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Monday, January 20, 2020

थोड़े से दर्द में ही , क्यूँ ऑंखें छलक उठी -सतीश सक्सेना

मुर्दा हुए शरीर  को , जीना सिखाइये !
मरते हुए ज़मीर को , पीना सिखाइये !

इतने से दर्द में ही , क्यूँ ऑंखें छलक उठी 

गुंडों की गली  में  इन्हें , रहना सिखाइये !

गद्दार कोई हो , मगर  हक़दार सज़ा के ,
उस्ताद, मोमिनों को ही चलना सिखाइये  !

अनभिज्ञ निरक्षर निरे जाहिल से देश को !
सरकार,शाही खौफ से, डरना सिखाइये !

नज़रें उठायीं तख़्त पे दिलदार, तो खुद को ,
सरकार के डंडों को भी,सहना सिखाइये !

Friday, May 10, 2019

यज्ञ सदियों तक चले, जडबुद्धि अभ्युत्थान में -सतीश सक्सेना

साधुओं का वेष रक्खे लार टपकाते दिखें
कौन आएगा नमन को , मेरे हिंदुस्तान में ?


धूर्तों ने धन कमाने , घर में, कांटे बो दिए !
रोयेंगी अब पीढ़िया, परिवार पुनरुत्थान में !

कौम सारी हो चुकी बदनाम , बहते खून से ,

कई युग बीतेंगे अपनी क़ौम के भुगतान में !

जाहिलों की बुद्धि, कैसे शुद्ध हो इस देश में
यज्ञ सदियों तक चले जडबुद्धि अभ्युत्थान में !


इस मदारी राज में सब , दिग्भ्रमित से हैं खड़े
औ लगाओ जोर हइन्सा राज ध्वजोत्थान में !

Thursday, May 10, 2018

चिंतित माँ की चौकीदारी क्या समझेंगे ? -सतीश सक्सेना

घर कुटुंब की जिम्मेदारी क्या समझेंगे ?
शक संशय में रिश्तेदारी,क्या समझेंगे ?

पर निंदा ,उपहास में, रस तलाशने वाले
व्यथित पिता की हिस्सेदारी क्या समझेंगे ?


नन्हीं बच्ची, तिनके चुग्गा लाने निकली
चिंतित माँ की चौकीदारी क्या समझेंगे ?

सुंदरता में फंस कर ,कितने राजा डूबे
धूर्त कैकेयी की मक्कारी क्या समझेंगे ?

अभी नशे में डूबे हैं , सरकार हुस्न की
चकाचौंध में,आपसदारी क्या समझेंगे ?

Thursday, October 13, 2016

सिर्फ दिखावे के उत्सव , सद्भाव ख़त्म हो जाते हैं - सतीश सक्सेना

जहाँ पूजा का हो अपमान
वहां बन जाते कालिदास
जहाँ प्रीति का हो उपहास
वहीं पैदा हों तुलसी दास
इतने गहरे तीर , मृदुल 
आवेग ख़त्म कर जाते हैं !
चुभते तीखे शब्दों से, अनुराग ख़त्म हो जाते हैं !

जहाँ परिवार मनाये शोक 
जन्मते ही कन्या को देख 
बुढ़ापे में बन जाते बोझ 
पुत्र पर,कैसे जीवनलेख
इन रिश्तों में वर्चस्व हेतु , 
संपर्क ख़त्म हो जाते हैं !
अपना अपना हिस्सा ले,म्बन्ध ख़त्म हो जाते हैं !

जहाँ सन्यास कमाए नोट 
देश में  बेशर्मी के साथ ! 
जहाँ संस्कार बिके बाजार
नोट ले बड़ी ख़ुशी के साथ
रात्रि जागरण में कितने, 
विश्वास  ख़त्म हो जाते हैं !  
सिर्फ दिखावे के उत्सव , सद्भाव ख़त्म हो जाते हैं !

साधू सन्यासी करते होड़
देश में व्यापारी के साथ 
अनपढ़ों नासमझों के देश 
भव्य अवतारी बनते रोज, 
धन के लालच में पड़कर  
ईमान ख़तम हो जाते हैं !
धर्माचार के साये में , विश्वास  ख़त्म हो जाते हैं !

Monday, October 10, 2016

गाल बजाते धूर्त ! तुम मुझे क्या दोगे ? - सतीश सक्सेना

अगर तुम रहे कुछ दिन 
भी सरदारी में ,
बहुत शीघ्र गांधी,
सुभाष के गौरव को 
गौतम बुद्ध की गरिमा 
कबिरा के दोहे ,
सर्वधर्म समभाव 
कलंकित कर दोगे !
बड़बोले हो दोस्त सिर्फ धनपतियों के 
नील में रंगे सियार, तुम 
मुझे क्या दोगे ?

