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Monday, June 15, 2015

तेरे झंडों से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा - सतीश सक्सेना

जो यहाँ जन्में उन्ही का देश माना जाएगा !
तेरे झंडों  से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा !

साधू,बाबा,तांत्रिकों ने देश शर्मिन्दा किया 
आस्था से धन कमाने का ज़माना जाएगा !

शहर जीता जब उन्होंने तब नशे में लोग थे 
होश आने दे शहर को ये ठिकाना जाएगा !

शुक्र है अब नौजवां, अंधे नहीं इस देश के
नबी के बच्चों से झगडे का बहाना जाएगा !

मिटा पाओगे निशां,अल्बर्ट,सेखों,हमीद के ?
सरजमीं पे उन्हीं का अधिकार माना जाएगा !

Wednesday, May 6, 2015

ये ग़ज़ल कैसी रही ? - सतीश सक्सेना

गर्दिशों में खिलखिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !
आंसुओं में झिलमिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

इस उदासी का सबब, कैसे बताएं,आप को,
सिर्फ रस्मों को निभाती, ये ग़ज़ल कैसी रही !

काबा, कंगूरों से चलकर, मयकदे के द्वार पे 
खिदमतों में सर झुकाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

मीर गालिब औ जिगर ने शौक
 से गहने दिए
दर्द में भी  मुस्कराती , ये ग़ज़ल कैसी रही !

कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही !

Wednesday, April 8, 2015

हर कविता में छिपी कहानी होती है - सतीश सक्सेना

कुछ ग़ज़लों में एक कहानी होती है,
गहरे दुःख की सर्द निशानी होती है !

हम दोनों के बीच हुई कुछ बातें भी , 
मरते दम तक हमें छिपानी होती हैं !

अब न भरोसा करते हैं लंका वाले
भाई की पहचान करानी होती है !


यूँ  तो, ब्रूटस  बडे भरोसे वाले थे ,
अपने घर पाकर , हैरानी होती है !

कैसे  ढूंढेंगे प्रमाण , दुनिया वाले 
कितनी बातें सिर्फ जुबानी होती है !

Sunday, March 1, 2015

आओ छींटें मारे, रंग के, बुरा न मानो होली है ! - सतीश सक्सेना

नमन करूं , 
गुरु घंटालों के  !
पाँव छुऊँ , 
भूतनियों  के !

राजनीति के '
मक्कारों ने,
डट कर खेली 
होली है ! 
आओ छींटें मारे रंग के ,  बुरा न मानो होली है !

गुरु है, गुड से 
चेला शक्कर
गुरु के गुरु  
पटाये जाकर  !
गुरुभाई से 
राज पूंछकर , 
गुरु की गैया,
दुह ली है !
जहाँ मिला मौका देवर ने जम के खेली होली है ! 

घूंघट हटा के 
पैग बनाती ! 
हिंदी खुश हो
नाम कमाती !
पंत मैथिली 
सम्मुख इसके
अक्सर भरते 
पानी है !
व्हिस्की और कबाब ने कैसे,हंसके खेली होली है !

जितना  चाहे 
कूड़ा लिख दो !
कुछ ना आये ,
कविता लिख दो

एक पंक्ति में,
दो शब्दों की, 
माला लगती 
सोणी है !
कवि बैठे हैं माथा पकडे , कविता कैसी होली  है !


कापी कर ले ,
जुगत भिडाले !  
लेखक बनकर   
नाम कमा  ले !

हिंदी में 
हाइकू   
लिख मारा,
शिकी की 
गागर फोड़ी है !
गीत छंद की बात भी अब तो,बड़ी पुरानी होली है !  

अधर्म करके  
धर्म सिखाते  
धन पाने के 

कर्म सिखाते 
नज़र बचाके,
कैसे उसने,
दूध में गोली, 
घोली है !
खद्दर पहन के नेताओं ने, देश में खेली होली है !

ब्लू लेवल, 

की बोतल आयी !
नई कार ,
बीबी को भायी !
बाबू जी का

 टूटा चश्मा,
माँ  की चप्पल 
आनी है  !
समय ने, बूढ़े आंसू देखे , कैसी गीली होली है !


