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Saturday, January 5, 2019

अब एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में -सतीश सक्सेना

खांसते दम ,फूलता है 
जैसे लगती जान जाए 
अस्थमा झकझोरता है, 
रात भर हम सो न पाए
धुआँ पहले खूब था अब  
यह धुआँ गन्दी हवा में 
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने 
दीप आँखों में जले,अब 
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !

धूर्त,बाबा बन बताते 
स्वयं को ही राज्यशोषित 
और नेता कर रहे नेतृत्व  
को अवतार घोषित ! 
चोर सब मिल गा रहे हैं 
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े 
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक 
देख ठट्ठा मारते, अब 
राम बंधक बन चुके हैं , कातिलों के शहर में !

सुगन्धित खुशबू बिखेरें
फूल दिखते ही नहीं हैं
जाने कब भागीरथी भी
मोक्षदायिनि सी रहीं हैं 

कृष्ण की अठखेलियाँ भी 
थीं, कभी कृष्णा किनारे
उस जगह रोती हैं गायें , 
अपने केशव को पुकारें 
किस गली खोये स्वर्ण
अवशेष  मेरे देश के  ?
हाँ , एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में !

Thursday, November 8, 2018

कल दिवाली मन चुकी है ,जाहिलों के शहर में -सतीश सक्सेना

खांसते दम ,फूलता है 
जैसे लगती जान जाए 
अस्थमा झकझोरता है, 
रात भर हम सो न पाए
धुआं पहले खूब था अब  
यह धुआं गन्दी हवा में 
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने 
दीप आँखों में जले,अब 
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !

धूर्त, बाबा बन बताते 
स्वयं को ही राज्यशोषित 
और नेता कर रहे हैं ,  
स्वयं को अवतार घोषित 
चोर सब मिल गा रहे हैं 
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े 
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक 
देख ठट्ठा मारते, अब 
राम बंधक बन चुके हैं , जाहिलों के शहर में ! 

Sunday, July 29, 2018

आसान यूरोप यात्रा -सतीश सक्सेना

इस बार यूरोप यात्रा का संयोग गौरव की जर्मनी पोस्टिंग के कारण हुआ उसकी इच्छा थी कि पापा और माँ मेरे पास लम्बे समय आकर रहें सो पहली बार घर को लगभग ढाई महीने के लिए छोड़ने का फैसला किया पिछली पोस्ट पर मित्रों का अनुरोध था कि इस यात्रा का विवरण लिखूं सो यह पोस्ट आवश्यक हो गयी है !
यूरोपियन ढाबा पर जौ का रस, मशहूर ब्रेड, ब्रीज़ल के साथ !

-विदेश यात्रा को अधिकतर लोग हौआ मानते हैं और उस पर अक्सर बात करने से या जाने की योजना बनाने से झिझकते ही नहीं बल्कि सोंचने में भी कतराते हैं और इसके पीछे धन का अभाव न होकर अक्सर आत्मविश्वास की कमी ही होती है कुछ अन्य कारण निम्न हैं  ....

- पहला कारण विदेशियों से कम्युनिकेशन में आत्मविश्वास का न होना, अधिकतर का मानना है कि उनकी बेहतरीन फर्राटेदार इंग्लिश समझना और बेहतरीन इंग्लिश में बात करना बहुत मुश्किल है जबकि वास्तविकता इसके उलट है लगभग पूरे विश्व में सामान्य विदेशियों की इंग्लिश काफी कमजोर है अधिकतर जगह पर वे टूटी फूटी इंग्लिश में और हावभाव के साथ ही संवाद करते हैं और तो और हमारी मैडम एयरपोर्ट से लेकर शानदार मॉल तक में धड़ल्ले से अपनी हिंगलिश और हिंदी मिलाकर चमत्कृत करने वाली देसी अंग्रेजी में जर्मन लोगों को समझाने में कामयाब रहीं हैं !

-झिझक का दूसरा कारण विदेश यात्रा में अधिक खर्चे का अनुमान होना होता है जबकि यह कई बार देशी यात्रा से भी कम बैठता है ! दिल्ली से पेरिस या म्यूनिख का एक व्यक्ति के आने जाने का खर्चा लगभग 36000/- है और लगभग 5000 रूपये प्रति दिन में अच्छा होटल मिल जाता  है जिसमें एक समय का खाना शामिल होता है ! इस प्रकार एक मध्यम आय वाले पति पत्नी, सवा लाख रूपये में, ५ दिन के लिए रोम जाकर बापस आ सकते हैं !

-विश्व के किसी भी भाग की यात्रा, बिना जानकारी करना पहले असंभव थी जबकि अब इन यात्राओं को गूगल ने बेहद आसान बना दिया है, अगर स्मार्ट फोन आपके पास है तब आप कहीं किसी शहर में खो नहीं सकते, जीपीएस टेक्नोलॉजी के जरिये आपकी लोकेशन हर वक्त आपके पार्टनर के पास होती है इसके लिए आपने अपने परिवार के सदस्यों या मित्रों को अपनी लाइव लोकेशन शेयर करनी भर होती है, आजकल हर व्यक्ति को जीपीएस सिस्टम की जानकारी रखना आवश्यक है !