दुःशाशन दुर्योधन शकुनि 
न टिक पाएं !
झूठ की हांडी बारम्बार 
न चढ़ पाए,
बरसों से अक्षुण्ण रहा 
था, दुनियां में ,
भारत आविर्भाव, 
कलंकित कर दोगे  !!
भारत रत्न मिले, तुमको मक्कारी में 
कितने धूर्त महान, तुम 
मुझे क्या दोगे ?

है विश्वास मुझे तुम 
जल्दी जाओगे !
बस अफ़सोस यही
अपयश दिलवाओगे 
पंचशील सिद्धांत ,
सबक इतिहासों का  
दोस्त पुराने भुला 
नए दरवाजों पर  ,
बचा खुचा सम्मान समर्पित कर दोगे 
हे अभिनय सम्राट , तुम 
मुझे क्या दोगे ?

Tuesday, August 2, 2016

मालिक ये हाथ रखें नीचे,हम हाथ उठाना सीख गए - सतीश सक्सेना

डमरू तबला कसते कसते,हम धनक उठाना सीख गये,
तेरा गंद उठाकर सदियों से, तेरा आबोदाना सीख गये !


हमसे ही अस्मिता भारत की, परिहास बनाना बंद करें
सदियों से पिटते पिटते ही, तलवार चलाना सीख गए !

मालिक गुस्ताखी माफ़ करें,घरबार हिफाज़त से रखना
बस्ती के बाहर भी रहकर, हम आग जलाना सीख गये !

बेपर्दा घर, जूता, गाली, मजदूरी कर हम  बड़े हुए !
जाने कब, ऊंचे महलों की दीवार गिराना सीख गए ! 

तेरे जैसा ही जीवन पाकर, पशुओं जैसा बर्ताव मिला,
मालिक ये हाथ रखें नीचे, हम हाथ उठाना सीख गए !

Monday, June 15, 2015

तेरे झंडों से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा - सतीश सक्सेना

जो यहाँ जन्में उन्ही का देश माना जाएगा !
तेरे झंडों  से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा !

साधू,बाबा,तांत्रिकों ने देश शर्मिन्दा किया 
आस्था से धन कमाने का ज़माना जाएगा !

शहर जीता जब उन्होंने तब नशे में लोग थे 
होश आने दे शहर को ये ठिकाना जाएगा !

शुक्र है अब नौजवां, अंधे नहीं इस देश के
नबी के बच्चों से झगडे का बहाना जाएगा !

मिटा पाओगे निशां,अल्बर्ट,सेखों,हमीद के ?
सरजमीं पे उन्हीं का अधिकार माना जाएगा !

Saturday, April 25, 2015

किन्नर मन्नू महंत से बातचीत - सतीश सक्सेना

पिछले सप्ताह दिन में एक काल आयीं जिसमें अगर समय हो तो बात करने का अनुरोध था , दूसरी तरफ हरियाणा से मन्नू महंत
नामक किन्नर मुझसे अपने समाज के बारे में बात करना चाहते थे !उनसे बात करते समय यह लगभग साफ़ था कि वे अपनी बात कहने में बेहद गंभीर, व्यवस्थित और विद्वान थे और हरियाणा में अपनी गद्दी के प्रधान भी !  
इन्होने मेरा एक लेख पढ़कर ही मुझे फोन किया था , मेरे लेख एवं किन्नरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण के प्रति धन्यवाद कहते हुए उन्होंने लगभग आधा घंटा बात की जिसमें अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति समाज से शिकायत और बेहतर सम्मान की मांग शामिल थी  !
किन्नरों के प्रति समाज का रवैया न्याय पूर्ण नहीं है इसमें कोई संदेह नहीं , इन्हें समाज हमेशा शक की नज़र से ही देखता है व इनकी समस्याओं और स्थिति को जाने बिना , बदले में सिर्फ भय और नफरत ही देता है !
मानवता दया करुणा के नाम पर बड़ी बड़ी बातें करते हम लोग किन्नरों के प्रति जानवरों से भी खराब रवैया अख्तियार करते हैं , वे लोग सामान्य व्यक्तियों की भांति जीवन यापन करना चाहते हैं जो समाज करने नहीं देता ! 

किन्नर आदिकाल से पाये जाते हैं , पौराणिक काल में शिव के एक अवतार अर्धनारीश्वर की चर्चा है जिनका आधा
भाग नारी और आधा पुरुष का था , किन्नर शिव के इस रूप को पूजते हैं ! महाभारत में भी इनकी चर्चा है कि द्रुपद पुत्र शिखंडी, स्त्री स्वरूपा पैदा हुआ था, और उसकी आड़ में अर्जुन ने भीष्म पर तीर चलाये थे , चूंकि भीष्म की प्रतिज्ञा थी कि वे किन्नरों पर , निहत्थों पर एवं स्त्री पर प्रहार नहीं करेंगे युद्ध भूमि में पिछले जन्म की अम्बा को शिखंडी रूप में पहचान, उन्होंने हथियार एक और रख दिए और किन्नर शिखंडी की आड़ से, अर्जुन को भीष्म पर घातक वार करने का मौका मिला !

