यक्तियों में किसी भी बीमारी की दवा, उनके विशेष स्वभाव के अनुसार अलग अलग होगी अतः एक व्यक्ति की कैंसर की कामयाब दवा दूसरे व्यक्ति के कैंसर में काम नहीं आएगी अगर उनका स्वभाव अलग अलग हुआ ! होमियोपैथी रेपर्टरी में मानव के लाखों गुणों का समावेश किया गया है जिससे व्यक्ति विशेष की दवा निकालना संभव है उसके लिए अस्वस्थ इंसान के गुणों का सावधानी से चयन आवश्यक है और असम्भव रोग का इलाज भी ! 

अपने स्वभाव का अध्ययन कर मैंने अपनी होम्योपैथिक संजीवनी की आसानी से तलाश कर ली , फलस्वरूप 68 वर्ष की आयु में भी मैं रोग मुक्त रहता हूँ काश मित्र लोग होमियोपैथी का अध्ययन करने की सलाह मान लें तो मेरे अधिकांश मित्रों का कल्याण होगा उन्हें किसी डॉ के पास जाने की आवश्यकता नहीं होगी ! 
 

Friday, July 31, 2020

लॉन्ग डिस्टेंस रनिंग के फायदे और खतरे -सतीश सक्सेना

3 km या उससे अधिक रनिंग को लॉन्ग डिस्टेंस रनिंग कहा जाता है , 61 वर्ष में जब मैंने दौड़ना सीखना शुरू किया था तब 100 मीटर लगभग हर लॉन्ग डिस्टेंस रनर यह सुख रनिंग के दौरान या उसके तुरंत बाद महसूस करता है और उस समय शरीर में कोई स्ट्रेस  , दर्द महसूस नहीं होता !

पहला मैराथन रनर यूनानी सैनिक फिडीपिडिस  था जिसने मैराथन नामक जगह से एथेंस तक की लगभग 42 किलोमीटर की दूरी दौड़ते हुए तय की और राज दरबार में जाकर ईरान पर अपनी सेना की विजय की सूचना देने के बाद लड़खड़ा कर गिर गया और इतनी लम्बी दौड़ को शरीर सह न सका और उसकी मृत्यु हो गयी !

अक्सर लम्बी दौड़ में मसल्स फाइवर्स में सूजन हो जाती है और इसे ठीक होने में कम से कम 3 सप्ताह से 3 माह तक लगते हैं , रनिंग
एक हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज है जिसमें दौड़ते समय हर कदम पर, शरीर का तीन गुना वजन के बराबर इम्पैक्ट होता है , और शरीर का हर अंग अवयव कम्पन महसूस करता है ! इस खतरनाक एक्सरसाइज के कारण शरीर तरह तरह से रियेक्ट करता है , अस्वस्थ  शरीर, 
परिवार में हृदय रोग हिस्ट्री के रनर को लम्बी दूरी की इस हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज से बचना चाहिए अन्यथा हृदय आघात से मृत्यु की संभावना अधिक रहती है !

फिडीपीडीज़ अकेला रनर नहीं था जिसकी लम्बी दूरी दौड़ने के कारण मृत्यु हुई हो , अधिक समय तक जोश में लम्बी दूरी दौड़ने वाले अक्सर हृदय डैमेज के शिकार तो होते हैं साथ ही बरसाती गर्म मौसम, ठण्ड और बारिश की अक्सर बिना परवाह 3 से 6 घंटे दौडने वाले अक्सर  मसल्स की अंदरूनी चोट , जॉइंट एंड बोन के अलावा घातक हृदय डैमेज, अचानक स्ट्रोक , डिहाइड्रेशन और बेइंतिहा थकान का शिकार होकर अचानक मृत्यु के शिकार होते हैं और इन सब कारणों में अक्सर कुछ और बड़ा करने की तमन्ना और जोश अक्सर घातक होते हैं ! पिछले ४ वर्षों में भारत में ही कम से कम आठ मौतें रनिंग के कारण हुई हैं , जिनमें आधी से अधिक दौड़ते हुए हुई हैं !

मुझे याद है लखनऊ मैराथन के दौरान , लगभग 16 km के बाद ही पैरों में क्रैम्प्स आने शुरू होने के कारण मैं दौड़ने के स्थान पर लड़खड़ा कर मुश्किल से चल रहा था , पानी कम पीने के कारण उस दिन डिहाइड्रेशन के असर साफ़ दिख रहा था उस पर बहता हुआ पसीना , जैसे तैसे लड़खड़ाते पैरों के साथ मैंने उस दिन 21 km की दूरी पूरी की थी , शायद वह दिन मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा !
जब से मैं अपने हर दोस्त को जोश में दौड़ने से रोकता रहता हूँ , और उन्हें कहता हूँ कि 5 km की दौड़ भी अक्सर काफी रहती है !

प्रौढ़ों को वाक् के अंत में थोड़ी दूर तक मस्ती में दौड़ना आना चाहिए और यह दौड़ना किसी भी हाल में , बिना हांफे और बीपी बढे बिना होना चाहिए अन्यथा वे अपने को खतरे में डालेंगे !

अतः हर रनर को अपने शरीर की सीमा क्षमता से अधिक नहीं दौड़ना चाहिए , हर लम्बी रनिंग के बाद 1 दिन से 7 दिन अथवा सप्ताह में दो दिन  विश्राम आवश्यक है ताकि मसल्स में आयी सूजन ठीक हो सके और वे अधिक मजबूत हो ! पानी की मात्रा रनर के शरीर में बहुत अधिक होनी चाहिए , उसे हर वक्त यह याद रखना चाहिए कि 10 से 21 किलोमीटर में वह शरीर से लगभग 3 लीटर पानी पसीने के रूप में बह जाता है उसकी भरपाई न होने पर वह मुसीबत में आ सकता है !

याद रखें जहाँ सप्ताह में 4 - 5 दिन, 4 km की एवरेज रनिंग और एक दिन साइक्लिंग आपके लिए वजन मुक्ति, कब्ज , खून संचार, स्ट्रेस , डायबिटीज और हृदय रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए काफी होगी वहीँ जोश और जवानी दिखाने के लिए 10 km रोज की दौड़ , जान लेने में भी समर्थ है !

हैप्पी रनिंग टू आल !!