-आपके शहर से हजारों किलोमीटर दूर अनजान शहर में आपको उस शहर में कदम रखने से पहले, गूगल मैप के जरिये ,अपने बस स्टॉप और बस नंबर तक का पता चल जाता है और कितने स्टॉप बाद उतर कर किस दिशा में, कितने कदम चलना है गूगल मैप की मदद से आप अपने गंतव्य पर आसानी से पंहुच जाते हैं !

-अपना टिकिट अपने मोबाइल पर घर बैठे ऑनलाइन खरीद लीजिये और जहाँ चाहे यात्रा करिये कोई चेक करने नहीं आता न कहीं कोई रेलवे टिकिट कलेक्टर जैसा कोई इंसान दिखता, हर जगह एक भरोसा सा महसूस होता है कि आप भले इंसान हैं और चोरी नहीं कर सकते ! अगर किसी वीरान बसस्टॉप या ट्राम पर खड़े हैं तो टिकिट आपको अपने मोबाइल पर खरीदने की सुविधा है ! 

-हर सड़क पर पदयात्रियों के फुटपाथ , साइकिल के लिए अलग ट्रेक बना है ! पैदल चलते व्यक्ति को सड़क पार करते देख गाड़ियां जबतक इंतज़ार करती हैं जबतक वह इंसान सड़क पार न कर ले ! मोहल्ले में कोई शोर शराबा नहीं लेट इवनिंग में आप घर में तेज आवाज में टीवी अथवा ड्रिल से दीवार में या लकड़ी में छेद नहीं कर सकते शोर मचाना या जोर जोर से बोलना  असभ्यता की निशानी माना जाता है ! नियम पालन यहाँ का समाज अपनी जिम्मेदारी समझ कर पालन करता है !
यूरोप के विभिन्न देशों के बीच सीमा नहीं है हर व्यक्ति बिना किसी परमिट के किसी भी देश में जाने को स्वतंत्र है !

-पूरा वातावरण बेहद स्वच्छ है धूल उड़ते कहीं नहीं दिखती , इस बार मैं एक सफ़ेद शर्ट कई दिन से पहने हूँ कॉलर गंदा ही नहीं होता ! ठन्डे और साफ़ वातावरण में सुबह सुबह इसार नदी के किनारे दौड़ने का आनंद ही कुछ और है काश विश्व के देशों की सीमाएं समाप्त हो जाएँ और हम सब एक साथ मिलकर हंसना रहना सीख सकें !

कितना सुंदर सपना होता 
पूरा विश्व  हमारा  होता । 
मंदिर मस्जिद प्यारे होते 
सारे  धर्म , हमारे  होते ।  
कैसे बंटे,मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत । 
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।  

काश हमारे ही जीवन में 
पूरा विश्व , एक हो जाए । 
इक दूजे के साथ  बैठकर,
बिना लड़े,भोजन कर पायें ।
विश्वबन्धु,भावना जगाने, 
घर से निकले मेरे गीत । 
एक दिवस जग अपना होगा,सपना देखें मेरे गीत । 

Sunday, November 5, 2017

ज्वालामुखी मुहाने जन्में , क्या चिंता अंगारों की ! -सतीश सक्सेना

पेट्रोलियम मंत्रालय के तत्वावधान में बनायी गयी सोसायटी PCRA द्वारा आज दिल्ली में नेशनल साइकिल चैम्पियन शिप का आयोजन किया गया जिसमें बिना किसी तैयारी के मैंने भी 30 km रेस में डरते डरते भाग लिया, तैयारी की हालत यह थी कि 15 सितम्बर के बाद एक भी दिन साइकिल को हाथ भी नहीं लगाया था फॉर्म भरते हुए अपना रजिस्ट्रेशन रोड साइकिल के रूप में कराया था जबकि मुझे यही नहीं पता था कि मेरी साइकिल रोडी नहीं बल्कि हाइब्रिड क्लास की है जो रोड साइकिल के मुकाबले काफी स्लो होती है !

आज मुझे घर से सुबह 4 बजे, लगभग 17 km साइकिल चलाकर जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम जाना पड़ा साइकिल रेस की कोई समझ न होने के कारण तनाव में था कि कहीं इन स्पीडस्टर के बीच अपने आपको चोट न लगा लूँ !
स्टार्ट लाइन पर मेरे साथ खड़े संजीव शर्मा ने कई उपयोगी सुझाव दिए जैसे साइकिल की सीट एडजस्ट करायी एवं रेस के बीच ब्रेक का उपयोग कम से कम करने की सलाह शामिल थी !

जब रेस शुरू हुई तब पहले लैप (9 Km) में आत्मविश्वास काफी कम था एवं डिफेंसिव मूड में था और अपने को समझा रहा था कि पहले लैप में थकना नहीं सो अन्य सभी साइकिलिस्ट को अपने से तेज और अनुभवी मानते हुए स्पीड अपेक्षाकृत कम रखी मगर लगभग ५ km बाद अपने अंदर का मैराथन रनर जग गया था जो मुझे कह रहा था कि तुम और तेज चल सकते हो फिर घबरा क्यों रहे हो स्पीड बढ़ाओ सतीश ये आसपास चलते हुए रेसर्स में बहुत कम लोग इतना दौड़ते होंगे जितना तुम दौड़ते हो ! तुम नॉन स्टॉप ढाई घंटा दौड़ते हो जबकि यह दौड़ सिर्फ 30 km की है और वह भी साइकिल की , शर्म करो !