इनके बारे में तमाम गलत धारणाएं समाज में फैलायी गयी हैं , जिन लोगों को इनसे कोई सहानुभूति नहीं वही इनके बारे में सबसे अधिक अनर्गल प्रचार करते हैं !वे नाच गा कर  भिक्षा यापन कर अपना गुज़ारा करते हैं , उनका यह भी दावा है कि वे यक्ष , गन्दर्भ, किन्नर समाज के लोग हैं और नाच गाना उनका पुरातन पेशा है , उन्हें अपनी स्थिति से कोई शिकायत नहीं  बल्कि उसे पसंद करते हैं , समाज से उन्हें एक ही शिकायत है कि अगर समाज उनका आदर न कर सके तो भी उसे उनके अपमान का कोई अधिकार नहीं ! वे सूफी संत सम्प्रदाय की राह पर चलने वाले लोग हैं और उनकी दुआओं में उतनी ही शक्ति है जितनी किसी और और वास्तविक संत में ! 
इनके साथ अपराध होने की स्थिति में टेलीविजन मीडिया अथवा अखबारों में इन्हें कोई महत्व अथवा प्रमुखता नहीं दी जाती बल्कि इन्हें हेय व अपमानजनक दृष्टि से देखा जाता है !  वे अपने आपको किन्नर कहलाना पसंद करते है , हिजड़ा उर्फ़ छक्का शब्द एक गाली है जो इन्हें, निर्मम समाज की देन है , किन्नर हर धर्म का सम्मान करते व मानते  हैं , मृत्यु होने की दशा में किन्नरों को उनके धर्म  के आधार पर  दफनाया या जलाया जाता है !

इनको ट्रेन यात्रा अथवा बस यात्रा में कोई सीट नहीं देता चाहें यह बीमार ही क्यों न हों उनके साथ खाना पीना तो दूर लोग बैठना भी पसंद नहीं करते !
 अख़बारों के हिसाब से माने तो छत्तीस गढ़ में कोई कानून बनाने का प्रयत्न हो रहा है  जिसमें इन्हें ऑपरेशन द्वारा स्त्री या पुरुष बनाने की बात कही गयी है ? अगर यह सच है तो यह अमानवीय है ! उनका मानना है कि यह लोग अल्पमत में हैं और कम संख्या में हैं इनका सरंक्षण होना चाहिए न कि इन्हें समाप्त ही कर दिया जाये !

इनकी देवी का नाम  बहुचरा माता है जिनका मंदिर बलोल , संथाल , गुजरात में है !  मन्नू महंत का कहना है कि 

" चाहे इस्लाम हो या हिन्दू , हर धर्म में इन्हें सम्मान दिया गया है और इनकी चर्चा है ! वे आगे कहते हैं कि हाल में उन्होंने पढ़ा है कि किन्नरों को ऑपरेशन द्वारा महिला या पुरुष बना दिया जाएगा कितने दुर्भाग्य की बात है कि जिस भारत देश में किन्नरों को साधू संत और असली फ़क़ीर माना जाता है उनके अगर सुबह दर्शन हो जाएँ तो माना जाता है कि सारे आज काम पूर्ण होंगे , जिन्हे अल्लाह , वाहे गुरु , यीशु मसीह , भगवान के बहुत करीब माना जाता है वही मालिक के बन्दे अपनी पहचान के लिए भी किसी सरकार या हुकूमत के आगे मज़बूर हैं क्या इनके हकों के लिए क़ानून बनाने से पहले इनसे पूंछना जरूरी नहीं ?
क्या आपको नहीं लगता कि वे उन बेजुबान जानवरों में से नहीं जिनके बारे में कानून बनाने से पहले उनसे पूंछा भी नहीं जाता ? क्या आपको नहीं लगता कि कुदरत और प्रकृति से छेड़छाड़ करना गलत है ?
किन्नर अपनी जिन्दगी से बहुत खुश हैं वो सबको दुआएं देते हैं , सबका भला चाहते हैं , वे सूफी साधू संत हैं , भिक्षा यापन से गुज़ारा करते हैं  और ऐसे ही रहना चाहते हैं उन्हें नौकरी आदि कुछ नहीं चाहिए अगर समाज या सरकार उन्हें कुछ देना चाहती है तो उनके थोड़ी इज़्ज़त दे इस पंथ का अपमान न करे !"  
मन्नू महंत, गद्दी नशीन गुरु, गांव -भुन्ना ,तहसील - गुहला, जिला कैथल, हरियाणा -136034 
फोन - 9991789432 