Friday, February 27, 2015

बिना जिगर ही जिंदा हैं, हम यार बड़े शर्मिन्दा हैं - सतीश सक्सेना

बिना जिगर हम जिंदा हैं पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !
कितनी बार मरे हैं , लेकिन यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

किससे वादे ,जीवन भर के ,
किसके हाथों में हाथ दिया !
किसके संग कसमें खायीं थी  
किसके जीवन में साथ दिया !
आंसू,मनुहार,सिसकियों का,
अपमान हमारे, हाथ हुआ !
अब  सब जग के आंसू पोंछें, पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

उस घोर अँधेरे जंगल में, 
कैसे मनुहारें सिसकी थीं
किसके सपनें बर्वाद हुए
कैसी दर्दीली हिचकी थीं 
तब किसने माँगा साथ मेरा,
उस समय कदम न उठ पाये !
अब सारी दुनियां जीत चुके, पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

कितने सपने कितने वादे  
बिन आँखे खोले टूट गए !
कितने गाने कितनी गज़लें 
गाये बिन, हमसे रूठ गए !
मुंह खोल नहीं पाये थे हम, 
सारे जीवन,घुट घुट के जिए !
चलना जब था तब चल न सके, अब यार बड़े शर्मिंदा हैं !

कितना अच्छा होता यदि हम 
मिलते ही नहीं इस बस्ती में !
कितना अच्छा होता यदि हम  
हँसते ही नहीं, उस मस्ती में !
उस राह दिखाने वाले को,
हमने ही अकेला छोड़ दिया !
खुद ही घायल कर अपने को,हम यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

कितनी नदियां धीरे धीरे 
कैसे नालों में बदल गयीं !
जलधाराएं मीठे जल की  
कैसे खारों में बदल गयीं !
अपने घर आग लगा हँसते,
मानव जीवन का सुख लेते
कहने को यूँ हम जिन्दा हैं , पर यार बड़े शर्मिंदा हैं !

Sunday, November 2, 2014

ये नेता रहे तो , वतन बेंच देंगे - सतीश सक्सेना

ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे

कलम के सिपाही अगर सो गए
हमारे मसीहा , अमन बेंच देंगे !

कुबेरों के कर्ज़े लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे !

Monday, June 16, 2014

उनको द्वारे पे ही अल्लाह याद आएंगे -सतीश सक्सेना


आज हम मुद्दतों के बाद , वहाँ जाएंगे !
ये तो तय है ,वे मुझे देख के घबराएंगे !

एक अर्से के बाद,दर पे उनके आया हूँ !
सामने पा ,उन्हें अल्लाह  याद आएंगे !

काश उस वक़्त,सहारे के लिए हो कोई !
वे मुझे  देख के हर हाल, लडख़ड़ायेंगे !

वे तो शायद मुझे, पहचान ही नहीं पाएं !
जवां आँखों से छिने ख्वाब याद आएंगे !

यादें उनको तो वहीँ छोड़ के आना होगा !
वरना मिलने पे तो , वे होंठ थरथराएँगे !

Sunday, June 15, 2014

अलंकार,श्रंगार बिना हम दिल की बातें करते हैं ! -सतीश सक्सेना

ओठों पर आ जाए जो उस गीत की बातें करते हैं !
जो मन को छू जाये उस संगीत की बातें करते हैं !

अम्मा दादी नानी बाबा से  हम चलना सीखे हैं ,
स्नेही आँचल में कटे , अतीत की बातें करते हैं !

जीवन भर तस्वीर संजोये , लेकिन ढूंढ न पाए हैं,
अपने सपनों में आये उस मीत की बातें करते हैं !

हमको कौन शाबाशी देगा , सन्नाटों में रहते  हैं !
कब्रों के संग बैठ जमीं से, प्रीत की बातें करते हैं !

कंगूरों से  रही लड़ाई ,  इंसानों से प्यार किया !
ऐसे बुरे समय में भी हम, जीत की बातें करते हैं ! 

Sunday, April 20, 2014

इक असंभव गीत, गाना चाहता हूँ -सतीश सक्सेना

              अपने बचपन के उन सबसे बुरे दिनों में,जब माँ की मृत्यु हुई , मैं इतना छोटा था कि अपनी माँ का चेहरा भी याद नहीं ……
               काश एक बार वे सपने में ही दिख जाएँ ! ऐसी कौन सी भूल हुई मुझ बच्चे से, जो वे छोड़ कर हमेशा को, वहां चली गयीं जहाँ से कोई कभी बापस नहीं लौटा !! 