कई बार स्वयं धिक्कार काम कर जाता है और मैंने डरते डरते तेज साइकिल सवारों के बीच अपनी स्पीड बढ़ानी शुरू की तो लगा कि मैं बिना हांफे चला पा रहा हूँ ! तेज चलते हुए नौजवान साइकिल सवारों को पीछे छोड़ते हुए महसूस किया कि मैराथन ट्रेनिंग ने मेरे पैरों को इस उम्र में भी काफी ताकतवर बना दिया है और यह महसूस करते ही मैंने अपनी जीपीएस वाच पर नज़र डाली जहाँ स्पीड पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ रही थी भरोसा नहीं हो रहा था कि अपने जीवन में कभी ग्रुप में भी साइकिल न चलाने वाला मैं लगभग 30 km प्रति घंटे की दर से साइकिल चला रहा था !

और फिर आखिर तक यह स्पीड कम नहीं हुई, चीयर करते हुए लोगों के बीच जब फाइनल टाइमिंग स्ट्रिप से गुजरा तो मैं अपना सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड बना चुका था !


अपने ६३ वर्ष में, आखिरी स्थान पर आने की उम्मीद लिए मैं, रेस ख़त्म होने पर 27 Km की दूरी 57:33 मिनट में तय करते हुए कुल 376 रेसर्स में 163वें स्थान पर रहा !

प्यार बाँटते, दगा न करते , भीख न मांगे दुनिया से !
ज्वालामुखी मुहाने जन्में , क्या चिंता अंगारों की ! -सतीश सक्सेना

Saturday, November 4, 2017

अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा कराकर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना

आजकल कुछ लोग सोशल मीडिया पर मुहिम चला रहे हैं कि दिल्ली में बढे हुए प्रदूषण की वजह से , सक्षम सैक्लोथॉन एवं एयरटेल दिल्ली हाफ मैराथन को कैंसिल कर दिया जाय ! उनका यह सोंच है कि इससे एथलीट की सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव पडेगा !
अफ़सोस यह है कि अक्सर ऎसी मुहिम चलाने वालों को एथलीट की मानसिक और शारीरिक अवस्था के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है मगर दिमागी बम चलाने वाले सलाह हर जगह देते हैं !
कल मुझे सक्षम पेडल साइक्लोथॉन के आयोजकों ( Saumjit )द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाने का न्योता मिला था जहाँ मुझसे पूंछे गए तमाम प्रश्नों में से एक प्रश्न यह भी था कि 
क्या आप 63 वर्ष की उम्र में, इस प्रदूषण में साइकिल चलाना, अपने स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं मानते  ? 
मेरा जवाब था कि दिल्ली का प्रदूषित वातावरण में किसी भी यूरोपियन अमेरिकन के लिए हानिकारक हो सकता है क्योंकि उनका शरीर प्रदूषण बर्दाश्त नहीं कर सकता और न वे इस वातावरण के लिए अभ्यस्त हैं , हम भारतीय शुरू से इसी वातावरण केआदी हैं और हमारा इम्यून सिस्टम इसके प्रतिरोध के लिए बेहद मजबूत है सो हमारे ऊपर इसका कोई प्रभाव नहीं पडेगा !
और यही प्रश्न कल शाम मेरे मोबाइल पर रेडिओ सिटी से रेडिओ जॉकी नितिन द्वारा अचानक कॉल करके पूंछा गया तो उन्हें भी यही जवाब दिया , कि मैं 63 वर्ष की उम्र में कल 30 किलोमीटर रेस में भाग लूँगा और शान से पूरी भी करूंगा निश्चिन्त रहें मुझे प्रदूषण की कोई चिंता नहीं इसकी चिंता उन आलसियों को है जो मेडिकल बिजनिस की सलाह लेकर विटामिन खा कर अपने को स्वस्थ रखने का दावा करते हैं , मैं अगर दौड़ते दौड़ते मृत्यु को प्राप्त हुआ तब अपने को बेहद सौभाग्य शाली मानूंगा कि मैं अकर्मण्य मौत नहीं मरा !
मुझे दिल्ली सेक्लोथॉन का सबसे यंगेस्ट साइकिलिस्ट का ख़िताब देते हुए नितिन ने मुझे 1000 रूपये का वाउचर देने की घोषणा की जो यकीनन मेरे जैसे नवोदित साइकिलिस्ट के लिए उत्साहवर्धक था !
सो धन्यवाद सक्षम पेडल और रेडिओ सिटी को जिन्होंने मुझे अपनी बात कहने का मौक़ा दिया कि मैं अपनी बात आम जनता को पंहुचा सकूँ !
कल तमाम प्रदूषण की परवाह न करते हुए 30 km अमेच्योर साइकिलिंग में हिस्सा लूंगा और इस विश्वास के साथ लूंगा कि मेरे स्वास्थ्य पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पडेगा बल्कि इम्यून सिस्टम और मजबूत होगा !

