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Friday, March 27, 2015

आम आदमी भी कितने अरमान छिपाए बैठा है ! - सतीश सक्सेना

आम आदमी भी कितने अरमान छिपाए बैठा है !
बुझती नज़रों में कितने, तूफ़ान छिपाए बैठा है !

धनाभाव भी तोड़ न पाया साहस बूढी सांसों का, 
सीधी साधी आँखों में अभिमान छिपाए बैठा है !

जाने पर भी, उनके कर्जे ,मर के मिटा न पाएंगे  !
अपने पुरखों के कितने,अहसान छिपाए बैठा है !

कबसे बुआ नहीं आ पायीं अपने घर में रहने को,
अपने सर पर पापा के, भुगतान छिपाए बैठा है !

आस्तीन में रहने वालों से, थोड़ा हुशियार रहें
जाने कितने बरसों के अपमान छिपाए बैठा है !

दुश्मन शांत न सोने देगा, गद्दारों का ध्यान रहे,
क्या मालूम वो कितने इत्मीनान छिपाए बैठा है !

Wednesday, June 11, 2014

अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख ! - सतीश सक्सेना

ज्ञान सदा सम्मानित होगा खूब पुस्तकें पढ़ना सीख !
पुस्तक पढ़ने से पहले ही,बच्चे ध्यान लगाना सीख !

कड़ी धूप में, बहे पसीना, हार न माने, जीना सीख !
प्रतिद्वंदी फुर्तीला होगा , लेकिन पाँव बढ़ाना सीख !

हंसकर करें हमेशा स्वागत, मित्रों का अपने दरवाजे 
सारे धर्मों का,आदर कर,साथ बैठ कर,खाना सीख !

जब भी जीना लगे असंभव,ढृढ़ निश्चय ले आंसू पोंछ
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !

दुःख में कभी नहीं घबराना,अपने हाथ नहीं फैलाना
अगर याद ईश्वर की आये , माँ के पैर दबाना सीख !


Wednesday, November 13, 2013

तो हम होली दिवाली,माँ से मिलने घर गए होते -सतीश सक्सेना

अगर हम ऐसी वैसी धमकियों से, डर गए होते !
अभी तक दोस्तों के हाथ, कब के मर गए होते !

तेरे जज़्बात की हम को , अगर चिंता नहीं होती ,
तो हम होली दिवाली,माँ से मिलने घर गए होते !

अगर हम वाकई मन में ,यह शैतानी लिए होते !
तुम्हारे दिल  के , अंदेशे भी , पूरे कर गए होते !

अगर हमने भी डर के ऐसे, समझौते किये होते !
तो बरसों की मेरी मेहनत, कबूतर चर गए होते !

अगर हम  दोस्तों में ऐसे , कद्दावर नहीं  होते !
हमारे घर की दीवारें , वे काली कर गए होते !

Wednesday, October 16, 2013

खतरनाक काँटों का, ध्यान रहे बेटा - सतीश सक्सेना


16 अक्टूबर  पर :

कभी, अपना भी कुछ ,ख़याल रहे बेटा !

तुम्हीं से  खुशी है   
तुम्हीं से है  आशा !
तुम्हीं  से तो चेहरे   
पे रौनक, हमेशा  !
कठिन  हो समय 
तो न घबराना बेटा !
न अपमान औरों का, हो तुमसे बेटा !

तुम्हीं प्यार का
दूसरा नाम हो !
अपने नन्हे घरौंदे
की तुम जान हो !
ख़याल अपना,मेरे 
लिए रखना बेटा !  
समय कम बड़ों पर, न  सो जाना बेटा !

तुम्हीं मेरे जीवन 
की  पहचान हो !
तुम्हीं मेरे पुण्यों 
का परिणाम हो ! 
मेरे जीवन के मूल्यों 
का हो ध्यान बेटा !
खतरनाक  काँटों  से , सावधान  बेटा !

तुम्हीं मेरे मंदिर 
के इकले कन्हैया 
तुम्हीं नाव के अब 
बनोगे खिवैय्या !
अगर गहरे जाओ,
तो ध्यान रहे बेटा  !
पापा के गौरव का,  ख्याल  रहे  बेटा !