-नई दिल्ली। भारतीय संसद के इतिहास में 40 साल बाद कोई निजी विधेयक कानून बनने की दहलीज पर खड़ा हुआ है जो किन्नरों को समाज में बराबरी के अधिकार देने की क्रांतिकारी नींव रखेगा।
राज्यसभा ने शुक्रवार को यह ऐतिहासिक पहल द्रमुक के तिरूचि शिवा की ओर से पेश किये गये इस गैर सरकारी विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। यह विधेयक अब लोकसभा के दरवाजे पहुंच गया है जहां यह तय होगा कि यह कानून का रूप ले पाता है या नहीं।
इसके बाद विधेयक सदन के नियमों के अनुसार विचार और पारित करने के लिए पेश किया जायेगा। किन्नरों के प्रति सहानुभूति देखते हुए सरकार लोकसभा में भी इस विधेयक के समर्थन में आ सकती है जहां सरकार का बहुमत है।
राज्यसभा में सदन के नेता अरूण जेटली का कहना था कि इस संवेदनशील मुददे पर सदन बंटा हुआ नजर नहीं आना चाहिए। राज्यसभा में सख्याबल के आधार पर मजबूत स्थिति में खड़े विपक्ष ने इस गैर सरकारी विधेयक के पीछे अपनी ताकत झोंक दी जिसके सामने सरकार इसे ध्वनिमत से पारित कराने पर सहमत हो गई है।
- India, probably the world, will get its first transgender college principal when Manabi Bandopadhyay takes charge of Krishnagar Women's College in West Bengal


किन्नरों के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएँ !

Thursday, April 2, 2015

जागो देशवासियों अब भी समय बचा - सतीश सक्सेना

चलो गांव की ओर, व्यथाएँ  बांटेंगे, 
इकले नहीं किसान यकीन दिलाएंगे 

कसमें खाकर घर से पैदल आये हैं 
भूखे नहीं किसान कभी सो पाएंगे !

अन्न उगाने वाले क्यों कमजोर रहें 
आत्मचेतना,बोध,विवेक जगायेंगे !

हो आनंद  हमेशा इनके आँगन में 
इन चौपालों में,सौभाग्य जगायेंगे !

जागो देशवासियों ! वरना भारत में
खद्दरधारी दीमक , जश्न मनाएंगे !

कृषिप्रधान देश की खेती चाट गए
अब गरीब की रोटी,चट कर जाएंगे ! 

हिम्मत हारें नहीं,समय वह आएगा
खलिहानों में जीवनदीप जलायेंगे !

(यवतमाळ पदयात्रा 15 से  19 april के अवसर पर )

Tuesday, December 23, 2014

कर न पायीं बातें ग़ज़लें , हंसने और हंसाने की - सतीश सक्सेना

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये , जीने और जिलाने की !
कफ़न आ गया बाजारों में, बातें सबक सिखाने की 

अम्बर चाँद सितारे हम पर, नज़र लगाए रहते हैं,
कैसे नज़र इनायत होगी साक़ी औ मयखाने की !

सुबह सवेरे तौबा करते , अब न हाथ लगाएंगे !
रोज शाम आवाजें आतीं पीने और पिलाने की !

रंज भुलाकर साथ बैठकर हंसना खाना पीना है 
यहाँ न ऐसी बातें करिए , रोने और रुलाने की !

इश्क़, बेरुखी, रोने धोने, से भी कुछ आगे आयें  
कर न पायीं बातें ग़ज़लें, हंसने और हंसाने की !