             यह मात्र एक रचना न होकर माँ को लिखा एक एक पत्र है,मेरा अपना, माँ के लिए …… 

माँ ,तुझे वापस , बुलाना चाहता हूँ !
इक असंभव गीत , गाना चाहता हूँ !

इक झलक तेरी, मुझे मिल जाये तो,
एक कौरा ही, खिलाना चाहता हूँ !

मुझसे हो नाराज, मत मिलना मुझे,
अपने बच्चों से, मिलाना चाहता हूँ !

जानता हो अब न तुम आ पाओगी
सिर्फ सपने में , बुलाना चाहता हूँ !

जाने कितनी बार ये, रुक -रुक बहे !
माँ, मैं आंसू को, जिताना चाहता हूँ !

देख तो लो माँ , कि बेटा है कहाँ ?
तेरा घर तुझको दिखाना चाहता हूँ !

बहुत दिन से चल रहे हैं , बिन रुके !
आज दिनकर को बिठाना चाहता हूँ !

(आज पता चला कि यह कतील शिफ़ाई की जमीन पर लिखा गया , अनजाने में ) - ३१ अगस्त १५  

Thursday, April 10, 2014

ये ग़ज़ल के कद्रदां भी क्या करें ? -सतीश सक्सेना

ये बेचारे बागबां , भी क्या करें !
बिन बुलाये खामखां भी क्या करें !


अब ये जूता और चप्पल ही सही
ये वतन के नौजवां, भी क्या करें !

भौंकने पर किस कदर नाराज हो
ये  बेचारे बेजुबां ,भी क्या करें !


हाले धरती, देख कर ही रो पड़े,
दूर से ये आस्मां भी , क्या करें !

झाँकने ही झांकने , में फट गए ,
ये हमारे गिरेबां भी , क्या करें !


तालियां, वे  मांग कर बजवा रहे
ये गज़ल के कद्रदां भी, क्या करें !

Tuesday, March 11, 2014

कवि दिवस ( ९ मार्च ) और विवेक जी के संकल्प - सतीश सक्सेना

बेतुल में कविदिवस 
मैं ८० के दशक से कवितायें लिख रहा हूँ मगर आज तक उन्हें किसी मंच , कवि गोष्ठी अथवा मित्रों के समूह में कभी नहीं सुनाया ! १९७७ से ट्रेड यूनियन मूवमेंट लीडर शिप में रहा हूँ तथा मंच से सैकड़ों बार भीड़ में, भाषण देने के कारण, पब्लिक सम्बोधन में कभी कोई झिझक नहीं रही ! मेरे लिए यह एक सामान्य बात कहने की, प्रक्रिया भर है फिर भी मैं आत्म प्रचार से चिढ़ता रहा हूँ , परिणाम स्वरुप मेरे साथ बरसों काम करने वाले मित्र भी यह नहीं जानते कि मैं कविता लेखन करता हूँ ! ब्लॉग जगत में मेरे आने का कारण, यश अर्जन न होकर मेरी कविताओं और लेखों को एक जगह कलमबद्ध करना मात्र रहा है ताकि भविष्य में, समाज के लिए उपयोगी मानी जाएँ तो वे लोगों के काम आ जाएँ !

मगर जब विवेक जी के विचारों के लिए बने संगठन, आनंद ही आनंद, के मध्य भारत के संयोजक विश्वास जी ने जब मुझे बेतुल आने का निमंत्रण दिया तो मैं प्रारम्भिक झिझक के बाद भी, मना नहीं कर सका , आश्चर्य हुआ
महात्मा विवेक जी 
कि वे मेरी अधिकाँश कवितायें पहले ही ब्लॉग के माध्यम से पढ़ चुके थे ! सामजिक पृष्ठभूमि पर लिखी कविताओं के कारण ही, वे तथा आनंद ही आनंद से जुड़े लोग, मुझसे परिचित थे ! बेतुल के कविसम्मेलन में मुझे प्रभावशाली  कवि मदन मोहन समर,मनवीर मधुर,ज्योति खरे,संतोष त्रिवेदी,शरद जैसवाल ,दीपक अग्रवाल, शुभम शर्मा के साथ मंच पर बैठने का मान मिला ! 