Tuesday, July 28, 2020

टी विद अरविन्द कुमार -सतीश सक्सेना

हिंदी साहित्य में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो बिना किसी दिखावा शानशौकत के चुपचाप अपना कार्य करते हैं , उनमें ही एक बेहद सादगी भरा व्यक्तित्व अरविन्द कुमार का है जिनको मैंने जितना जानने का प्रयत्न किया उतना ही प्रभावित हुआ !
वे मेरठ पोस्ट  ग्रेजुएट  कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंस में मेडिकल फिजिक्स में प्रोफेसर एवं हिंदी जगत में कहानीकार एवं कवि हैं !
अरविन्द कुमार हिंदी इंग्लिश के अलावा रशियन भाषा के जानकार हैं , आजकल वे हिंदी जगत के प्रख्यात लेखकों, कवियों, कहानीकारों और आलोचकों से लाइव वार्ता कर रहे हैं , उनके प्रसारण का नाम टी विद अरविन्द कुमार है और यह वार्ता फेसबुक पर प्रसारित होती है !
मेरी खुशकिस्मती है कि अरविन्द कुमार ने मुझे भी इस चाय के लायक समझा और आज शाम को अपने साथ चाय पर आमंत्रित किया है उनके साथ मुख्य विषय शारीरिक फिटनेस होगा साथ में एक दो गीत भी उनके अनुरोध पर प्रस्तुत किये जाएंगे !
आप सब आमंत्रित हैं इस चर्चा में शामिल होने के लिए  ...
आज दिनांक 28.07.2020 (दिन मंगलवार) की शाम 8.00 बजे
https://www.facebook.com/tkarvind
आभार  ..!!
कल दिनांक 28.07.2020 (दिन मंगलवार) की शाम 8.00 बजे मेरे बातचीत के मंच पर होंगे गीतकार और द फिटनेस मैं Satish Saxena जी। उनसे उनकी जीवन यात्रा, रचना यात्रा और उनके फिटनेस मंत्र के बारे में बातें होंगी। आशा है हमारी यह गुफ्तगू आप सभी मित्रों के लिए प्रेरणादाई होगी। आपसे गुजारिश है कि आप सभी इस बातचीत में सक्रिय भागीदारी निभाएं। हमारी यह बातचीत मेरे फेसबुक वॉल पर लाइव स्ट्रीम होगी जिसका लिंक मैं नीचे दे रहा हूं---
https://www.facebook.com/tkarvind
 — with Satish Saxena 

Monday, July 15, 2019

प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाकर, भय से मुक्ति पाइये - सतीश सक्सेना

भारत में आजकल लगभग 40 डिग्री टेम्प्रेचर है और एक नए बने रनर ट्रेनी के लिए इस गर्मी में, लम्बी दूरी दौड़ना केवल एक भयावह सपना होता है , पिछले माह जब मैं जर्मनी आया था तब अगले दिन ही यहाँ के ठन्डे मौसम में, इसार नदी के किनारे दौड़ते दौड़ते कब 21 km पूरा कर लिया पता ही नहीं चला जबकि अपने देश में पिछले 4 महीने में मेरा कोई भी ट्रेनिंग रन 21 km के आसपास भी न था ! यहीं एक उदाहरण और देना चाहूंगा 18 जून को अकेले दौड़ते हुए मैंने यह रन बेहद मस्ती और आराम से पूरा किया था जबकि इससे पूर्ववर्ती कई हाफ मैराथन मैंने पूरी ताकत लगाकर दौड़ते हुए भी लगभग इसी समय में पूरे किये थे जबकि शरीर थक कर चूर हो जाता था ! आश्चर्य यह है कि जब भी मैं बिना किसी तनाव के आराम से दौड़ने निकलता हूँ उस दिन गति अधिक ही आती है और मेरा शरीर और मन बिलकुल नहीं थकता !


मुझे ख़ुशी है कि मैं दौड़ के सहारे अपने तथाकथित वृद्ध शरीर का कायाकल्प करने में सफल रहा , आज उन दसियों बीमारियों में से एक भी शेष नहीं बची जिनसे मैं एक समय चिंतित रहा करता था और या सफलता मुझे 60 वर्ष से 64 वर्ष के मध्य मात्र दौड़ना सीख पाने से मिली ! जो व्यक्ति अपने साठ वर्षों में कभी दस मीटर भी न दौड़ा हो वह सिर्फ एक वर्ष के अभ्यास के बाद 21 km लगातार दौड़ने में सक्षम हुआ है एवं बीमारियां कहाँ गायब हुईं यह पता ही नहीं चला !

दौड़ना स्वस्थ शरीर के लिए एक बेहद आवश्यक क्रिया है जिसके द्वारा, शरीर की आंतरिक प्रतिरक्षा शक्ति, शरीर के विभिन्न
अवयवों को वाइब्रेट कर स्फूर्ति प्राप्त करती है ! दुर्भाग्य से आज के समय में बेहतरीन विद्वान भी इस विषय (मानवीय  प्रतिरक्षा शक्ति) को अछूता छोड़े हुए हैं और भौतिक सुख सुविधाओं का उपयोग, अपने शरीर को आराम देने में प्रयुक्त कर रहे हैं !

आज हमारे देश में, 50 वर्ष के आसपास का हर चौथा व्यक्ति हार्ट आर्टरीज़ की रूकावट का शिकार है एवं हर तीसरा व्यक्ति डायबिटीज का शिकार है और ऐसे समय में इसके निदान के लिए मेडिकल व्यवसायी आगे आते हैं ,उनके एजेंट्स, डॉक्टरों के जरिये संभावित असामयिक मृत्युभय के कारण आम व्यक्ति को समझाने में आसानी से कामयाब हैं कि जान जाने से बचने के लिए, उनके पास कितने तरह के केमिकल एवं ऑपरेशन उपलब्ध हैं जिनके सेवन से आपको हृदय रोग से बचाव होगा। ... 

वे यह कभी नहीं बताते कि इन दवाओं के सेवन से आपकी किडनी कितने दिनों में आधे से अधिक बर्बाद हो जायेगी और फिर उसकी दवा भी पुराने केमिकल्स (तथाकथित दवा) के साथ खानी होगी !

वे यह कभी नहीं बताते कि मात्र नियमित दौड़ना सीखने से ही आप बिना किसी साइड इफक्ट्स के आप आर्टरीज को साफ़ कर पाएंगे एवं डायबिटीज कभी पास नहीं आ पाएगी !

वे यह कभी नहीं बताते कि पैरों का उपयोग किये बिना आप अपने शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को बेहद कमजोर कर रहे हैं और बीमारी रहित मजबूत मानव जीवन के लिए रोज कम से कम 10 kmचलना व् दौड़ना बेहद आवश्यक है !

वे यह कभी नहीं बताते कि मात्र दौड़ने के नियमित अभ्यास से आपके हृदय आर्टरीज़ में जमा रक्त के थक्के समाप्त हो सकते हैं !

वे यह कभी नहीं बताते कि मेडिकल साइंस अभी खुद शैशव अवस्था में है और मेडिकल कॉलेज बरसों से पुराना ज्ञान ही पढ़ाते रहते हैं ऑपरेशन करते समय कई बार डॉक्टर्स को यह पता ही नहीं होता कि इस नए लगे चीरे से क्या क्या कट गया और उसका असर क्या होगा !

वे कभी नहीं बताएँगे कि जंग लगे घुटनों से चलने में दर्द तो होगा मगर यह प्रयत्न करना छोड़ें नहीं एक दिन यह घुटने मजबूत जोड़ वाले घुटनों में बदल जाएंगे हाँ वे सब यह अवश्य बताते हैं कि बढ़ी उम्र में आपके घुटने के कार्टिलेज डैमेज हो गए हैं , अब उनका उपयोग कम करें ! 