Wednesday, August 6, 2014

खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को - सतीश सक्सेना

किन्हीं गुरुजन के सम्मान में जवाब के कुछ अंश :
आप विद्वान् हैं , मैं विद्वान नहीं हूँ और न विद्वता खोजने निकला हूँ , साहित्य को आगे ले जाना मेरा लक्ष्य नहीं है भाई जी , मेरा लक्ष्य है समाज के पाखण्ड और अपने चेहरों पर लगे मुखौटे उतार कर , सिर्फ इंसान बन पाने की तमन्ना ! अपना कार्य कर रहा हूँ और बिना नाम चाहने की इच्छा के ! सो मुझे यश नहीं चाहिए हाँ सरल भाषा के जरिये अगर कुछ लोग भी इन्हें आत्मसात कर पाए तो लेखन सफल मानूंगा !
मुखौटे उतारने होंगे 
आज कवि और साहित्यकार भांड होकर रह गए हैं पुरस्कारों के लालच में , लोगों के पैर चाटते हुए कवि अब घर, समाज, परिवार सुधार पर नहीं लिखते , धन कमाने को लिखते हैं ! इन्हें समझाने के लिए नियमों में बिना बंधे, काम करना होगा, साहित्यकारों को बताना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनके भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः अनपढ़ और सामान्य जन से उनकी कविता बहुत दूर चली गयी है , अब उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने के लिए नहीं लिखी जातीं  वे सिर्फ आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
भाव अभिव्यक्ति के लिए कवि किसी शैली का दास नहीं हो सकता , कविता सोंच कर नहीं लिखी जाती उसका अपना प्रवाह है बड़े भाई , अगर उसमें बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! तुलसी और कबीर ने किस नियम का पालन किया था ! आज भी, कुछ उनके शिष्य हो सकते हैं !
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
जहाँ तक गद्य की बात है मैंने लगभग ४५० रचनाएं की हैं उनमें कविता और ग़ज़ल लगभग २०० होंगी बाकी सब लेख हैं जो समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं , आपसे बहुत छोटा हूँ मगर कोई धारणा बनाने से पूर्व हो सके तो इन्हें पढियेगा अगर बड़ों का आशीर्वाद मिल सका तो धन्य मानूंगा !!
बहुत ज़ल्द ही ढोंग, मिटाने जागेंगे ,दुनिया वाले,
खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को !
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ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे ?
हानि लाभ का लेखा लिखते ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

Saturday, June 28, 2014

कौन जाने यह विधाता कौन है ? - सतीश सक्सेना

ऐसी दुनियां को बनाता कौन है ?
कौन जाने,यह विधाता कौन है ?

इस बुढ़ापे में, नज़र क़ाफ़िर हुई,
वरना ऐसे , गुनगुनाता कौन है ?

इश्क़ की पहचान होनी चाहिए
बे वजह यूँ, मुस्कराता कौन है ?

आपको तो, काफिरों से इश्क है !
वर्ना इनको मुंह लगाता कौन है ?

चलके वृन्दावन में ही पहचान हो 
काफिरों को घर बुलाता कौन है ?

Sunday, April 13, 2014

अब तो मंदिर के इश्तिहार छपाया करिये -सतीश सक्सेना

धर्म की आड़ में,दुश्मन को डराया करिये !
दहशते भीड़ को, वोटों से भुनाया करिये !

इसी  दुनियां  में , दरिंदे भी तो पाये जाते
कभी लोबान को,बस्ती में घुमाया करिये !

काश लड़ते हुए मंदिर औ मस्जिदों के लिए 
कोई  कबीर भी , मिलने को बुलाया करिये !

सियासी दावतें, अक्सर ही खूब छपती हैं , 
कभी गरीब को इफ़्तार, खिलाया करिये !

आजकल आपकी, हैवानियत के चरचे हैं !
अजी ये रात की बातें, तो छिपाया करिये !

Saturday, February 1, 2014

लानत है, इस संकीर्ण सोंच के लिए - सतीश सक्सेना

कल इसी देश के एक बच्चे को पीट पीट कर राजधानी में मार दिया गया जबकि वह अपना प्रान्त और भाषा छोड़ कर सबसे विकसित शहर दिल्ली में शिक्षा लेने आया था ! सुदूर उत्तर पूर्व क्षेत्र के, हमारे यह सीधे साधे देशवासी, भारत वासी होने का क्या अभिमान करें ?

जाति, धर्म, भाषा और प्रांतीयता में आकंठ डूबे, विद्वता का दम भरते, हम संकीर्ण भारतीय, मरते दम तक अपने अपने झंडे उठाये, आपस में एक दुसरे को भला बुरा कहते रहेंगे बस यही हमारी पहचान है ! इस पूरे देश को, १९४७ से पूर्व ३०० - ४०० राज्यों में बाँट देना चाहिए और हम उसी छुद्र अभिमान के योग्य हैं !     

हमारी संकुचित अशिक्षित मनस्थिति, हज़ारों किलोमीटर दूर फैले, हमारे ही विभिन्न रीतिरिवाज और संस्कृतियों को अपनाने में बुरी तरह फेल हुई है ! बिहारी, मराठी, गुजराती, मद्रासी मानसिकता में साँसे भरते हम संकीर्ण देसी लोग, विश्व में कहीं रहने योग्य नहीं हैं !       

यह देश अब एक विकलांग सोंच  का मालिक है जहाँ औरों से घृणा के अलावा और कुछ नहीं है  हम भारतीयों  के पास, शायद विश्व के सबसे संकीर्णमना देशों में से एक हैं हम !