Monday, August 19, 2013

अब रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठे हैं -सतीश सक्सेना

ऐसे ही एक भावुक क्षण , निम्न कविता की रचना हुई है जिसमें एक स्नेही भाई और पिता की वेदना  का वर्णन किया गया है .....
बेटी की विदाई के साथ ही , उसका घर, मायके में बदल जाता है , हर लड़की के लिए और उसके भाई के लिए, एक कमी सी घर में हर समय कसकती है कि कहाँ चला गया इस घर का सबसे सुंदर टुकड़ा ...फिर एक मुस्कान कि हमारी लाडो अपने घर में बहुत खुश है ...  

हम दोनों जन्मे इस घर में 
औ साथ खेल कर बड़े हुए
अपने इस घर के आंगन में  
घुटनों बल, चलकर खड़े हुए
तू विदा हुई शादी करके 
पर इतना याद इसे रखना 
घर में पहले अधिकार तेरा,
मैं रक्षक हूँ , तेरे घर का  !
अब रक्षा बंधन के दिन पर , घर के दरवाजे , बैठे  हैं !

पहले  तेरे जन्मोत्सव पर
त्यौहार मनाया जाता था !
रंगोली  और  गुब्बारों से !
घरद्वार सजाया जाता था !
होली औ दिवाली उत्सव 
में, पकवान बनाये थे हमने 
लेकिन तेरे घर से जाते ही 
सारी रौनक ही चली गयी 
राखी के प्रति , अनुराग लिए , उम्मीद लगाए बैठे हैं  ! 

पहले इस घर के आंगन में

संगीत , सुनाई पड़ता था  !
मुझको घर वापस आने पर ,
ये घर रोशन सा लगता था !
झंकार वायलिन की सुनकर
मेरे घर में उत्सव लगता था 
जब से तू जिज्जी विदा हुई 
झाँझर पायल भी रूठ गयीं  
आहट  पैरों  की, सुनने  को, हम  कान  लगाए  बैठे  हैं  !

पहले घर में , प्रवेश करते ,

एक मैना चहका करती थी !
चीं चीं करती, अपनी  बातें 
सब मुझे सुनाया करती थी !
तेरे जाते ही चिड़ियों सी 
चहकार न जाने कहां गयी !
जबसे तू विदा हुई घर से , 
हम लुटे हुए से , बैठे हैं  !
टकटकी लगाये रस्ते में, घर के  दरवाजे  बैठे हैं !

पहले घर के,  हर कोने  में ,

एक गुड़िया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका 
को संग खिलाया करती थी
पापा की लाई चीजों पर 
हर बात पे झगड़ा करती थी 
जबसे गुड्डे, संग विदा हुई , 
हम  ठगे हुए  से बैठे हैं  !
कौवे की बोली सुननें को, हम  कान  लगाये बैठे हैं !

पहले इस नंदन कानन में

एक राजकुमारी रहती थी
हम सब उसके आगे पीछे 
वो खूब लाडली होती थी  
तब राजमहल सा घर लगता
हर रोज दिवाली होती थी !
तेरे जाने के साथ साथ ,
चिड़ियों ने भी, आना छोड़ा !
चुग्गा पानी को लिए हुए , उम्मीद  लगाए बैठे    हैं !

Monday, July 22, 2013

मानव वेश में अक्सर फिरें, शैतान दुनिया में -सतीश सक्सेना

अगर ताकत तुम्हारे पास, सब स्वीकार दुनिया में !
कभी मांगे नहीं मिलते ,यहाँ अधिकार, दुनिया में !

फैसलों की घड़ी आये ,तो अपनी समझ से लेना,
मदारी रोज लगवाते हैं, जय जयकार दुनिया में !

किताबें खूब पढ़ डालीं, मगर लिखा नहीं पाया कि
पर्वत भी लिया करते हैं अब, प्रतिकार दुनिया में !

इसी बस्ती में, मानव रूप , कुछ  शैतान  रहते हैं !
बड़े सज धज सुशोभित रूप में मक्कार दुनिया में !

अधिकतर गिरने वाले घर के, अन्दर ही फिसलते हैं !  
तुम्हारे हर कदम पर , ध्यान की दरकार, दुनिया में !

Tuesday, April 24, 2012

सब झूम उठे ....-सतीश सक्सेना


कुछ ऐसा आज हुआ यारो
पग जहाँ उठे,रंग बरस उठें 
कुछ ऐसा रंग चढ़ा मन पर , 
हम जहाँ उठे, सब झूम उठे 
कुछ मौसम ने अंगडाई ली, 
गुलमोहर ने रंग बरसाए !
कुछ यार हमारे आ बैठे , महफ़िल में सुर झंकार उठे  !