वे यह कभी नहीं बताते कि  अपने परिवार में वह दवाएं कभी नहीं देते जो वे अपने मरीजों में धड़ल्ले से बांटते हैं !
वे यह कभी नहीं बताते कि उन्हें हर रेकमेंडेड टेस्ट से लगभग 50 प्रतिशत पैसा कमीशम में बापस मिलता है !
वे यह भी नहीं बताते कि अधिकतर लैब टेस्ट, टेबल पर बैठकर बिना टेस्ट किये , सिग्नेचर कर जारी किये जाते हैं !
वे यह भी नहीं बताते कि लैब्स के पास रोज आये सैकड़ों सैंपल टेस्ट करने की क्षमता, उपकरण एवं तकनीशियन लैब में होते ही नहीं !
हजारों तरह के एड हम रोज देखते हैं , कोई एड यह नहीं बताता कि हम अपने शरीर में दौड़ने की आदत विकसित कर 60 वर्ष की उम्र के बाद भी कायाकल्प करने में समर्थ हो सकते हैं  एवं बड़ी उम्र में भी शरीर से अनावश्यक क्षरण को रोकना संभव है !

वे कहेंगे कि आपकी उम्र अब इस योग्य नहीं कि हैवी व्यायाम करने का प्रयत्न करें वे कभी नहीं बताएँगे कि आप धीमे धीमे हलके व्यायाम करते हुए अपने शरीर को मेहनत करने की आदत डालें और यकीन रखें कि आप भी कुछ वर्षों में युवकों जैसा व्यायाम कर पाने में समर्थ होंगे ! धीमे धीमे व्यायाम करते हुए एक आध वर्षों में आपके जीर्णशीर्ण अवयव पहले बीमारी मुक्त होंगे और बाद में अपनी पूरी शक्ति के साथ नए ऊतकों के साथ आपके शरीर को नया अनुभव देने में समर्थ होंगे !

ये सब एक ही बात कहते हैं कि यह दवाएं खाइये आप स्वस्थ होंगे और दवाओं से पहले उसे बीमारी से संभावित खतरे जो मौत की और ले जाते हैं को खूब घंटे बजाकर बताया जाता है ताकि उस अस्वस्थ व्यक्ति के विचार को इतना शून्य और क्षतिग्रस्त कर दिया जाए कि वह इन दवाओं की शरण से अपनी पूरी जिंदगी में निकलने के बारे में कभी सोंच भी न सके !

इस लेख का उद्देश्य उपरोक्त तथ्यों पर आपका ध्यान दिलाना है ताकि आप उचित फैसले ले सकें !

Thursday, May 9, 2019

जीवन चलने का नाम -सतीश सक्सेना

नमस्ते सर , अजय कुमार बोल रहा हूँ  ...कल सुबह आपके साथ दौड़ने का मन है, जहाँ कहें वहां आ जाऊंगा ...
मेरे साथ अजय कुमार दौड़ेंगे ? क्यों बुड्ढे का मजाक बना रहे हो यार  ...?  और वाकई अजय सुबह सवा पांच बजे फरीदाबाद से चलकर मेरे घर के दरवाजे पर थे !


अजय कुमार NCR के जबरदस्त रनर्स में शुमार होते हैं , और वे अक्सर अल्ट्रा रन में भाग लेते हैं , उनका मैं प्रशंसक इसलिए हूँ कि वे कम उम्र में ही हैवी डायबिटीज के शिकार हुए और उन्होंने दौड़ना शुरू करके उसे हराने में कामयाबी प्राप्त की , आज वे एक सफल धावक हैं और 50 km की शानदार दौड़ लगाने में कामयाब हैं !
अजय कुमार एक बेहतरीन चित्रकार भी हैं और उनकी प्रदर्शनी भी लग चुकी हैं , उनका एक चित्र कमेन्ट लाइन में देखिएगा !

आज के बुरे समय में जब इंसान अपने शरीर का उपयोग ही भूल चूका है , अपने शरीर के प्रति जागरूक रहना बेहद आवश्यक है ! अक्सर रिटायरमेंट उम्र होने के आसपास ही अपने मित्रों की मृत्यु की खबर सुनना आम बात हो गयी है और यह अक्सर हार्ट अटैक से होती हैं , अधिकतर यह साथी उस समय ओवरवेट और डायबिटीज , ब्लडप्रेशर के रोगी होते हैं ! अपने मित्रों की मौत की खबर सुनकर हम सिर्फ एक शब्द ही कहते हैं कि यह भी कोई उम्र थी जाने की , और अगले दिन घर में मीठी स्वादिष्ट इलायची पड़ी चाय के साथ आलू परांठे खा रहे होते हैं !


मुझे बेहद अफ़सोस तब होता है कि अक्सर असमय जाने  वाले लोग बेहतरीन प्रभामंडल युक्त होते हैं जिनके आसपास जी हजूरी तथा हाँ जी हाँ जी कहने वालों की भीड़ होती है और यह गुरु गौरव के साथ, तमाम सामाजिक उपयोग का विशुद्ध ज्ञान भी, नियमित बाँटते रहते हैं , ऐसे विद्वान भी अपने शरीर की चीत्कार सुनने में असमर्थ होते हैं और उसका एकमात्र कारण आलस्य तथा जीभ पर कंट्रोल न करना मात्र है जिसके कारण वे अपने नजदीक आती हुई निश्चित मृत्यु की आहट को सुनने में विफल रहते हैं !

मैं जब आलस्य से घिरता हूँ तब अजय कुमार जैसे कम साधन युक्त लोगों से सबक और शक्ति लेता हूँ , जो अकेले बिना किसी दवा के डायबिटीज को हारने में कामयाब हुए हैं अवसाद युक्त क्षणों में भी अक्सर मैं उन्हें हँसते देखता हूँ तब मुझे उनसे शक्ति मिलती है ! 



Tuesday, February 26, 2019

६५ वर्ष में फ़िटनेस उम्र 52 वर्ष -सतीश सक्सेना

जीपीएस वाच मेरी एक्टिविटी रिकॉर्ड करती है , उसके एप्प टॉमटॉम स्पोर्ट्स के अनुसार 65 वर्ष की उम्र में, मेरी फ़िटनेस ऐज 52 वर्ष है जबकि पिछले वर्ष फिटनेस ऐज 47 वर्ष थी , इसका अर्थ है कि मैंने पिछले वर्ष की तुलना
में इस वर्ष कम एक्टिविटी की हैं नतीजा एक वर्ष में 5 वर्ष उम्र बढ़ गयी , पिछले चार माह से दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारण, सुबह दौड़ना केवल नाममात्र को ही रहा, आज भी सुबह आरामदेह कम्बल से दुखी मन तभी निकला जब खुद को ढेरों गालियाँ देनी पड़ीं !