यह देश सभ्य लोगों के रहने योग्य नहीं !
Ref : http://indianexpress.com/article/cities/delhi/delhi-arunachal-boy-beaten-to-death-by-shopkeepers-in-lajpat-nagar-say-reports/

Thursday, October 10, 2013

जब से तालिबान जन्में हैं, विश्व में नफरत आई है - सतीश सक्सेना

तालिबानियों ने,गैरों से द्वेष की फितरत पायी है !
जहाँ गए ये,उठा किताबें, वहीँ हिकारत पायी है !

हैरत में हैं लोग,  इन्होने नफरत  , खूब उगायी है !
इनकी संगति में नन्हों ने ,खूब  अदावत पायी है !

लगता पिछली रात , चाँद ने , अंगारे बरसाए थे !
बहते पानी में भी हमने , आज  हरारत  पायी है ! 

हवा,नदी,मिटटी की खुशबू,कब्ज़ा कर के खायेंगे !  
अपनी मां के टुकड़े करने की भी हिम्मत पायी है !

घर के आँगन में ,बबूल के पौधे ,रोज़ सींचते हैं !
इन्हें देखकर बच्चे सहमें, ऎसी  सूरत  पायी है  !

Saturday, July 27, 2013

हमारे मासूम खतरे में हैं ..-सतीश सक्सेना

तालिबानी चाहे वे हिन्दू हों अथवा मुसलमान, उनका प्रसार रुकना चाहिए अन्यथा हमारे मासूम खतरे में हैं ..

यह अभिशाप ही नहीं, अपराध है मानवता के प्रति , अपराध है, परिवार और छोटे छोटे मासूम बच्चों के प्रति,जो हमारी ओर , सहारे के लिए देखते हैं..मौलवियों और पंडितों ने हमारी कच्ची बुद्धि को, अपने प्रभाव में लेते हुए, हमसे उस बच्चे को छीन लिया जो दोनों हाथ उठाये, अपने दूसरे मित्र से कहता है आओ खेलने चलें जब तक अम्मा न डांटे, हम सिर्फ खेलेंगे !

जिन्होंने हमें जन्म के कुछ समय बाद ही,  हिन्दू और मुसलमान बना दिया धिक्कार है उन धार्मिक शिक्षाओं को...

जिन्होंने हमारी समझ में, एक दुसरे के प्रति नफरत भर दी, धिक्कार है उन धर्म गुरुओं को ...

और धिक्कार है हमारी मंद बुद्धि को जो धर्म के पढाये पाठ के नशे में अंधे होकर , इंसानियत ,प्यार और अपना बचा हुआ थोडा सा जीवन  भूल गए !

अपनी बस्ती में ज़हर बिखेरते, इन धार्मिक पंडितों को यह नहीं मालुम कि सबसे पहले इस विष का प्रभाव, तुम्हारे अपने मासूमों पर ही पड़ेगा , ऐसा न हो कि सबसे पहले तुम्हारा ही बच्चा, तुम्हारी दी हुई शिक्षा का शिकार बने ...

अपने समाज और धर्म को ऊंचा उठाने के सपने देखने वाले धर्म ज्ञानियों  !!!
पहले एक साथ रहना तो सीख लो ..??

अभी तुम्हें दुसरे धर्म से नफरत है ...
तुम्हें एक देश से नफरत  है….

तुम्हे अपने देश में एक प्रांत के लोगों से नफरत है .. 
तुम्हें दूसरी जाति से नफरत है  ..
प्यार और मित्रता तुम जाति देख कर करते हो  ..
तुम अपने धर्म की रक्षा के लिए दूसरों की जान भी ले सकते हो …. 
तुम कितने संकीर्ण बुद्धि और अनपढ़ हो , तुमसे कुछ भी सकारात्मक होना संभव ही नहीं अतः आओ इस शानदार देश को युद्ध के अखाड़े में तब्दील करदो !! 

अक्सर ऐसे लोगों की मृत्यु, उन्ही जैसे निर्दयी लोगों के हाथ अथवा परिस्थितियों में होती है और वे वीरता का नाम जपते जपते "शहीद" होते हैं और ऐसे शहीद यदि पहले ही मारे जाएँ तो मां के प्रति एक अहसान होगा !

अरे विद्वान् मित्रों  !!! 


-हम पैदा न हिन्दू हुए थे और न मुसलमान , हम इंसान थे बस उस वक्त हम देश, जाति, राजनैतिक पार्टी एवं धर्म की सीमाओं में नहीं बंधे थे ..
-इन सबका नाम, हम कायर डरपोकों ने, बाद में अपनी पीठ पर, लिखवा लिया और आज हम इनके गुलाम हैं !