बहुत कम लोग जानते होंगे, स्वयं प्रचार के अभाव में, साधारण से दिखने वाले इस युवक ( विवेक जी ) ने, अपनी उच्च शिक्षा एवं अन्तराष्ट्रीय जीविका को त्याग कर , इस देश की संस्कृति पुनरुत्थान का , जो संकल्प लिया है , वह अद्वितीय है ! त्याग की इस अनुपम मिसाल युक्त आकर्षक व्यक्तित्व की वाणी जब जब मैंने सुनी तब तब उस सौम्य व् मीठी वाणी  में मुझे विवेक जी नहीं साक्षात विवेकानंद सुनाई पड़ रहे थे ! आकर्षक एवं मोहक व्यक्तित्व के मालिक विवेक से जब मैंने उनके विवाह के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था कि विवाह तो हो चुका इन संकल्पों से ! 


कवियों और कविता के प्रति उनकी आस्था और विश्वास है कि बरसों से सुप्त पड़ी कविता भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक नयी रोशनी ला सकती है सो कवियों को जगाना होगा एवं इस कार्य का आगाज़ पूरे देश में पहली बार कवि दिवस ( ९ मार्च ) की उद्घोषणा करते हुए किया है ! भविष्य में विवेक जी की योजना इन कवि सम्मेलनों को देश के अन्य हिस्सों तथा विदेशों में ले जाने की है !

उनके द्वारा किया गए कार्यों में से, मुझे सबसे अधिक आकर्षित, वृद्ध सहायता कार्यक्रम ने किया है जिसमें वे देश में वृद्धों के लिए एक डाटा बैंक बनवा रहे हैं तथा उन लोगों की मदद के लिए एक लोकल सर्कल होगा जो हर क्षण वृद्धों की सहायता में  तत्पर रहेगा !

परिवार , एवं समस्त भौतिक सुखों का त्याग इतनी कम उम्र में आसान नहीं होता ! इस अशिक्षित देश में, एक नयी अध्यात्मिक सांस्कृतिक लौ प्रज्ज्वलन का प्रयत्न करते, इस महात्मा का मैं अभिवादन करता हूँ !

Monday, February 10, 2014

नीची नज़रों वाले अक्सर, तीखी चोटें करते हैं - सतीश सक्सेना

चंदा, सूरज, बादल ,कितना काम हमारा करते हैं !
कुदरत की ताकत बतलाने, सिर्फ इशारा करते हैं !

खुशी हमारी देख हमेशा, जलते हैं दुनिया वाले !
नज़र लगाने वाले अक्सर, नज़र उतारा करते हैं !

लड़के अक्सर ही लुट जाते चूड़ी, सुरमा, लाली से  
संवेदना, समर्पण पाकर, दिल को हारा करते हैं !

करुणा दया से रिश्ता कैसा, पथरीली चट्टानों से 
डूबते दिल को, बैठे साहिल सिर्फ निहारा करते हैं 

नज़र बचा के चलने वालों, से रहना चौकन्ने ही   
नीची नज़रों वाले , तीखी चोटें , मारा करते हैं !

Sunday, January 19, 2014

चाटुकारिता गाने वालों, प्रीत नहीं लिख पाओगे -सतीश सक्सेना

चाटुकारिता गाने वालों , प्रीत नहीं लिख पाओगे !
जन मन में छा जाने वाले गीत, नहीं लिख पाओगे !

जाति गर्व पर लिखने वालों कवि भले ही कहलाओ
सबके मन को भाने वाले गीत नहीं लिख पाओगे !

शब्द चुराकर हाथ नचाकर, मंच पे ताली पा लोगे 
ह्रदय तरंगित करने वाले, गीत नहीं लिख पाओगे !

सूरदास, रसखान को पहले, पढ़ आओ गाने वालों
केशव को बुलवाने वाले ,गीत नहीं लिख पाओगे !