इतिहास गवाह है कि सफलता मानव को पागल बना देती है, वह अपने किये हर काम को श्रेष्ठ मानना शुरू कर देता है , हम सब भी धन और सम्मान पाते ही उसका अनजाने में दुरुपयोग शुरू कर देते हैं , धन का उपयोग सबसे पहले आराम करने में लगाते हैं , सुख सुविधाओं के होते सबसे अधिक ह्रदय रोग और डायबिटीज (शाही रोग) धनवान और सम्मान सज्जित लोगों को ही होते हैं , मैंने आजतक एक भी मेहनतकश व्यक्ति को ह्रदय रोग से मरते नहीं सुना और न उसे डायबिटीज हुई जबकि चीनी भी वह सबसे अधिक खाता रहा ,इन बीमारियों का शिकार सबसे अधिक सम्मानित और बड़े लोग ही होते हैं जिनके प्रभामंडल पर समाज को नाज होता है ! वे पूरे समाज को दिशा देने में समर्थ होते हैं मगर शारीरिक मेहनत और पसीना बहाना उन्हें भी निरर्थक लगता है !

मजबूत मानवीय शरीर के इंजन के विभिन्न अवयवों को शक्ति सप्लाई देने के लिए , हाथ पैरों का निर्माण किया गया है ,लगातार चलते हुए हाथ पैर शारीरिक इंजिन को ईंधन देते रहते हैं ताकि वह अंत तक कार्यशील रहे ,
इसीलिये पुराने समय में लोग बहुत कम बीमार पड़ते थे ,रोग अपने आप ठीक हो जाते थे ! उद्यम शीलता के होते ढाई लाख वर्ष के मानव जीवन में मेडिकल व्यापार का दखल पिछले दो सौ वर्षों से ही हुआ है और यकीन मानिए इसके बदौलत मानव उम्र में कोई ख़ास योगदान नहीं हुआ है सिर्फ धन बहने के एक श्रोत का सर्जन अवश्य हुआ है आज एक ऑपरेशन होते ही इंसान के जीवन की आधी एक्टिविटी और उत्साह नष्ट हो जाता है बचा जीवन धीरे धीरे बात करते हुए ही गुजरता है !

रिटायरमेंट के बाद मैंने पहली बार शारीरिक मेहनत का सुख महसूस किया, पिछले 41 माह में 638 बार घर से दौड़ने निकला हूँ और लगभग 5000 Km दौड़ चुका हूँ, प्रति सप्ताह 30 km एवरेज रनिंग करने के साथ 26 बार हाफ मैराथन रेस (21Km) पूरी करने में सफलता प्राप्त की !

६५ वर्ष की उम्र में लगातार ढाई घंटा दौड़ने के बाद पूरे शरीर से बहते पसीने का आनंद का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता उसे केवल महसूस किया जा सकता है , चेहरे और पेट का भारी वजन, कोलेस्ट्रोल , डायबिटीज , बढ़ा बीपी , पेट के रोग , जोड़ों के दर्द कब गायब हो गये, पता ही नहीं चला ! भरोसा नहीं होता कि मैं वही सतीश हूँ जिनका फोटो नीचे लगा है ! यह सब करने के लिए मैंने आत्मविश्वास के साथ लीक से हटकर चलने की आदत डाली और सफल रहा !
सस्नेह आप सबको ...

Sunday, December 9, 2018

सारी धरती लोहा माने , इंसानी इकबाल का ! -सतीश सक्सेना

सत्येन दादा,उन लोकप्रिय लोगों में से एक हैं जिन्हें मैं सम्मान के साथ पढने ,समझने का प्रयत्न करता हूँ , हर एक
के प्रति संवेदनशील, स्नेही सत्येन भंडारी को अगर पढ़ना शुरू करें तो समाप्ति से पहले रुक नहीं पायेंगे , उनकी सहज अभिव्यक्ति,आसानी से आपको मुक्त नहीं करेगी बल्कि सोंचने को विवश कर देगी, ऐसी है उनकी लेख्ननी !
स्नेही संवेदनशील लोग अगर लेखक हों तो वे निस्संदेह उनके लेखन में अनूठापन और ईमानदारी स्पष्ट नजर आएगी ऐसे लोग अपनी तारीफ नहीं चाहते और न इसका प्रयत्न करते हैं सो अक्सर यह बहुमूल्य व्यक्तित्व साहित्य जगत में गुमनामी में ही रहते हैं ,हाँ, ढोल बजाते प्रशस्ति पत्र पाते लोगों से कोसों दूर इन लोगों की कुटिया में उनके भले मित्रों की कोई कमी नहीं होती !

आज Anand भाई के एक कमेन्ट के द्वारा Satyen Bhandari की अस्वस्थता के बारे में ज्ञात हुआ, सुनकर खराब लगा , हाइपरटेंशन वाकई खराब बीमारी है खासतौर पर यदि 50 के बाद हो तब, मैं खुद इसका 55-60 वर्ष की उम्र में शिकार रहा हूँ , पेट के इर्दगिर्द वजन , और चेहरे का भारी होना इसकी शुरुआत मानता हूँ ! इसके साथ ह्रदय आर्टरीज में रूकावट होने का खतरा हमेशा सामने रहता ही है ! आज सर्वाधिक डायबिटीज और ह्रदय रोगी हमारे देश में ही हैं जिनसे मेडिकल व्यवसाय जबरदस्त तरीके से फलफूल रहा है !

सर्विस रिटायरमेंट (2014) के समय मुझे यह सारी समस्याएं, जन्मजात भावुकता एवं संवेदनशीलता के साथ मौजूद थीं, किसी भी जीव के कष्ट में खुद को आत्मसात कर लेना , इस खतरे को चर्म सीमा पर पंहुचाने के लिए 
काफी था मगर मैं इस उम्र में रगड़ रगड़ कर मरना नहीं चाहता था और इन्हीं दिनों मैं अपनी जिम्मेवारियों से
मुक्त हुआ था और अब खुद के लिए जीने की तमन्ना थी सो बड़प्पन को एक तरफ झटक अभी तो पार्टी शुरू हुई है, के नारे के साथ शरीर को निरोग बनाने का फैसला , अभूतपूर्व विश्वास के साथ कर 61 वर्ष की उम्र में नियमित वाक शुरू किया था ...

पौराणिक कहानियों में मैंने भीष्म पितामह से एक सबक लिया कि जीवनीशक्ति पर किया आत्मविश्वास आपको विजयी बनाएगा बशर्ते इसपर कोई संशय न हो ! अगर आसन्न मृत्यु उन्हें डिगा नहीं पायी तो मैं अभी उस भयावह अवस्था में नहीं हूँ बस सबसे पहले यह ठान लेना होगा कि मुझे अगले 20 वर्ष बेहद मजबूती के साथ जीना हैं और उसके बाद तदनुसार खानपान सम्बन्धी उचित आचरण करना होगा !

लोग अक्सर मुझसे मेरे स्वास्थ्य का राज पूंछते हैं , ऐसा नहीं कि मुझे बीमारियाँ नहीं होतीं हर वर्ष जाड़ों में खांसी की समस्या मेरे बढ़िया स्वास्थ्य में रुकावट रही है ! पिछले दो माह से दिल्ली के प्रदूषण में दौड़ने का प्रयास और फलस्वरूप गले में इन्फेक्शन के कारण लगभग तीन किलो वजन बढ़ा है साथ ही स्वाभविक तौर पर लम्बी दूर की दौड़ पर प्रतिकूल प्रभाव भी दिख रहा है मगर यह समस्याएं आत्मविश्वास नहीं तोड़ पाएंगीं , कुछ दिनों में अन्धेरा दूर होगा और फिर वजन घटेगा और सतीश दौड़ेगा ...