कुछ वादे करके निकला हूँ अपने दिल की गहराई से
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा कराकर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना 
#WillRunADHM , 

Thursday, May 4, 2017

उद्दंड राज्य और भयभीत मानवता -सतीश सक्सेना

-नार्थ कोरिया ने इज़राइल को कहा है कि अगर भविष्य में उसके महान नेता के खिलाफ एक भी शब्द बोला तो उसे बिना दया के 1000 गुनी भयानक सजा दी जाएगी अतः भविष्य में अपना मुंह सोंच समझ कर खोले और अमेरिका की चमचा गीरी न करे 

-नार्थ कोरिया ने अमेरिकन विमानवाहक युद्धक बेडा को समुद्र में डुबा देने की धमकी दी  उसने कहा की पूरा विश्व अमेरिका के इस अविजित और घमंडी एयरक्राफ्ट कैरियर को लोहे के कबाड़ में बदलते हुए समद्र में डूबते देखेगा और वह यह भी देखेगा कि कैसे पूरा देश जमीन से गायब हो जाता है  !

-नार्थ कोरिया की विज्ञप्ति के अनुसार हम न केवल साउथ कोरिया में अमेरिकी मूवमेंट पर नजर रखे हुए हैं बल्कि अमेरिकी मुख्य भूमि के सामरिक अड्डों पर भी हमारे परमाणु मिसाइल हमला करेंगे हम उन्हें बताएँगे कि अमेरिकन राजधानी पालक झपकते ही कैसे राख के ढेर में बदलती है ! 

कहते हैं कि युद्ध के समय, अमेरिका का न्यूक्लियर पॉवर्ड निमित्ज़ क्लास विमानवाहक विनाशक बेडा, विश्व के अच्छे बड़े देश से निपटने के लिए लिए अकेला काफी है , इस एयरक्राफ्ट कैरियर के ग्रुप में ,इसकी सुरक्षा और दुश्मन पर अटैक करने के लिए इसके डेक पर 90, F-18 सुपर होर्नेट अटैक एयरक्राफ्ट न्यूक्लिअर वेपन एवं मिसाइल के साथ तैनात रहते हैं !

जब किसी विमानवाहक को युद्ध में भेजा जाता है तब उसके साथ सुरक्षा एवं अग्रिम अटैक करने के लिए , स्ट्राइक ग्रुप साथ
चलता है जिसमें बेहद शक्तिशाली एक या दो न्यूक्लिअर पनडुब्बियां, जिसमें जमीन पर 1700 km तक मार करने वाली 154 टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल या उनके स्थान पर न्यूक्लियर वार हेड्स युक्त इंटरकांटिनेंटल बैलस्टिक मिसाइल लोडेड रहती हैं !


एयरक्राफ्ट कैरियर के साथ ही दो क्रूज़र और दो या अधिक डिस्ट्रॉयर साथ चलते हैं , यह सब टॉमहॉक क्रूज़ गाइडेड मिसाइलों से लेस होते हैं , शिप से जमीन पर मार करने वाली यह मिसाइल फायर करने के बाद 2500 km तक मार करने में सक्षम एवं पारम्परिक बमों अथवा न्यूक्लियर वॉर हेड से लोडेड होती हैं !यह डेस्ट्रॉयर एजिस राडार मिसाइल डिफेन्स टेक्नोलॉजी से युक्त हैं जो हमलावर मिसाइल को पहचानकर ध्वस्त करने के लिए मशहूर है !

अटॉमिक आईसीबीएम से लैस,विश्व के सबसे शक्तिशाली युद्धक एयरक्राफ्ट कैरियर को डुबाने की किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी मगर नार्थ कोरिया का आत्मविश्वास पूरी दुनिया को चौंकाने के लिए काफी है !


दो न्यूक्लियर देशों में आजतक युद्ध नहीं हुआ इसीलिए दुनिया सुरक्षित रही है , मगर हाथ में परमाणु बेम लिए हुए अगर कोई पागल व्यक्ति तानाशाह बन जाए तो विश्व पर मौत के गहरे बादल मंडराते नजर आते हैं ! यह समय ऐसा ही है  ....

अपने अपने प्रभामंडल के नशे में डूबे दो जननायक जिन्हें पहली चिंता अपने लोगों के जीवन की करनी चाहिए थी , झाग उगलते हुए , हाथ में हाइड्रोजन बम और मिसाइल लिए मानवता को नष्ट करने की धमकी दे रहे हैं ताकि उनका गर्व सुरक्षित रहे !
प्रकृति इन्हें पैदा करने की जगह बाँझ होती तो क्या इससे अधिक बुरा होता !

Wednesday, February 24, 2016

धीर और गंभीर पदों के, आहट की पहचान नहीं है -सतीश सक्सेना

सबके मन में ही बसते हैं 
गूगल से साभार 
वे समग्र शास्वत आते हैं
मुरझाये मानव,जीवन में
गीतों का झरना लाते हैं
घने अँधेरे पर जाने कब ,
हौले हौले छा जाते हैं !
किसे ढूँढ़ते चित्र बनाये

लाखों देव देवताओं में ,
दिव्य और विश्वस्त रूप की, मानव को पहचान नहीं है !

उनके आने से पहले ही
जग में कोलाहल आ जाता
उनके चलने से पहले ही,
धरती पर योवन आ जाता
उनकी मद्धम गति से दुनियां
का जीवन रौनक पा जाता
किसे अर्ध्य देने जाती हो
स्वप्नपुरुष की अनदेखी कर
सूर्य किरण के रथ चिन्हों की, तुमको भी पहचान नहीं है !

अगर तेज को सह न पायीं
आँखें बंद नहीं करनी थीं !
अर्ध्य नहीं दे पायीं जल का
तो भी पीठ नहीं करनी थी !