दिल करे नाचने को यारों, 
माहौल सुगन्धित हो जाए  
जीवन के सुंदर पन्नों  में ,
चन्दन की गंध समा जाये 
मधु कलशों से अमृत छलके, 
मन वृन्दावन सा हो जाए !
बचपन से कभी जो सुन न सके, वे साज बजाए झूम उठे !

जीवन की सुंदर नगरी में ,
यह पहला कदम उठाया है 
अब साथ तुम्हारा पाते ही 
मन में उत्साह समाया है !
अब दिन भर तो रंग खेलेंगे  
हर रात मनेगी  दीवाली !
पायल छमछम, तबला  ठुमके, सब यार हमारे झूम उठें !

रो रोकर दुनिया जीती है 
हम हँसना उसे सिखायेंगे 
नफ़रत की जलती लपटों 
पर गंगा जल ही बरसाएंगे  
शीतल जल की फुहार बरसे ,
जब तपती धरती पर यारो 
रजनीगंधा के साथ साथ , घर का गुलमोहर महक  उठे !

Monday, March 5, 2012

इस होली पर क्यों न साथियो,आओ सबको गले लगा लें -सतीश सक्सेना

अपने घर में ही आँखों पर 
कैसी पट्टी , बाँध रखी है  ! 
इन  लोगों ने जाने कब से ,
मन में रंजिश पाल रखी है !
इस होली पर क्यों न सुलगते,
दिल के ये अंगार बुझा दें !
मुट्ठी भर कुछ रंग,फागुन में, अपने घर में भी, बिखरा दें 

मानव जीवन पाकर कैसे , 
बुद्धि गयी है,बिलकुल मारी ! 
खनक चूड़ियों की सुनते ही 
शंख ध्वनि से, लगन हटायी !
अपनों की वाणी सुनने की,
क्यों न आज से चाह जगा लें !
इस होली पर माँ पापा की ,चरण धूल को शीश लगा लें !

बरसों मन में गुस्सा बोई
ईर्ष्या  ने ,फैलाये  बाजू ,
रोते  गाते,हम लोगों ने 
घर बबूल के वृक्ष उगाये 
इस होली पर क्यों न साथियों,
आओ रंग गुलाल लगा लें ?
भूलें उन कडवी बातों को, आओ  अब  घर द्वार सजा लें !!

कितना दर्द दिया अपनों को 
जिनसे हमने चलना सीखा  !
कितनी चोट लगाई उनको 
जिनसे हमने,हँसना सीखा  !
स्नेहिल आँखों  के  आंसू , 
कभी नहीं जग को दिख पायें !
इस होली पर,घर में आकर,कुछ गुलाब के फूल चढ़ा लें !

जब से घर से दूर  गए हो ,
ढोल नगाड़े , बेसुर लगते !
बिन प्यारों के,मीठी गुझिया,
उड़ते रंग, सब फीके लगते !
मुट्ठी भर गुलाल फागुन में, 
फीके चेहरों को महका  दें !
सबके संग ठहाका लेकर,अपने घर को स्वर्ग  बना लें !

Thursday, February 23, 2012

नेह निमंत्रण -सतीश सक्सेना

आशीर्वाद दें, इन बच्चों को कि वे दोनों मिलकर एक सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकें !
आप सबको आदर सहित......

इस नेह पत्रिका के जरिये 
आमंत्रण भेज रहा सब को !
अंजलि भर, आशीषों की है 
बस चाह, हमारे बच्चों को !
दिल से निकले आशीर्वाद ,
दुर्गम पथ  सरल  बनायेंगे  !
विधि-गौरव के नवजीवन में, सौभाग्य पुष्प बिखराएंगे !

दिव्या सतीश का कुल गौरव 
एक विदुषी को घर लाया है
विमला के घर, स्नेह सहित ,
विश्वास ,राज  का पाया है !
अब हाथ पकड़ विधि का गौरव,
कुल का सम्मान बढ़ाएंगे !
जिस नेह को दुनिया याद रखे, वह प्यार  सभी में बाँटेंगे !