अपने ऊपर यह भरोसा तुम्हें हर बीमारी से मुक्त रखेगा , हाँ यह सब एक दिन में न होकर काफी लम्बे समय में होगा जब तक जीना है शरीर को एक्टिव बनाए रखना होगा अन्यथा हल्की से मायूसी और खुद पर अविश्वास उसी दिन शरीर को जमीन पर लिटाने के लिए काफी होगा !

जिस व्यक्ति को यही नहीं मालूम कि उसके शरीर का मोटापा क्या खाने से बढ़ रहा है वह यकीनन अपने जीवन के प्रति लापरवाह है ! हर शरीर अलग है, अगर एक शरीर पर, मीठा वजन बढाने का दोषी है तो दूसरे शरीर पर चना या दूध यह काम बखूबी कर रहा होगा और यह पता करना कोई अधिक मुश्किल काम नहीं, 
याद रहे बढ़ा हुआ वजन हर बीमारी बढाने में समर्थ है !

हर व्यक्ति को लगभग ५ km रोज धीरे धीरे दौड़ना चाहिए , इतना दौड़ना शरीर को सिखाने के लिए , लगभग २ माह का समय लगता है ! और मजबूत शरीर के लिए आवश्यक दौड़ सीखने के लिए हर रोज वाक का आखिरी 200 मीटर, बिना हांफे भाग कर समाप्त करना चाहिए ! मानवीय बॉडी कोर में अवस्थित महत्वपूर्ण अवयव, दौड़ने से उत्पन्न कम्पन पाकर अपने आपको धन्य समझेंगे और नए जोश से आपके शरीर को नवऊर्जा संचार देंगे ! आपकी आन्तरिक शारीरिक प्रतिरक्षा शक्ति आपको धन्यवाद् देगी कि चलो इस उम्र में ही सही बुड्ढे में बुद्धि तो आई ....

और २०१५ में ६१ वर्ष की उम्र में मेरा बीपी कब ठीक होगया पता ही नहीं चला , हैं मैंने शरीर के साथ जबरदस्ती नहीं की धीरे धीरे उसे एथलीट बनाया और सफल भी रहा !

मैराथन आसान ,भरोसा हो क़दमों की ताल का
साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा तिरेसठ साल का !

इसी हौसले से जीता है, सिंधु और आकाश भी
सारी धरती लोहा माने , इंसानी  इकबाल का !

Sunday, November 11, 2018

मरना है तो,मरो सड़क पर मगर आज हों, ब्रेक बैरियर ! -सतीश सक्सेना

कई दिन बाद,आज सुबह, लम्बा दौड़ने का फैसला कर दौड़ते हुए 13.20 Km का फासला बिना रुके , बिना पानी के तय किया ! यह दूरी 1घंटा 36 मिनट में तय की गयी ! रनिंग के तुरंत बाद, बॉडी कूल डाउन के लिए लगभग 6 km तेज वाक किया ! अब लग रहा है कि जैसे काफी दिन बाद शरीर तरो ताजा और आत्मविश्वास से लबालब हुआ !


लोग सोंचते होंगे कि यह किस्मत वाले वाले हैं कि इन्हें 64 वर्ष की उम्र में भी कोई बीमारी नहीं है , मगर यह सच नहीं है , सत्य है कि मुझे भी बीमारियाँ हैं और परेशान करने वाली बीमारियों हैं मगर मैं उन्हें याद ही नहीं रखता और न दवा खाता अन्यथा बचा जीवन कब का मेडिकल व्यापारियों की भेंट चढ़ गया होता !
मेरा मानना है कि ६४ वर्ष की उम्र में कम से कम 64 प्रतिशत शरीर का क्षरण अवश्य हुआ है और मेरे शरीर का हर अंग की क्षमता भी उसी हिसाब से कम हुई होगी वह और बात है कि मैं अपनी मशीनरी को अधिकतर एक्टिव रखने में कामयाब हूँ सो मेरे शरीर की चुस्ती और स्टेमिना, उम्र के हिसाब से कहीं अधिक है , यकीनन मैं बाद में बिस्तर पर लेटकर बीमारियाँ भोगने से काफी हद तक बचा रहूंगा !

बूढों को देखते ही,संभावित बीमारियों का टेस्ट कराने के लिए , अक्सर परिवारजन सलाह देते देखे जाते हैं , मुझे मेडिकल व्यवसाय से अधिक प्रभावी विज्ञापन आजतक देखने को नहीं मिले जहाँ बीमार होते ही पूंछा जाए कि दवा ले आये ? मतलब शरीर में जो बीमारी बरसों में पैदा हुई है वह गोली खाते ही ठीक हो जायेगी इसीलिए मेडिकल पढ़ाई की फ़ीस करोड़ों तक पंहुचती है क्योंकि उस धंधे में पैसों की कोई कमी नहीं , साठ से ऊपर का हर आदमी अपने जीवन भर की कमाई बचाए बैठा रहता है कि उसे देकर इलाज हो जाएगा उसे उससे आगे की सोंचना ही नहीं कि बाद में बचोगे कितने साल ?

हर शहर में मेडिकल टेस्ट लेब्स की भरमार है और एक एक लैब में रोज सैकड़ों टेस्ट सैंपल लिए जाते हैं कोई ज्ञानी यह समझने की कोशिश ही नहीं करता कि क्या इस लैब में इतने टेस्ट करने की क्षमता और मशीनें भी हैं ? एक सामान्य टेस्ट करने में ही लगभग आधा घंटा लगता है पूरे दिन में एक तकनीशियन सिर्फ 12 टेस्ट कर पायेगा फिर यह रोज की 100 टेस्ट रिपोर्ट क्या मंगल वासियों द्वारा किये गए हैं ?

खैर ....दोस्तों से निवेदन है कि भारत डायबिटीज और ह्रदय रोगों की राजधानी बन चुका है, रोज जवान और असमय मृत्यु सुनने को मिलती है सो इनसे और मेडिकल व्यवसाइयों से बचने के लिए खुद को दौड़ना सिखाइए और जीवन का आनंद लीजिये !

सस्नेह सादर ..

आज की पंक्तियाँ जो गाते हुए दौड़ा ....

भाड में जाए धड़कन दिल की
कमर दर्द , कमजोर हड्डियां
मरना है तो , मरो सड़क पर
मगर आज हों, ब्रेक बैरियर !