देवपुरुष को आगे पाकर
पुष्पांजलि भेंट करनी थी
आकर  चले गए द्वारे से
ये  कैसा आवाहन तेरा !
धीर और गंभीर पदों के, आहट की पहचान नहीं है !

जीवन के सब चक्र उलझते
उनके असमय सो जाने पर ,
फुलझड़ियाँ बरसें आँगन में
रोज सुबह उनके जगने पर
दिव्य पुरुष के आसानी से
दर्शन सुलभ नहीं मानव को
कष्ट और निज मर्यादा का
कितना ही अहसास रहे पर
अवमानना प्यार की करके , कोई भी परिहार नहीं है !


Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने इस गाँव में,कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते औ ज्वार की रोटी
किसने मज़दूर के घर,खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ चलाना भी इन गुलाबों को 
आज भौंरों के बदन में , चुभे भाले देखे !

कैसे औरों का गिरेबान दिखाते हाक़िम  
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरसती है,जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे,देश में  नाले देखे !

Sunday, December 7, 2014

दुखद संक्रमण काल, तुम मुझे क्या दोगे - सतीश सक्सेना

समय प्रदूषित, लेकर आये,  क्या दोगे ?
कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ?

दैत्य , शेर , सम्राट 
ऐंठ कर , चले गए !
शक्तिपुरुष बलवान

गर्व कर  चले गए ! 
मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, 
तुम मुझे क्या दोगे ?  
हँसता काल विशाल, तुम मुझे क्या दोगे ?

मैं था ललित प्रवाह 
स्वच्छ जल गंगे का 
भागीरथ के समय 
बही, शिव गंगे का !
किया प्रदूषित स्वयं,
वायु, जल, वृक्षों को ?
कालिदास संतान ! तुम मुझे  क्या  दोगे ?

अपनी तुच्छ ताकतों 
का अभिमान लिए !
प्रकृति साधनों का 
समग्र अपमान किये  
करते खुद विध्वंस, 
प्रकृति संसाधन के !
धूर्त मानसिक ज्ञान, तुम मुझे क्या दोगे !

विस्तृत बुरे प्रयोग 
ज्ञान संसाधन  के  !
शिथिल मानवी अंग
बिना उपयोगों  के !
खंडित वातावरण, 
प्रभा मंडल  बिखरा ,
दुखद संक्रमण काल, तुम मुझे क्या दोगे !

यन्त्रमानवी बुद्धि , 
नष्ट कर क्षमता को,
कर देगी बर्बाद ,
मानवी प्रभुता को !
कृत्रिम मानव ज्ञान, 
धुंध मानवता पर !
अंधकार विकराल, तुम मुझे क्या दोगे !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !  
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे ?

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन गीत लिखे हैं , निर्धन और अनाथों पर, 
जाने पर मेरे  गीतों के , दावे दार संभाल सकोगे  ?

जीवन भर तुम रहे साथ में,ऊँगली पकडे पापा की  
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हँस हँस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार संभाल सकोगे ?

Thursday, July 10, 2014

कैसे कैसे लोग भी, गंगा नहाये इन दिनों ! ! -सतीश सक्सेना

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !

झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,
कैसे कैसे लोग भी , गंगा  नहाये इन दिनों !

सैकड़ों बलवान चुनकर , राजधानी आ गए !
आप संसद के लिए, आंसू बहायें इन दिनों !

देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों !

ये वही नाला है जमुना नाम था,जिसके लिए, 
साफ़ करने के लिए,चलती हवायें इन दिनों !

Monday, June 9, 2014

इंतज़ार है, क्षितिज में कबसे, काले, घने, बादलों का

इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे,काले घने,बादलों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये, पाठ जमीं पर रहने का !

गर्म  हवा के लगे, थपेड़े, 
वृक्ष न मिलते राही  को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल 
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के, 
सीना जलता जननी  का  ! 
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !

चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों   से !
पीने का जल,जहर बनाये   
मानव  अपने  हाथों  से  !
डेली न्यूज़ के सौजन्य से , अच्छा लगता है जब लोग
बिना भेजे, रचना को छपने योग्य समझे !आभार !
मां के गर्भ को खोद के ढूंढे ,
लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !

उसी वृक्ष को काटा हमने   
जिस आँचल में,  सोते थे ! 
पृथ्वी  के आभूषण, बेंचे 
जिनमें  आश्रय  पाते  थे !
मूर्ख मानवों की करनी से, 
जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन,  बुझाने का !

जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले   
हमसे प्यार , चाहती  थी !
दर्द  से तडप रही मां घर में, 
देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !

जल से  झरते, झरने सूखे 
नरम मुलायम पत्ते, रूखे 
कोयल की आवाज़ न आये 
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,  
है आवाहन  मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !

Monday, October 7, 2013

राजा हैं वे, औ हम है प्रजा , वे और बढ़ावा क्या देते - सतीश सक्सेना

अच्छा है दिखावे ख़त्म हुए , वे हमें कलावा क्या देते 
मंदिर में घुसने योग्य नहीं , वे हमें  चढ़ावा क्या देते ! 

जाते जाते,बातें करके,कुछ उखड़ा मन बहलाये थे !

वे अपने चेहरे दिखा गए , वे और छलावा क्या देते !