अगर नहीं आवाहन होगा , मोहन के मन भावों सा 
राधा को आकर्षित करते, गीत नहीं लिख पाओगे !

Saturday, November 2, 2013

बड़े मनोहर पल्लू ले , महिलायें बाहर निकली हैं -सतीश सक्सेना

करवाचौथ मना के अब, बालाएं बाहर निकली हैं !
कैसे कैसे लल्लू  ले , महिलायें बाहर निकली हैं !

आज खरींदे, सोना चांदी,धन की वारिश होनी है !
धनतेरस पर उल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !


कितने लोग आज भी ऐसे , जो  बंधने को बैठे हैं !
बड़े मनोहर पल्लू ले , महिलायें बाहर निकली हैं !


जीवन इनका राजनीति में, पूंछ हिलाते बीता है ! 
गोरे रंग का कल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !

पूंछ हिलाते देख इन्ही को , कुत्ते बस्ती छोड़ गए !
अपने अपने पिल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !

Thursday, October 24, 2013

कसमें चौकीदारी की -सतीश सक्सेना

रात में जमकर धोखा देते, दिन में कसमें यारी की !
साकी और शराब रोज़ हो , रस्में चारदीवारी की !

अक्सर बासिन्दे शहरों के , असमंजस में दिखते हैं !      
अभिलाषाएं, धुएं में जीवित, चिंता है बीमारी की !

जब भी लगती आग, धमाका नहीं सुनाई पड़ता है !
ऎसी कौन सी ताकत होती, छोटी सी चिंगारी की !  

पता नहीं ये शख्श भरोसे लायक,मुझे न लगता है,
मीठी मीठी बातें करता , पर  ऑंखें मक्कारी  की ! 

इस बस्ती में लोग हमेशा , मास्क लगाए रहते हैं  !
सूरत से धनवान दीखते , आदत पड़ी भिखारी की !

Saturday, October 19, 2013

कितने भेद छिपाए बैठा, एक दुपट्टा, औरत का - सतीश सक्सेना

आओ खेलें खेल देश में नफरत और हिफाज़त का 
जो जीतेगा वही करेगा शासन सिर्फ हिकारत का !

भ्रष्टाचार ख़तम कर डालें , हल्ला गुल्ला  हैरत का ! 
जनता साली क्या जानेगी,किला जीतना भारत का !

टेलीविज़न पर नेताओं को, काले धन की चिंता है !
कैसे भी, सत्ता हथियानी, लक्ष्य पुराना हज़रत का !

ऐसा लगता बदन रंगाये,बिल्ला जमीं पर उतरा है !
लगता वही डालडा डब्बा,बजे चुनावी कसरत का !

तरस, दया, हमदर्दी खाकर ,हाथ फेरना बुड्ढों का ! 
यह तो  वही पुराना फंडा,उस्तादों की फितरत का !

पढ़े लिखे क्या समझ सकेंगे,मक्कारों की बस्ती में !
कितने भेद छिपाए बैठा , एक  दुपट्टा, औरत का !



Sunday, September 29, 2013

कुछ खस्ता सेर हमारे भी - सतीश सक्सेना

अनुराग शर्मा को समर्पित :

खस्ता शेरों को देख उठे, कुछ सोते शेर हमारे भी ! 
सुनने वालों तक पंहुचेंगे, कुछ देसी बेर हमारे भी !

ज़ाहिल डरपोक भीड़ कैसे,जानेगी वोट की ताकत को   
इस देश के दर्द में खड़े हुए,अनजाने शेर हमारे भी !

जैसे तैसे जनता आई ,कितना धीरज रख पायेगी ! 
कल रात से,अंडे सड़े हुए ले, बैठे  शेर  हमारे भी !

प्रतिभा लक्ष्मी का साथ नहीं बेईमानों की नगरी में ! 
बाबा-गुंडों में  स्पर्धा , घर में हों , कुबेर हमारे भी !

जाने क्यों वेद लिखे हमने,हँसते हैं अब,अपने ऊपर !
भैंसे भी, कहाँ से समझेंगे, यह गोबर ढेर, हमारे भी !

चोट्टे बेईमान यहाँ आकर,बाबा बन धन को लूट रहे ! 
जनता को समझाते हांफे, पुख्ता शमशेर हमारे भी !