Friday, October 19, 2018

शाब्बाश बुड्ढे ! यू कैन रन - सतीश सक्सेना

मेरी उम्र के लोगों को यह कविता पसंद नहीं आएगी , इसे बेहद दोस्ताना अन्दाज़ में लिखा गया है और वे इसके आदी नहीं हैं , 50 वर्ष से ऊपर के लोग बच्चों की तरह हंसने में असहज होते हैं उन्हें सिर्फ सम्मान चाहिए और वह भी सभ्यता के साथ और जीर्ण शरीर और बुढ़ापा भी यही चाहते हैं !
यह रचना दिल्ली में हो रहे रनर्स महाकुम्भ ADHM (Airtel Delhi Half Marathon 2018 ) के अवसर पर लिखी है जिसमें मैं हाफ मैराथन में भाग ले रहा हूँ !


शाब्बाश बुड्ढे ! यू कैन रन ! 
तवा बोलता छन छन छन !

सारे जीवन काम न करके
तूने सबकी वाट लगाईं !
ढेरों चाय गटक ऑफिस में
जनता को लाइन लगवाई !
चला न जाना अस्पताल में
बेट्टा , वे पहचान गए तो
जितना माल कमाया तूने 
घुस जाएगा डायलिसिस में
बचना है तो भाग संग संग
रिदम पकड़ कर छम छम छम , 
शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !

जब से उम्र दराज बने हो  
सबके आदरणीय बने हो
सारी दुनिया के पापों को
खुलके आशीर्वाद दिए हो !

इस सम्मान मान के होते
देह हिलाना भूल गए हो
पिछले दस वर्षों से दद्दू 
छड़ी पकड़ के घूम रहे हो
आलस तुझको खा जाएगा
फेंक छड़ी को रन, रन, रन , शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !

साठ बरस का मतलब सीधा
साठ फीसदी ताकत कम
ह्रदय बहाए खून के आंसू
बरसे जाएँ झम झम झम
चलना फिरना छोड़ा कब से
घुटने रोते , चलते दम !
साँसें गहरी, भूल चुका है
ऑक्सीजन पहले ही कम
अभी समय है रक्ख भरोसा
गैंग बना कर धम धम धम , शाब्बाश बुड्ढे, यू कैन रन !


डायबिटीज खा रही तुझको 
ह्रदय चीखता, जाएगा मर
सीधा साधा इक इलाज है
उठ खटिया से दौड़ने चल
आधे धड़ को पैर मिले हैं
उनको खूब हिलाता चल
ताकतवर शरीर होगा फिर
मगर तभी जब, मेहनत कर
सब देखेंगे जल्द , करेंगे
दुखते घुटने, बम बम बम , शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !



Thursday, September 20, 2018

रनिंग टिप्स - सतीश सक्सेना

-रनिंग सीखे बिना, दौड़ने की कोशिश करना, अधिक उम्र वालों के लिए घातक हो सकता है !
-अधिकतर प्रौढ़ व्यक्तियों या "समझदार" व्यक्तियों को दौड़ना नहीं आता है वे बच्चों की तरह, हांफते, रुकते, टहलते, दौड़ने का प्रयास करते हैं जिससे उनके हृदय पर विपरीत असर पड़ता है ! उन्हें लगता है कि रनिंग में सीखने जैसी क्या बात है !
- अगर रनिंग करते समय आनंद नहीं आ रहा तो वह रनिंग आपके हृदय को स्वस्थ नहीं बल्कि कमजोर बनाएगी इसीलिए शरीर को रनिंग सिखानी आवश्यक है कि उसे उसमें आनंद आये !


-अधिक उम्र वालों को स्मूथ रनिंग सीखने में, लगभग 2 से 3 वर्ष लगते हैं जो जल्दबाजी करते हैं उनकी रनिंग जल्द ही बंद हो जाती है !
- मैं 3वर्ष में 25 से अधिक बार हाफ मैराथन के साथ कुल 4285 km दौड़ चुका हूँ और अब भी खुद को रनिंग का जानकार नहीं समझता, मेरा हर नया रन एक नया सबक देता है !
-जब भी दौड़ते समय हांफने लगें मानियेगा कि आप ट्रेनिंग से अधिक तेज दौड़ने का प्रयास कर रहे हैं और शरीर रजिस्ट कर रहा है सो शरीर से जबरदस्ती नहीं करनी !
-आप लगातार 5 मिनट तक न दौड़ें बल्कि 2 मिनट दौड़ें और अगले चार मिनट वाक् करें जब सांस व्यवस्थित हो जाए तब दो मिनट फिर दौड़ें और फिर चार मिनट वाक, यह क्रम दुहराएँ !
-दौड़ते समय शरीर को शक्ति ऑक्सीजन से मिलती है सो दौड़ते समय सांस लेने का एक रिद्म बनता है जिससे मस्तिष्क और फेफड़ों को बेहतर एवं अधिक मात्रा में ऑक्सीजन मिलती है ! जो सही से सांस नहीं लेते वे जल्दी थक जाएंगे
-दौड़ने से पहले व्यायाम और एड़ी पंजें की स्ट्रेचिंग करें !
-पानी दौड़ के लिए और एक रनर के लिए बहुत आवश्यक है सारे दिन में कम से कम 12 गिलास पानी पियें इससे जोड़ों में लचीला पैन आएगा जो कि लम्बी दौड़ों के लिए बेहद आवशयक है !
-पूरे सप्ताह में आराम देना बहुत आवश्यक है कम से कम दो दिन दौड़ने को आराम दें !
सप्ताह में एक दिन साईकिल चलाने जैसी एक्सरसाइज बेहद आवश्यक है यह उन मसल्स को मजबूत करेगी जो रनिंग के द्वारा उपयोग में नहीं आते !
अगर रनिंग के सबसे आवश्यक टिप जानना हों तो पहले तीन टिप निम्न हैं
१.हायड्रेशन
२.हायड्रेशन
३.हायड्रेशन
अर्थात शरीर में अगर पानी अब्सॉर्व नहीं है तो शरीर दौड़ नहीं पायेगा इसका अर्थ यह नहीं कि दौड़ने से पहले एक बोतल पानी पीकर दौड़ा जाये बल्कि दौड़ने से पहले दिन अधिक पानी पीना है
- जिस दिन आप रनिंग 21 km दौड़ते हुए एन्जॉय कर पाएंगे समझियेगा कि आपकी सारी हार्ट आर्टरी ओपन हो चुकी हैं और याद रखें रनर को डायबिटीज तो हो ही नहीं सकती !

Tuesday, June 26, 2018

सावधान -सतीश सक्सेना

सावधान -सतीश सक्सेना
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कुछ वर्ष पहले के बेहद खूबसूरत चेहरे , चंद वर्षों में ही , बेडौल और भद्दे दिखने लगते हैं , बुरा हो उनके खैरख्वाहों की बजती तालियों और तोंद से नीचे बंधी बेल्ट का, जो उन्हें अहसास ही नहीं होने देतीं कि वे कितना कुछ खो चुके हैं !
और बुरा हो उन बहानों का जो बढ़ते वजन का कारण हैं , कोई बेचारा समय, कम होने के कारण मोटा है तो कोई दवाओं के कारण तो कोई घुटने के दर्द के कारण वाक् नहीं कर पाते तो दौड़ना कैसे सीखें ?
कुछ लोग खुद को तसल्ली दे लेते हैं कि वे रोज दोस्तों के साथ पार्क में टहलते हैं और कुछ तो जिम भी जाते हैं !
इन्हें नहीं मालुम कि बढ़ते फैट के कारण शरीर का हर अंग बीमार हो रहा है अगर वे दो मंजिल सीढियाँ या 100 मीटर दौड़ने में हांफ रहे हैं तो समझिये, ह्रदय घात कभी भी होगा और पछताने का मौक़ा नहीं देगा !
To avoid danger of Obesity, Diabetes and Heart attack, Learn Running ....