उसदिन तो हमारी तरफ देख ,वे हौले से मुस्काये थे !
राजा हैं वे,औ हम है प्रजा, वे और बढ़ावा क्या देते !

उस दिन देवों ने , उत्सव में, नर नारी भी बुलवाए थे ! 
बादल गरजे,बिजली चमकी,वे और बुलावा क्या देते !

रुद्राभिषेक करने हम तो,परिवार सहित जा पंहुचे थे  !
भक्ति के बदले मुक्ति मिली,वे इसके अलावा क्या देते !




Monday, July 22, 2013

मानव वेश में अक्सर फिरें, शैतान दुनिया में -सतीश सक्सेना

अगर ताकत तुम्हारे पास, सब स्वीकार दुनिया में !
कभी मांगे नहीं मिलते ,यहाँ अधिकार, दुनिया में !

फैसलों की घड़ी आये ,तो अपनी समझ से लेना,
मदारी रोज लगवाते हैं, जय जयकार दुनिया में !

किताबें खूब पढ़ डालीं, मगर लिखा नहीं पाया कि
पर्वत भी लिया करते हैं अब, प्रतिकार दुनिया में !

इसी बस्ती में, मानव रूप , कुछ  शैतान  रहते हैं !
बड़े सज धज सुशोभित रूप में मक्कार दुनिया में !

अधिकतर गिरने वाले घर के, अन्दर ही फिसलते हैं !  
तुम्हारे हर कदम पर , ध्यान की दरकार, दुनिया में !

Friday, June 21, 2013

हिमालय, को समझते,उम्र गुज़र जायेगी - सतीश सक्सेना

                   यह नहीं समझ आया, कि इंसानियत भूलों से, पहाड़ के नुक्सान को पूरा करने को , इस ग़ज़ल में ऐसा क्या लिखें   कि अर्थ पूरा हो ???
                   हमारी बेवकूफियों से पहाड़ रो रहे हैं , नदियाँ क्रोधित हैं , अगर नहीं सुधरे तो अभी बहुत कुछ सहना बाकी है  ! Ref: 16 june 2013, केदार घाटी 

लगता भूलों में ही यह, उम्र गुज़र जायेगी !
हिमालय को समझते, उम्र गुज़र जायेगी ! 

आज सब दब गए, इस दर्द के, पहाड़ तले
अब तो लगता है रोते, उम्र गुज़र जायेगी !

किसको मालूम था, उस रात उफनती, वह 
नदी, देखते देखते ऊपर से, गुज़र जायेगी !

कैसे मिल पाएंगे ?जो लोग, खो गए घर से,
मां को, समझाने में ही, उम्र गुज़र जायेंगी !

बहुत गुमान था, नदियों को बांधते, मानव 
केदार ऐ खौफ में ही, उम्र, गुज़र जायेगी  !

Saturday, December 17, 2011

अब शब्दों की जिम्मेदारी -सतीश सक्सेना


पिछली पोस्ट में प्रवीण पाण्डेय की टिप्पणी पढ़कर देखता ही रह गया ...
"मैंने तो मन की लिख डाली, 
अब शब्दों की जिम्मेदारी  ! "और उनको एक पत्र लिखा ...
प्रवीण भाई,
आपकी दी हुई उपरोक्त दो लाइने अच्छी लगी हैं ! इस गीत को आगे पूरा करने का दिल है ...इजाज़त दें तो  ... :-) 
और जवाब तुरंत आया ....
आपको पूरा अधिकार है, निश्चय ही बहुत सुन्दर सृजन होगा, कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं मैने भी पर भाव अलग हैं। प्रतीक्षा रहेगी आपके गीत की। सादर ,   प्रवीण
प्रवीण पाण्डेय,मेरी नज़र में बहुत ऊंचा स्थान ही नहीं रखते अपितु उनकी रचनाओं से हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है ! हिंदी भाषा का यह सौम्य सपूत वास्तव में बहुत आदर योग्य है ! 
उनके प्रति आभार के साथ, इस रचना का आनंद लें ...अगर आप लोग आनंदित हुए तो रचना सफल मानी जायेगी !

रचनाकारों की नगरी में 
मैंने कुछ रंग लगाये हैं 
अंतर्मन से ही नज़र पड़े 
ऐसे  अरमान जगाये हैं  !
मानवता गौरवशाली हो 
तब झूम उठे, दुनिया सारी !
मैंने तो मन की लिख डाली, अब शब्दों की जिम्मेदारी  !

ये शब्द ह्रदय से निकले हैं 

इन पर न कोई संशय आये
वाक्यों  के अर्थ बहुत से हैं,
अपने  भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की , 
हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी !
जाने क्या अर्थ निकालेगी, इन छंदों का,  दुनिया सारी !

असहाय, नासमझ जीवों  की 

आवाज़ उठाना लाजिम है !
मानव की कुछ करतूतों से  
आवरण उठाना वाजिब है !
पाशविक प्रवृत्ति का नाश करे,
मानवता हो, मंगल कारी
इच्छा है, अपनी भूलों को , स्वीकार करे दुनिया सारी !

जिस तरह  प्रकृति का नाश ,

करें खुद ही मानव की संताने
फल,फूल,नदी,झरते झरने
यादें लगती, बीते  कल  की  !
गहरा प्रभाव छोड़े अपना , 
कुछ ऐसी करें कलमकारी !
प्रकृति की अनुपम रचना का, सम्मान करे दुनिया सारी !