-हम मानव है और बचे हुए २०-३० वर्ष के जीवन में , इंसान से प्यार कर हँसते हुए, जीने का प्रयत्न करें
इस जंगल नुमा क्षेत्र में अपने बच्चों को सही शिक्षा दें और भेडियों से बचा लें वही काफी होगा


-कुछ वर्ष जीवन के अगर बचे हैं , तो उन्हें विश्व बंधुत्व की भावना में, मानवता के नाम समर्पित करते हुए आनंद लें , पूरे विश्व को ,अपना घर मानकर जियें , और सबसे प्रेम में आनंद महसूस करें !  

-ध्यान रहे एक दूसरे से नफरत करने वाले भेडिये केवल तुम्हारे ही धर्म में नहीं है वे हर जगह मिलते हैं
बेहतर है इनसे और इनकी विचारधारा से दूर रहा जाए  !

Sunday, August 19, 2012

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख -सतीश सक्सेना

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख,
जिससे घर का सम्मान बढ़े ,
कुछ कागज काले कर ऐसे,
जिससे आपस में प्यार बढ़े

रहमत चाचा से गले मिलें,
होली और ईद साथ आकर !
तो रक्त पिपासु दरिंदों को,नरसिंह बहुत मिल जायेंगे !


विध्वंसक भीड़ सामने हो ,
कोई साथी नज़र नही आए !

हर तरफ धधकते शोलों में, 
शीतल जल नज़र नहीं आये !
कुछ नयी कहानी ऐसी लिख,
जिससे अंगारे ठन्डे  हों !
मानवता के मतवालों को, हमदर्द बहुत मिल जायेंगे !

कुछ तान नयी छेड़ो ऐसी
झंकार उठे, सारा मंज़र ,
कुछ ऐसी, परम्परा जन्में ,

हंस गले मिलें फेंकें खंज़र,
होली पर, मोहिद रंग खेलें, 

गौरव हों दुखी, मुहर्रम पर !
तब  धर्म युद्ध में कंधे को , सारथी बहुत  मिल जायेंगे !


वह दिन आएगा बहुत जल्द
नफरत के सौदागर ! सुनलें ,
जब माहे मुबारक के मौके,
जगमग होगा बुतखाना भी !

मुस्लिम बच्चे,  प्रसाद लेते , 
मन्दिर में ,  देखे जायेंगे !
और ईद मुबारक के मौके, हमराह बहुत मिल जाएंगे !

ये जहर उगलते लोग हमें 
आपस में, मरवा डालेंगे !
अपने घर की दीवारों में 
रंजिश का बिरवा बोयेंगे  !
चौकस रहना  शैतानों से , 

जो हम लोगों  के बीच रहें  !
तू आँख खोल पहचान इन्हें,जयचंद बहुत मिल जायेंगे !

Saturday, December 17, 2011

अब शब्दों की जिम्मेदारी -सतीश सक्सेना


पिछली पोस्ट में प्रवीण पाण्डेय की टिप्पणी पढ़कर देखता ही रह गया ...
"मैंने तो मन की लिख डाली, 
अब शब्दों की जिम्मेदारी  ! "और उनको एक पत्र लिखा ...
प्रवीण भाई,
आपकी दी हुई उपरोक्त दो लाइने अच्छी लगी हैं ! इस गीत को आगे पूरा करने का दिल है ...इजाज़त दें तो  ... :-) 
और जवाब तुरंत आया ....
आपको पूरा अधिकार है, निश्चय ही बहुत सुन्दर सृजन होगा, कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं मैने भी पर भाव अलग हैं। प्रतीक्षा रहेगी आपके गीत की। सादर ,   प्रवीण
प्रवीण पाण्डेय,मेरी नज़र में बहुत ऊंचा स्थान ही नहीं रखते अपितु उनकी रचनाओं से हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है ! हिंदी भाषा का यह सौम्य सपूत वास्तव में बहुत आदर योग्य है ! 
उनके प्रति आभार के साथ, इस रचना का आनंद लें ...अगर आप लोग आनंदित हुए तो रचना सफल मानी जायेगी !

रचनाकारों की नगरी में 
मैंने कुछ रंग लगाये हैं 
अंतर्मन से ही नज़र पड़े 
ऐसे  अरमान जगाये हैं  !
मानवता गौरवशाली हो 
तब झूम उठे, दुनिया सारी !
मैंने तो मन की लिख डाली, अब शब्दों की जिम्मेदारी  !

ये शब्द ह्रदय से निकले हैं 

इन पर न कोई संशय आये
वाक्यों  के अर्थ बहुत से हैं,
अपने  भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की , 
हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी !
जाने क्या अर्थ निकालेगी, इन छंदों का,  दुनिया सारी !

असहाय, नासमझ जीवों  की 

आवाज़ उठाना लाजिम है !
मानव की कुछ करतूतों से  
आवरण उठाना वाजिब है !
पाशविक प्रवृत्ति का नाश करे,
मानवता हो, मंगल कारी
इच्छा है, अपनी भूलों को , स्वीकार करे दुनिया सारी !