चंदा कुटीर में गरिमा और,
हँसते इशान,रोली, अक्षत  
अर्चना थाल,नूपुर, कंगन ,
जलकलश,खड़े दरवाजे पर 
विधि रथ आने पर स्वागत में, 
ये सबसे  पहले  जायेंगे  !
गौरैया कोयल चहक चहक कर, स्वागत गीत सुनायेंगे  !

आशीष नेह से दें इनको, 
समृद्ध,यशस्वी हों दोनों !
पैरों की आहट से इनके ,
झंकार उठे , वीरानों में  !
गुलमोहर के वृक्षों ने भी,
उस दिन को इकट्ठे फूल किये 
कहते  हैं, उस दिन झूम झूम, फूलों को वे  बरसाएंगे  !



Saturday, August 20, 2011

कौवे की बोली सुनने को, हम कान लगाये बैठे हैं - सतीश सक्सेना

शुरू से ही पुत्री के प्रति, अधिक संवेदनशील रहा हूँ , दिन प्रति दिन, बड़ी होती पुत्री की विदाई याद कर, आँखों के किनारे नम हो जाते हैं !स्नेही पुत्री के घर में न होने की कल्पना ही, दिल को झकझोरने के लिए काफी है !  
ऐसे ही एक क्षण , निम्न कविता की रचना हुई है जिसमें एक स्नेही भाई और पिता की वेदना  का वर्णन किया गया है .....  

जन्मे दोनों इस घर में हम 
और साथ खेल कर बड़े हुए

इस घर के आंगन में दोनों 
घुटनों बल चलकर खड़े हुए
घर में पहले अधिकार तेरा, 
हम रक्षक है तेरे घर के !
अब रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठे  हैं !

पहले  तेरे जन्मोत्सव पर
त्यौहार मनाया जाता था,
रंगोली  और  गुब्बारों से !
घर द्वार सजाया जाता था
तेरे जाने के साथ साथ,
घर की रौनक भी चली गयी !
राखी के प्रति, अनुराग लिए, कुछ याद दिलाने बैठे हैं  !

पहले इस घर के आंगन में
संगीत , सुनाई पड़ता था  !
झंकार वायलिन की सुनकर 
घर में उत्सव सा लगता था
जब से जिज्जी तू विदा हुई,
झाँझर पायल भी रूठ गयीं ,
छम छम पायल की सुनने को, हम आस लगाए बैठे  हैं !

पहले घर में , प्रवेश करते ,

एक मैना चहका करती थी
चीं चीं करती,  मीठी  बातें
सब मुझे सुनाया करती थी
जबसे तू  विदा हुई घर से,
हम लुटे हुए से बैठे हैं  !
टकटकी लगाये रस्ते में, घर के  दरवाजे  बैठे हैं ! 

पहले घर के हर कोने  में ,

एक गुड़िया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका 
को संग खिलाया करती थी
जबसे गुड्डे संग विदा हुई , 
हम  ठगे हुए से बैठे हैं  !
कौवे की बोली सुननें को, हम  कान  लगाये बैठे हैं !

पहले इस नंदन कानन में

एक राजकुमारी रहती थी
घर राजमहल सा लगता था
हर रोज दिवाली होती थी !
तेरे जाने के साथ साथ ,
चिड़ियों ने भी आना  छोड़ा !
चुग्गा पानी को लिए हुए, उम्मीद  लगाए बैठे    हैं !

Tuesday, August 9, 2011

बूढ़ा वट वृक्ष -सतीश सक्सेना

मित्रो,
मॉल  में घूमते हुए, आपका ध्यान, मैं  बाहर खड़े, सूखते वट वृक्ष और जीर्ण कुएं की ओर दिलाना चाहता हूँ जो इस विशाल एयर कंडीशंड बिल्डिंग बनने से पहले, आपके लिए छाया और पानी देने का एकमात्र स्थान था  ! याद करें, हमारे बचपन में, शीतल पानी और छाया केवल वहीँ मिलती थी  ! 
आजकल  वहां कोई नहीं जाता   !

क्या कभी आपने  कमजोर होते, माता पिता के बारे में सोंचने  की  जहमत उठाई है कि इस उम्र में, बिना आपके, वे अपना सही इलाज़ कैसे कर पा रहे होंगे ! 

क्या आपने सोचा है कि  उनके  जैसे , कमजोर असहायों वृद्धों  को, अस्पताल, जिनका उद्देश्य मात्र पैसे कमाना है, तक पंहुचना, कितना तकलीफदेह और भयावह होता होगा  !