मृदु भावों का अहसास रहे ,

पिछली पीढ़ी का ध्यान रहे
बचपन से, मांगे  मुक्त हंसी
स्वागत सबका, सम्मान रहे !
दुश्मनी रंजिशें भूल अगर,
झूमेगी तब महफ़िल सारी !
यदि गैरों की भी पीड़ा का ,अहसास करे दुनिया भारी !

बच्चों को  टोकें , हंसने से !

कलियों को रोकें खिलने से
हर हृदय कष्ट में आ जाता 
आस्था पर प्रश्न उठाने से !
क्रोधित मन, कुंठाएँ पालें, 
ये बुद्धि गयी  कैसे मारी ! 
गुरुकुल की, शिक्षाएँ भूले , यह कैसी है पहरेदारी !

कुछ ऐसा राग रचें मिलकर

सुनकर उल्लास उठे मन से
कुछ ऐसा मृदु संगीत  बजे 
सब बाहर आयें ,घरोंदों से !
यदि गीतों में  झंकार न हो,
तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी  !
हर रचना के मूल्यांकन में इन शब्दों की जिम्मेदारी !

Thursday, July 8, 2010

शोर प्रदूषण और यूरोप - सतीश सक्सेना

पेरिस से जिनेवा तक का सफ़र हम लोगों ने, विश्व की सबसे तेज रफ़्तार ट्रेन टीजीवी, जिसकी स्पीड ३२० कम प्रति घंटा तक जाती थी, से तय किया था ! इस ट्रेन की यात्रा का हमें बहुत इंतज़ार था ! पेरिस स्टेशन ( पेरिस ल्योन ) पंहुचने पर एक कतार में खड़ीं कई सुपरफास्ट ट्रेन दिखाई दीं ! बीच में एक ऐतिहासिक स्टेशन बेलग्रेड पड़ा जिसकी जीर्ण हालत देख हमें ख़ुशी हुई ! बेलग्रेड हिटलर की एक बदनाम जेल के लिए मशहूर रहा है , जहाँ गेस्टापो का एक महत्वपूर्ण अड्डा था !
ट्रेन में  हम भारतीयों को छोड़, अन्य लोग शांत थे , हम लोगों ने बैठते ही अपना अपना ग्रुप बना लिया और अपनी अपनी कहानियां सुनाने में भूल गए कि यहाँ के लोग तेज आवाज में सुनने के आदी नहीं हैं ! यहाँ तक कि  हाई स्पीड टीजीवी के चलने पर, कुछ भी नहीं महसूस हो रहा था ! पटरियों की धडधड आदि सब गायब , इतनी शांत कि गति भी पता न चले , लगा कि कुछ मज़ा ही नहीं आ रहा  !      
थोड़ी देर में लगभग ७५ वर्षीय एक बुजुर्ग महिला अपनी सीट से उठ कर, मेरे  सामने बैठे, मित्र के पास जाकर बेहद गुस्से में बोली आप इतनी जोर से क्यों चीख रहे हैं !  आपकी तेज आवाज ने मेरे कानों में दर्द कर दिया है ! मेरी तबियत खराब हो रही है ...क्या आपको पब्लिक प्लेस में बोलना नहीं आता है ! 
हमारे भारतीय मित्र , जो एक उच्च अधिकारी रह चुके थे ,अचानक हुए इस हमले को बिलकुल तैयार नहीं थे !  बार बार सॉरी  माँ , कहकर अपनी जान छुटाई ! यह पहला मौका था जब हमारी ख़राब आदत, हमें खुद को महसूस हुई !
दूसरा मौका स्वित्ज़रलैंड में विलार्स नामक बेहद खूबसूरत  जगह  होटल  "ले ब्रिस्टल "  लॉबी का था जहाँ एक काफी बड़ा बोर्ड  लगा हुआ था कि कृपया साइलेंस बनाए रखें !
एक अन्य कोच से  उतरे, एक भारतीय, लॉबी  में  इतनी जोर जोर से बोल रहे थे कि मुझे तक असहनीय हो रहा था  ! इतने में एक होटल अधिकारी ने आकर उन सज्जन को बुला कर यह नोटिस बोर्ड दिखाया उसके बाद ही वे देसी सज्जन खामोश हो पाए !

साधारण शिष्टाचार और अपने देश के सम्मान का ख़याल हमारे जन मानस में , कैसे आएगा ? खास तौर पर तब जबकि शोर को हम प्रदूषण मानते ही नहीं ,उसके खतरों से आगाह होने की चिंता तो तब होगी जब हमें उसके बारे में पता हो !


Monday, April 26, 2010

आभूषण रहित धरा को कर क्यों लोग मनाते दीवाली ? -सतीश सक्सेना

कितने कवियों ने मौसम की
गाथा गायी कविताओं में !
अब मौसम पर कविता लिखते
लेखनी ठहर क्यों जाती है !
बरसों बीते , दिखती न कहीं 

हर ओर छा रही हरियाली !
अब धुआं भरे इस मौसम में क्यों लोग मनाते दीवाली ?