जिस तरह  प्रकृति का नाश ,

करें खुद ही मानव की संताने
फल,फूल,नदी,झरते झरने
यादें लगती, बीते  कल  की  !
गहरा प्रभाव छोड़े अपना , 
कुछ ऐसी करें कलमकारी !
प्रकृति की अनुपम रचना का, सम्मान करे दुनिया सारी !

मृदु भावों का अहसास रहे ,

पिछली पीढ़ी का ध्यान रहे
बचपन से, मांगे  मुक्त हंसी
स्वागत सबका, सम्मान रहे !
दुश्मनी रंजिशें भूल अगर,
झूमेगी तब महफ़िल सारी !
यदि गैरों की भी पीड़ा का ,अहसास करे दुनिया भारी !

बच्चों को  टोकें , हंसने से !

कलियों को रोकें खिलने से
हर हृदय कष्ट में आ जाता 
आस्था पर प्रश्न उठाने से !
क्रोधित मन, कुंठाएँ पालें, 
ये बुद्धि गयी  कैसे मारी ! 
गुरुकुल की, शिक्षाएँ भूले , यह कैसी है पहरेदारी !

कुछ ऐसा राग रचें मिलकर

सुनकर उल्लास उठे मन से
कुछ ऐसा मृदु संगीत  बजे 
सब बाहर आयें ,घरोंदों से !
यदि गीतों में  झंकार न हो,
तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी  !
हर रचना के मूल्यांकन में इन शब्दों की जिम्मेदारी !

Saturday, April 23, 2011

आओ, कुछ हम भी रंग बदलें - सतीश सक्सेना

                   अक्सर समाज में हम लोग दुहरे चेहरे के साथ जीते हैं ! पूरे जीवन, अपनी झूठी शानोशौकत से लदेफदे हम लोग , हर समय अपना काम येन केन प्रकारेण, निकालने में व्यस्त रहते हैं ! अपना काम निकालने के लिए , बेईमान जीवन के इन विभिन्न स्वरूपों को इस हलकी फुलकी  हास्य रचना के माध्यम से ढालने का प्रयत्न है, अगर इसे पढ़कर आप मुस्करा दिए तो इसका लिखना सार्थक हो जाएगा ! 


आओ हम भी कुछ नाम करें 
कुछ छपने लायक काम करें 
इक जैकपॉट लग जाये और 
बस जीवन भर आराम करें  
दुनिया न्योछावर हो हम पर, 
मोहक स्वरुप  के क्या कहने 
बगुला करले ख़ुदकुशी देख, जब जब हम अपना रंग बदलें 

हम चोरों और उचक्कों को 
उस्तादी के गुण सिखलाएं 
खुद परमब्रह्म भी  घबराएं 
जब हम  पूजा करने बैठें  ! 
भरपेट,आमरण अनशन कर, 
जब गाँधीवादी   बन  जाएँ !
सारा समाज भौचक्का हो,जब जब हम अपना रंग बदलें !

दयनीय भाव के साथ साथ 
हम हाथ जोड़, बेटी व्याहें
भरपूर गर्व के साथ साथ
हम पुत्र वधू  लेने  जाएँ  !
मंडप में क्रोधित रूप लिए , 
हम लगते विश्वविजेता से,
समधी बेचारे गश खाएं,जब जब हम अपना रंग बदलें !

माथे पर चन्दन तिलक लगा,
जब पीत वस्त्र धारण करते  !
शुक्राचार्यों की समझ  लिए ,
गुरु वशिष्ठ  जैसा  रूप  रखें !  
सन्यासी करते  त्राहि त्राहि, 
जब हम संतों  सा  वेश रखें  ! 
गिरगिट शर्मिंदा हो भागे ,जब जब हम अपना रंग बदलें  !

Friday, April 22, 2011

मानवता के लिए बलिदान दिवस -सतीश सक्सेना

गुड फ्राई डे, त्याग और वलिदान का दिन है ! आज के दिन विश्व, ईसु मसीह के कष्टों को याद करता है , मानव जाति के कल्याण के लिए, अपने हाथों पैरों में कील ठुकवाते, ये महात्मा, इस दुनिया को छोड़ गए थे ,इस आशा में कि शायद मानव जाति कभी सबक लेगी !

शायद अभी कुछ और समय लगेगा जब हम , अपने मत को न मानने वालों  से नफरत करना बंद कर पायेंगे ! 

शायद अभी और वक्त लगेगा जब हम दूसरों की श्रद्धा का उपहास बनाना  बंद कर पाने में समर्थ होंगे ! 

मैं अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ उनको नमन करता हूँ !

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