फिर भी कुछ ढेले फेंक रहे ,शायद ये नींदें खुल जाएँ ! 
पंहुचेंगे कहीं तक तो प्यारे,ये कपोत दिलेर,हमारे भी !

Tuesday, September 17, 2013

बाहर जाकर करो रोशनी ,लोग ढूंढते फिरते हैं -सतीश सक्सेना


बाबा,ज्ञानी,संत,साध्वी, कितने पावन दिखते हैं !
फिर भी देसी अख़बारों में इनके किस्से छपते हैं !

चूहों से घबरा के हमने,घर में ज़हरी पाल लिया !
तब से, कट्टर बैरी हमसे , कुछ हमदर्दी रखते हैं !

आब ऐ आफताब को लेकर,घर में काहे बैठे हो !
बाहर जाकर करो रोशनी , लोग ढूंढते फिरते हैं !


ताले, दीवारें, दरवाजे, क्या कुछ भी कर पायेंगे !
घर के रखवाले ही कैसे, बदले बदले लगते हैं !


धनुषवाण ले राम के फोटो,दीख रहे चौराहों पे      
तब से, सारे बस्ती वाले ,आशंकित से रहते हैं !

Wednesday, July 17, 2013

मिसरा,मतला,मक्ता,रदीफ़,काफिया,ने खुद्दारी की थी -सतीश सक्सेना

मिसरा,मतला,मक्ता,रदीफ़,काफिया,ने खुद्दारी की थी !  
हमने भी ग़ज़ल के दरवाजे,कुछ दिन पल्लेदारी की थी !

हैरान हुए, हर बार मिली,जब भी देखी, गागर खाली ! 
उसने ही,छेद किया यारो, जिसने चौकीदारी  की थी !

लगता है तुम्हारे आने पर , हर  घर में दीवाली  होगी !
कलरात,तुम्हारी गलियों में,लोगों ने खरीदारी की थी !

जाने  अनजाने, वे  भूलें , कुछ पछताए, कुछ रोये थे !
हमने ही ,नज़रें फेरीं थीं, उसने तो, वफादारी की थी !

अब तो शायद,इस नगरी में,कोई न हमें,पहचान सके !
कुछ रोज,तुम्हारी बस्ती में,हमने भी सरदारी  की थी !



Wednesday, July 14, 2010

दर्द दिया है तुमने मुझको, दवा न तुमसे मांगूंगा - सतीश सक्सेना

आहत स्वाभिमानी मन का छलकता गर्व, महसूस करें ! लगभग 25 साल पहले लिखी यह रचना आपकी नज़र है !   

समझ प्यार की नही जिन्हें 
है,समझ नही मानवता की !
जिनकी अपनी ही इच्छाएँ
तृप्त , नही हो पाती हैं  !
दुनिया चाहे कुछ भी सोंचे ,

कभी न हाथ पसारूंगा ?
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !

चिडियों का भी छोटा मन है

फिर भी वह कुछ देती हैं !
चीं,चीं करती दाना चुंगती
मन को , हर्षित करती हैं !
राजहंस का जीवन पाकर,

क्या भिक्षुक से मांगूंगा ?
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !

विस्तृत ह्रदय मिला ईश्वर से
सारी दुनिया ही, घर लगती
प्यार,नेह,करुणा औ ममता
मुझको दिए , विधाता ने  !
यह विशाल धनराशि प्राण !

अब क्या में तुमसे मांगूंगा ?
दर्द दिया है  तुमने मुझको , दवा  न  तुमसे  मांगूंगा  !

जिसको कहीं न आश्रय 
मिलता, 
मेरे दिल में रहने आये !
हर निर्बल की रक्षा करने
का वर मिला , विधाता से !
दुनिया भर में प्यार लुटाऊं, 

क्या लोभी से मांगूंगा ?
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !


परपीड़ा देने को अक्सर 
करता ह्रदय,निष्ठुरों का,
जंजीरों से ह्रदय और मन
बंधा रहे ,  गर्वीलों  का  ,
मैं हूँ फक्कड़ मस्त कवि, 

क्या गर्वीलों से मांगूंगा ?
दर्द दिया है तुमने मुझको, दवा न तुमसे मांगूंगा !
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