Wednesday, June 20, 2018

हेल्थ ब्लंडर -9

आप कई वर्ष से वाक कर रहे हैं, आप कई वर्ष से जानवरों का दूध पी रहे हैं , आप बरसों से रोटी,दाल,सब्जी खा
रहे हैं , यह सब आपकी आदत का हिस्सा बन गयी हैं और उसी तरह से आपका शरीर भी बरसों से एक शक्ल अख्तियार कर चुका है और वजन टस से मस नहीं हो रहा तो मान लीजिये शरीर ने इन आदतों को स्वीकार कर लिया है और आप यह सब करते रहिये शरीर इसी वजन के साथ थुलथुल शरीर के साथ जीने की आदत डाल लेगा और आप इस भुलावे में मस्त रहिये कि आप व्यायाम कर रहे हैं जबकि अब यह व्यायाम न होकर शरीर का एक रुटीन भर रह गया है जिससे शरीर में रत्ती भर बदलाव आना संभव नहीं !

अगर बदलाव लाना है तो अपने व्यायाम की एकरसता को तोडिये और अपनी एक्टिविटी में विविधिता लाइए शरीर में हलचल मचना शुरू हो जायेगी ! सप्ताह में चार पांच अलग गति और एक्शन के साथ वाक /रन करें अन्यथा लटके हुए मांस में बदलाव आना संभव नही ! अधिकतर एथलीट एक दिन साधारण वाक्, एक दिन तेज वाक, अगले दिन साईकिल, अगले दिन रेस्ट और फिर जोगिंग और एक दिन तेज रन करता हूँ !

जानवरों का दूध पीना लगभग एक माह बंद करके देखें इसके साथ ही वह सब कुछ महीने के लिए त्याग करें जो आपको बहुत खाने में बहुत अच्छा लगता हो, इनमें से कुछ खाद्य पदार्थ हो सकता है आपका नुकसान कर रहे हों , इनको छोड़ने के साथ वह प्राकृतिक खाद्य शुरू करें जो आपने बहुत कम खाया हो !

आप डरपोक हैं इसीलिए एक सप्ताह में कैंसर ठीक, जैसे न्यूज़ नुमा विज्ञापन ध्यान से पढ़ते ही नहीं बल्कि अपने तमाम दोस्तों को शेयर भी तुरंत करते हैं ! आकर्षक हैडिंग वाली ख़बरें आपको खींचती हैं उस माल को खरीदने के लिए जो मुफ्त में फायदा देने का झांसा दे रहा है तब आप मृत्यु के प्रति घबराए हुए तो हैं ही साथ ही मूर्ख और लालची भी हैं जो किसी व्यापारी के लुभावने ऑफर को धन्यवाद् सहित स्वीकार ही नहीं कर रहे बल्कि अनजाने में उसके एजेंट भी बन रहे हैं ! मृत्यु के प्रति यह भय आपकी जान ले लेगा और आपके जाते जाते मेडिकल व्यवसाइयों को धन दिलाने में कामयाब रहेगा !

अकर्मण्यता की आदत से, है कितना लाचार आदमी !
जकड़े घुटने पकड़ के बैठा , ढूंढ रहा उपचार आदमी !

दुरुपयोग मानस का करके,ढेरो धन संचय कर.भयवश
निष्क्रिय औ भयभीत ह्रदय से करता योगाचार आदमी !

Tuesday, June 12, 2018

बिना समझे, दौड़ना खतरनाक हो सकता है -सतीश सक्सेना

६ जून की पोस्ट पर भाई लकी सिंह के स्नेहिल प्रश्न के जवाब में यह पोस्ट लिखनी आवश्यक हो गयी है मुझे दुःख है कि अधिकतर लोग ध्यान से बिना समझे रनिंग शुरू करते हैं जबकि यह बेहद घातक सिद्ध हो सकता है अतः आज रनिंग से सम्बंधित कुछ ख़ास बातें , फायदे और संभावित नुकसान की भी चर्चा आवश्यक है !

चूंकि रनिंग अकेली ऎसी एक्सरसाइज है जो डायबिटीज और ह्रदय आर्टरिज़ में आयी रूकावट को दूर करने में समर्थ है मगर रनिंग के बारे में कोई यह जानना नहीं चाहता कि रनिंग का सही तरीका क्या है, नुकसान क्या हो सकते हैं , उनका सोंचना है कि रनिंग के बारे में किसी से क्या पूंछना ? और वे दौड़ना शुरू कर देते हैं यही नहीं उनकी कोशिश होती है कि वे लम्बी दूरियां, बढ़िया स्पीड के साथ तय कर सकें ताकि साथियों में अपनी बुलंदी के किस्से सुनाये जा सकें और अधिकतर इस जोश का अंत किसी गंभीर मसल्स इंजरी के साथ ही होता है जिसके कारण कई लोगों की रनिंग पूरे जीवन नहीं हो पाती !


रनिंग एक हार्ड हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज है जिसमें शरीर के हजारो अंग एक  साथ वायब्रेट करते हैं और विभिन्न व्यक्तियों पर अपनी अपनी आदत के अनुसार उन पर अच्छा या बुरा असर पड़ता है ! अतः रनिंग करते समय हर व्यक्ति का ध्यान अपने शरीर पर होना चाहिए कि वह क्या कह रहा है , और हर शरीर अपने स्वस्थ होने या बीमार होने का संकेत काफी पहले ही देता है अगर इसे दौड़ने के जोश में, नज़रंदाज़ करेंगे तो यकीनन आपका नुकसान हो सकता है !

हर रनिंग में शरीर के मसल्स एवं जॉइंट्स को बहुत काम करना पड़ता है गिरते हुए हर कदम पर आपके शरीर के वजन का तीन गुना इम्पैक्ट जमीन पर पड़ता है इसका अर्थ यह है कि दौड़ते समय अगर आपका वजन 70 kg है तो हर गिरते कदम पर आपका पैर जमीन से 210 kg के वजन के साथ टकराएगा और हर बार 210 किलोग्राम  इम्पैक्ट का कम्पन आपके घुटने,हिप जॉइंट्स , बॉडी कोर, हृदय, फेफड़े और मस्तिष्क तक महसूस करेगा ! 5 Km दौड़ते हुए ,एक रनर लगभग 6000 बार अपने घुटनों और काफ मसल्स पर 210 किलोग्राम का इम्पैक्ट देता है , और यह झनझनाहट, शरीर के हर नाजुक जॉइंट्स से गुजरती हुई मस्तिष्क तक जाती है !