                              बीमार हालत में, दयनीय आँखों से, डाक्टर को ताकते , ये वही हैं, जिनकी गोद में आप सुरक्षित रहते हुए, विशाल वृक्ष बन चुके हो और ये लोग, उस ताकतवर वृक्ष से दूर ,निस्सहाय, गलती हुई जड़ मात्र , जिन्हें बचाने वाला कोई नहीं !
मात्र आपकी निकटता से, यह अपने आखिरी समय में, सुरक्षित महसूस करेंगे !
इस समय इन्हें आपकी आवश्यकता है ......

अंतिम समय में इन्हें सम्मान के साथ विदा करें  जो इनका हक़ है यकीन मानें, आपके पास बैठने मात्र से, यह शांति से अपनी ऑंखें बंद कर लेंगे !

                                 खैर ! अच्छे वैभवयुक्त जीवन के लिए, आपको हार्दिक शुभकामनाएं ! 

Monday, August 23, 2010

बहिन के प्यार को न भूलें ?? - सतीश सक्सेना

रक्षा बंधन के त्यौहार पर बहिन आपने भाई की रक्षा की कामना करते हुए दीर्घायु के लिए कामना करती है कि मेरा  भाई सुरक्षित रहे जिससे इस दुनिया में मैं अकेली महसूस न करुँ ! परस्पर एक दूसरे की दीर्घायु की कामना करने की याद दिलाता यह पर्व, बहिन भाई के मध्य एक महत्वपूर्ण गाँठ का काम करता रहा है !  
विवाह के बाद अपने भाई से दूर चली गयी बहिन के लिए, यह दिन अपने भाई को याद करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है ! इस रक्षा सूत्र के जरिये बहिन व्रत रख कर ,अपना प्यार व्यक्त करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करती है ,कि मेरा भाई सुरक्षित रहे और मेरा विश्वास है कि हर बहिन अपने दिल की गहराई से यह चाहती है !मगर आज के समय में कितने भाई ऐसे हैं जिन्हें अपनी बहिन के प्यार में लिपटे इस कच्चे धागे का महत्व पता है ! 


शायद हमें यह दिन, बहिन के प्यार की कीमत के रूप में, बहिन को दिए जाने वाले चंद रुपयों के कारण "खर्चे का दिन "के रूप में ही याद रहता है  !  
परस्पर कम होते स्नेह के इन बुरे दिनों में, भाई को इसका महत्व सिर्फ चंद रुपयों के रूप में ही याद न रहे तभी यह पौराणिक समय से चलता आया पर्व सार्थक होगा !      

Sunday, June 1, 2008

पुत्र को -सतीश सक्सेना


पिता पुत्र का रिश्ता तुमको
कैसे शब्दों में समझाऊँ !
कुछ रिश्ते अहसासों के हैं
समझाने की बात नही !
जीवन और रक्त का नाता, 

नहीं बनाये से बनता है
यह तो विधि की देन पुत्र, समझाने की है बात नहीं

अगर तर्क की करें तो ,

सत्य हमेशा ध्यान रहे  
जन्मदायनी माता है ,
पिता कष्ट नाशक तेरा
पुत्र हेतु मानव रूपों में, 

माता पिता मिले ऐसे
शास्त्र और वेदों ने इनको, इष्ट सरीखा माना है

और पिता के लिए, पुत्र ! 
तुम आँखों के तारों जैसे

बिन जीवन संसार मध्य  
होता है, अंधकार जैसे !

इस कठोर संसार मध्य, 
कष्टों के झंझावातों में
वृद्ध पिता के लिए सहारा होता निज औलादों का !

अगर बात कर्मों की हो ,
तो पुत्र याद रखना इसको
छूटे कार्य पिता अपने के
पूर्ण करो संकल्प सदा ले
करो सार्थक नाम हमेशा, 

आशा और विश्वास लिए !
कुलगौरव कुलदीपक अपने कुल का रखना मान यही !

मेरे कुल के गौरव ,
तुमको देता आशीर्वाद यही
प्रखरबुद्धि और दृढनिश्चय से
पार करो , जीवन सागर !
आशीर्वाद पिता का,मां का 

प्यार , साथ में लेकर तुम
करो प्रकाशित सारा जग तो जीवन सफल हमारा हो !

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