धरती की छाती से निकली 
सहमी सहमी कोंपलें दिखे
काला गहराता धुआं देख
कलियों में वह मुस्कान नहीं
जलवायु प्रकृति को दूषित कर 

धरती लगती खाली खाली
विध्वंस हाथ से अपना कर , क्यों लोग मनाते  दीवाली  ?

प्रकृति का चक्र बदलने को 
काटते पेड़ निर्दयता से  !
बरसात घटी बादल न दिखे
ठंडी जलधार बहे कैसे  !
कर रहीं नष्ट ख़ुद ही समाज,  

कालिदासों की संताने !
आभूषण रहित धरा को कर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अब नहीं नाचता मोर कहीं
घनघोर मेघ का नाम नहीं !
अब नहीं दीखता इन्द्रधनुष 
सतरंगी आभा साथ लिए !
कर उपवन स्वयं तवाह अरे 

क्यों फूल ढूँढता है माली ?
जहरीली सांसे लेकर अब,  क्यों लोग मनाते दीवाली ? 

Friday, April 2, 2010

डैथ ट्रेप : जब मेरा पूरा परिवार मौत से बाल बाल बचा था ! - सतीश सक्सेना


वह रात मेरे परिवार के लिए, जीवन की सबसे बुरी रात थी और शायद उस दिन हमें किसी अद्रश्य शक्ति ने बचा लिया था अथवा आज यह लेख लिखने को भी जीवित नहीं बचते !
जून १९८८ की रात , नॉएडा में पूरी रात बिजली नहीं थी ११-१२ बजे तक तो पसीने से भीगे हुए जागते रहे, दोनों 
बच्चों (गौरव ८ वर्षीय और गरिमा ३ वर्षीय )को बेहाल देख , मैंने केनोपी में खडी मारुति ८०० के एयर कंडिशनर का  ध्यान आया और हम पति पत्नी, दोनों बच्चों को लेकर गाडी में बैठ गए ! खडी गाड़ी को स्टार्ट कर, ऐ सी चला दिया , पसीने में सराबोर हम सबको इस ठंडक को मिलते ही ऐसा लगा कि जैसे एक वरदान मिल गया हो ! देखते ही देखते नींद कब आ गयी पता ही न चला !

पता नहीं शायद अचानक गुडिया की आवाज सुनकर मेरी नींद खुली , और मैंने अन्दर की लाइट जलाने के लिए हाथ उठाया तो लगा जैसे हाथों में दम नहीं रही , लाइट जलते ही मैंने अर्धबेहोशी की हालत में गौरव को सीट के नीचे बेहोश गिरा पाया और गुडिया पिछली सीट पर हाथ पैरों को, अजीब तरह से पटक रही थी ! खतरे का अहसास होते ही मैंने दरवाजा खोला ,गिरता पड़ता बाहर निकला उस समय खुले लान में चारो तरफ धुआं ही धुंआ था ! शरीर बिलकुल काबू में नहीं था , पत्नी को चीख कर कहा बच्चो को जल्दी बाहर निकालो मगर उनकी स्थिति भी काबू में नहीं थी ! पता नहीं कहाँ से ताकत आ गयी मुझमें ! गाड़ी को बाहर रोड पर लाकर खडी की , बापस घर में आकर बच्चों को गोद में लेकर, लगभग भागते हुए गाडी में डाला , और नॉएडा मेडिकेयर सेण्टर, कैसे पहुंचा हूँ, कुछ याद नहीं ! डॉ से जाते ही कहा तुरंत ओक्सिजन चाहिए ,गैस पोइजन के शिकार हैं हम लोग ! सबसे पहले बच्चों को ओक्सिजन दी गयी ! लगभग ३० मिनट में हम लोग व्यवस्थित हो पाए ! डॉ के हिसाब से अगर ५ मिनट हम और सोते रहते तो शायद कोई नहीं बचता !

कई साल बाद जब मैंने अखबार में, गराज के अन्दर खड़ी गाड़ी में, दो बच्चों की लाशें मिलने की खबर पड़ी तो मैंने एरिया डी सी पी को फ़ोन करके यह संभावित मौत कैसे हुई होगी ? को लेकर अपनी घटना बताई तो वे भी अचम्भे में रह गए थे !

उस रात बिलकुल हवा नहीं चल रही थी , एग्ज्हास्ट पाइप से निकला धुआं गाड़ी के चारो ओर जमा हुआ और चलते एयर कंडिशनर ने धुंए को फिल्टर करते हुए कार्बन मोनो आक्साइड को अन्दर खींच लिया ! अगर मेरी नींद न खुलती तो ......??

Sunday, March 21, 2010

यमुना मैय्या मैली सी !

दिल्ली में यमुना एक नाले के रूप में बहती है , आर्ट ऑफ़ लिविंग  के द्वारा १७ मार्च से एक सामूहिक  प्रयास शुरू किया गया है , बहुत प्रसंशनीय कार्य मानते हुए लोगों ने इसमें योगदान किया है  ! "मेरी दिल्ली मेरी यमुना " अभियान में बिसिनेस स्कूल और अन्य कालेज के विद्यार्थी बढ़ चढ़ के हिस्सा लेते देखे गए यह एक अच्छा शकुन है !
अगर यमुना के आस पास रहने वाले लोग ही, कमर कस कर निकल पड़ें तो मुझे विश्वास है कि हमारे माथे लगा यह गन्दा टीका साफ़ होते देर नहीं लगेगी !    

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