इतनी दुष्कर हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज अगर कोई आलसी वृद्ध व्यक्ति , या अनाड़ी जोशीला जवान एक दिन में करने की कोशिश करेगा तो इस मूर्खता स्वरुप उसकी मसल्स एवं जॉइंट्स में सूजन आ जाएगी और अधिक  करने पर,वे फटकर घायल भी हो सकती हैं जिनके हील होने में कई बार महीनों, बेडरेस्ट करना पडेगा और अगर मेडिकल व्यापारियों के पास चला गया तो वह ऑपरेशन के साथ,लोहे के घुटने लगा कर, बचे जीवन भर रनिंग को गालियां देता रहेगा !


इस तरह की चोट लगने से बचाव के लिए, सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता अधिक मात्र में पानी पीना है ! अगर शरीर में पानी पर्याप्त मात्र में नहीं है तब दौड़ते समय मसल्स क्रेम्प्स आना और अंदरुनी जख्म के कारण दर्द होना, सामान्य बात है ! अतः हर रनर दौड़ने से पहले 24 घंटे अपने शरीर को, पर्याप्त हाइड्रेशन देने की व्यवस्था करता है अधिकतर जल, जूस , दूध या  लिक्विड भोजन इसकी जरूरत पूरी करता है !

हर लम्बी दौड़ के बाद एक या अधिक दिनों का आराम आवश्यक है जिसमे सूजे हुए मसल्स आराम के बाद ठीक होकर और शक्तिशाली बनकर अगली रनिंग के लिए अधिक मजबूती के साथ तैयार हो सकें ! इस प्रक्रिया को मसल्स अथवा शारीरिक रिकवरी कहते हैं यह रनिंग की सबसे बड़ी उपलब्धि है मैं इसे कायाकल्प कहता हूँ इस प्रक्रिया से ही शरीर ढीले मसल्स का त्याग कर , नौजवान मसल्स की शक्ल लेकर , नए
स्वरुप को प्राप्त करता है ! सो हर लम्बी मेहनत के बाद , ढेरों जल , लंबा आराम एवं बेहतरीन नींद अवश्यक है !
  

याद रहे हर रनर दौड़ से पहले बॉडी वार्मअप करता है फिर धीरे धीरे दौड़ना और दौड़ के समाप्ति पर कुछ देर तक जोगिंग मोड में दौड़ना बेहद आवश्यक होता है ! इतनी मेहनत के करने बाद रिकवरी के लिए निम्न टिप ध्यान में रखना आवश्यक हैं !
  • रनिंग के बाद एक या दो दिन आराम करें उसके बाद जब शरीर ठीक हो जाए तब अगली दौड़, पहली दौड़ से स्लो करें न कि जोश में और तेज दौड़ने का प्रयत्न करें यह भयानक भूल होगी आप यह न भूले कि आपके मसल्स ऊपर से भले सहज लग रहे हैं मगर वे भीतर से जख्मी हैं उन्हें और जख्म न दें !
  • बेहतरीन नींद ही सूजे हुए अंगों को ठीक करके स्वस्थ बनाने में समर्थ है सो 10 km या अधिक लम्बी दूरी के रनर कम से कम 8 घंटे या 10 घंटे की नींद अवश्य लें ! 
  • रनर के लिए हाइड्रेशन से महत्वपूर्ण कुछ नहीं होता हर रनिंग से पहले के 24 घंटे ढेरों पानी पीना है ताकि आपके शरीर में स्मूथनेस और शरीर से सफाई हो सके और इसी तरह रन के बाद अगले दो दिन खूब पानी एवं लिक्विड आहार लें ताकि मसल्स रिकवरी इफेक्टिव हो , हाँ दौड़ते समय पानी कम लेना चाहिए
    गला सूखते समय सिर्फ सिप भर लेना है ताकि गला गीला रहे ! भर पेट पानी दौड़ते हुए पीना मूर्खता होगी वह आपको दौड़ने नहीं देगा !
  • रनिंग के बाद बिना आराम किये, जोश में लोग, पिछली थकान को साथ लेकर अगले दिन फिर दौड़ने जाते हैं और सूजी हुई मसल्स को डैमेज करते हैं अगर इन्हीं मसल्स को समुचित आराम दिया जाता तो वे अगली रनिंग और अधिक ताकत के साथ बिना थके करने के लिए तैयार होती !
  •   सप्ताह में एक दिन रनिंग की जगह क्रॉस ट्रेनिंग बेहद आवश्यक है जिनके द्वारा उन मसल्स को मजबूत किया जाता है जिनका उपयोग रनिंग के समय नहीं होता बहुतायत में रनिंग इंजुरी इसी के न करने के कारण होती है ! और साइकलिंग को बेहतरीन क्रॉस एक्सरसाइज माना जाता है !सो सप्ताह में एक दिन साईकिल चलायें !
  • रनिंग से पहले बॉडी स्ट्रेचिंग एवं वार्मिंग रनिंग के दौरान सिप करने के लिए पानी की छोटी बोतल एवं रन के अंत में धीमे धीमे स्लो डाउन करते हुए रुकना , इंजुरी से बचने के लिए बहुत आवश्यक है !
  • सीनियर उम्र के रनर अगर जल्दवाजी और जोश में रनिंग करेंगे तो तरह तरह के दर्द होंगे जिन्हे मेडिकल व्यापारी  खतरनाक बताकर पैसे निकलवा लेंगे ! उन्हें खासतौर पर शरीर का लचीलापन बनाये रखने के लिए विभिन्न एक्सरसाइज करना होगा तथा अपने लिए गहरी  नींद , सप्ताह में दो दिन पूरा रेस्ट तथा एक दिन साइक्लिंग करनी ही होगी  तभी शरीर लम्बे समय तक रनिंग के लिए साथ देगा , थके हुए पैरों को लेकर लम्बी दौड़ नहीं करनी चाहिए !
निम्न वेब साइट पर जाकर आप अन्य जानकारी ले सकते हैं 
https://www.runnersworld.com/training/

एवं रनिंग ट्रेनिंग के लिए 
https://www.halhigdon.com/training/5k-training/

यह मत भूल जाना कि इन दिनों जिन के पेट का घेरा बढ़ा हुआ है वे सब हृदय आर्टरीज में चर्वी जमा कर चुके हैं और डायबिटीज के शिकार हैं और इससे मुक्ति का इलाज केवल और केवल रनिंग सीखना है ! उनका जबरदस्त प्रभामंडल , समाज से मिलता सम्मान का नशे में व्यस्त वे आसन्न मौत की आहट भी नहीं ले पाएंगे  !

उन्हें चाहिए कि अगर अपने यश और सम्मान का सुख लेना है तो थोड़ा समय उस भूल पर लगाएं जो उन्होंने वर्षों से की है, आज से मेहनत करना और पसीने के साथ दौड़ने में सुख लेने का प्रयत्न करें अन्यथा जिनके लिए जीना आवश्यक है उन्हें ही खतरे में डालकर अचानक जाने के लिए तैयार रहें !
मंगलकामनाएं आप सबको !
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